एक दूसरे में समाये-1

(Ek Dusre Me Samaye-1)

दोस्तो, मेरा नाम अर्पित है, उम्र छब्बीस वर्ष और मैं नोएडा का रहने वाला हूँ। दिखने में बिल्कुल सामान्य हूँ लेकिन अपनी काबिलियत से मैं हमेशा सबका चहेता रहा हूँ। मैंने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली है और बहुत ही अच्छी जॉब में हूँ, यह मेरी पहली सच्ची कहानी है, विश्वास है कि आप सभी को पसंद आएगी।

बात उस समय की है जब मेरी उम्र करीब उन्नीस वर्ष थी, मैंने बारहवीं की परीक्षा पास करके एक बहुत ही विख्यात कॉलेज में दाखिला लिया ही था… मेरा पहला ही सत्र था और मैं दाखिले के बाद पहली बार घर आया था।

मैं अपने माता पिताजी की इकलौती संतान हूँ.. मेरे घर में सिर्फ मेरे माँ-पिताजी के अलावा बस दो नौकर ही रहते हैं जो हमारे घर के बाहर बने हुए सर्वेंट क्वाटर में रहते हैं।

अभी बस मैं घर पहुँचा ही था कि तभी मेरी नजर उस पर पड़ी.. मैं उसे देखता ही रह गया.. उसका वो मासूम सा चेहरा, वो उन्नत उभार और तराशे हुए नितम्ब.. मैं अभी सौंदर्य के उस सागर में उतरा ही था कि एक प्यारी सी आवाज ने मुझे आगे बढ़ने से रोक दिया..
“चाय पियेंगे आप?”
और ऐसा लगा जैसे किसी ने एक खूबसूरत सपना तोड़ दिया हो.. मैं बोला- आप बनाओगी तो बिल्कुल पियूँगा…

और एक हल्की सी मुस्कान उसकी तरफ उछाल दी, प्रत्युत्तर में उसने भी अपनी मुस्कराहट से मेरे मन के तारों को छेड़ दिया।

चाय के साथ पिताजी से पता चला कि यह उनके मित्र की बेटी है, नाम इशानी है.. इसके पिता के देहांत के बाद घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई और मेरे पिता जी ने इसकी जिम्मेदारी स्वयं पर ली है, इसकी पढ़ाई से लेकर विवाह तक अब वो हमारे ही घर में रहेगी।
यह सुन कर मेरी आँखों में चमक सी आ गई.. मैंने उससे बात की तो पता चला कि उसने इसी वर्ष बारहवीं की परीक्षा पास की है और दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातिकी कर रही है और इस वर्ष अपने कॉलेज की मिस फ्रेशर भी है।

मैं हमेशा से ही चाहता था कि एक सौंदर्य की देवी और प्रेम की मूर्ति मेरे जीवन में भी हो परन्तु आजकल की इस प्रतिस्पर्धा में मेरा यह सपना कहीं खो गया था।

इशानी को देखते ही मेरे मन के उस सूने पड़े कोने में जैसे कोई पहली किरण सी पड़ी हो.. मुझे घर आने से ज्यादा ख़ुशी इशानी के घर में होने की हो रही थी.. खैर बातों बातों में सारा समय निकल गया और मेरी रैगिंग की कहानियाँ सुनते सुनते हम सबने रात का खाना भी खा लिया।

इशानी के इम्तिहान भी कुछ ही दिनों में होने वाले थे तो उसने किताबें उठाई और अपने कमरे में चली गई।
माँ ने बातों बातों में बोला- बेटा, इशानी तुझसे कुछ पढ़ना चाह रही है लेकिन संकोचवश कह नहीं पाई, तू ही जाकर उससे पूछ ले और उसे अच्छे से समझा दे…
थोड़ी ही देर में पढ़ते-पढ़ाते हम अच्छे दोस्त बन गए… घर में जल्दी सोने की आदत की वजह से सब सो चुके थे और पढ़ाई की वजह से किसी ने हमें डिस्टर्ब नहीं किया।

अचानक घड़ी देखी तो रात के एक बज रहे थे… मैंने उससे उसके पिता के बारे में पूछा तो वो बताते बताते रो पड़ी और चुप होने का नाम ही नहीं ले रही थी।

मैं सोफे पर उससे बिल्कुल सट कर बैठ गया और सांत्वनावश उसको अपनी बाहों में भर लिया.. मेरे बाँहों में भरते ही ऐसा लगा जैसे उसके आँसुओं का बांध टूट गया और वो और ज्यादा रोने लगी.. मैं उसे चुप कराने के लिए उसके पीठ और बाँहों को सहलाने लगा और तभी मेरे हाथों ने उसकी पीठ पर कुछ महसूस किया। मैंने ध्यान से पता करने की कोशिश की तो कपड़ों के ऊपर से ही मुझे समझ आ गया कि यह उसकी ब्रा की पट्टी है।

अब मेरी बरसों की दबी हुई आग ने फिर से चिंगारी पकड़ ली… मैंने अब उसे चुप कराने के बहाने अपने से बिल्कुल चिपका लिया और उसके पूरे शरीर पर अपने हाथ फेरने लगा…

अचानक उसका रोना अब उठती और गिरती साँसों में बदल गया.. शायद वो भी वही महसूस कर रही थी जैसा मैं कर रहा था… उसने भी अपने स्तनों को मेरे सीने से चिपका दिया और अपने दोनों हाथों से मेरी पीठ सहलाने लगी।

काम भावना के आवेश में कब मैंने अपने होंठ उसके दहकते हुए होंठों पर रख दिए, मुझे पता ही नहीं चला और अचानक उसने मेरे हाथों को जो उसके स्तनों को कपड़ों के ऊपर से ही भींचे हुए थे, हटाने की कोशिश की। तब मुझे इस बात का एहसास हुआ कि हमारे बीच यह क्या हो गया?

उसने अपने आप को मुझसे अलग किया और कमरे से बाहर चली गई.. मुझे भी अपने ऊपर शर्म आ रही थी, मैंने सोचा कि उससे बात करूँ कि यह सब बस भावावेश में हो गया और मैं उसके पीछे हो लिया.. उसे खोजते हुए मैं छत पर पहुँचा तो मुझे देखते ही वो नीचे जाने लगी।

तभी मैंने उसे रोक लिया… मैंने उससे कहा- अभी जो पल हमने बिताये हैं, ये मेरी जिंदगी के सबसे यादगार पल बन गए हैं.. आज से पहले मैंने ऐसा कभी महसूस नहीं किया था और ना ही कभी ऐसा कुछ किया ही था…

मैंने उसे धन्यवाद दिया जीवन के ये यादगार लम्हे देने के लिए!
फिर उसने जो बोला, सुन कर मेरे होश ही उड़ गए.. उसने मुझे बताया कि वो बचपन से ही मेरे बारे में सिर्फ अच्छा ही सुनती आ रही है और मन ही मन मुझे प्यार करती है…
मैंने उसे गले से लगा लिया और उसके होंठों को चूम लिया.. मैंने कहा- हम आज ही मिले हैं और आज ही तुमने अपने प्यार का इज़हार कर दिया !

तो उसने कहा- जल्दी करने में ही भलाई है, वरना क्या पता तुम्हें अपने कॉलेज की कोई लड़की पसंद आ जाती तो मैं तो मर ही जाती…
अब हम आपस में काफी खुल गए थे।
कुछ देर बातें करने के बाद मैंने उससे कहा- रात बहुत हो गई है और तुम अब सो जाओ..

हम दोनों साथ ही नीचे आये और वो अपने कमरे में जाकर सो गई और मैं अपने कमरे में सो गया…

कहानी जारी रहेगी।
[email protected]

कहानी का दूसरा भाग: एक दूसरे में समाये-2

Leave a Reply