मेरी पहली मांग भराई-1

(Meri pahli Maang Bharai-1)

सभी पाठकों को मेरा प्रणाम! गुरु जी को भी अलग से बहुत बहुत प्रणाम !

मैं अन्तर्वासना की नियमित पाठिका हूँ इसमें कोई शक नहीं है। मैं एक भी दिन ऐसा नहीं जाने देती जब मैं अन्तर्वासना पर ना आती होऊँ। एक एक चुदाई जिस्म में आग लगा देती है, चूत की प्यास बढ़ने लगती है, दिल करता है जल्दी से सलवार का नाड़ा खोल लूँ और पास पड़ी कोई चीज़ घुसा दूँ या ऊँगली घुसा दूँ, अपने किसी आशिक को बुला कर रंगरलियाँ मना लूँ !

मेरी उम्र बीस साल की है, मैं बी.ए प्रथम वर्ष की छात्रा हूँ। वैसे तो मेरे इस वक़्त कई बॉयफ्रेंड हैं और मैं सबको एक साथ सम्भालना भी जानती हूँ। हर किसी को उसकी जगह पर रखना मुझे खूब आता है। क्या करूँ बचपन भी एक चालू से माहौल में बीता, फिर स्कूल में ही चालू लड़कियों से मेरी दोस्ती हो गई। वो लड़कियाँ कहती होंगी कि उनकी मेरे जैसी चालू लड़की से दोस्ती हो गई।

ऐसे ही चलती है जिंदगी ! खूब मजे करने चाहिएँ, यह हुस्न, यह मदमस्त जवानी, ये नशीली आंखें ! अब ही मौका है कि इनके नशे में किसी भी मर्द को हलाल कर दो, यह वक़्त होता है छाती से चुन्नी सरका कर किसी मर्द के सोये नाग को उठाने का, यही उम्र है जब अपनी चूचियों से किसी का शिकार कर डालो, पतली कमर लचका कर मर्दों की अपने पर फ़िदा करवाने का और फिर बंद कमरे में हुस्न का खेल, जवानी का खेल, जिस्मों का मेल-जोल सब कुछ जवानी में ही होता है।
यह सब मेरा अपना ख़याल है और मैं इस पर चलती भी हूँ।

जैसे जैसे जवानी ने दस्तक देनी शुरु की, तैसे तैसे मेरा ध्यान लड़कों में लगने लगा, मेरी दिलचस्पी अपनी तरफ देख उनकी हिम्मत बढ़ने लगी। पहले तो आते जाते कोई कुछ बोल देता, कोई कुछ, कोई कहता- देख कितनी छोटी है अभी साली फिर भी नैन-मटक्का करने से बाज नहीं आती ! देख साली कैसे बल खा-खा कर चलने लगी है ! कोई कहता देख तो यार, आग निकलेगी आग !

ऐसे करते करते सोलहवां, सतरहवां, अठरहवां पूरा किया, मुझे पर जवानी कहर की चढ़ी है भी, उम्र से पहले मेरी छाती कहर बनने के लिए तैयार हो चुकी थी, लड़कों की बातें सुन-सुन कर अब कुछ कुछ होने लगता, मैं मुस्कुरा देती, उनके हौंसले बढ़ने लगे और फिर :

एक दोपहर कड़ी गर्मी थी, उस दिन स्कूल से जल्दी छुट्टी हो गई, उस दिनों हम गाँव में रहते थे, मेरी जवानी उफान पर थी। बहुत गर्मी थी, कुरता पसीने से भीग मेरी जवानी से चिपका हुआ था। स्कूल जाने के दो रास्ते थे।

एक था आम पक्की सड़क से दो मिलोमीटर की दूरी थी, पर मैं अपनी सहेलियों के साथ पैदल चली जाती थी क्यूंकि उनको अपने मनचले आशिकों से यारी को परवान चढ़वाने का मौका भी मिल जाता था।

दूसरा रास्ता कच्चा ज़रूर था, बारिश के मौसम में बिलकुल बेकार था, खेतों से होकर निकलता था जिससे स्कूल एक किलोमोटर ही पड़ता था। जिस दिन किसी सहेली को ज्यादा परवान चढ़ना होता, उस दिन वो उस रास्ते चली जाती।

मेरे पीछे आने वाले लड़कों की गिनती कम नहीं थी, हाँ कम नहीं थी।

मैं भी उनकी बाँहों में झूलना चाहती थी लेकिन काफी देर से खुद को बांध रखा था, मेरे सबसे ज्यादा पीछे आने वालों में से जो युवक था उसका नाम था लल्लन ! वो गाँव के मुखिया का बेटा था।

मैंने शुरु से ही किसी लड़के की किसी भी बात को काटा ना था, इसलिए उनकी हिम्मत बढ़ चुकी थी।

उस दिन में कड़ी दोपहर स्कूल से जल्दी निकली, अकेली थी, बाकी सब मौके का फायदा उठा अपने यारों से मिलने गई।

मैंने छोटे वाले रास्ते से घर आने की सोची, बहुत गर्मी थी तेज़ तेज़ चल रही थी पसीने से कुर्ती भीग गई, आधे रास्ते आई कि किसी ने मेरी कलाई पकड़ मुझे खेत में खींच लिया।

इससे पहले में कुछ देखती, सम्भलती, मैं लल्लन की बाँहों में थी, उसने मेरे होंठों पर अपना हाथ रख मुझे चुप करवा दिया, बोला- बहुत प्यार करता हूँ तुझे, तू है कि कुछ न कहकर भी सब कुछ कह देती है, मुस्कुरा देती है लेकिन उसके बाद सब ठन्डे बस्ते में डाल देती है। आज अपने को नहीं रोक पाया।

उसने मेरी गाल की चुम्मी ले डाली। मुझे अजीब सा लगा, उसका हाथ मेरी भीग चुकी कुर्ती पर रेंगने लगा, मुझे लगा जैसे मेरी छाती में कसाव सा आने लगा, उसने होंठों से हाथ हटाया और अपने होंठ रख दिए।

मैं चुप थी, कुछ नहीं बोल पाई। उसके जोश में बढ़ावा आया, खुल कर होंठ चूसने लगा और साथ मेरी कुर्ती में हाथ घुसा दिया। उसने मेरा हाथ पकड़ा और खेत के और अन्दर ले जाने लगा।

प्लीज़ लल्लन छोड़ दो ! मुझे घर जाने दो !
प्लीज़ आरती, आज मुझे मत रोको ! क्या तुम मुझ से प्यार नहीं करती? क्या तू जिंदगी भर मेरी होकर नहीं रहना चाहती?
करती हूँ लल्लन ! लेकिन ऐसे हमें किसी ने देख लिया तो?
इतनी दोपहर कौन साला घर से निकलेगा? यह तो हम जैसे आशिक ही ऐसे मौकों का फायदा उठाते हैं मेरी जान!

वो मुझे खेत के काफी अंदर ले गया, वहाँ फ़सल काटने के बाद उसकी बची हुई घास की ढ़ेरी लगी हुई थी, मुझे बाँहों में लेकर उसने मुझे वहीं लिटा दिया और मेरे ऊपर लेट मेरे होंठ चूसने लगा।

उसने मेरी कुर्ती मेरे बदन से अलग कर दी, आराम से एक तरफ़ रख दी ताकि गंदी ना हो!
यह क्यों उतारी?
चुप मेरी जान !
उसने मेरी ब्रा खोल दी और मेरे मम्मे दबाने लगा।
हाय ! यह मुझे क्या हो रहा है? मैं खुद को आराम से उसको सौंप रही थी!

उसने अपनी टीशर्ट उतार दी। जब मेरी नंगी छाती उसकी मरदाना छाती से घिसी तो मेरे अंदर आग भड़क उठी, मैं वासना से तपने लगी।
उसने मेरा एक चुचूक मुँह में लिया तो मैं उछल पड़ी- हाय! मत करो ना! मुझे अब जाने दो! यह सब बाद में भी हो सकता है।
उसने मुझे बाँहों से आज़ाद किया, बोला- ठीक है!

दोस्तो, उसके आगे क्या-क्या हुआ?
जानने के लिए मेरी इस कहानी का अगला भाग ज़रूर पढ़ना! उम्मीद है गुरु जी मेरी इस चुदाई को सबके सामने लायेंगे।
अगला भाग इसके साथ ही लिख रही हूँ।
आपकी आरती
[email protected]
कहानी का दूसरा भाग: मेरी पहली मांग भराई-2

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