तुमको ना भूल पाऊँगा-1

Tumko na Bhool Paunga-1
यह कहानी दो साल पहले की है और यह मेरी ज़िन्दगी की सच्ची कहानी है।

सबसे पहले मैं अपने बारे में बता दूँ, मेरा नाम राज है। मेरा कद 5’11”, चौड़ा सीना और हष्ट-पुष्ट शरीर, रंग गोरा है।

उस वक़्त मेरी उम्र 23 साल थी। मुझे सरकारी नौकरी मिल चुकी थी, मैं केन्द्र सरकार के एक विभाग में इन्जीनियर के पद पर कश्मीर में कार्यरत हूँ।

मेरी स्नातक की पढ़ाई का आखरी साल अभी बाकी था, इसलिए मैंने अपने विभाग से छुट्टी ले कर स्नातक के आखरी साल में दाखिला ले लिया।

कॉलेज में मुझे मेरी अच्छी नौकरी के कारण सभी पहचानने लगे थे क्योंकि मेरा जॉब-प्रोफाईल आर्मी के साथ काम करना था।

नौकरी मिलने के बाद कॉलेज की काफी सारी लड़कियाँ भी मुझसे प्रभावित थीं और कुछ लड़कियों ने तो मुझे प्रपोज़ भी किया था।

बात तब की है जब मैं अपने भान्जे का जन्मदिन मनाने के लिए अपनी सबसे बड़ी बहन के घर मुंबई पहुँचा।

प्रोग्राम कुछ ज्यादा बड़ा नहीं था, बस कालोनी के कुछ बच्चे और आस-पड़ोस के कुछ परिवार ही थे।

मैं पूरी रात बस का सफ़र कर के दीदी के घर पहुँचा था और प्रोग्राम की पूरी साजसज्जा मुझे ही देखना था।
थकान तो बहुत थी, लेकिन मेरे सबसे प्यारे भांजे का जन्मदिन था इसलिए मुझे काम तो करना ही था।

मेहमानों में सबसे पहले आए, दीदी के पुराने पड़ोसी… दीदी के उनके साथ बहुत अच्छे सम्बन्ध थे, वो लोग बिल्कुल घर के ही तरह थे। मैं सजावट के काम में लगा हुआ था कि दीदी ने किसी को मेरी मदद करने के लिए भेजा।

मैंने पीछे देखा तो कोई लड़की थी, दिखने में खूबसूरत और जरा नखरैल लग रही थी, उसकी उम्र लगभग 21-22 की होगी। उसका फ़िगर भी अच्छा ही था, उसके बड़े-बड़े मम्मे बड़े ही प्यारे लग रहे थे।

मैं अपना ट्रैक-सूट पहने हुए था।

उसके हाव-भाव से मुझे पता चल चुका था कि वो मुझ पर आकर्षित हो चुकी है, लेकिन मैंने ही उसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।
उसकी मदद से मैंने सजावट का काम पूरा कर दिया। सब काम पूरा कर के मैं प्रोग्राम के लिए तैयार हो गया।

दीदी के फ्लैट में हॉल, रसोई और एक ही कमरा होने के कारण खाने का पूरा इन्तज़ाम हॉल में ही किया गया था और जीजाजी के दोस्त लोग भी वहीं बैठे हुए थे और कमरे में सभी महिलाएँ थीं।

बेहद थकान के कारण मेरा कहीं भी मन नहीं लग रहा था अतः मैं रसोई में अकेले ही खड़ा था और मेहमानों के लिए पानी और केक की पूर्ति कर रहा था।

मुझे रसोई में अकेला देख कर वो भी रसोई में चली आई और मेरे बगल में खड़ी हो गई।

उसने मेरे हाथों से चाकू ले लिया और केक काटने में मेरी मदद करने लगी।
उसके हाथों में केक का पूरा क्रीम लग गया।

मैंने उससे कहा- कोई अगर तुम्हारे हाथों को देखेगा तो कहेगा कि पूरा केक तुम अकेली ही खा गईं।

उसने मुस्कुराते हुए मेरी तरफ़ देखा और मेरे होंठों के पास अपनी उंगलियों को लाकर बड़े अजीब ढंग से पूछा- तुम भी खाओगे?

मैं थोड़ी देर के लिए डर गया और पीछे हटते हुए कहा- तुम ही खाओ, मेरे लिए बस एक छोटा सा टुकड़ा दे दो।

फ़िर उसने मेरे लिए केक का टुकड़ा काटा और मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा- मैं खिलाऊँ क्या?

मैं फिर चौंक गया और कहा- अपने हाथों से खिलाओगी?

‘हाँ, मैं तुम्हें अपने हाथों से खिलाऊँगी, खाओगे क्या?’

तभी रसोई के सामने से दीदी गुजरीं, मैं डर गया कहीं दीदी ने हमारी हरकतों को ना देख लिया हो।

मैंने उसे इशारा किया और वो भी सतर्क हो गई।

मैंने उसके हाथों से केक का टुकड़ा लेकर खा लिया और मेहमानों के लिए पानी के गिलास भरने लगा।

हम आपस में एक-दूसरे को देख कर मुस्कुराए और मैंने उससे कहा- मैं तो तुम्हारा नाम पूछना ही भूल गया।

उसने कहा- मेरा नाम सीमा है और मैं आपका भी नाम जानती हूँ।

मैंने आश्चर्य से पूछा- वो कैसे? मैंने तो अभी तक तुम्हें अपना नाम बताया ही नहीं।

उसने कहा- तब से सभी लोग तुम्हें राज कह कर बुला रहे हैं.. इसलिए मुझे लगा कि आपका नाम राज होगा।

मैंने मुस्कुराते हुए कहा- वाह यार, तुम तो बड़ी समझदार हो।

उसने मुस्कुराते हुए मेरी ओर देखा और आँख मारी।

थोड़ी ही देर में मेहमान कम हो गए और मैं हॉल में जाकर बैठ गया।

उसका भाई अक्की और बहन रीना भी आए थे, भाई सीधा अपने कॉलेज से आया था इसलिए वो अपना लैपटॉप भी साथ लाया था।
प्रोग्राम खत्म होने के बाद मैंने अपना मोबाइल का मैमोरी कार्ड उसके लैपटॉप में डाला और दीदी और जीजाजी को मैं अपनी कश्मीर की कुछ तस्वीरें दिखाने लगा।

सीमा मेरे बगल में मुझसे चिपक कर बैठ गई। सबके सामने उसका मेरे इतने करीब बैठना मुझे थोड़ा अजीब लग रहा था।

उसने धीमी आवाज में मुझसे कहा- मुझे आपका मोबाइल नम्बर चाहिए।

मैंने आश्चर्य से पूछा- तुम्हें मेरा नम्बर क्यों चाहिए? तुम मेरा नम्बर लेकर क्या करोगी?

उसने कहा- मुझे आप से ढेर सारी बातें करनी हैं।

मैंने कुछ सोचा और उसे अपना नम्बर दे दिया।

सभी मेहमानों के जाने के बाद सबसे आखिर में सीमा और उसके घर वाले जाने लगे।
तब तक बाहर बारिश भी होने लगी थी, दीदी ने उन्हें रात भर रुक जाने को कहा।

यह बात सुन कर मैं भी मन ही मन में खुश होने लगा और सीमा भी खुश ही लग रही थी।

हम दोनों आँखों ही आँखों में इशारों में बातें कर रहे थे लेकिन उनके मम्मी-पापा ने मना कर दिया, इस बात पर सीमा ज़रा दुःखी लग रही थी।
वो सभी चले गए।

अगले दिन सुबह मैं ज़रा देरी से जागा, मेरे फोन पर किसी अनजान नम्बर से काल आ रहा था। मैं समझ गया था कि यह सीमा ही होगी जो इतनी बेचैनी से मुझे काल कर रही है।

मैंने किसी भी काल का जवाब नहीं दिया और मैं रात की बस से हॉस्टल जाने के निकल गया।

बस में सफ़र के दौरान फ़िर से उसका काल आया, इस बार मैंने जवाब दिया। उसने कहा- मैं आपको पसन्द करने लगी हूँ।

उसने मुझे प्रपोज किया, लेकिन मैं भी उसे ज्यादा दिनों तक नहीं टाल पाया और मैंने भी ‘हाँ’ कर दी।

फिर हमारी फोन पर ही बातचीत होती थी, कभी रोमांटिक.. कभी सेक्सी तो कभी साधारण बातें। धीरे-धीरे हमारा प्यार परवान चढ़ता गया, हम दोनों एक-दूसरे से मिलने का बेसब्री से इन्तज़ार करने लगे।

फिर 8 महीनों के इन्तज़ार के बाद आखिर वो दिन आ ही गया।
वो मेरा रेल्वे स्टेशन पर इन्तज़ार कर रही थी।
जैसे ही मैं ट्रेन से बाहर निकला, वो दौड़ कर आई और मुझे अपनी बाँहों में भर लिया।

हम आटो-रिक्शा से एक पार्क में गए। रास्ते में उसने मुझे चूमना शुरू किया और मैंने भी उसे चूमा।
हम लोग पार्क में पहुँच चुके थे।
पार्क बहुत बड़ा था, हमने पार्क में काम करने वाले कर्मचारी से एकांत में बैठने लायक जगह के बारे में पूछा तो उन्होंने एक ऐसी जगह बताई जहाँ दूर-दूर तक कोई भी नज़र नहीं आ रहा था और वहाँ बहुत सारी चारपाईयाँ रखी हुई थीं।

हम लोग किसी कोने की चारपाई पर बैठ गए और सबसे पहले हमने एक-दूसरे को अपनी बाँहों में भर लिया और काफ़ी देर तक एक-दूसरे को चूमते रहे।

मैं उसे माथे पर, गालों पर, उसके होंठों पर और उसकी गरदन पर चूमता रहा। वो भी गर्म हो रही थी और ‘सी…सी…आह…ऽऽऽ’ करते हुए मुझे चूम रही थी।

मैंने उसे अपनी गोद में बैठाया और उसे चूमने लगा, मैं अपने एक हाथ से उसके मम्मों को कमीज़ के ऊपर से ही दबाने लगा और एक हाथ से उसकी पीठ को सहलाने लगा।

वो और भी ज्यादा गर्म हो गई थी और मदहोशी में ‘आहें’ भर रही थी।

मैंने उसे वहीं चारपाई पर लिटाया और उसे बुरी तरह से चुम्बन करने लगा।

इस बार मैंने अपना एक हाथ उसकी कमीज़ के अन्दर डाला और उसके पेट को सहलाने लगा।

वो मदहोशी में बड़बड़ाने लगी- ओह… आह… सीऽऽऽ सीऽऽऽ… आह… आय लव यू राज… आय लव यू जानू… आह…

मेरा भी रोम-रोम मदहोशी से भरने लगा था। मेरा लंड उत्तेजना के कारण खड़ा हो चुका था।

मैं उसकी कमीज़ के अन्दर से उसके मम्मों को सहलाने लगा और उसके होंठों को चूमने लगा, फ़िर धीरे से उसके मम्मों को ब्रा से बाहर निकाला और सहलाने लगा।
वाह क्या मुलायम और चिकने मम्मे थे, उत्तेजना के कारण उसके चूचुक कड़े हो चुके थे। मैंने उसके चूचुकों को अपनी ऊँगलियों से मसलना शुरु किया।

सीमा मदहोशी में लगातार ‘ओह… आह…सीऽऽऽसीऽऽऽ…’ जैसी आवाजें निकालने लगी।

लेकिन तभी मुझे लगा कि हमें कोई देख रहा है।
मैं अचानक ही रुक गया, सीमा ने कहा- क्या हुआ जान? तुम रुक क्यों गए?

मैंने कहा- शायद हमें कोई देख रहा है।

यह सुन कर वो भी चौकन्ना हो गई और हम बैठ कर बातें करने लगे।

बातें करते हुए मैं कभी उसे चूमता तो कभी उसके बालों से खेलता। थोड़ी देर में मैं चारपाई पर लेट गया और सीमा मेरे सीने पर सर रखकर लेट गई।
मैं उसकी जांघों को सहला रहा था और वो मेरी जीन्स के अन्दर हाथ डालते हुए मुझसे बातें कर रही थी कि तभी मैंने उसकी चूत को सहलाना शुरु किया और धीरे से उसकी चूत को उंगली से दबाया।
वो उछल पड़ी, मानो जैसे उसे बिजली करंट लग गया हो।

उसने कहा- ये क्या कर रहे हो जान? प्लीज़ ऐसा मत करो… वरना मुझे अभी ही चाहिए होगा… और इस जगह पर तुम दे नहीं पाओगे।
मैंने कहा- वक्त आने पर मैं तुम्हें वो भी दे दूँगा जान।
कहानी जारी रहेगी।
मुझे आप अपने विचार मेल करें।

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