मेरी सपना का अपनापन

(Meri Sapna Ka Apnapan )

सभी दोस्तों को रौनक का नमस्कार! यारो, मैं अन्तर्वासना की कहानियां कई सालों से हमेशा पढ़ता आया हूँ. सभी की अंतर्वासना जान कर मुझे भी अपनी कहानी लिखने की प्रेरणा मिली. पिछले कई सालों से मैं पुणे में रहकर अपनी स्टूडेंट वाली ज़िन्दगी जी रहा था.

जब नौकरी का मौका आया तो उसी में पूरा घुस गया. ज़िन्दगी तेजी से चलने लगी.. या यूं कहिये तेजी से दौड़ने लगी. कुछ समय बीतने पर अपने लिए बुरा लगने लगा कि पुराने दिन न जाने कहाँ चले गए. जब हम दोस्तों के साथ कहीं घूमने जाते.. वहाँ की ख़ूबसूरत अप्सराओं को लाइन मारते. पर दिल में यही ख्वाहिश रही कि ज़िन्दगी इस तरह जी लूँ.. जहां बहुत सारे दोस्त हों.. काम से जब टाइम मिले तो वक़्त अच्छा बीते.

एक बार एक एक इंटरव्यू में गया, जहां पर टीचर की ज़रूरत थी. बड़ी लम्बी इंटरव्यू के बाद नौकरी मिलने की आस जगी. लेकिन इसमें पैसा कम था.. पर सोचा कि जो भी मिलेगा सो ले लेंगे. भगवान की दया से वहाँ नसीब खुल गया.
किसी ने सच ही कहा है कि भगवान के घर देर है अँधेर नहीं.
ईशकृपा जान कर मैंने वो ऑफिस ज्वाइन कर लिया. जब ज्वाइनिंग लेटर लेने पहुँचा तो वहाँ पे बैठी ख़ूबसूरत महिला के दर्शन हुए. जिसे मैं देखते ही रह गया और उसकी आँखों में खो गया.

उसने मुझे देख कर इज्जत से कहा- सर ये रहा आपका अपॉइंटमेंट लेटर.. आप ‘हमें..’ कब से ज्वाइन कर रहे हैं?

उसे ये शब्द सुनकर दिल में मानो बहार आ गई. जब होश आया तो याद आया कि वो ऑफिस में ज्वाइन की बात कह रही थी.

मैं उसकी यादों को आँखों में सजाए वहाँ से निकलने लगा, तभी वहाँ के अधिकारी ने पूछ ही लिया- सर आपने पत्र लिया ना..!
तो मुँह से निकला- हां सर आपकी सेक्रेटरी ने दे दिया.
इस पर उन सर ने कहा- वो सेक्रेटरी नहीं, टीचर हैं, जो वो ये काम भी देख लेती हैं. उनका नाम सपना है.

यारो, सपना तो सही में सपना सा लगने लगी. गोरा रंग भूरी भूरी आँखें, कसा हुआ बदन, साढ़े पांच फ़ीट की ऊचाई होगी. उसको देख कर लगता था जैसे भगवान ने बहुत वक़्त देकर तराशा हो. उसके बदन की खुशबू मेरी सांसों में उसी वक़्त समा गई. मेरा दिल भी कहने लगा कि रौनक बेटा अब देर ना कर.. इसको जल्द ही ज्वाइन कर ले.

बस फिर क्या था, जहां माँ-बदौलत एक महीने बाद आने वाले थे.. वहाँ दो दिन में आ गए. नया नया ऑफिस होने की वजह से जब मैं इधर उधर भटकने लगता तो किसी को पूछना पड़ता. धीरे धीरे इस बात को उन्होंने भी गौर कर लिया.

एक दिन सपना ने पास आकर खुद कह दिया- रौनक सर आपको जहां जाना हो, आप मुझसे पूछ सकते हो. मैं आपको बता दूंगी.

बस फिर क्या था.. बातों का होने का बहाना मिल गया.. और मुझे जीने का. दिन भर सपना को देखता और रात भर सपना की यादों में खोया रहता. धीरे धीरे मेरी इस भावना को शायद वो समझने लगी थीं. पर ना मैंने कभी कहा, ना उन्होंने सबके सामने ज़ाहिर होने दिया.

वक़्त बीता और जब हमारे ऑफिस के पुराने अफसर का रिटायरमेंट आया तो उन्होंने सबको अपने घर पे बुलाया. इसी बात पर मैं सोचता रहा कि मैं वहाँ जाऊं कि नहीं.
यारो, पता नहीं क्यों.. बड़े बुजुर्गों की पार्टी मुझे बोरिंग सी लगती है. फिर अचानक मेरे मोबाइल पे फ़ोन आया. फ़ोन पे पता चला कि साहब ने हम सबको ले आने के लिए गाड़ी भेजी है. तब मैं मन मार कर जाने को तैयार हो गया.
बताई हुए जगह पर गया देखा तो गाड़ी लगी हुई थी.. ऑफिस के सब लोग जो यहाँ के कोथरूड एरिया से चलते थे, दिखाई दिए. सबने हाथों में एक बड़ा गुलदस्ता पहले से ही खरीद लिया था. सबसे बात करते करते ना जाने कब गाड़ी अफसर साहब के घर पहुंच गई.

उनका घर बहुत अच्छे से सजा था.. सजावट से लगा मानो सपना ने ही किया हो.. क्योंकि मेरी छटी इन्द्रिय कह रही थी कि यहाँ उसी की खुशबू चारों ओर फैली हुई थी.

अन्दर जाते ही साहब को मुबारकबाद दी और सोफे पे बैठ गया. खुशनुमा माहौल था, रोमांटिक गाना भी बज रहा था.
थोड़ी देर मैं किसी ने पीछे से आवाज़ दी- रौनक सर, आने में रास्ता तो नहीं भूल गए?

जब पलटा तो यारो, मेरे सनम के दीदार हो गए. इस दीदार से सारी बोरियत दूर हो गई और बुड्ढों की पार्टी भी हसीन लगने लगी.
सपना ने कहा- मैं आपको फ़ोन करने वाली थी, पर जब सर ने कहा कि आप सबको लाने के लिए गाड़ी भेजी गई है तो सोचा कि यहीं पर मिल लूंगी.

उसके बाद सपना ने जो बोला, मुझे कुछ सुनाई नहीं दिया. उसकी खूबसूरती ने और प्यारी से आवाज़ ने मुझे दीवाना कर दिया. वो कब फुर्र ही गई कुछ होश ही नहीं रहा.

सब लोग पार्टी का मजा लेने में व्यस्त थे और मैं सपना को ढूंढ रहा था. कुछ देर बाद वो बालकनी में कुछ परेशान सी दिखाई दी. पास जाने में थोड़ा डर लग रहा था.. पर फिर भी सोचा कि पूछ ही लूँ कि क्या हुआ है.
थोड़ी आना कानी के बाद जो बोली, उससे मुझे दुःख हुआ.. समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ. उसकी आपबीती से पता चला कि उसके मंगेतर ने उससे रिश्ता तोड़ दिया है.. जिससे उसके पिताजी को दिल का दौरा आया है.. और उसके लिए तुरंत नासिक जाना पड़ेगा.
सपना ने ये भी बताया कि पुणे में वो घर से दूर अकेली रहती है. अब बिना तैयारी और छुट्टी के इतनी जल्दी वो घर कैसे जाएगी.. ऑफिस से छुट्टी नहीं मिलेगी.. या तनख्वाह काटी जाएगी.

उसके मुँह से ये सुनकर अजीब सा लगने लगा कि इतने दिनों में उसने अपने दुखों का कभी जिक्र ही नहीं किया था. फिर मेरे मन ने कहा कि सपना के लिए कुछ करने का यही मौका है.
मैंने अपने बॉस से बात की और उन्हें सारी बातें समझाते हुए कह दिया कि ऑफिस का काम हम दोनों डबल शिफ्ट करके पूरा कर देंगे.. आपका नुकसान नहीं होगा.

यह सुन कर बॉस मेरी बात मान गया.. और उसने सपना को जाने की आज्ञा दे दी.
बॉस ने कहा- तुम भी उसके साथ जाओ.. पैसे देते हुए कहा कि कुछ पैसे रख लो.. जरूरत पड़े तो लगा देना.
बॉस दिल का बड़ा अच्छा लगा.

ये बात जब मैंने सपना को बताई तो वो ख़ुशी से मुझसे लिपट गई.. फिर खुद को सँभालते हुए उसने मुझे और बॉस को धन्यवाद दिया.

पार्टी का वक़्त भी हो चला था.. मुझे मेरे हॉस्टल भी जाना था.. तो मैं भी बॉस और साहब से आज्ञा मांग कर अकेले ही निकल पड़ा. कुछ दूर जाने से लगा कि सपना भी उसकी स्कूटी लेकर मेरे पीछे पीछे आ रही है.

उसने मुझे देखा तो कहा- बोलो कहाँ जाना है, वहाँ छोड़ देती हूँ.
घायल दिल बेचारा ‘ना’ कैसे कर सकता था.. मैं उसके पीछे गाड़ी पर बैठ गया.

फिर उसने तेजी से गाड़ी भगाई.. उसने इतने ब्रेक मारे कि मैं पूरी तरह उसके बदन से चिपक गया था. हवा में ठण्डक थी.. बदन चिपकने से थोड़ी गर्मी आ रही थी. शायद उससे भी अच्छा लग रहा होगा. मुझे पता ही नहीं चला कि मेरे दोनों हाथ कब उसकी कमर से लिपट गए. मुझे थकान के कारण थोड़ी नींद सी भी आ रही थी. कुछ सपना के बदन की खुशबू का नशा भी था.

उसने मुझे हॉस्टल पे पहुँचा दिया और कहा- कल मैं जाऊँगी तो हफ्ते भर के बाद ही आऊँगी.
मैंने कहा- ठीक है.. पर तुम कब निकल रही हो?
उसने कहा- सुबह चार बजे की गाड़ी से निकलूंगी तो नासिक दस बजे तक पहुंच जाऊँगी. फिर नासिक से पीपल गांव…
मैंने कहा- ठीक है.. आराम से जाना.. अपना ख्याल रखना.

वो मुस्कुराई और चली गई.

अगली दिन सुबह सुबह मैं भी तैयार हो कर बस स्टैंड चला गया.. थोड़े कपड़े ले लिए, पैसे भी और एक चादर क्योंकि बाहर बहुत ठंडी थी. कुछ दूर पैदल चलने पर बस स्टैंड आ गया. वहाँ जाकर नासिक की टिकट ली और गाड़ी में बैठ गया. जब सपना थोड़ी देर में गाड़ी में आई तो मुझे देखकर ख़ुशी से फिर लिपट गई और आकर मेरी बाजू की सीट पर बैठ गई.

मैंने उसे पूरी बात बता दी कि बॉस से आज्ञा लेकर ही सब प्लान किया है.. और अब कुछ दिन तुम्हारे साथ ही रहूँगा.
बस पूरी खाली थी.. हम पीछे की सीट पर बैठे थे. गाड़ी निकली तो लगा कि भर जाएगी, पर ऐसा नहीं हुआ.

सपना ने ख़ुशी से कहा- चलो, मैं तुम्हें अपना गांव दिखाऊंगी… नासिक भी घुमाऊँगी.
मैंने भी हामी भर दी.

पर उसके पिताजी की परेशानी उसके चेहरे पर दिखाई दे रही थी. मैंने एक हाथ उसके सिर के पीछे कर दिया.. और दूसरे हाथ को उसने प्यार से पकड़ लिया. मुझे ठण्ड सी लगी तो मैंने चादर निकाल कर ओढ़ ली. उसने तो टॉप जीन्स एंड जैकेट पहनी हुई थी.

गाड़ी जब पुणे से बाहर निकली तो ठंडी तेज होने लगी और सपना का सिर मेरे कंधों पर आ गया. प्यार से उसकी तरफ देखा तो पता चला कि वो नींद के आगोश में दुबकी हुई है.. तो मैंने मेरे कंधों को उसका तकिया बन कर सहारा से दिया. उसके प्यारे से चेहरे से नजर ही नहीं हट रही थी.

सुबह चार बजे अँधेरा था.. बाहर की रोशनी जैसे ही उसके चेहरे पर गिरती उसका चेहरा चमक उठता.

थोड़ी हिम्मत करके मैंने उसके ललाट पे चुम्बन दे दिया.. और अपनी बांहों में जोर से पकड़ लिया.. बदन की गर्मी से मेरी भी नींद लग गई.

गाड़ी देर बाद नाश्ते के लिए रुकी तो दोनों की आँख खुल गई. हम नीचे उतरे फिर चाय ली.. वो फ्रेश होने गई. फिर मैं भी गया.

जब गाड़ी ने हॉर्न बजाया तो हम गाड़ी में आ गए. अँधेरा थोड़ा कम था पर फिर भी ड्राइवर ने अन्दर की लाईट ऑफ कर दी. मैंने सोचा कि अब मैं आराम से सो सकता हूँ.. पर ऐसा नहीं हुआ. सपना ने सीट से खड़ी होकर अपना जैकेट निकाल दिया और मुझसे लिपट कर बैठ गई. हल्की सी नींद में आँखें बंद हो गईं. थोड़ी देर में ऐसा लगा कि वो भी मेरी चादर को अपने ऊपर लेना चाहती है.. तो मैंने चादर को उसके ऊपर डाल दिया.

अब हम दोनों एक चादर में लिपटे हुए आराम से गाड़ी की यात्रा का आनन्द ले रहे थे.

जैसे जैसे बाहर ठंडी बढ़ती गई, हम दोनों के बीच की दूरियां भी घटती गईं. ना जाने कब सपना ने मेरा औज़ार पकड़ लिया, मुझे पता ही नहीं चला. उसका एक हाथ मेरे लंड पे था, तो दूसरा चादर को पकड़े था. मैंने देखा कि सपना के मुलायम से गोल गोल मम्मों के बीचों बीच मेरा कन्धा फंसा था. मैंने सोचा कि जो हुआ होने दो.. और मैं सोने का नाटक करने लगा.

फिर मैंने एक चुम्बन सपना के माथे पे कर दिया.. उसने कुछ नहीं कहा तो हल्के से उसके गालों पे दिया और सोने लगा.

शायद उसको ये सब अच्छा लग रहा था. मुझे मेरे लंड के ऊपर ज्यादा दबाव महसूस होने लगा.. तो मैं अपने पाँवों को थोड़ा अलग अलग करके आराम करने लगा. साथ ही ऐसा मैंने ये सोच कर भी किया ताकि जान सकूं कि आगे क्या होने वाला है.

जब सपना को लगा कि मैं नींद में हूँ तो उसने मुझे और जोर से पकड़ लिया और मेरे लंड को पेंट से आज़ाद करके अपने हाथ में पूरा पकड़ लिया.

उसकी बढ़ती हुई साँसें ये बात कह रही थीं कि उसके मम्मे मेरे कंधों की वजह से गरम हो गए हैं.. और वो खुद भी गरमी लेना चाहती है.

अब उसने मेरी ओर देखा और धीरे से उसके चेहरे को चादर के अन्दर ले लिया.. गाड़ी में भीड़ ना होने की वजह से ये सब होना आसान था. फिर थोड़ी देर बाद उसके हाथ मेरे लंड पर ऊपर नीचे होने लगा.. और थोड़ी देर में ही मुझे ठंडा सा महसूस हुआ.. उसके नरम मुलायम होंठों मेरे लंड का चुम्बन दे रहे थे.. मैं सोने की अवस्था में लेटा रहा और लंड चुसाई का आनन्द लेने लगा. थोड़ी देर में सपना लंड को मुँह में ले कर प्यार से चूसने लगी.. उसने मेरा एक हाथ पकड़ कर उसकी जांघों के बीच में रख दिया.

मेरा लंड अब पूरे जोश में आ गया.. और अंत में सपना को कामरस मिल ही गया. उसने अपने रूमाल से मुँह को पोंछा और मेरी गोद में ही लेट गई.

अब कुछ करने की मेरी बारी थी. मैंने मेरा एक हाथ उसके टॉप के अन्दर धीरे धीरे सरकाने लगा.. और उसके एक मम्मे को मेरी उंगलियों से मसलने लगा. चूची मसलते मसलते मेरी उंगलियों से उसके निप्पल को मसलने लगीं.
बार बार मम्मे और निप्पल को मसलने से वो फिर गरम होने लगी.. उसने फिर से मेरा लंड मुँह में लिया और लंड चूसने लगी.

अब हम दोनों होश में एक दूसरे को प्यार देने लगे.. उसकी आँखें मेरी नज़रों से टकराई और दोनों ने लम्बा चुम्बन किया. उसके होंठों से मेरे होंठ चिपक गए. हम दोनों ने चादर हटा कर गाड़ी के उस अंधेरे में एक दूसरे को देर तक चुम्बन किया. दोनों की साँसें तेजी से चलने लगीं.

मेरा हाथ उसके निप्पलों को जोर जोर से दबा रहा था.. और उसका हाथ मेरे लंड पे चल रहा था. हम दोनों के लब एक दूसरे से चिपके हुए थे.. और उसके मुँह से ‘उमह.. उम्म्ह… अहह… हय… याह… ह्ह्ह्ह.. ओहह आह! की आवाज निकलने लगी.
मैं अपना एक हाथ उसकी चूत के ऊपर घुमाने लगा.. तो सपना ने अपनी जींस की बेल्ट को खोल दिया और मेरा हाथ पकड़ कर उसकी पेंटी के अन्दर कर दिया.

जो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था, आज सपना ने मेरे हाथों को वहाँ तक पहुँचा दिया. मेरी उंगलियों पे थोड़ा चिपचिपा सा लग रहा था. उसकी चूत की गरमी से मेरे बदन की ठंडी ना जाने कहाँ दूर हो गई. मैं जितना ही उसकी चूत को सहलाता, उसको उतना ही ज्यादा अच्छा लगता.

फिर देर तक उसकी चूत के ऊपर घुमाने पर एक उंगली को मैंने चूत के अन्दर घुसा दिया. उसने मेरी उंगलियों को अपने अन्दर तक लेना शुरू कर दिया. ऐसे ही अन्दर बाहर करते करते वो थक कर मेरे ऊपर गिर गई.. तो मैंने उसके ऊपर चादर डाल कर अपनी बांहों में ले लिया.

थोड़ी देर बाद उसको जब होश आया तो वो उठी, अपने कपड़े ठीक किए.. मेरे लंड का चुम्बन लिया और प्यार से लंड को मेरी अंडरवियर के हवाले कर दिया.
अब वो आराम से बैठ गई… क्योंकि अब गाड़ी के अन्दर का सब बाहर की रोशनी में दिखाई देने लगा था.

ज्यादा सोचने का वक़्त अब नहीं था.. अब हम थोड़ी ही देर में नासिक पहुंचने वाले थे.. अब दोनों का एक दूसरे को देखने का नजरिया बदल गया था. मेरे दिल में हलचल सी मची थी कि अब बरसों की प्यास कब बुझेगी और कब तन मन का मिलन पूरा होगा.

एक दूसरे को देखते ही देखते नासिक आ गया. उसने खुद को सम्भालते हुए कहा- अब आप मेरे साथ ही रहना.. कहीं भी छोड़ कर मत जाना.
मैंने उसके हाथ को थाम लिया और हम बस से नीचे उतर गए.

जब वहां पहुंचे तो पता चला कि सुबह की बस निकल गई है.. और अब अगली बस ढाई बजे ही निकलेगी. फिर क्या सोचना था.. फ्रेश होने के लिए एक होटल के रूम में चले जाने का सोचा और पास के ही एक होटल में एक रूम बुक किया.

मुझे तो बहुत नींद आ रही थे.. पर सपना को बहुत भूख लगी थी. मैंने सपना को उसके काम पर लगा दिया.. और खाने का आर्डर दे कर पलंग पे जा कर सो गया.

थोड़ी ही देर में नींद लग गई.. जब दरवाजे पर खाने का आर्डर आया और बेल बजी तो आँख खुली. आर्डर लेकर वेटर को पैसे दिए और उसे चलता किया.

थोड़ी देर बाद जब सपना बाथरूम से नहा कर निकली तो तौलिये में लिपटी एकदम क़यामत लग रही थी. उसे देखते ही नशा सा छाने लगा.. और किसी और चीज़ की भूख जागने लगी. उसके बालों से टपकती पानी की बूंदें उसके गोरे बदन पर.. ओस की बूंदों की तरह चमक रही थीं. लबों की रंगत गुलाब की मुलायम पंखुड़ियों की तरह लगने लगी.

जब हम दोनों की नज़रें मिलीं तो मुझसे रहा न गया.. और एक दूसरे से हम लिपट गए. एक दूसरे के होंठ सिल गए.. साँसें चढ़ने लगीं. उसके बदन की खुशबू मदहोश करने लगी.. मेरे हाथ उसकी कमर और जिस्म को चूमने लगे.

उसने मेरे कपड़े निकालने शुरू कर दिये और थोड़ी ही देर में हम दोनों नंगे हो गए. जब उसने मुझे पूरा नंगा देखा तो उसने आँखें बंद कर लीं. मैंने उसकी बंद आँखों को चूमा.. उसके लबों को चूमा.. और उसको बिस्तर पर लेटा कर सारे बदन को चूमने लगा.

उसके मुँह से कामुक सिसकारियां निकलने लगीं. उसकी सुराहीदार गर्दन को चूमते चूमते मैं उसके निप्पलों को चूसने लगा. जब दाएं निप्पल को चूसता तो बाएं को उंगलियों से दबाता जाता था और जब बाँयें को चूसता तो दांयें को उंगलियों से मींजता था

फिर उसकी मखमली कमर और नाभि को इतना चूमा कि उसने उठकर मेरे होंठों को फिर से चूम लिया.
अब मैं उसके लबों के रस का पान करते हुए निप्पल को जोर जोर से दबाने लगा.
‘आहह.. अह्ह्ह… ह्ह्ह्ह… उह्ह्ह्ह… ओह…’ उसके मुँह से मादक आवाजें निकलने लगीं.

धीरे धीरे मैंने मेरी उंगलियों को उसकी चुत के ऊपर घुमाना शुरू किया. जैसे जैसे उंगलियां उसकी चुत के अन्दर जातीं, वो मुझे कसके अपने सीने से दबाने लगती. फिर मैंने मेरी दो उंगलियां उसकी चुत में घुसा दीं… उसके मुँह से कराह भरी आवाज़ निकल गई. कुछ देर तक उंगलियों को उसकी चूत में अन्दर बाहर करने के बाद उसका पानी निकल गया.
वो निढाल हो गई.

कुछ देर के आराम के बाद अब उससे रहा नहीं जा रहा था. तो वो मेरे लंड को पकड़ कर चूसने लगी.
उसने कहा- प्लीज, जल्दी से इसे अन्दर डालो..

चुदने की चाहत में उसने मेरे लंड को चूस चूस कर उसने कड़क कर दिया.. तो मैं बिस्तर पे लेट गया और वो मेरे ऊपर आ गई. उसने मेरे लंड को अपनी चुत में सैट कर लिया. जैसे ही उसने लंड चुत के अन्दर लिया, उसकी आँखों से दर्द के आंसू निकल गए. दो तीन प्रयास में मेरा लंड उसकी चुत की गहराइयों में डूबा हुआ था.

कुछ पल बाद सपना मेरे लंड को ख़ुशी ख़ुशी अन्दर लिए जा रही थी. उसकी चुत का कामरस चुत से निकल कर मेरे लंड पर लग गया था.

थोड़ी देर में मैं उसके ऊपर आ गया और उसकी चुत में ले धकापेल चालू हो गया. वो भी मुझ जोरदार साथ दे रही थी. और वो कमर उठा उठा कर चुदवाने में लगी हुई थी. काफी देर की प्रेम लीला के बाद मेरा रस निकलने वाला था.

मैंने पूछा तो उसने कहा- मेरे अन्दर ही निकाल दो.. मेरा भी निकलने वाला है.
बस कुछ ही देर बाद मेरा कामरस उसकी चुत के अन्दर विलीन हो गया.. और मेरा लंड उसकी चुत में ही सो गया.

कुछ देर में मुझे भी नींद आ गई… और दोनों एक दूसरे के ऊपर सो गए.
जब आंख खुली तो बिस्तर पे ढेर सारा खून लगा पाया. मैंने चादर को निकाल कर बाथरूम में रख दिया. उसके बाद बाथरूम में ही एक और बार चुदाई का प्रोग्राम चला और वो भी शावर के नीचे चुदाई हुई.

दोनों के चेहरे पर एक अलग से ख़ुशी थी.. एक अलग से चमक थी. हम दोनों ने एक दूसरे को अपने हाथों से खाना खिलाया.
तब तक बस निकलने का समय हो गया था. हम तैयार हो कर निकल गए.

अब आगे क्या हुआ.. वो फिर किसी और कहानी में लिखूंगा.. क्योंकि जो हुआ, उतना प्यार और प्रेमरस का पान जिंदगी में कभी किसी को नहीं मिला होगा.

आपको मेरी जिंदगी की ये घटना कैसी लगी.. अपने विचार मुझे लिख भेजिए.. मुझे अच्छा लगेगा.
आपका रौनक
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