घर की सुख शांति के लिये पापा के परस्त्रीगमन का उत्तराधिकारी बना-1

(Ghar Ki Sukh Shanti Ke Liye Papa Ki Maal Ko Choda- part 1)

This story is part of a series:

अन्तर्वासना के पाठकों एवं पाठिकाओं को सिद्धार्थ का प्रणाम।
आशा करता हूँ कि ईश्वर की कृपा से आप सब सुखी होंगे एवं अन्तर्वासना में प्रकाशित होने वाली रचनाएं आप सब को रोमांचित करने के अलावा आनंद एवं संतुष्टि भी प्रदान कर रही होंगी।
उसी आनंद एवं संतुष्टि में थोड़ी सी वृद्धि करने के लिए मैं अपने एक पाठशाला काल के परम मित्र श्री अनुराग शर्मा के जीवन के कुछ अंश इस रचना में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

अनुराग और मैं पहली कक्षा से दसवीं कक्षा तक एक साथ पढ़े थे और उन लड़कपन के दिनों में सभी प्रकार की अच्छी एवं गंदी गतिविधियों में एक साथ भाग लिया था।
दसवीं की परीक्षा में मैं तो उत्तीर्ण हो गया था लेकिन अनुराग की एक विषय में असफल हो जाने के कारण मुझसे एक वर्ष पिछड़ गया तथा जब मैं आगे की पढ़ाई के लिए छात्रावास में चला गया तब उसका और मेरा साथ भी बिछड़ भी गया।
मैं दसवीं के बाद के छह वर्षों में इंजीनियरिंग तक की पढ़ाई करने के उपरान्त भोपाल में स्थित एक उद्योग में नौकरी करने लगा था जबकि अनुराग मेरे एक वर्ष बाद इंजीनियरिंग करके दूसरे शहर में नौकरी करता था।

लगभग दस वर्षों में से आठ वर्षों तक तो हम दोनों की कोई मुलाकात नहीं हुई थी लेकिन इस दौरान हमारे बीच सामान्य पत्राचार ही चलता रहता था।
लगभग दो वर्ष पहले जिस उद्योग में मैं काम करता हूँ उसी में अनुराग को भी नौकरी मिल गयी और तब से हम दोनों का पहले जैसा साथ हो गया।
पिछले दो वर्षों से हम रहते तो एक ही शहर में हैं लेकिन अलग अलग क्योंकि जिस उद्योग मैं काम करता हूँ मैं उसके आवासीय परिसर के एक फ्लैट में रहता हूँ और अनुराग ने शहर में एक कमरा किराये पर ले कर उसमें रहता है।

कभी कभार शनिवार और रविवार की छुट्टी के दिन वह मेरे घर पर ही रहने आ जाता है और तब हम बचपन की भूली बिसरी बातें याद करते हैं तथा दसवीं के बाद अलग बिताये सात वर्षों के जीवन में घटी घटनाओं को साझा करते हैं।

अनुराग के साथ बिताये उन शनिवार एवं रविवार में उसने अपने जीवन में घटित एक घटना का विवरण मेरे साथ साझा किया है जिसे मैं उसी के शब्दों में एक रचना के रूप में सम्पादित करके प्रस्तुत कर रहा हूँ।

***

मेरा नाम अनुराग शर्मा है और मैं पच्चीस वर्ष का हूँ तथा मैं पिछले दो वर्षों से भोपाल में एक बड़े उद्योग में कार्य कर रहा हूँ।
जैसा कि मेरे परम मित्र सिद्धार्थ ने बताया है कि मैं एक बार दसवीं में असफल हो कर उससे एक वर्ष पीछे हो गया था तब मेरी आयु पन्द्रह वर्ष की थी।
लेकिन अगले वर्ष मेहनत कर के मैं बहुत अच्छे नम्बरों सफल भी हो गया और शहर के दूसरे स्कूल में बारहवीं तक पढ़ाई कर के पूरे जिले में पहले स्थान पर भी आया।
जिले में पहला स्थान प्राप्त करने के कारण मुझे स्थानीय इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला मिल गया और सिद्धार्थ के इंजीनियर बनने के एक वर्ष बाद मैं भी इंजीनियर बन गया।

जिन दिनों मैं इंजीनियरिंग की दूसरी छमाही में था तब एक रात साढ़े ग्यारह बजे मम्मी और पापा की जोर जोर से बहस करने की आवाज़ ने मेरी नींद भंग हो गयी।
यह जानने के लिए की उनमें किस बारे में बहस हो रही है मैं उनके कमरे की ओर बढ़ रहा था तभी मम्मी को कहते सुना- लगता है अब आपका मुझसे मन भर गया है और आपको कोई दूसरी मिल गयी है।

मम्मी की बात सुनते ही मेरे कदम रुक गए और मैं उनके कमरे के दरवाज़े के बाहर ही खड़ा होकर उनकी बातें सुनने लगा तभी पापा बोले- अरे नहीं जानेमन, मेरी ज़िन्दगी में तो सिर्फ तुम ही हो और कोई नहीं है। तुम मुझमें ऐसा क्या बदलाव देख लिया है कि जो ऐसी बात बोल रही हो?
गुस्से से ऊँचे स्वर में मम्मी बोली- मुझसे झूठ मत बोलो, मैंने कई बार तुम्हें नीचे वाली ऋतु के साथ सीढ़ियों में हंस हंस कर बातें करते देखा है। मेरे साथ तो तुम सदा सड़े मुंह से बात करते हो और उलटे जवाब देते रहते हो।

उन दोनों की ऐसी बातें सुन कर मैंने सोचा कि पति पत्नी की आपस की सामान्य बात हो रही है और वापिस अपने कमरे की ओर मुड़ा ही था तभी मम्मी को कहते सुना- पहले तो रोज़ सहवास करने के लिए मेरे पीछे पड़े रहते थे लेकिन अब मेरे बार कहने पर भी तुम मेरे पास तक नहीं आते। क्या अब तुम मुझे यौन आनंद एवं संतुष्टि प्रदान करने की ज़रूरत नहीं समझते हो? क्या तुम बता सकते हो कि तुमने पिछले पन्द्रह दिन में मेरे साथ एक बार भी सहवास क्यों नहीं किया है?

मम्मी की बात के उत्तर में पापा ने कहा- आजकल ऑफिस में काम की बहुत अधिक भाग दौड़ होती है जिस कारण मैं बहुत थक जाता हूँ और रोजाना घर आने में भी देर हो जाती है। उस थकावट के कारण मुझे खाना खा कर लेटते ही नींद आ जाती है। मेरी रानी, मेरे पर विश्वास रखो और चलो अब इस बात की छोड़ो कर आओ मेरे पास आओ। आज मैं तुम्हें वही यौन आनंद एवं संतुष्टि दूंगा जो शादी के बाद दिया करता था।

पापा की बात सुन कर मैं समझ गया कि अब ये दोनों हमेशा की तरह लगभग पन्द्रह बीस मिनट तक यौन संसर्ग करेंगे और फिर एक दूसरे के साथ चिपक कर सो जायेंगे।
उस समय मुझे मम्मी पापा को सहवास करते देखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी क्योंकि पिछले चार वर्षों में मैं उनको कई बार सहवास करते हुए देख देख कर अपना एक वर्ष तथा बहुत सारी रातें खराब कर चुका था।
मेरे लिए तो उनका सहवास करना अब एक सामान्य दिनचर्या की तरह हो गया था और मुझे बहुत जोर की नींद आ रही थी इसलिए अपने कमरे में जा कर सो गया।

इस बात को तीन दिन गुज़र गए थे और मम्मी पापा के बीच में सुलह हो जाने के कारण घर के वातावरण में सुख शांति का वास था तभी उसी रात लगभग साढ़े ग्यारह बजे मुझे कमरे के बाहर कुछ आहट सुनाई दी।
मैंने चुपके से उठ कर बाहर जा कर देखा तो पाया कि पापा दबे पाँव सीढ़ियों का दरवाज़ा खोल कर नीचे जा रहे थे।

जब मैंने सीढ़ियों के ऊपर से नीचे झाँक कर उन्हें पहली मंजिल में ऋतु आंटी के दरवाजे को खटखटाते देखा तो बहुत असमंजस में पड़ गया।

कुछ क्षणों के बाद नीचे की मंजिल का दरवाज़ा खुला तथा उसमें से ऋतु आंटी निकली और पापा के गले लगती हुई उन्हें चूमती हुई अंदर ले जा कर दरवाज़ा बंद कर दिया।

मैं वापिस कमरे में जा कर लेटे हुए पापा के इस प्रकार चुपके से नीचे जाने के बारे में सोच रहा था तभी मुझे तीन दिन पहले मम्मी द्वारा ऋतु आंटी के बारे में कही बात याद आ गयी।
मैंने सोचा कि अगर पापा और ऋतु आंटी के बीच में कोई खिचड़ी पक रही है तो उसका असर हमारे घर पर अवश्य पड़ेगा तथा परिवार की सुख शांति मिटने के साथ हमारी घर गृहस्थी भी उजड़ जायेगी।
हमारी घर गृहस्थी को उजड़ने से बचाने के लिए मुझे क्या करना चाहिए इस बारे में सोचते हुए डेढ़ घंटा कब बीत गए मुझे पता नहीं चला तथा मेरी विचारधारा तब टूटी जब पापा के वापिस आने की आहट सुनाई दी।

उसके बाद मैंने अपने मस्तिष्क में चल रहे सभी विचारो को सुलाने के लिए करवट बदल ली और शीघ्र ही निंद्रा की गोद में चला गया।

अगले दिन सुबह रोजाना की तरह पापा ऑफिस तथा मैं कॉलेज चला गया और जब दोपहर को घर वापिस आया तब मम्मी को सामान बाँधे जाने के लिए तैयार देखा।
उस सामान को देख कर मेरे मस्तिष्क में मम्मी पापा की तीन रात पहले के झगड़े वाली बात कौंध गयी और चिंता हुई की शायद मम्मी को पापा का रात को नीचे जाने का पता चल गया था इसलिए वह घर छोड़ कर जा रही हैं।

लेकिन उनसे पूछने पर जब उन्होंने ने बताया की छोटे मामा का फ़ोन आया था कि मामी प्रसव के लिए अस्पताल में भरती थी इसलिए वह उनके पास जा रही थी.
तब मैं आश्वस्त हुआ।

मम्मी ने जाते समय बताया कि वे लगभग एक माह वहीं रहेंगी इसलिए उन्होंने हमारे खाने पीने और घर की साफ़ सफाई तथा अन्य काम के लिए कामवाली बाई से कह दिया था।
क्योंकि मम्मी ने पापा को फ़ोन पर सब बता दी थी इसलिए शाम को पापा ने मेरे साथ इस बारे में कोई बात नहीं की और रात का खाना खाने के बाद हम अपने अपने कमरे में सोने चले गए।

लगभग ग्यारह बजे मैं अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था तब मुझे बाहर कुछ आहट सुनाई दी और मैंने उठ कर देखा कि पापा बाहर का सीढ़ियों वाला दरवाज़ा खोल रहे थे।
मैं तुरंत अपना फ़ोन उठाया और उसका कैमरा चालू कर के पापा की हरकतों की वीडियो बनाना चालू कर दिया।

पिछले दिन की तरह पापा धीरे धीरे सीढ़ियाँ उतर कर पहली मंजिल के दरवाज़े के सामने खड़े हो कर उसे खटखटाया। कुछ ही क्षणों के बाद वह दरवाज़ा खुला और ऋतु आंटी ने बाहर आ कर पापा को झप्पी डाल के चूमा तथा उनका हाथ पकड़ कर उन्हें खींच कर घर के अंदर ले गयी।

मैं अपने घर वापिस आ गया और बिस्तर पर लेट कर सोने की कोशिश करता रहा लेकिन नींद नहीं आई।
पापा और ऋतु आंटी के उस समय नीचे वाले घर अंदर क्या कर रहे होंगे का बारे में कल्पना करता रहा जिस कारण नींद मुझसे कोसों दूर रही।
क्योंकि घर में कोई भी नहीं था इसलिए दो घंटे बीतने पर इस आशा से के पापा अब वापिस आने वाले होंगे, मैं उठ कर अपनी मंजिल की सीढ़ियों पर जाकर बैठ गया।
लगभग दस मिनट की प्रतीक्षा के बाद जैसे ही मुझे नीचे से आहट सुनाई दी वैसे ही मैंने मोबाइल का कैमरा चालू कर के वीडियो बनाने लगा।

पहली मंजिल का दरवाज़ा खुला और उसमें से पापा एवं ऋतु आंटी बाहर निकल कर कुछ देर बातें करते रहे और फिर उन्होंने आपस में आलिंगन करके एक दूसरे के होंठों को चूम कर अलग हुए।
जैसे ही पापा ने पहली सीढ़ी पर पाँव रखा मैंने भाग कर दरवाज़े को वैसे ही बंद कर दिया जैसा पापा कर गए थे तथा घर के अन्दर जाते ही अपने बिस्तर पर जा कर सो गया।

कहानी जारी रहेगी.
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