माँ बेटी की चूत चुदाई की इच्छा-40

(Maa Beti Ki Chut Chudai Ki Ichcha-40)

यह कहानी निम्न शृंखला का एक भाग है:

अभी तक आपने पढ़ा…

तभी रूचि मेरे पास आई उसने कातिलाना मुस्कान देते हुए कहा- लाओ मैं अभी तुम्हारा कीड़ा चैक किए देती हूँ..
मैं बोला- अरे नहीं.. अब हो गया..
वो मेरे लौड़े को देखते हुए बोली- हाँ दिख तो रहा है.. कि साफ़ हो गया।
फिर से चुहलबाज़ी में हँसने लगी।

तभी माया ने मेरा पक्ष लेते हुए कहा- तू उसे तंग मत कर.. बड़ा है तेरे से..
तब कहीं जाकर रूचि शांत हुई.. फिर हम टीवी देखने लगे कि तभी माया बोली- टीवी में आज कुछ अच्छा आ ही नहीं रहा है..
रूचि भी बोली- हाँ.. माँ आप सच कह रही हो.. मैं भी बोर हो रही हूँ।

मैंने भी उनकी ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलाते हुए अपने प्लान को सफल बनाने के लिए अपनी इच्छा प्रकट की- हाँ यार.. कुछ मज़ा नहीं आ रहा है..
तो विनोद बोला- फिर क्या किया जाए?
रूचि बोली- कुछ भी सोचो.. जिससे आसानी से टाइम पास हो सके।
वो बोला- अब सोचो तुम ही लोग.. मेरा क्या है.. मैं तो बस शामिल हो जाऊँगा।

अब मुझे अपना प्लान सफल होता हुआ नज़र आने लगा जो कि मैंने घर से आते ही वक़्त बनाया था.. जिसकी सम्पूर्ण जानकारी सिर्फ रूचि को ही थी.

अब आगे…

लेकिन प्लान क्या था.. तो अब मैं अपना प्लान बताता हूँ.. विनोद का ध्यान हटते ही मैंने माया को देखते हुए कहा- आंटी आप ही कुछ बताओ न..

तो वो बोलीं- मैं क्या बताऊँ?
मैंने उनसे पूछा- जब आप लोग छोटे थे.. तो क्या खेलते थे?

बोलीं- बहुत कुछ.. पर उस जमाने में आज की तरह इतने साधन नहीं थे.. तो हम लोग कैरम, लूडो, लुका-छिपी, खो-खो, रस्सी-कूद, चोर-पुलिस और अंताक्षरी वगैरह खेलते थे।

‘वाह आंटी.. बहुत मज़ा आता होगा न..?’

वो बोलीं- हम्म.. हम लोगों के समय बस यही खेल खेले जाते थे.. जिसमें से अंताक्षरी में.. मैं हमेशा हार जाती थी।

माया की बात से मुझे याद आया कि मेरा दोस्त विनोद भी अपनी माँ की ही तरह था.. उसे गाने-वाने में ज्यादा इंटरेस्ट नहीं था… तो आंटी की इस बात से मुझे पक्का यकीन हो चला कि अब मेरा प्लान सफल हो जाएगा और प्लान इतना मज़ेदार था कि किसी भी हाल में आज या तो मेरे साथ माया रहेगी या रूचि.. जिसके सपने मेरी आँखों के सामने घूमने लगे थे।

बस फिर क्या था.. मैंने बोला- चलो फिर आज अंताक्षरी खेली जाए.. पर एक शर्त रहेगी..
तो सब बोले- वो क्या?
मैं बोला- वो बाद में.. पहले ये बोलो कि दूसरी टीम का कप्तान कौन बनेगा..?

तो रूचि ही ने तपाक से बोला- अगर तुम कप्तान हो.. तो मुझसे मुकाबला करो..
सभी हंस दिए.. वो ऐसे बोली थी कि जैसे झाँसी की रानी हो..
मैंने बोला- चलो ठीक है.. पर आंटी और विनोद.. किसकी टीम में रहेंगे.. इसके लिए टॉस होगा।

तो सभी ने सहमति जताई और मेरे पक्ष की बात हुई.. तो मैंने सिक्का निकाला और रूचि से बोला- देख.. अगर हेड आया तो विनोद मेरी ओर.. और अगर टेल आया.. तो तेरी ओर..
वो मुस्कुरा कर बोली- अरे कोई भी आए.. जीतूंगी तो मैं ही..

तो मैंने टॉस उछाला और वही हुआ.. जो मैंने सोचा था।
मैंने सोचा यह था कि विनोद मेरी ओर ही रहे और नसीब से हेड ही आया।

फिर सबसे पहले आंटी बोलीं- अच्छा अब शर्त भी तो बता.. जो तू बोल रहा था।

मैं बोला- बहुत ही आसान है.. अगर बिना शर्त के खेल खेला गया तो शायद मज़ा न आए.. बस इसलिए गेम में ट्विस्ट लाने के लिए किया जा रहा है।

तो विनोद बोला- अबे यार इतना घुमा क्यों रहा है.. सीधे बोल न.. करना क्या है?

मैं बोला- जो जीतेगा.. उस टीम का 1 मेंबर हारी हुई टीम के 1 मेंबर के साथ रहेगा.. उतने सभी दिन.. जितने दिन मैं यहाँ हूँ.. और हर रोज पार्टनर आल्टरनेट बदलते रहेंगे और उसे जीतने वाली टीम के मेंबर की हर बात माननी होगी।

आंटी बोलीं- पर कैसे?

मैंने समझाया- जैसे मैं जीतता हूँ.. तो आपको या रूचि में से कोई आज मेरे साथ ही रहेगा.. और जैसा मैं बोलूंगा.. वो उसको करना पड़ेगा और कल आप में से कोई दूसरा मेरे साथ.. इसी तरह जब तक मैं हूँ.. यही चलता रहेगा।

वो बोलीं- वैसे करना क्या-क्या पड़ सकता है?

मैं बोला- जैसे खाना बनाने में मदद.. सोते में साथ ही रहना.. और अगर रात को पानी मांगे.. तो उठ कर देना.. ये समझ लो.. बिना कुछ सोचे उसका आदेश मानना है।

विनोद बोला- यार मेरे से नहीं हो पाएगा.. साले कहीं तू हार गया तो सब मुझे भी करना होगा.. जो कि मुझसे नहीं होगा।
तो मैं बोला- अबे प्रयास करेगा या पहले ही हार मान लेगा।

वो फिर बोला- साले.. मेरे हिस्से का भी तू ही करेगा.. ये सोच ले.. मुझसे जितना बन पड़ेगा.. मैं बस उतना ही करूँगा।
जिस पर रूचि ने विनोद की बहुत चिकाई ली.. तो वो भी मुझे अपने मन में गरियाता हुआ ‘हाँ’ बोल दिया।

तभी रूचि बोली- भाई अगर मैं जीती.. तो तुम्हें आज ही अपनी सेवा का मौका दूंगी.. बहुत काम कराते हो मुझसे!
तो वो खिसियाते हुए बोला- पहले जीत तो सही.. फिर देखेंगे..

आंटी मेरे बताए हुए प्लान के मुताबिक मौन धारण किए हुई थीं.. क्योंकि उनका न बोलना ही प्लान को हवा दे रहा था।

फिर हमने गेम शुरू किया.. क्योंकि टॉस मैं जीता था.. तो मुझसे ही शुरूवात हुई।

अब गाने वगैरह लिखने की शायद जरूरत नहीं है.. आप लोग बुद्धिजीवी हैं.. सब समझ ही लेंगे और अगर लिखता भी हूँ तो कुछ को यही लगेगा कि फालतू की समय बर्बादी हो रही है.. इसलिए अब कहानी आगे बढ़ाता हूँ।

गेम खेलते-खेलते करीब आधा घंटा हो चुका था.. पर हम दोनों में से कोई भी हार मानने को तैयार नहीं था।
तभी मैंने रूचि को याद दिलाई- यार.. इतनी देर हो गई.. अब कोल्ड ड्रिंक ले आओ.. जल्दी से फिर पीते-पीते हुए ही खेलेंगे।
रूचि उठने लगी.. तो मैंने उसे इशारा किया कि मुझे बात करनी है.. और वो गाना था ‘मुझे कुछ कहना है… मुझे कुछ कहना है..’

जिसे रूचि समझते हुई मुस्कुराई और उसने ‘हाँ’ में सर हिला दिया और बोली- पहले कोल्ड्ड्रिंक हो जाए.. फिर कहते हैं।
तो मैं बोला- ओके..

वो रसोई में गई और उसे गए करीब पांच मिनट से भी ज्यादा हो गए थे.. पर वो नहीं आई।
विनोद ने आवाज लगाई- देर क्यों लगा रही हो?
वो बोली- ड्रिंक्स वाले गिलास नहीं दिख रहे हैं..

विनोद अपनी माँ से बोला- माँ तुम ही जाओ.. वरना ये सारी रात गिलास ढूढ़ने में ही लगा देगी।

मुझे बस इसी पल का इंतज़ार था.. जब तक आंटी उठतीं.. तब तक मैं ही विनोद से बोला- तू ही चला जा न..

वो बोला- यार मुझे कोई आईडिया नहीं है.. कि कौन सा सामान कहाँ रखा है।

तो मैंने बनावटी हंसी के साथ बोला- ले तेरा घर.. तुझे ही नहीं मालूम.. तुझसे अच्छा तो मैं ही हूँ.. कि घर तेरा और कौन चीज़ कहाँ है.. बस दो ही दिन में जान गया था। आंटी लगता है.. आप इससे कोई काम नहीं लेती हो.. तभी इसे कुछ नहीं मालूम..

फिर तो विनोद खिसियाते हुए बोला- अबे लेक्चर बंद कर.. और लेकर आ.. तब जानूँ..

तो मैं उठा और रसोई में गया.. जहां पहले से ही सब रेडी हो चुका था.. बस बाहर आने की ही देरी थी।
मैं जैसे ही गया तो रूचि बोली- क्या है.. क्या बात कहनी थी?

तो मैं बोला- कैसे भी करो.. हारो.. नहीं तो प्लान चौपट हो सकता है.. विनोद की वजह से.. कहीं वो शर्त से मुकर गया.. तो सब किए-कराए पर पानी फिर जाएगा।

तो वो मेरे और करीब आई और मुस्कुराते हुए मुझे बाँहों में भरकर मेरे होंठों पर चुम्बन देते हुए बोली- जान तेरे लिए तो अब मैं अपना सब कुछ हारने को तैयार हूँ.. फिर ये गेम क्या चीज़ है।
मैंने भी उसके बोबों को भींचते हुए बोला- तो फिर अब चलें..

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मेरे अचानक से हुए इस वार से या शायद ज्यादा ही दबाव के कारण.. उसके मुँह से दर्द भरी चीख निकल गई..

तो मैं भी उतनी ही तेज स्वर में बोला- क्या यार.. बच्चों की तरह एक चूहे से डर गई..
यह कहते हुए हम वापस कमरे में पहुंच गए.. जहाँ हम खेल रहे थे।
आंटी रूचि से बोलीं- क्या हुआ.. चीखी क्यों थी?

तो रूचि मुस्कुरा उठी.. इसके पहले कि कोई अपना दिमाग लगाता.. मैंने बोल दिया- क्या आंटी.. रूचि तो बहुत ही डरती है.. जरा सा चूहा पैर से छू कर क्या निकल गया.. ये तो चीख ही पड़ी.. बहुत कमजोर है।

यह कहते हुए मैंने रूचि को देखते हुए आँख मार दी.. जिससे रूचि से रहा न गया और वो शर्मा उठी।
फिर मैंने बोला- ये तो कहो.. चूहे का दिल मजबूत था.. नहीं तो इसकी चीख सुनकर बेचारा वहीं मर जाता।
इतना सुनते ही सब ठहाके लगाकर हँसने लगे।

तभी विनोद रूचि से बोला- अब सबको ड्रिंक्स देगी भी.. या ऐसे ही खड़ी रहेगी..

तो रूचि बोली- थोड़ा तो रुको.. मैं बहुत घबड़ा गई थी। ये तो कहो.. मैं अकेली नहीं थी.. वरना सब गिलास टूट जाते और कांच भी साफ़ करना पड़ता..

फिर वो गिलासों में कोल्डड्रिंक्स डालने लगी और चारों गिलास में भरने के बाद ट्रे हमारी ओर बढ़ाई तो हम लोगों ने ली.. फिर एक उसने माया को दिया और एक खुद ले कर माया आंटी के पास बैठ गई।

तो दोस्तो, आप लोगों ने शायद ध्यान नहीं दिया कि जब से मैंने रूचि को जवानी का पाठ पढ़ाना शुरू किया था.. तब से वो न ही तो मेरा नाम ले रही थी और न ही मुझे अभी तक एक बार भी भैया बोला था।

खैर.. आपको कहानी पर ले चलते हैं.. फिर मैंने उससे बोला- चलो अब ‘ह’ से गो या ‘ह’ से हारी पाओ..
तो वो बोली- अच्छा..

और कुछ सोचने के बाद बोली- माँ मेरी डिक्शनरी लगभग खाली हो रही है.. कुछ आप भी गाओ न..?
तो माया बोली- मुझे जो आते हैं.. मैं गा तो रही हूँ..

और इसी तरह सोचने के कुछ देर बाद बोली- लो फिर… ‘हम तुमसे मोहब्बत करके दिन रात सनम रोते हैं।’
वो ऐसे चेहरे के भाव बना कर गा रही थी.. जैसे कि गाने के जरिये ही मुझे हाल-ए-दिल बयान कर रही हो।

मैं अभी इसी सोच में था कि अचानक विनोद की आवाज़ मेरे कान में पड़ी- देखा साले.. हरा दिया न..

तो मैं बोला- अभी कहाँ..

बोला- तू सोचता ही रहेगा या ‘ह’ से गाएगा भी?
तो मैं बोला- बाबू.. थोड़ा समय तो दे.. बस अभी गाता हूँ।
तभी रूचि बोली- इतनी देर का नहीं चलेगा..

तो मैं बोला- फिर आगे के लिए एक मिनट का समय तय कर लो.. मुझे ऐसा लग ही रहा था कि अब खेल ख़त्म होने की तरफ है.. क्योंकि मुझे गाना ही ऐसा याद आया था.. जिससे शायद उसे उसके गाने का जवाब भी मिल जाता।

तो मैंने गाना शुरू करने के पहले विनोद से बोला- तुम साले.. बस टापने के लिए ही बैठे हो.. या कुछ करोगे भी..?
वो बोला- मैं तुम्हारे ही सहारे खेल रहा हूँ.. तुम्हें तो पता ही है कि ये मेरे बस के बाहर है।

फिर मैंने बोला- चलो.. अब खेल ख़त्म..
रूचि ने सोचा कि मैं हार गया.. वो ख़ुशी से उछल पड़ी… तो मैं बोला- अरे इतनी खुश न हो..
तो वो बोली- आपको हराकर में खुश न हुई.. तो क्या हुआ.. वैसे आज विनोद भैया को गुलाम बनाना है.. ये मुझसे अक्सर बहुत काम लेते हैं।

मैं बोला- परेशान न हो.. मैं ये कह रहा था कि मेरे गाने के बाद खेल ख़त्म हो जाएगा..

मैंने एक आँख मार कर इशारा भी कर दिया ताकि आंटी को भी शक न हो कि मैं और रूचि भी उन्हीं क़े जैसे मिले हुए हैं।

तो रूचि बोली- कैसे?

मैं बोला- खुद ही देख लेना..

मैंने गाना चालू किया- हाल क्या है दिलों का.. न पूछो सनम.. आप का मुस्कुराना गजब ढा गया। एक तो महफ़िल तुम्हारी हंसी कम न थी.. उस पे मेरा तराना गजब ढा गया। हाल क्या है..?

अब चलो.. गाओ ‘है’ से..

थोड़ी देर बाद विनोद बोला- रूचि अभी कुछ देर पहले एक मिनट वाला शायद कुछ कह रही थी न..

ये कहते हुए वो हँसने लगा और मन ही मन हम तीनों भी ये सोच कर हंस रहे थे कि विनोद भी बेवकूफ बनकर खुद ही मदद करने लगा और वो गिनती गिनते हुए रूचि से बोले जा रहा था- अगर तू फंस गई.. तो समझ ले बहुत सारे कपड़े तुझसे धुलाऊँगा.. बहुत दिनों से गंदे पड़े हैं और तू खुद ही जिम्मेदार भी है.. अभी खुद पर बड़ा टशन था न.. अभी हारते ही सबसे पहले तुझे मैं मुर्गा बनाता हूँ।

विनोद की इस बात से आंटी इतना खुश हो रही थीं.. कि कुछ पूछो ही नहीं.. क्योंकि अब कुछ ऐसा बचा ही नहीं था कि विनोद किसी तरह का कोई विरोध करे या बनाए गए प्लान में आपत्ति जताता। उन्होंने मेरी और मुस्कुराते हुए देखकर फेसबुक की लाइक बटन की तरह अपने हाथों से इशारा किया.. जिससे मुझे लगा कि जैसे आज मेरी इच्छा नहीं बल्कि आंटी की इच्छा पूरी होने वाली है।

वैसे दोस्तो, आप सभी को मेरा प्लान कैसा लगा?
हो सके तो जरूर बताइएगा।

इसी के साथ आज यहीं समाप्त करने की इजाजत चाहूंगा और प्रयास रहेगा कि आगे ऐसी धमाकेदार चुदाई का वर्णन हो.. जिससे लौड़े खुद ही फूट के बह जायें और लड़कियाँ रुक-रुक कर रिसती रहेंगी और शादी-शुदा बिना डलवाए नहीं रह पाएंगी.. और तो और.. कुछ न मिला तो हत्थी तो चलेगी ही..

फिर मिलेंगे..
अभी के लिए फिलहाल इतना ही बाकी का मैं फिर कभी अपनी अगली कहानियों में वर्णन करूँगा कि कब कैसे और क्या हुआ। तब तक के लिए आप सभी काम रस से सने लौड़े वालों को और चिपचिपाती चूत वालियों को मेरा चिपचिपा नमस्कार.. आप सभी अपने सुझाव मेरे मेल पर भेज सकते हैं और इसी आईडी के माध्यम से फेसबुक पर भी जुड़ सकते हैं।
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