लण्ड न माने रीत -1

(Lund Na Mane Reet-1)

यह कहानी निम्न शृंखला का एक भाग है:

उस दिन माँ का फोन सुबह सवेरे ही आ गया ‘बेटा.. कैसे हो.. इस बार होली पर आ रहे हो ना.. कितने साल हो गए घर आए हुए?’
‘नहीं माँ.. मैं नहीं आ पाऊँगा.. ऑफिस से बहुत छुट्टियाँ ले चुका हूँ.. मार्च आने वाला है.. अब तो एक दिन की छुट्टी लेना भी मुश्किल है..। दो दिन तो आने-जाने में ही निकल जाएंगे.. फिर दो-तीन दिन रुकना भी पड़ेगा।’ मैंने अपनी मजबूरी बताई।

‘अच्छा.. वो आरती भी आई हुई है.. तुझे पूछ रही थी कि तू होली पर आएगा क्या.. क्या बोलूँ उसे?’
आरती का नाम सुनते ही मेरे बदन में मीठी सी सिहरन दौड़ गई.. अब कैसी होगी वो.. कैसी लगती होगी शादी के बाद..? ऐसे कितने ही प्रश्न मन में उठने लगे।
‘ठीक है माँ.. मैं कोशिश करूँगा आने की..’ मैंने कह दिया।
आरती मुझे याद करे और मैं न जाऊँ ये तो संभव ही नहीं था। होली आने में अभी 8-10 दिन थे। मैंने उसी दिन शताब्दी में रिज़र्वेशन करा लिया।

ट्रेन चल पड़ी थी.. और मैं आरती के ख्यालों में खो गया। वो अठरह बरस की कमसिन कच्ची कली थी.. उसे कितनी बेरहमी से रौंदा था मैंने उस दिन.. उसका वो करुण क्रंदन.. वो चीत्कार.. वो विनती.. आज भी मुझे स्मरण होती है.. जैसे अभी अभी की बात हो।
‘बाहर निकाल लो बड़े पापा.. मैं आपका पूरा नहीं सह पाऊँगी..!’ यह कहते हुए आरती की आँखों में आंसू उमड़ आए थे।

मैं भी उसकी हालत देख दुखी हो उठा था और पछता रहा था.. लेकिन अब क्या हो सकता था। समय का चक्र पीछे नहीं घुमाया जा सकता.. अब वापस लौटना बेवकूफी ही कहलाएगी। यही सोच कर मैंने उसके अर्ध-विकसित स्तन अपनी मुट्ठियों में भर लिए फिर मैंने अपने चारों और नज़र फिरा के देखा.. जेठ की उस तपती दुपहरी में चारों ओर सन्नाटा पसरा था.. दूर-दूर तक कोई नहीं था।

मैंने जी कड़ा करके अपने लण्ड को थोड़ा सा पीछे खींचा और दांत भींच कर.. पूरी ताकत.. बेदर्दी और बेरहमी से आरती की कमसिन कुंवारी चूत में लण्ड को धकेल दिया। मेरा काला.. केले जैसा मोटा और टेड़ा लण्ड उसकी चूत की सील तोड़ता हुआ चूत में गहराई तक धंस गया।

आरती के मुँह से ह्रदय विदारक चीख निकली थी और वो छटपटाने लगी। तोतों का झुण्ड जो डालियों पर बैठा आम कुतर रहा था.. डर के मारे टांय-टांय करता हुआ उड़ा और दूसरे पेड़ पर जा बैठा।
सहसा किसी ने मेरा कंधा पकड़ कर जोर से हिलाया.. यादों का सिलसिला टूट गया, मैंने चौंक कर देखा तो सामने टीटीई खड़ा था।
‘सर.. टिकट प्लीज.. कब से आवाज़ लगा रहा हूँ आपको..’ वो बोला।
‘ओह.. आई एम सारी..’ मैंने कहा और टिकट निकाल कर उसे दे दिया।

मित्रो.. अब तक की पूरी कहानी शुरू से सुनाता हूँ आप सबको। यह कोई इन्सेस्ट सेक्स कथा नहीं है.. यहाँ जिस आरती का जिक्र हो रहा है.. वो मेरे हम प्याला हम निवाला बचपन के लंगोटिया यार रणविजय सिंह की इकलौती पुत्री है। रणविजय को गाँव में सब लोग राजा कह कर बुलाते हैं।
मैं भी उसे राजा कह कर ही बुलाता हूँ।

हाँ.. तो राजा की गाँव में बहुत बड़ी हवेली है.. खेती-बाड़ी.. फलों के बगीचे सब कुछ है.. धन-दौलत की कोई कमी नहीं.. बहुत नेक और नरम-दिल इंसान है मेरा दोस्त.. बस पीने-पिलाने और अय्याशी का शौक है। मैंने और राजा ने मिलकर न जाने कितनी कुंवारी और शादीशुदा कामिनियों का मर्दन किया है, उनके बदन को जी भर के भोगा है.. लेकिन जोर-जबरदस्ती कभी किसी के साथ नहीं की थी..

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