दिलकश मुस्कान -1

(Dilkash Muskan-1)

This story is part of a series:

दोस्तो, सबसे पहले मैं आप सबका शुक्रिया करता हूँ आपने मेरी कहानियों को पसंद किया और मैं अन्तर्वासना का भी शुक्रिया करूँगा, इसी मंच ने मुझे आपके साथ अपनी कहानी लाने का मौका दिया।

आपके काफी मेल मुझे मिले, मैंने कोशिश की हर मेल का जवाब देने की, माफ़ी चाहूँगा अगर मैंने किसी मेल का जवाब नहीं दिया हो तो।

जैसा कि मैंने अपनी पिछली कहानी में वादा किया था कि मैं अपने कॉलेज के दिनों की चुदाई की दास्तान आपको बताऊँगा। मैं आज अपनी वही कहानी आपको बता रहा हूँ।

बात उन दिनों की है जब मैंने पटना के एक कॉलेज में दाखिल लिया था। इससे पहले मैं अपने घर वालों के साथ रहता था, मैं कभी अकेले रहा नहीं था। इसलिए मेरे एक परिचित ने अपने दोस्त के यहाँ मेरे रहने के लिए एक कमरा दिलवा दिया। वैसे तो वो कमरा किराये पर नहीं देते थे, पर परिचित होने के कारण मुझे मिल गया।

मैं अपना सामान लेकर वहाँ चला गया। मुझे भी एक परिवार जैसा माहौल मिला। शाम में एक महिला जिनकी उम्र 40 के आस पास होगी, आई, बोली- आज खाना हमारे यहाँ ही खाना है।

अब मैं मकान के बारे में बता दूँ, मकान में कुल 4 कमरे थे, मेरे कमरे में एक दरवाजा था जो दूसरी तरफ दूसरे कमरे में खुलता था और उधर से बंद था। बाथरूम कॉमन था।

रात नौ बजे मैं खाना खाने गया। वहां अंकल मिले, फिर बातें होने लगी। हजारों कहानियाँ हैं अन्तर्वासना डॉट कॉम पर !

बातों में पता चला कि उनकी दो बेटियाँ हैं, एक मेरी हमउम्र है, लेकिन गर्ल्स कॉलेज में पढ़ती है, उसका कॉलेज मेरे कॉलेज के रास्ते में था और दूसरी उससे दो साल बड़ी है। कुछ देर के बाद हम सब खाना खाने लगे। उनकी दोनों बेटियाँ खूबसूरत थी। मेरे मन में कोई गलत विचार नहीं था। बस वो दोनों मुझे अच्छी लगी, मैं नजरें बचाकर देखते रहा। खाना ख़त्म करके मैं अपने कमरे में वापस आ गया और दिन भर का थका होने के कारण मुझे नींद आ गई। मैं सुबह जागा,नहा कर बाहर जा कर नाश्ता किया और फिर कॉलेज के लिए निकल गया।
कुछ दिन इसी तरह निकल गये, मैं सुबह कॉलेज जाता और फिर वापस आकर अपने कमरे में चला जाता।

इसी तरह दिन निकलते रहे।

एक दिन जब मैं कॉलेज 3 बजे मैं ऑटो से कॉलेज से वापस आ रहा था, तो जैसा कि मैंने आपको बताया कि उनकी दूसरी बेटी जिसका नाम स्वाति था, उसका कॉलेज मेरे कॉलेज के रास्ते में था, वो अपने कॉलेज के सामने ऑटो का इंतजार कर रही थी। मेरा ऑटो उसके पास रुका और वो मेरे सामने वाली सीट पर बैठ गई।

उसने मुझे देखा और बोली- आपकी क्लास भी ख़त्म हो गई क्या?
फिर हमारी थोड़ी बात हुई, मैंने उसका सब्जेक्ट पूछा वो मेरे सब्जेक्ट से ही ग्रेजुएशन कर रही थी। हमने ज्यादा बात नहीं की और घर आ गए।

समय निकलता गया, कभी कभी हमारी मुलाकात ऑटो में हो जाती। दिन निकलते गए। जैसा कि मैंने आपको बताया कि मेरे कमरे में एक दरवाजा था जो दूसरी तरफ से बंद रहता था, यही वो कमरा था जहाँ स्वाति और उसकी बहन शिप्रा रहती थी।

यह बात है ठंड के दिनों की, छुट्टी के दिन मैं छत के पर बैठ कर पढ़ता था, एक दिन वो नहा कर छत पर कपड़े डालने आई, वो काफी खूबसूरत लग रही थी। मैं उसे देख रहा था, उसकी पीठ मेरी तरफ थी, उसके कूल्हे बड़े मस्त थे। मैं गौर से देख रहा था कि अचानक वो पीछे मुड़ी और मुझे देखते उसने देख लिया और पूछा- क्या देख रहे हो?

मैं बोला- अगर बोलूँगा तो बुरा तो नहीं मानोगी?
वो बोली- नहीं बोलोगे तो गुस्सा हो जाऊँगी।
मैंने हिम्मत जुटा कर बोला- तुम खूबसूरत हो और मुझे अच्छी लगती हो !वो मुस्कुरा कर चली गई। मैं समझ गया कि उसके दिल में भी वही है जो मैं सोच रहा हूँ।

इसके बाद एक दिन शाम को वो छत पर आई, अन्धेरा हो चला था, मैं पहले से ही छत पर था। वो जब आई तो मैंने हिम्मत करके उसके हाथ पकड़ लिया।

वो बोली- कोई देख लेगा।
इस पर मैंने कहा- अँधेरे में कौन देखेगा?
तो वो बोली- इरादे ठीक नहीं लग रहे है तेरे।

मुझे और क्या चाहिए था, यह उसका इकरार था और मैं उसके दोनों बाँहों को पकड़ कर अपनी और खींचा और उसके होंठों को चूम लिया।

एक सिहरन सी महसूस हुई मुझे, आखिर किसी लड़की को मैंने पहली बार चूमा था। वो अपनी बाँहों को छुड़ा कर जल्दी से नीचे चली गई। मैं अब भी उसकी होंठों की तपिश अपने होंठों पर महसूस कर रहा था। एक अलग किस्म की खुमारी महसूस कर रहा था, एक अजीब से अनुभूति हो रही थी, मैं बता नहीं सकता कि वो कैसा एहसास था लेकिन जैसा भी था मेरी बेचैनी बढ़ा रहा था।

मेरी नज़रें हर पल उसे ढूँढती रहती थी।
जब भी वो अकेले में मिलती मैं कभी उसे चूम लेता कभी उसके हाथों को पकड़ता मगर इससे आगे कभी कुछ नहीं किया।

एक दिन वो बोली कि वो फिल्म देखने जा रही है अपनी सहेलियों के साथ और मुझे पूछा- चलोगे क्या मेरे साथ?
मुझे और क्या चाहिए था, मैं तैयार हो गया और मैं उससे पहले घर से निकल कर सिनेमा हॉल पहुँच गया और उसका इंतजार करने लगा।

थोड़ी देर के बाद वो आई, उसके साथ उसकी दो सहेलियाँ थी। हम सब अंदर जाकर बैठ गये और थोड़ी देर में फिल्म शुरू हो गई।

वो मेरे बगल में थी, मैंने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया और फिल्म देखने लगा। जब रोमाँटिक सीन आया तो मैं भी थोड़ा रोमांटिक हो गया, वो मेरे थोड़ा करीब आ गई और मेरे कंधे पहली बार उसके बूब्स से सटे तो मेरे अंदर एक बिजली सी कौंध गई, मुझे अच्छा लगा।

वो कुछ नहीं बोली। इस तरह थोड़ी देर के बाद मैंने अपना हाथ उसके बूब्स पर रखा और धीरे धीरे दबाने लगा वो मेरे हाथ को ज़ोर से दबा रही थी शायद उसकी यह प्रतिक्रिया थी। इसके बाद मैंने अपना हाथ उसकी जांघों पर रख दिया और धीरे धीरे सहलाने लगा और कुछ देर के बाद मैंने अपना हाथ उसकी चूत के पास रख दिया, उसने मेरा हाथ हटा दिया।

फिर मैंने दुबारा अपना हाथ चूत के पास नहीं रखा, मैं बस उसके बूब्स दबाता रहा, मैं अपना हाथ मोड़ कर अंदर से उसके बूब्स के पास रखा था ताकि कोई देख ना सके।

इस तरह मैं पूरी फिल्म में उसके उरोज सहलाता-दबाता रहा। उसे भी शायद अच्छा लग रहा था, तभी तो वो मेरा हाथ नहीं हटा रही थी। इस तरह फिल्म देख कर हम वापस आ गये। यह हमारे रिश्ते की नई परिभाषा थी।
कहानी जारी रहेगी।
[email protected]
3069

Download a PDF Copy of this Story दिलकश मुस्कान -1

Leave a Reply