दीपावली के पटाखों की सौगात

लेखिका: अंजलि प्रधान
संपादक एवं प्रेषिका : शिप्रा

अन्तर्वासना के पाठकों एवं पाठिकाओं को शिप्रा का नमस्कार!
आप सबको मेरे द्वारा संपादित की गई मेरे भाई की दो रचनाएँ
इक्कीसवीं वर्षगांठ
और
डुबकी का खेल रिया के साथ
पर अभी तक अपने विचार भेजने के लिए बहुत धन्यवाद।

आज मैं आपके साथ साझा करने के लिए मेरी एक बहुत ही प्रिय पड़ोसिन सखी अंजलि प्रधान के द्वारा लिखे उसके जीवन के कुछ संस्मरण को सम्पादित कर के लाई हूँ।
अंजलि कौन है, कहाँ रहती है और मेरे उससे कैसे संबंध हैं यह सब आपको उसी के शब्दों में निम्नलिखित रचना से पता चल जायेंगे।
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अन्तर्वासना में प्रकाशित रचनाओं की पाठिकाओं एवं पाठकों को अंजलि का नमस्कार!

मैंने अपने अठाईस वसंत के छोटे से जीवन में कुछ अनुभव अर्जित किये हैं जिनको मैं अपनी एक निजी वार्षिक दैनंदिनी में लिखती रहती हूँ।
उसी वार्षिक दैनंदिनी में से मेरे अतीत के कुछ पृष्ठों को मेरी प्रिय पड़ोसिन सखी एवं मुंह बोली बड़ी बहन शिप्रा की सहायता से आपके साथ साझा कर रही हूँ।

हर इंसान के जीवन में जन्म का दिन, शादी का दिन, बच्चों के पैदा होने के दिन और ऐसे अनेक दिन होते है जिस की तारीखें वह भुलाना नहीं चाहता अथवा अगर कभी भुलाना चाहे तो भी भुला नहीं पता।
लेकिन मेरे जीवन में इन उपरोक्त दिनों के साथ साथ कुछ ऐसे अविस्मरणीय दिन भी आये थे जिन्होंने मेरे जीवन में गहरी छाप छोड़ गए कि अगर मैं उनको भुलाना भी चाहूँ तो भी कभी नहीं भुला पाऊंगी।
मेरे जीवन के उन अविस्मरणीय दिनों में से एक दिन ऐसा था जिसका उल्लेख करते ही मैं लज्जा से पानी पानी हो जाती हूँ और मेरे जिस्म के रोंगटे भी खड़े हो जाते हैं।

वह दिन 11 नवम्बर 2015 की दीपावली का था जिसके बारे में मैं दिन-रात ईश्वर से प्राथना करती रहती हूँ कि वैसा दिन किसी भी स्त्री के जीवनकाल में कभी भी नहीं आये। मैं उस दिन के सम्बन्ध में ईश्वर से ऐसी प्राथना क्यों करती हूँ इसके बारे में जानने के लिए आपको मेरी निम्नलिखित रचना को पढ़ना पड़ेगा।

29 फरवरी 2012 को मेरी शादी समीर प्रधान से हुई थी जो तब एक बहु-राष्ट्रीय आई टी कंपनी में काम करते थे।
लेकिन सन 2013 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और अपना निजी व्यवसाय शुरू कर दिया तथा पहले दो वर्षों की अनथक मेहनत से उन्होंने बहुत लाभ भी कमा लिया।

सन 2014 की दीपावली के दिन जब हम अपने किराये के घर की सजावट कर रहे थे तब मैंने समीर से अपना घर खरीद कर उसमें रहने की इच्छा प्रकट करी।
समीर ने भी जब मेरी बात का समर्थन किया तब हमने निर्णय ले लिया कि अगले एक वर्ष में अपना घर खरीद कर हम दीवाली उसी में मनाएंगे।

हुआ भी कुछ ऐसा कि सन 2015 की दीपावली से लगभग तीन माह पहले ही हमने खुद का घर खरीद कर उसे ठीक करा कर उसमें स्थानांतरित भी हो गए।
उस दीपावली के दिन को मैं अपने लिए बहुत ही शुभ मान रही थी क्योंकि उस दिन हम अपने खुद के ही घर में पहली दीपावली मना रहे थे।

हमारे उस तीन कमरे वाले एक मंजिला घर में एक बड़ा हॉल, दो मध्यम माप के कमरे, एक छोटा स्टोर, एक रसोई तथा एक बाथरूम है।
मैंने बड़े हॉल कमरे को बैठक तथा भोजन कक्ष बना दिया था और उसमें नया सोफे और खाने की मेज रख कर कई फोटो एवं सजावटी सामान से अलंकृत कर दिया था।

एक मध्यम माप के कमरे को हमने अपना शयनकक्ष बना कर उसमे डबल बैड और अन्य समान रख दिया था तथा उसके बगल में स्थित छोटे से स्टोर में मैंने अपनी अलमारी, खाली सूटकेस एवं बैग्स रख दिए थे।

दूसरे मध्यम माप के कमरे को मैंने अतिथि-गृह बना दिया था लेकिन अपनी दैनिक गतिविधियों के लिए भी प्रयोग करती थी।
मेरी प्रिय पड़ोसिन सखी शिप्रा (जिसे मैं अब दीदी कहती हूँ) हमारे घर के सामने वाले घर में ही रहती है और उनका भी अपना खुद का बँगला है। वह उस कॉलोनी में पिछले पाँच वर्ष से रही थी और आस-पास के सभी पड़ोसियों से उनकी अच्छी दोस्ती है।

जब हम पहले दिन अपने नए घर में सामान स्थानान्तरण कर रहे थे तब दीदी ने ही बिना मांगे हमारी बहुत सहायता करी थी। बहुत मना करने के बावजूद दीदी ने पूरे दिन की चाय पानी से लेकर दोपहर का खाना, शाम का चाय नाश्ता तथा रात का खाना उनके घर पर ही कराया था।

इसके बाद दीदी ने मुझे घर में स्थानांतरित किये सामान को ठीक से लगाने में भी मेरी बहुत सहायता करी जिस कारण तीन ही दिनों में मेरा घर पूर्णतया व्यवस्थित हो गया था।
इन तीन दिनों में मुझे ऐसा लगने लगा कि मैं उस कॉलोनी के नए घर में कई दिनों से रह रही हूँ तथा दीदी को तो जैसे कई वर्षों से जानती हूँ और वह भी मेरे परिवार का एक महत्वपूर्ण सदस्य है।
दीदी की वजह से ही मुझे घर के आसपास के बाजार का भी पता लग गया था और हमारे पड़ोसियों के बारे में भी काफी जानकारी मिल गई थी।
मैंने 11 नवम्बर 2015 की उस दीपावली के दिन अपने नए घर की अंदरूनी सजावट बहुत से नए लाये सामान तथा फर्नीचर के साथ कर दी थी।
उस नए लाये सामान में मेरे मनपसंद के बिलकुल नए पर्दे भी थे जिन्हें विशेष रूप से मैंने उसी दिन के लिए ही बनवाये थे।

दीपावली के दिन सुबह उठते ही मैंने पूरे घर की सफाई करने पश्चात नए पर्दे लगाए तथा बैठक में सोफे की गद्दियों के कवर एवं मेजपोश भी बदल कर नए लगा दिए।
उस दिन सुबह ही दीदी और जीजू (दीदी के पति) मेरे घर दीपावली की शुभकामनायें देने तथा हमें उनके ही घर में रात का खाना खाने तथा दीपावली मनाने का निमंत्रण देने आये।
खाने का निमंत्रण देते समय दीदी ने यह आग्रह भी किया की खाने के बाद दिवाली की आतिशबाजी हम दोनों परिवार मिल उन्हीं की छत पर एक साथ ही चलाएंगे।

उनके इस आग्रह को सुन कर जब मैंने समीर की ओर देखा तो उन्होंने तुरंत दीदी को कह दिया की हम उनके निर्देश का पालन करेंगे और उनके कहे अनुसार समय पर उनके घर पहुँच जायेंगे।
सांझ को सात बजे हमने पूजा करने के बाद हर तरफ मोमबत्ती, दिए और बिजली की बतियाँ जला कर घर भर में दीपावली की रोशनी करी।
उसके बाद हम तैयार हो कर रात आठ बजे दीदी के घर पहुँच गए जहाँ हम सब ने मिल कर दीदी के द्वारा बनाया गया स्वादिष्ट खाना खाया।

खाना समाप्त करने के बाद हम सब दीदी के घर की छत पर चले गए और वहाँ दोनों परिवार के सदस्यों ने मिल कर आतिशबाजी चलाने लगे।
आतिशबाजी में पटाके, अनार, बम और रॉकेट इत्यादि तो जीजू और समीर चलाते रहे तथा मैं और दीदी फुलझड़ियाँ एवं चक्करी जला कर आनन्द लेती रहीं।

जब दो अनार और कुछ चक्करी ही चलाने के रह गई तब हमें पता चला की छत पर हमें एक घंटे से अधिक बीत गया और रात के दस बजे बज चुके थे।
तब दीदी कॉफ़ी बनाने के लिए और जीजू बंगले से बाहर खड़ी अपनी कार और दीदी की स्कूटी को घर के अन्दर रखने के लिए नीचे चले गए।

उन दोनों के नीचे जाने के बाद मैं और समीर उन बचे हुए अनार और चक्करी चलाने लगे तभी एक अनार में जोर से विस्फोट हुआ और उसकी चिंगारी सब ओर फ़ैल गई जिससे बचने के लिए मैं पीछे की ओर भागी।
घबराहट में मैं एक जलती हुई चक्करी के ऊपर से गुज़री और उस चक्करी में से निकल रही चिंगारीयों से मेरी साड़ी को आग लग गई।
जब मैंने अपनी साड़ी को जलते हुए देखा तो तुरंत उसे खीच कर अपने बदन से अलग कर दी लेकिन तब तक आग मेरे पेटीकोट को भी लग चुकी थी।
मेरी टांगों और जाँघों में जलन महसूस होते ही जब मैं जोर से चिल्लाई तब मेरे जलते कपड़ों के देख कर समीर भाग कर मेरे पास आये।

मेरे पास आते ही उन्होंने घुटनों से ऊपर तक जल चुके पेटीकोट का नाडा खींच कर खोला और उसे नीचे गिरा कर मेरे बदन से अलग करते हुए दूर फेंक दिया।
मैं उस समय सिर्फ पैंटी, ब्रा तथा ब्लाउज में खड़ी डर के मारे कांप रही थी और मेरी आँखों से आंसुओं की धारा बहने लगी थी।
मैं जलन की पीड़ा से बेहाल अपने अर्ध-नग्न शरीर की अपने हाथों से ढकने की कोशिश कर रही थी तब समीर ने मुझे अपनी गोदी में उठाया और तत्काल सीढ़ियाँ की ओर भागे।
समीर तेज़ी से दीदी को आवाज़ लगते हुए सीढ़ियाँ उतर कर मुझे दीदी के शयनकक्ष में ले जा कर उनके बैड पर लिटा दिया।
समीर की आवाज़ तथा मेरी रोने एवं चिल्लाने की आवाज़ सुन कर दीदी और जीजू अविलम्ब शयनकक्ष में आ गए।
मेरी हालत देख कर दीदी ने अपने पति को प्राथमिक चिकित्सा का डिब्बा लाने को कहा तथा खुद फ्रिज में से बर्फ ले आई।

दीदी और समीर ने मेरी टांगों और जाँघों पर जहाँ आग की जलन लगी थी वहाँ पर बर्फ लगा रहे थे तभी जीजू अपने हाथों में प्राथमिक चिकित्सा का डिब्बा लिए शयनकक्ष में प्रवेश किया।
मेरे अर्ध नग्न शरीर को देख कर वह ठिठके और उलटे कदम शयनकक्ष के बाहर चले गए लेकिन दरवाज़े के पास खड़े होकर मुझे निहारने लगे।
जीजू द्वारा तीखें नज़रों से मुझे निहारने के कारण मुझे ऐसा लगने लगा था कि मेरे बदन पर चींटियाँ रेंग रही हैं और मैं संकोच एवं लज्जा से पानी पानी हो रही थी।
क्योंकि दीदी और पति देव मेरे बदन के जले स्थानों पर बर्फ लगा रहे थे इसलिए मैं अपनी टाँगे और जांघें ढक भी नहीं सकती थी।

समीर ने मेरी जांघों के अन्दर बर्फ लगाने के लिए मेरी टांगें भी चौड़ी कर रखी थी और उस बर्फ के पानी से मेरी पैंटी भी गीली हो गई थी।
क्योंकि मेरी गीली पैंटी मेरे गुप्तांग से चिपकी हुई थी इसलिए उसमें से मेरी योनि की दोनो फांकों के बीच की दरार साफ़ दिख रही थी।
मैं इस दुविधा में थी की क्या करूँ तभी दीदी ने मेरे चेहरे के भाव देखे और पलट कर दरवाजे के पास खड़े अपने पति को मेरे अर्ध नग्न शरीर को घूरते हुए देखा।
जैसे ही दीदी ने मेरी दुविधा को समझा वैसे वह जीजू से बोली- आप वहाँ खड़े क्या कर रहे हो? यह दवाई वाला डिब्बा मुझे दो और जल्दी से जाकर सब के लिए कुछ ठंडा पीने के लिए ले आओ।

जब जीजू डिब्बा दे कर बाहर जाने के लिए मुड़े तब दीदी ने ऊँची आवाज़ में कहा- सुनो, अलमारी से बदन ढकने के लिए एक सफ़ेद चादर भी निकाल कर दे दो।
दीदी का जीजू को वहाँ से भेज देने से मुझे कुछ राहत मिली और उनकी चादर वाली बात सुन कर तो बहुत संतोष भी मिला।
क्योंकि बर्फ के कारण मुझे जलन से कुछ आराम मिल गया था इसलिए दीदी और समीर ने मेरे शरीर पर बर्फ लगानी बंद कर दी।
उसके बाद दीदी ने मेरी टांगों पर जलन वाली जगह को एक नर्म एवं सूखे कपड़े से पोंछ कर घाव पर मरहम लगाने लगी।

तभी समीर ने मेरी गीली पैंटी को उतार कर मुझे नग्न कर दिया और उसी नर्म एवं सूखे कपड़े से मेरी जांघें एवं योनि तथा उसके आस पास के क्षेत्र के पोंछ कर सुखाने लगे।
समीर ने जैसे ही मेरी जाँघों पर मलहम लगाना शुरू किया तभी जीजू चार गिलास में ठंडा लेकर कमरे में प्रवेश किया।
उस समय मेरी हालत बहुत ही लज्जाजनक थी क्योंकि मेरी दोनों टाँगें चौड़ी थी और मेरी बेपर्दा योनि अपना मुख खोले उनके सामने पड़ी थी।

जीजू को अपने सामने खड़े देख कर मुझे बहुत शर्म आने लगी थी लेकिन कुछ नहीं कर पाने के कारण मैं उसी तरह अपनी आँखें बंद कर के लेटी रही।
जब कुछ मिनटों के बाद मुझे महसूस हुआ की दवाई लगाना बंद हो गया है और मुझे ढक दिया गया है तब मैंने अपनी आँखें खोली।
आँखें खोलने पर जब दीदी और समीर को वहाँ नहीं पाया तब पास रखी कुर्सी पर बैठे जीजू को देख कर दीदी और समीर के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वे हाथ धोने गए हैं।

जीजू की नीची नजरें देख कर मुझे महसूस हुआ कि शायद उन्हें भी शर्म आ रही थी इसलिए मैंने और कुछ नहीं पूछा और चुपचाप लेटी रही।
मेरी चुप्पी से उन्होंने मेरी मानसिक स्थिति को भांप लिया और उनसे कुछ देर पहले हुई गलती के लिए मुझसे माफ़ी मांगने लगे।
मैंने जब उन्हें माफ़ी मांगने लिए मना किया और उस हादसे को एक अनपेक्षित घटना समझ कर भूल जाने के लिए कहा तब जा कर वह सामान्य हो पाए।

उसी समय समीर और दीदी कमरे में आ गए और हम सबने साथ में बैठ कर ठंडा पिया तथा रात को कहाँ सोना है, इस पर बात करी।
समीर तो चाहते थे कि हम दोनों अपने घर में सोयें लेकिन दीदी ने विरोध किया और कहा कि मैं और वो उनके ही घर में ही सोयेंगे और जीजू तथा समीर हमारे घर में जा कर सो सकते हैं।
क्योंकि मुझे अब जलन से काफी राहत मिल चुकी थी इसलिए सोने का निर्णय होते ही दोनों मर्द हमारे घर सोने के लिए चले गए।

उनके जाते ही मैंने अपने शरीर पर पहने ब्लाउज तथा पैंटी को भी उतार दिया और बिलकुल नग्न हो कर चादर ओढ़ते हुए उसी बिस्तर में सो गई।

सुबह जब मेरी नींद खुली और मैंने दीदी को साथ वाले बिस्तर पर लेटे हुए नहीं पाया तब मैंने उन्हें आवाज़ लगाईं।
मेरी आवाज़ सुन कर दीदी ने रसोई से ही उत्तर दिया कि वे रसोई में हैं और चाय बना कर ला रही हैं तब तक मैं पास की कुर्सी पर रखी हुई उनकी नाइटी को पहन लूँ।
मैंने उठ कर नाइटी पहनी और शौचालय में चली गई और जब तक नित्य कर्म कर के मैं लौटी तब तक दीदी भी चाय ले कर आ गई थी।

चाय पी कर दीदी ने नाइटी उठा कर मेरे घावों जा निरीक्षण किया और बताया कि अगर मैं यही दवाई लगाती रहूंगी तो अगले दो-तीन दिनों में मैं बिलकुल ठीक हो जाऊंगी।
आठ बजे जीजू और समीर आ गए और दोनों ने जब मुझसे जलन के बारे में पुछा तब मैंने उन्हें बताया की मुझे रात से कुछ आराम है.

समीर ने जब मुझे घाव दिखाने के लिए कहा तब मैंने जीजू की ओर देख कर थोड़ा संकोच किया तो वह तुरंत वहाँ से चले गए।
जीजू के शयनकक्ष से बाहर जाते ही मैंने नाइटी कमर तक ऊपर करके पति को वह सब जगह दिखा रही थी तभी मेरी नज़र सामने रखी श्रृंगार-मेज़ के आईने पर पड़ी।
मैंने उस आईने में देखा की जीजू दरवाज़े की ओट से शयनकक्ष में झाँक कर मेरे निरावरण शरीर को निहार रहे थे।
मैंने घबरा कर झट से अपनी नाइटी नीचे कर दी जिस कारण मेरी योनि के पास के घाव को नजदीक से देख रहे पति का सिर मेरी नाइटी के अंदर ही फंस गया।

उसी समय दीदी और उनके पीछे जीजू भी शयनकक्ष के अन्दर आ गए तथा मुझे एवं समीर को ऐसी दशा में देख कर दीदी हंस पड़ी और बोली- चलो जी चलो, अभी हमारा यहाँ कोई काम नहीं है। रात भर के दो प्यासों को अपनी प्यास बुझा लेने दो, बेचारे मिलन के लिए बहुत ही व्याकुल हो रहे हैं।
बाहर जाते हुए दीदी मुझे संबोधित करते हुए बोली- अंजलि, मैं दरवाज़ा बंद कर देती हूँ जब तुम दोनों फारिग हो जाओ तो आवाज़ लगा देना।

दीदी की बात सुन कर मुझे बहुत ही शर्मिंदगी महसूस हो रही थी इसलिए मैंने तुरंत नाइटी ऊपर करके समीर को बाहर किया और अपने लाल हो गए चेहरे तथा कानों को लिए दीदी के पीछे रसोई में चली गई।
दीदी ने मुझे देखा लेकिन कुछ कहा नहीं बस सिर्फ मुस्करा दी और जब मैंने दीदी को सफाई देने की कोशिश करी तो दीदी ने झट से टोक दिया और कहा- चुप रहो, यह पति पत्नी के बीच की बातें किसी को नहीं बताते।

मैं चुप हो गई और उन्हें बहुत ही असमंजस में देखते हुए आगे बढ़ उन्हें अपने गले लगा लिया तथा उसी समय उन्हें अपनी मुंह बोली बहन भी बना लिया।

11 नवम्बर 2015 की तारीख जिसे मैं अपने लिए एक शुभ दिन मान रही थी वह मेरे जीवन का एक दुर्भाग्य पूर्ण दिन बन गया था।

मैं उस दिन के दीपावली के पटाखों की सौगात को आज तक नहीं भूली हूँ और ना ही कभी भूल पाऊंगी क्योंकि उन्हीं के कारण ही एक पर-पुरुष ने मुझे निर्वस्त्र देखा था।
इसीलिए तब से मैं प्रतिदिन ईश्वर से यही प्राथना करती रहती हूँ कि किसी भी स्त्री के जीवनकाल में ऐसा दिन कभी भी नहीं आये।

आदरणीय पाठिकाओं एवं पाठकों आपको मेरी वार्षिक दैनंदिनी में लिखे मेरे संस्मरणों में से इस एक घटना का विवरण कैसा लगा इस बारे में अपने विचार मेरी दीदी के ई-मेल आई डी [email protected] पर भेज सकते हैं।

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