कपड़ों की धुलाई के साथ चुदाई भी -1

(Kapdon Ki Dhulai Ke Sath Chudai Bhi -1)

लेखक : अमन वर्मा
प्रेषिका : टी पी एल

अन्तर्वासना के पाठिकाओं एवं पाठकों को मेरा प्यार भरा नमस्कार।
मेरा नाम अमन है और पिछले दो वर्षों से मैं मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक कंपनी में इंजिनियर के पद पर कार्यरत हूँ।

छह वर्ष पहले जब मैं उन्नीस वर्ष का था तब मैंने भोपाल के ही एक इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया था और पास ही की एक कॉलोनी में कमरा किराये पर ले कर रहने लगा था।
दिन और रात के खाने के लिए कमरे से कुछ दूर ही एक ढाबे वाले से अनुबंध कर लिया था और वह खाना इत्यादि मेरे कमरे पर ही भेज देता था।
सुबह और शाम के नाश्ते एवं चाय मैं कमरे के एक कोने में रखे बिजली के हीटर पर बना लिया करता था।
मेरे कमरे के साथ एक संलग्न बाथरूम और बालकनी भी थी जिसमें स्नान आदि के लिए अथवा धुले कपड़े आदि सुखाने के लिए सभी सुविधा उपलब्ध थी।

मैं उस बालकनी का प्रयोग नहीं करता था क्योंकि मुझे कपड़े धोने नहीं आते थे तथा एक माह तक तो मुझे कपड़ों की धुलाई एवं प्रेस करने की समस्या का कोई समाधान भी नहीं मिला था।
अधिकतर सप्ताह में एक बार मैं अपने सभी मैले कपड़े पास की एक लांड्री से धुलवा लेता लेकिन उसमें मेरे बहुत पैसे खर्च हो जाते थे।
किसी तरह इस मुश्किल से झूझते हुए मैंने एक माह व्यतीत करा और एक दिन जब मैं एक दोस्त के घर पर गया तब मैंने अपनी समस्या का उल्लेख उसकी माँ से किया।

दोस्त की माँ ने मुझे उसका समाधान करने का आश्वासन दिया और तीन दिनों के बाद एक शाम को मेरे कमरे में लगभग बीस वर्ष की आयु की एक हल्के गेहुंए रंग की सुंदर सी युवती भेज दी।
उस युवती ने मेरे उस दोस्त की माँ का हवाला देते हुए मुझसे धुलाई और प्रेस के लिए कपड़े मांगे।

मैंने जब उससे पूछताछ करी तो उसने बताया कि वह मेरे उस दोस्त के घर के सभी कपड़ों की भी प्रेस करती है और उन आंटी के कहने पर ही वह मुझसे कपड़े लेने आई है।

मैंने फ़ोन पर जब दोस्त से बात करी तो उसने बताया कि उस युवती का नाम प्रीति है और उसकी माँ ने ही उसे मेरे कमरे पर भेजा था तथा वही उनके घर के सभी कपड़े धुलाई एवं प्रेस करती है।
प्रीति की बात की पुष्टि हो जाने के बाद मैंने उसे अपने मैले कपड़े दे दिए।

दो दिनों के बाद प्रीति शाम के समय मेरे सभी धुले एवं प्रेस किये हुए कपड़े दे गई और दो दिनों में मैले हुए कपड़े धुलाई एवं प्रेस के लिए ले गई।

लगभग पूरे तीन माह तक सब ऐसे ही चलता रहा तभी एक दिन प्रीति कपड़े देने आई तो बहुत ही खुश दिखाई दी।
जब मैं उसे मैले कपड़े देने लगा तो उसने लेने से मना कर दिया और कहा– अमन जी, मैं अगले दो सप्ताह धुलाई एवं प्रेस के कपड़े लेने नहीं आऊँगी और आज भी मैं कपड़े नहीं ले जाऊँगी।

मैंने उससे जब नहीं आने का कारण पूछा तो उसने कहा– कल मेरे पति, जो की दुबई में काम करते है, वह दो वर्ष के बाद दो सप्ताह के लिए घर आ रहे हैं इसलिए मुझे कपड़े धोने और प्रेस करने का समय ही नहीं मिलेगा।

किसी तरह दो सप्ताह बीतने के बाद जब प्रीति धोने एवं प्रेस करने के लिए कपड़े लेने आई तो उसका उदास चेहरा देख कर मैंने कारण पूछा तो उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
उसकी आँखों में आँसू देखते ही मैं समझ गया कि उसे अपने पति के दुबई जाने का दुःख तथा उदासी थी इसलिए मैंने बात आगे नहीं बढ़ाई।

अगले दो दिनों के बाद जब वह धुले एवं प्रेस किये हुए कपड़े देने आई तब मैं चाय बना रहा था इसलिए उसे देखते ही मैंने उसके लिए भी चाय बना दी और उसे आग्रह करके बिठाया तथा चाय पीने के लिए दी।
जब मैंने उसे चाय दे रहा था तब उसकी नम आँखें देख कर उससे पूछा- प्रीति क्या बात है, आज भी तुम्हारी आँखें में आंसू हैं? क्या अभी भी पति की याद में रो रही हो?

उसने आँखों को अपने साड़ी के पल्लू से पोंछते हुए कहा- उनकी याद तो हमेशा आती रहती है लेकिन ये आँसू उदासी के नहीं, बल्कि ख़ुशी के आँसू है। असल में मैं जहाँ भी जाती हूँ, लोग मुझे छोटी जाति की समझ कर मेरा तिरस्कार करते हैं। चाय तो क्या कोई पानी भी नहीं पूछता लेकिन आपने तो मुझे बैठने के लिए आसन दे कर मेरा मान बढ़ाया है तथा अपने हाथ से चाय भी बना कर पिलाई है।

उसकी बात सुन कर मैंने कहा- अरे मैंने तो इंसानियत के नाते यह सब किया है। मैं अपने लिए चाय बना रहा था और तुम्हें देखा तो तुम्हारे लिए भी चाय बना दी। मेरे अनुसार कोई भी इंसान छोटा या बड़ा नहीं होता, हर इंसान बराबर होता है।

उस दिन के बाद से ही प्रीति मेरे साथ खुल कर बातें करने लगी थी और बातों बातों में उसने अपने बारे में भी कुछ कुछ बताया।
उसने बताया कि उसका जन्म एक अच्छे परिवार में हुआ था और दो वर्ष पहले उसने बीए का सेकंड इयर पास किया था।
तभी एक दुर्घटना में उसके माता पिता की मृत्यु हो गई और उसकी पढ़ाई छूट गई तथा उसे चाचा चाची के साथ रहना पड़ा।

माता पिता की मृत्यु के कुछ माह के बाद उसके चाचा ने उसकी सहमति के बिना उसकी शादी दुबई जा रहे उसके पति के साथ करवा दी थी और जब वह ससुराल पहुँची तब उसे पता चला कि वह एक धोबी परिवार है।

शादी के एक माह के बाद ही उसका पति दुबई चला गया और तब से उसके सास ससुर तथा देवर ने उसे धुलाई और प्रेस करने के काम में लगा दिया था।
सारा दिन काम करने के बाद उसे तीन वक्त की खाना मिल जाता था और सोने के लिए घर के एक कोने में बिस्तर मिल जाता है।

इसके बाद अगले एक माह तक सब सामान्य ही चलता रहा और प्रीति सप्ताह में दो या तीन दिन छोड़ कर धुलाई के कपड़े ले जाती और दे जाती।

फिर एक रविवार को प्रीति सुबह छह बजे ही मेरे घर पर आई और बोली- जहाँ मैं कपड़े धोने जाती हूँ वहाँ पिछले दो दिनों से पानी नहीं आ रहा है। क्या मैं धुलने वाले कपड़े यहाँ आपके कमरे पर धो कर ले जाऊँ।

पहले तो मुझे समझ नहीं आया कि उसे क्या कहूँ लेकिन जब उसका मासूम सुंदर चेहरा देखा तो मैंने उसे अनुमति दे दी।

मेरी अनुमति मिलते ही वह कपड़ों का गठ्ठर उठा कर बाथरूम में ले गई और कपड़े धोने लगी और मैं अपने बिस्तर पर सोने चला गया।

लगभग डेढ़ घंटे के बाद जब मैं नींद से उठा तब मैंने देखा की प्रीति बाथरूम में सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट पहने हुए थी और वह धुले हुए कपड़ों को इकट्ठा कर के एक कपड़े में बाँध रही थी।

प्रीति को उस वेश में देख कर मैं उसके चेहरे के साथ साथ उसके शरीर की मनमोहक सुन्दरता से पहली बार अवगत हुआ।
क्योंकि उसने ब्लाउज के नीचे ब्रा नहीं पहनी हुई थी इसलिए पानी के छींटों से गीले ब्लाउज में से उसके ठोस, गोल, उठे हुए उरोजों एवं चुचूक बिल्कुल साफ़ साफ़ नजर आ रहे थे।
उसकी नग्न कमर बहुत ही पतली थी और उसकी नाभि के आसपास पानी की बूँदें मोतियों की तरह चमक कर उसका शृंगार कर रही थी।
प्रीति के नितम्ब गोल, कसे हुए और सामान्य से कुछ बड़े थे तथा उसका गीला पेटीकोट उसके उन नितम्बों से चिपका हुआ था।
उसके दोनों नितम्बों के बीच की दरार का साफ़ साफ़ दिखना इस बात का पुष्टीकरण था कि प्रीति ने पेटीकोट नीचे पैंटी नहीं पहन रखी थी।
धुलाई का काम करते हुए जब प्रीति मेरे ओर मुड़ी और मुझे उसके अर्ध-नग्न शरीर की घूरते हुए देखा तो वह शर्मा गई और जल्दी में उसके पास की खूंटी पर टंगती हुई साड़ी से अपने बदन को ढांपने की असफल कोशिश करने लगी।
प्रीति के संकोच एवं असुविधा को ध्यान में रखते हुए मैं वहाँ से हट कर अपने लिए नाश्ता और चाय बनाने लगा।

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कुछ देर के बाद प्रीति गीले ब्लाउज एवं पेटीकोट के उपर ही अपनी साड़ी पहन कर और सभी धुले कपड़े को एक गठरी में बाँध कर चली गयी।
तीन दिनों के बाद प्रीति कपड़े ले कर आई तो मुझे वह कुछ उदास भी दिखाई दी तथा उसके चेहरे पर चोट के निशान दिखे तब मैंने उससे पूछा- क्या बात है आज तुम बहुत उदास और चिंतित दिख रही हो। तुम्हारे चेहरे पर चोट के निशान कैसे है?

प्रीति ने उत्तर दिया- बात यह है कि कपड़े धोबी-घाट पर साफ़ पानी की कमी के कारण कपड़ों की धुलाई में बहुत दिक्कत आ रही है। सास और असुर भी इसी कारण चिड़चिड़े हो गए हैं और दिन भर छोटी छोटी बातों पर मुझे ही डांट देते हैं।

उसकी बात सुन कर मैंने पूछा- इस समस्या से सुलटने के लिए तुम्हारे सास-ससुर और तुमने क्या सोचा है?ो

इस पर प्रीति बोली- पिछले रविवार को मैंने एक गलती कर दी थी और अब वह कहते है कि उसी गलती को दोहराती रहूँ।
मैंने पूछा- रविवार को तुमने क्या गलती कर दी थी जिसे वह दोहराने के लिए कह रहे हैं?

उसने कहा- रविवार को पानी की समस्या से परेशान होकर मैंने बिना उन्हें बताये ही आप के कमरे में आ कर कपड़े धो लिए थे। बाद में जब मैंने उन्हें इस बारे में बताया तब से मुझे आपके घर में कपड़े धोकर लाने के लिए कह रहे थे। मेरे मना करने पर मेरी सास मुझे दो थप्पड़ भी जड़ दिए थे, ये उसी के निशान हैं।

उसकी बात सुन कर मुझे उसके सास-ससुर पर बहुत गुस्सा आया तथा प्रीति के प्रति सहानभूति एवं बहुत दया भी आई।

मैंने प्रीति से पूछा- तुमने अपने सास-ससुर को मेरे कमरे पर कपड़े धोने से मना क्यों कर दिया था।

वह बोली- पहली बात यह है कि हर रोज़ आपके घर पर कपड़े धोकर मैं आपको असुविधा में नहीं डालना चाहती थी। दूसरी बात यह है की मैंने आपसे इस बारे में ना तो कोई बात करी थी और ना ही आपसे अनुमति ली थी। तीसरी बात यह है कि मैं नहीं चाहती हूँ कि आपके अड़ोस पड़ोस तथा मकान मालिक को पता चलने पर आप पर कोई आपति आ जाये। चौथी बात यह है कि जब आप कॉलेज गए हुए होंगे तब मेरा बंद कमरे में कपड़े धोना कैसे संभव होगा?

प्रीति के सुलझे हुए तर्क सुन कर मैं कुछ सोच में पड़ गया और उसे अगले दिन सुबह आकर कपड़े ले जाने के लिए कह कर भेज दिया।
अगले दिन सुबह सात बजे जब प्रीति आई तब मैंने उसे कहा- प्रीति मैंने तुम्हारी समस्या और दशा पर रात भर सोच कर निर्णय कर लिया है कि तुम जब भी चाहो मेरे घर में कपड़े धो सकती हो।

प्रीति ने कहा- यह कैसे हो सकता है, जब आप कॉलेज गए हुए होंगे तब मैं घर में कपड़े कैसे धो सकती हूँ।

मैंने तुरंत घर की दूसरी चाबी निकाल कर देते हुए कहा- यह घर की दूसरी चाबी अपने पास रख लो और जब भी चाहो तुम आकर कपड़े धो सकती हो।

मेरी बात सुन कर प्रीति अवाक सी मेरी ओर देखते हुए बोली- मैं यह नहीं करना चाहती हूँ लेकिन मेरी मजबूरी के कारण मुझे आपकी बात मानना पड़ रही है। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि मैं आपके इस उपकार को कैसे उतारूँगी।

अनायास ही मेरे मुख से निकल गया- प्रीति, मेरी गैर हाजिरी में तुम मेरे कमरे की सफाई आदि करके अपने पर हुए उपकार को उतार देना। दूसरा अड़ोस पड़ोस और मकान मालिक भी यही समझेंगे कि मैंने तुम्हें कमरे की सफाई के लिए रखा है।

मेरी बात सुन कर प्रीति ने चुपचाप मेरे हाथ से कमरे की चाभी ले ली और मुझे धन्यवाद करके चली गई।
मैं भी तैयार हो कर कॉलेज चला गया और जब शाम को कमरे पर आया तो…
कहानी जारी रहेगी।

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