भाभी की ननद और मेरा लण्ड-3

(Bhabhi Ki Nanad Aur Mera Lund-3)

यह कहानी निम्न शृंखला का एक भाग है:

दलबीर सिंह
भाभी ने मुझे थोड़ा परे को ढकेला और मेरा अंडरवियर पकड़ कर नीचे की ओर खींच दिया।
फिर बोलीं- बिट्टू, तू हुन्न अपना ‘पप्पू’ माला दी घुत्ती दे अंदर धुन्न दे ! हौली हौली धक्कीं ! ऐदा पह्ल्ली वार ए ! ऐन्ने अज्ज तक नी ऐ काम्म कित्ता ! (तू अब अपना पप्पू माला की खाई में डाल दे ! पर धीरे से डालना, क्योंकि इसने पहले कभी किया नहीं है।)
मैं बोला- ठीक है भाभी।
भाभी ने अपना मुँह माला के मुँह पर लगाया और मेरा लन्ड पकड़ कर माला की चूत पर रख दिया।

मेरा तो उत्तेजना के मारे बुरा हाल था ही। सो मैंने भी एक जोर का धक्का मारा। मेरा आधे से ज्यादा घुस गया। माला बड़े जोर से छटपटाई लेकिन उसका मुँह भाभी ने अपने मुँह से बंद कर रखा था। इसलिए उसके मुँह से कोई आवाज़ नहीं आ पाई।
लेकिन उस के चेहरे से पता चल रहा था कि उसे दर्द हो रहा था। अंदर से उसकी चूत बहुत गर्म लग रही थी। मैंने दूसरा धक्का नहीं मारा और माला की चूची ज़ोर-ज़ोर से चूसने लगा। भाभी ने भी अब उसका मुँह छोड़ दिया, और दूसरी तरफ की चूची अपने मुँह में भर ली और चूसने लगीं।

माला बोलीं- भाभी बस और नहीं, मुझे बहुत ज़ोर का दर्द हो रहा है।
तो भाभी उसका सर सहलाते हुए बोलीं- बस मेरी बन्नो इतना ही दर्द था, अब और नहीं होगा। एक बार तो यह होना ही था।
और भाभी ने फिर से उसकी चूची को मुँह में भर लिया। लगभग एक-डेढ़ मिनट तक हम दोनों उसे ऐसे ही चूसते और सहलाते रहे।

फिर भाभी ने मेरे चूतड़ पर हाथ मार कर इशारा किया और मैंने धीरे-धीरे ज़ोर लगाना शुरू किया। बिल्कुल टाईट फंस कर मेरा लन्ड अंदर जा रहा था।

माला ने अपने हाथ से मेरी पीठ पर इतने ज़ोर से पकड़ा कि उसके नाखून मुझे चुभने लगे और उसका चेहरा दर्द के मारे लाल हो गया था।
लेकिन इस बार मैंने बिना रुके सारा लण्ड जड़ तक उसके भीतर डाल ही दिया। मैंने इससे पहले भाभी की चूत भी 3-4 दफा ली थी। उनकी चूत इतनी गर्म नहीं लगती थी।

अब पूरा लण्ड अंदर डाल कर, मैं थोड़ा रुक गया और उसकी गर्दन पर बाईं तरफ जीभ से चाटने लगा। उधर भाभी भी कभी उसकी चूची चूसतीं, कभी उसके गाल पर पप्पी करतीं और कभी उसके होंठों को चूसने लगतीं।

अब मेरा एक हाथ माला की कमर के नीचे चला गया था और दूसरा भाभी की चूत पर चला गया। भाभी की चूत भी गीली हो रही थी।
अब माला का चेहरे से दर्द के भाव कम हो गए थे और उसने नीचे से थोड़ा-थोड़ा हिलना शुरू कर दिया था। मैं समझ गया कि अब उसे भी मजा आने लगा है।

फिर धीरे-धीरे मैंने भी हिलना शुरू किया, पर अभी मैं अपना पूरा लण्ड बाहर नहीं निकाल रहा था। बस थोड़ा-थोड़ा ही आगे पीछे हिल रहा था। धीरे-धीरे करते-करते कब मेरी स्पीड बढ़ गई, पता भी नहीं लगा।

अब माला पूरे ज़ोर से सहयोग कर रही थी। और साथ-साथ बड़बड़ा भी रही थी- आआह… ह्हह्हा… बिट्टूऊ…ऊऊ भाअ…भीइइ… ये मुझे क्या हो रहा है…नशाआ सा हो रह्ह्हाआ है।’

और वो भी नीचे से जोर से उछलने लगी और उसका जिस्म अकड़ने लगा। वो कुछ ऐसे शब्द बड़बड़ा रही थी, जो समझ में नहीं आ रहे थे।

अचानक माला का शरीर पूरे ज़ोर से अकड़ा। उसने अपनी कमर ऊपर की ओर उठा दी, और मुझे इतने ज़ोर से भींचा कि कुछ पल के लिए मेरा हिलना रुक गया।
और उसके मुँह से आवाज़ें निकल रही थीं ‘आआईईई मांआअ मांआआअ हाईईई रेआआऐ आह’ करते ही वो रुक गई।

उसने मुझे इतने ज़ोर से भींचा कि मुझे भी लगा कि कुछ देर के लिए सांस लेने में भी ज़ोर लगाना मुश्किल हो रही है। मेरा भी लण्ड जो कि झड़ने ही वाला था, इतनी देर में वो भी रुक गया।

और माला ! वो तो बेसुध सी हो गई थी और शरीर एकदम शिथिल हो गया। उसकी मुझ पर से पकड़ भी ढीली हो गई।

भाभी ने कहा- आजा मेरे शेर आ, अब भाभी की सर्दी भी दूर कर दे।

और मैं ऐसे ही माला की चूत से निकले रज से सना हुआ लण्ड ले कर ही भाभी पर चढ़ गया। बिना किसी फार्मेलिटी के ही भाभी की चूत में अपना लण्ड डाल दिया और लगा ज़ोर-ज़ोर से धक्के लगाने।

भाभी भी मेरी और माला की चुदाई देख कर और साथ में खुद भी सहयोग करने के कारण पूरी तरह से गर्म हो चुकी थीं।

मैं अपना सारा का सारा जोश भाभी पर ही दिखा रहा था। कभी भाभी की बाईं चूची चूस रहा था तो, कभी दांई। कभी मेरा मुँह उनके मुँह पर चला जाता।

वो भी पूरा सहयोग कर रही थीं। कभी मेरी जीभ अपने मुँह में लेकर चूसतीं और कभी अपनी जीभ मेरे मुँह में डाल देतीं। मेरी पूरी पीठ पर हाथ फेर रही थीं। कभी मुझे जोर से कस लेतीं। अब भाभी ने अपनी दोनों टाँगें हवा में उठा दी थीं।

चुदाई की इतनी गर्मी हम दोनों को चढ़ी हुई थी कि ठण्ड का तो एहसास भी नहीं हो रहा था।
अचानक भाभी ने कहा- एक मिनट रुको।

मेरे रुकते ही भाभी ने पलटी खाई और मुझे नीचे कर के खुद मेरे ऊपर आ गईं, और दोनों टांगें मेरे दोनों तरफ कर दीं। ऊपर आ कर ज़ोर-ज़ोर से मेरे लण्ड पर कूदने लगीं। उनके भारी भरकम मम्मे झूलते हुए इतने मस्त लग रहे थे कि क्या बताऊँ !

कभी वो मेरे ऊपर बैठ कर हिलती थीं। कभी मेरे ऊपर झुक कर अपने मम्में मेरे मुँह के आगे कर देतीं और मैं उन्हें मुँह में भर कर चूसने लगता।

मेरे मुँह से भी और भाभी के मुँह से भी सेक्सी आवाज़ें निकाल रही थीं ‘आआ…आआह ओह्ह हयआऐ।’
भाभी बोल रही थीं- ज़ोर से डाल बिट्टू ! इसके भाई से तो कुछ होता ही नहीं ! आआहहह्ह हाय रे।

वो और भी पता नहीं क्या-क्या बड़बड़ा रही थीं। इसी तरह से कुछ देर करने से मेरी थकावट कुछ कम हो गई थी। लेकिन अब इस तरह से मुझे पूरा मजा नहीं आ रहा था।

मैंने कहा- भाभी तुम नीचे आओ।
मेरे इतना कहते ही वो तुरंत रुकीं और मेरे ऊपर से उठ कर कमर के बल लेट गईं।

मैंने फिर से ऊपर आकर भाभी की टाँगें ऊपर को कर दीं। उन की जांघों के नीचे से हाथ निकाल कर चूचियों को पकड़ लिया, और पूरा लण्ड उनकी चूत में डाल दिया। मैं लंड पूरा बाहर खींच कर अंदर धकेल रहा था। 5-7 धक्के मारते ही मुझे लगने लगा कि मेरा माल निकालने वाला है।

तो मैं तुरंत भाभी से बोला- भाभी, मेरा होने वाला है।

भाभी ने मेरे चूतड़ों को कस कर पकड़ लिया और बोलीं- जोर से करो मेरी जान, मेरा भी होने वाला है। अपना सारा माल मेरे अंदर ही डाल दे। बस मेरी तस्सल्ली करवा दे बिट्टूऊऊ…

भाभी का इतना बोलना था कि मैं तो पूरा मस्त हो कर, टोपा अंदर छोड़ कर पूरा लण्ड बाहर तक खींचता और फिर पूरे जोर से धक्का मार कर वापस धकेल रहा था।

और इस समय मुझे पूरी दुनिया में भाभी की चूत के सिवाए और कुछ भी नहीं सूझ रहा था। मैं तो बस आगे-पीछे आगे-पीछे हिल रहा था और धक्के मार रहा था।

8-10 धक्के और मारे होंगे कि भाभी का और मेरा शरीर अकड़ने लगे। भाभी ने मुझे पूरे जोर से भींच लिया और मैंने भाभी को।
इधर भाभी का पानी छूटा और साथ ही फिर अचानक जैसे एक जलजला सा आ जाए, इसी तरह मेरे लण्ड के टोपे पर ऐसी गुदगुदी सी होने लगी कि जिसे मैं सिर्फ महसूस कर सकता हूँ।

उसके लिए शायद सही शब्द कोई बना ही नहीं। मेरे शरीर की सारी गर्मी जैसे पिंघल कर मेरे लण्ड के रास्ते से भाभी की चूत में उतरने लगी। कई सारी पिचकारियाँ सी निकल कर भाभी के अंदर चली गईं।

अब मैं भाभी के सीने पर सर रख कर लम्बी लम्बी साँसें ले रहा था। जैसे पता नहीं कितने मील भाग कर आया होऊँ। यही हाल भाभी का भी था।

अब मेरा ध्यान माला की तरफ गया। वो भी होश में आ चुकी थी और अधखुली आँखों से हमारी तरफ देख रही थी।
मेरा शरीर ऐसे हो गया, जैसे जान ही नहीं रही हो। भाभी के सीने पर लेटे-लेटे मेरी आँख लग गई।

लगभग 15-20 मिनट बाद हमें होश आया तो भाभी ने तकिये के नीचे से एक कपड़ा निकाल कर दिया, और कहा- लो इससे साफ़ कर लो।

हम सबने अपने-अपने को साफ़ किया, अपने-अपने कपड़े पहन लिए। फिर भाभी उठी और रूम हीटर के सामने रखा पतीला उठाया और हमारे चाय वाले गिलासों में दूध डाल कर हमें पकड़ा दिया।

और बोलीं- लो सब लोग दूध पियो और ताकत हासिल करो।

उसके बाद हम लोग तरह से सो गए। यानि एक तरफ भाभी, एक तरफ माला और बीच में मैं।

उस रात बहुत बढ़िया नींद आई। सुबह दिन निकलने से पहले मैंने और भाभी ने एक बार और चुदाई की। माला के साथ दर्द के कारण उस समय दोबारा नहीं कर पाया। अगली शाम को भाभी को तो महीना आ गया और वो तो अगले पांच दिन के लिए कुछ कर नहीं पाईं। पर अगले चार दिन माला की चूत रोज़ दो बार मारी। वो कहानी अगली बार लिखूंगा।

यह कहानी बिल्कुल सच्ची है। बस कहानी का रूप देने के लिए घटना का मेकअप तो करना ही पड़ता है।

पाठकों की अमूल्य राय की प्रतीक्षा रहेगी। इन घटनाओं के बाद धीरे-धीरे मैं पक्का चोदू बन गया। धीरे-धीरे सारी कहानियाँ पेश करूँगा।
आपका दलबीर
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