पराये मर्द के लण्ड का नशा-3

प्रेषक : इमरान ओवेश

दर्द पर आनन्द हावी होने लगा, मैं महसूस कर रही थी कि उसका XL साइज़ का लिंग लगातार योनि के संकुचित मार्ग को धीरे-धीरे फैलाता अन्दर सरक रहा है। मैंने आँखे भींच ली थी और खुद को उसके हवाले कर दिया था।

फिर शायद आधा अन्दर घुसाने के बाद, वो ऊपर से हट कर अन्दर घुसाए-घुसाए ही वापस उसी पोजीशन में बैठ गया। फिर उसने लिंग को वापस खींचा, ऐसा लगा जैसे राहत मिल गई हो लेकिन यह राहत क्षणिक थी, उसने वापस एक जोरदार धक्का मारा और इस बार तीन चौथाई लिंग योनिमार्ग को भेदता हुआ अन्दर धंस गया।

इस आकस्मिक हमले से मैं खुद को संभाल न पाई और मेरी चीख निकल गई। मैंने छूटने की कोशिश की, उसे धकेलने की कोशिश की, लेकिन इस बार उसने मेरी जाँघों को मजबूती से थाम लिया था।

तीन चौथाई अन्दर डालने के बाद फिर वापस खींच कर एक और ज़ोरदार धक्का मारा और पूरा ही अन्दर धंसा दिया। मेरी जान सी निकल गई, जिस्म पर पसीना छलछला आया। इस बार चीख तो मैंने रोक ली थी मगर सर चकरा गया था।

वो फिर मेरे ऊपर लद कर मेरे वक्षों से खिलवाड़ करने लगा।

मैंने समझ रही थी, वो मौका दे रहा था कि योनि लिंग के हिसाब से व्यवस्थित हो जाए।

थोड़ी देर की रगड़ा-रगड़ी के बाद उसने अपना चेहरा मेरे चेहरे के पास लाकर कहा- कैसा लग रहा है जानेमन, मुझे पता है कि तुम्हें मेरा लंड बहुत पसंद आया है ! बोलो न?”

“ठीक है ! अब बकवास मत करो।”

“अब बकवास लग रही है और अभी तो ऐसे चूस रही थी, जैसे छोड़ने का इरादा ही न हो?”

मैंने खिसिया कर चेहरा घुमा लिया। अपने बदन पर उसके नंगे बदन की सरसराहट और योनि में ठुंसे हुए लिंग का एहसास… मुझे अपना दर्द भूलते देर न लगी। आनन्ददायक लहरें उस दर्द पर हावी होती गई और मैंने उसकी पीठ सहलाने लगी, अपनी टांगों को और फैला कर उसकी जाँघों पर चढ़ा लिया।

उसे समझते देर न लगी कि अब मैं पूरी तरह तैयार थी, इस समागम के लिए और वो उठ गया, उसने फिर पहले जैसी पोजीशन बनाई और अपने हाथ के पंजों को मेरे नितम्बों पर कस कर पूरा लिंग बाहर निकाल लिया और फिर वापस अन्दर एक धक्के से घुसाया…

अब योनि उसे स्वीकार कर उसके हिसाब से जगह बना चुकी थी और वो भी मेरे रस से सराबोर था। सो आराम से योनि की दीवारों को एक आनन्ददायक रगड़ देता जड़ तक सरकता चला गया। उसके शिश्नमुण्ड की ठोकर मुझे अपनी बच्चेदानी पर महसूस हुई।

कुछ धक्कों के बाद जब लिंग आसानी से समागम करने लगा तो उसने नितम्ब छोड़ के अपने हाथों से मेरे पेट पर पकड़ बना ली, हर धक्के के बाद ऐसा लगता जैसे बाहर जाते वक़्त लिंग के साथ उस पर कसी हुई योनि भी बाहर निकल जाना चाहती है पर वो फिर उसे अन्दर ठूंस देता।

हर धक्के पर मेरी ‘आह’ निकल जाती। मैंने चेहरा एक तरफ़ घुमा रखा था और मुट्ठियों में बेड की चादर भींच ली थी, पर वो मेरे जिस्म में उठती आनन्द की लहरों को महसूस कर सकता था, जो उसे और उत्तेजित कर रही थी।

“जिस दिन से काम पर आया हूँ, कसम से ईमान डोला हुआ है। आज जाकर मेरे पप्पू को तसल्ली हुई है। एक बच्चे के बाद भी इतनी कसी हुई है। लगता है साहब जी सामान कुछ ख़ास नहीं।”

“तेरे से आधा है।” मेरे मुँह से बेसाख्ता ही निकल गया। यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं !

“हाँ, होगा ही !” वह अजीब से अंदाज़ में हंसा- इसीलिए तो इतनी भूखी निगाहों से देख रही थी।

मैंने कुछ नहीं कहा और उन ‘गचागच’ लगते धक्कों से पागल होती रही, मेरे मुँह से उल्टे-सीधे शब्द निकलना चाहते थे, पर बड़ी मुश्किल से मैंने खुद को कंट्रोल किया हुआ था।

बस ‘आह-आह’ करती रही और वो जोर-जोर से धक्के लगाता रहा और इसी तरह मैं अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच कर बुरी तरह ऐंठ गई। योनि से निकले काम-रस ने उसके बेरहमी से वार करते लिंग को नहला दिया। उसके लिए रास्ता कुछ और आसान हो गया।

फिर कुछ देर के ठण्डे पलों के बाद मैं फिर से गर्म हो गई और अपने नितम्ब उठा-उठा कर उसे पूरा अन्दर कर लेने की कोशिश करने लगी। तब उसने लिंग को एक झटके के साथ बाहर निकाल लिया।

“क्या हुआ?”

“एक ही आसन में कराओगी क्या? उलटी हो जाओ, उसमें ज्यादा मज़ा आता है।”

मुझे पता है ज्यादा मज़ा आता है, पर फिर भी एक डर था उसके अंग की लम्बाई मोटाई का, बहरहाल मैंने विरोध करने का मौका तो कहीं पीछे छोड़ दिया था। मैं घोड़ी बन गई।

उसने मेरी कमर पर दबाव बना कर मुझे अपने हिसाब से नीचे कर लिया, अब मेरी योनि उसके सामने हवा में खुली थी, मगर वो उंगली मेरी गुदा द्वार पर फिरा रहा था।

“वहाँ नहीं, प्लीज़, मैं मर जाऊँगी…”

मैंने बेड पर लेट जाना चाहा मगर उसने मेरी कमर थाम ली थी।

“नहीं, डरो मत मेरी जान, अभी इसका नंबर नहीं है।” वह हँसते हुए बोला।

“शक्ल से तो बड़े शरीफ लगते हो, पर हो बड़े कमीने किस्म के इन्सान।”

“एक इसी मामले में तो तो कोई साधू हो मौलाना, सब कमीने होते हैं और तुम जैसी शरीफ औरतें हम कमीनों को ही पसंद करती हैं।”

सही कह रहा था कमीना ! फिर एक ठोकर में उसने मेरी खुली हवा में फैली योनि में अपना लिंग ठूंस दिया और नितम्बों को थाम कर बेरहमी से धक्के लगाने शुरू कर दिए।

जब मैं वापस फिर अपने चरम पर पहुँचने लगी तो इस बार अपना मुँह बंद न रख पाई।

“और जोर से-और जोर से… हाँ-हाँ ऐसे ही… ऐसे ही… और और… फक मी हार्ड… कम ऑन , बास्टर्ड फक मी हार्ड…!”

“लो और लो मेरी जान… यह लो… पर यह पीछे वाला छेद भी चखूँगा… इसे भी चोदूँगा… बोलो न जान, डालने दोगी?”

“हाँ हाँ… उसे भी मत छोड़ना… डाल देना उसमें भी !”

उसने धक्के लगाते-लगाते अपनी एक उंगली गुदा द्वार में सरका दी और साथ में उसे भी अन्दर-बाहर करने लगा… इससे धक्कों की तूफानी रफ़्तार कुछ थम सी गई।

“छेद में कुँवारेपन का कसाव नहीं है मेरी जान, मतलब इसमें भी डलवाती हो न!”

“हाँ… हाँ…पर तुम कल कर लेना उसमें… वादा करती हूँ… पर आज आगे ही करो प्लीज़।”

“नहीं, आज ही, कल का क्या भरोसा… अभी वक़्त है, एक राउंड अभी और हो जायेगा। जल्दी बोलो !”

“नहीं, आज नहीं कल… अब करो न ठीक से।”

“आज, वरना…!”

उसने एकदम से अपना लिंग बाहर निकाल लिया। मैं तड़प कर रह गई… मैंने घूम कर उसे देखा। वो अजीब सौदेबाज़ी वाले अंदाज़ में मुझे देख रहा था।

“ओके, पहले अभी करो… दूसरे राउंड में कर लेना।” मैंने हथियार डाल दिए।

उसने फिर मेरे नितम्बों पर पकड़ बनाई और लिंग अन्दर ठूंस दिया। एक मस्ती भरी ‘कराह’ मेरे मुँह से निकल गई और उसने फिर तूफानी रफ़्तार से जो धक्के लगाए तो मुझे अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचते देर नहीं लगी मगर वो भी साथ में ही चरम पर पहुँच गया।

“मेरा निकलने वाला है… कहाँ निकालूँ?”

“मैं अँग्रेज़ नहीं, जहाँ हो वहीं निकालो।”

और उसने जोर से कांपते हुए मुझे कमर से भींच लिया। पहले मेरा पानी छूटा और फिर उसके अंग से गर्म वीर्य की पिचकारी छूटी। फिर दोनों ही कराहते हुए बेड पर फैल गए। एकदम से दिमाग पर ऐसा नशा छाया के नींद सी आ गई।

फिर कुछ पलों बाद होश आया तो हम दोनों एक-दूसरे से लिपटे पड़े थे और वो अब फिर से मेरी छातियाँ सहला रहा था। मैंने उसे दूर करने की कोशिश की पर कर न सकी और वह हाथ नीचे ले जाकर फिर उसी ज्वालामुखी के दहाने से छेड़-छाड़ करने लगा। मैं कसमसा कर रह गई।
कुछ देर की कोशिश के बाद मैं फ़िर से गर्म हो गई और खुद को उसके हवाले कर दिया।

“कुछ चिकनी चीज़ है, जैली या तेल?”

“सरसों का तेल है… वो रखी है शीशी।”

उसने ड्रेसिंग टेबल से शीशी उठाई और उंगली पर लेकर गुदा-द्वार पर लगाने लगा, सामने से बैठ कर मेरी टाँगें मेरे सीने तक पहुँचा दी और तेल को छेद में डालने लगा… कुछ देर में ही वो बेहद चिकना हो गया और उसकी 3 उँगलियाँ तक अन्दर जाने लगीं।

फिर उसी अवस्था में लेट कर वह अपनी जीभ से मेरी योनि के दाने को सहलाने चुभलाने लगा और उंगली को गुदा के छेद में चलाता रहा। जब मैं बुरी तरह गरम हो कर सिसकारने, ऐंठने लगी तो वो उठ कर मेरे सर के पास चला आया और अपना मुरझाया हुआ लिंग मेरे होंठों के आगे कर दिया।

अब इन्कार की गुंजाईश कहाँ बची थी, मैंने उसे मुँह में ले लिया और लॉलीपॉप की तरह चूसने लगी।

कुछ ही देर में वो लकड़ी जैसा हो गया तो वह फिर मेरे पैरों के बीच पहुँच गया।

“जैसे पहले पोजीशन बनाई थी वैसे ही बनाओ अब।”

मैं फिर से बिल्ली जैसी अवस्था में हो गई और उसने मेरे नितम्ब थाम कर उन्हें अपने हिसाब से कर लिया और फिर अपने लिंग की नोक को छेद पर रख के हल्के से दबाया… सुपाड़ा अन्दर फंस गया और मेरी सांस गले में, पर मैं संभल पाती उससे पहले एक झटका लगा कर उसने आधा लिंग अन्दर कर दिया।

मेरे मुँह से एकदम से चीख निकल गई, मैंने झटके से आगे होने को हुई लेकिन उसने कूल्हे पकड़ रखे थे।

मैं कराह कर रह गई।

उसने फिर कुछ देर उसे अन्दर रहने दिया और एक हाथ नीचे डाल कर योनि के दाने को सहलाने लगा। फिर थोड़ी सनसनाहट पैदा हुई तो दर्द से ध्यान हटा और उसने इसी हालत में धीरे-धीरे सरकाते हुए पूरा लिंग अन्दर डाल दिया।

“गया पूरा… अब संभालो।”

कुछ धक्के उसने बड़े प्यार से धीरे-धीरे लगाए और रास्ता बनते ही उसकी रफ़्तार तेज़ होती गई, अब उसने दोनों हाथों से मेरे नितम्ब पकड़ लिए और जोर-जोर से धक्के लगाने लगा। मैं भी गर्म होती गई… और हर धक्के पर एक कराह छोड़ते मैं जल्दी ही फिर अपने चरम पर पहुँच कर बह गई और पीछे के छेद के कसाव उसे भी मार गया।

वो पहले जितनी देर न टिक सका और जल्दी ही कूल्हों को मुट्ठियों में भींच कर सारा माल अन्दर निकाल दिया और फिर पूरी ट्यूब खाली होते ही अलग हट कर ढेर हो गया।

वह था मेरी जिंदगी में पहला परपुरुष, पराया, गैर मर्द… और पहला अवैध सम्भोग, लेकिन उसने मुझे एक अलग दुनिया दिखा दी जो मुझे इतनी भायी कि फिर तो मैं कई अलग-अलग मर्दों की गोद तक पहुँच गई।

What did you think of this story??

Comments

Scroll To Top