ट्रेन में मिली शादीशुदा लड़की की कामवासना और चुदाई-2

(Train Me Mili Shadishuda Ladki Ki Kamvasna Aur Chudai- Part 2)

मेरी सेक्स कहानी के पिछले भाग
ट्रेन में मिली शादीशुदा लड़की की कामवासना और चुदाई-1
में अभी तक आपने पढ़ा कि मैं ट्रेन से पटना से भागलपुर जा रहा था कि मेरे सामने वाली सीट पर एक शादीशुदा युवती आकर बैठ गई. उससे थोड़ी बहुत बात चीत भी हुई.

अब आगे:

मैं धीरे से उसकी जांघों को सहलाने लगा था, ‘इस्सस उफ़्फ़्फ़…’ की हल्की हल्की आवाज उसके होठों से निकलने लगी थी। वो सुखासन में बैठी थी, मैंने उसकी साड़ी को नीचे से खिसका कर ऊपर कमर तक कर दिया। उसने बिकनी टाइप की पैंटी पहन रखी थी जो उसकी योनिरस से पूरी तरह से भीग गयी थी।

मैं उसकी चुत को पैंटी के ऊपर से ही सहलाने लगा। मैं अपने तर्जनी अंगुली को पैंटी के ऊपर से उसके चुत के दोनों पंखुड़ियों के बीच में रगड़ने लगा। उसके होठों से लगातार सिसकारियाँ निकलती ही जा रही थी- उफ्फ्फ अह इस्स्स!
वो तो ट्रेन की आवाज की वजह से उसकी आवाज दब जा रही थी, नहीं तो बगल वाले को यात्रियों को तो हल्की आवाज तो सुनाई दे ही जाती।

थोड़ी देर बाद मैंने उसकी पैंटी निकालने की कोशिश की तो उसने भी चूतड़ों को उठा कर अपनी पेंटी निकालने में सहयोग किया। मैंने उसकी पैंटी निकाल रहा था तो मुझे बाबा सील तोड़न दास की प्रवचन पंक्तियों में से एक पंक्ति याद आ गयी।
आदमी की किस्मत और लड़की की पैंटी का कोई भरोसा नहीं है, कभी भी खुल सकती है।

वो मेरे दायें तरफ बैठी थी खिड़की से सट कर। अब मैं अपने दायें हाथ को उसके कंधों के ऊपर से ले जा कर उसके दायें चूची को दबाने लगा और बायें हाथ से उसकी चुत को सहलाने लगा।
मैंने महसूस किया कि उसकी चुत पर एक भी बाल नहीं था, लगता था जैसे आज सुबह ही शेविंग की हो।
मैंने पूछा तो उसने कहा- आज ही साफ़ की हैं। बाल बड़े भी हो गए थे और फिर मायके में समय भी नहीं मिलता है।

मैं उसकी चुत के दाने को अंगूठे से रगड़ने लगा और चुत की दोनों पंखुड़ियों के बीच में अपनी तर्जनी अंगुली का प्रवेश करा दिया।
वो तड़प उठी, उसका बदन अब उसके कंट्रोल से बाहर हो रहा था, उसके चूतड़ अब लय में हिलने लगे थे।

मैं भी जितनी तेजी से हो सकता था दो अंगुलियों को चुत में घुसा कर अंदर बाहर करने लगा। अभी तक उसकी ब्लाउज़ खुली नहीं थी, मैं ऊपर से ही जितनी अच्छे तरह से उसके चूचियों को मसल सकता था, मसलने लगा। मैंने भी ब्लाउज खोलने की कोशिश नहीं की, यह थोड़ा रिस्की हो सकता था।

उसने भी अब तक ऊपर से ही मेरे लंड को सहलाना शुरू कर दिया था। मेरा लण्ड तो पहले से ही अपने पूर्ण रूप में आ चुका था।

हमारी यह काम क्रीड़ा जारी ही थी कि ट्रेन का अगला स्टॉप आ गया, ट्रेन रुकी तो काफी यात्रियों के उतरने की आवाज आई।
मैं झट से उठा और उनके उतरने के साथ ही मैंने इधर के दोनों दरवाजे भी बन्द कर दिये। और इधर के भी कुछ खिड़कियां जो खुली थी उसे भी बंद कर दिया। अब पूरी बोगी में सिर्फ हम दोनों थे, हमारे सिवा कोई नहीं था। मैंने सभी खिड़की दरवाजे भी बंद कर दिये थे।

वापिस आ कर मैंने समय देखा ट्रेन आधे घंटे लेट चल रही थी। 8:30 हो गये थे यानि अब हमारे पास लगभग साढ़े तीन घंटे का समय था चुदाई करने के लिये। अभी तक बगल वाले यात्रियों के वजह से न तो मैं उसे एक भी बार चूम पाया था ना चूत के भी दर्शन हुए थे। उसने अब कम्बल तो हटा दिया था लेकिन साड़ी को नीचे कर लिया था।

अब मैं उसके सामने खड़ा था और वो मेरे सामने सीट पर बैठी हुई थी। अब मैंने उसके हाथों को पकड़ा और झुक कर उसकी हथेली को चूम लिया। मैं वापिस खड़ा हुआ और उसे अपनी ओर खींच लिया वो भी खिंची चली आई और इस तरह लिपटी जैसे कोई लता लिपट जाती है।

मैंने उसकी आँखों में देखते हुए अपने लबों को उसके अधरों पर रख दिया। वह मेरी जिंदगी का प्रथम चुम्बन था। वह अहसास मैं कभी नहीं भूल सकता, आज भी जब वे पल याद आ जाते हैं तो मेरे होंठ सूख जाते हैं, थरथराने लगते हैं इसी उम्मीद में कि वो आये और अपने उसी गुलाब की पंखुड़ी की तरह कोमल अधरों को फिर से मेरे लबों पर रख दे और हम दोनों ही इस दुनिया के तमाम कठिनाइयों से दूर उस प्रेम की दुनिया में खो जाएँ।

उसके गुलाबी होंठ बहुत ही कोमल थे। तब पता चला कि इन अधरों को मय से भी अधिक नशीला यूँ ही नहीं कहा गया है।

हम दोनों की आँखें अपने आप ही बंद होती चली गयी। मुझे तो अपनी कुछ खबर ही नहीं रही, मैं तो अपने होश ही खो बैठा था। उसके अधरों के नशे में मैं खोता चला गया था।
लगभग बीस मिनट तक मैं उसके होंठो को चूमता रहा।

होंठ तेरे गुलाब के फूल से भी कोमल हैं…
चूमते वक्त कहीं खरोंच ना लग जाये दिल में बस यही डर है…
तेरे जिस्म की बनावट संगमरमर की मूरत से कम नहीं…
तुझे देख लूं जी भर के फिर मरने का भी गम नहीं…

अब मेरी तंद्रा टूटी तो मैंने अपने हाथ उसके पीठ पर चलाने शुरू कर दिये। उसकी पीठ बैकलेस ब्लाउज पहनने की वजह से वैसे भी पूरी तरह से नंगी थी। मैंने उसके ब्लाउज को निकाल दिया तो उसके बत्तीस इंच साइज की चूचियां आजाद हो गई, एकदम टाइट उठी हुई। पूरी तरह से गोल… मानो हैंडबॉल को आधा काट कर लगा दिया गया हो!
लेकिन जब मैंने उन्हें दबाना शुरू किया तो रूई की तरह मुलायम और दब गई।

थोड़ी देर उसकी चुची को दबाने के बाद मैंने अपने लबों को उसके लबों से हटा कर उसकी चुची पर लगा दिया। वह ‘उफ़्फ़ आआ आआ आह्ह्ह ह्ह…’ करने लगी। मैं बारी बारी से उसकी दोनों चूचियों को दबाने और चूसने लगा। कभी कभी उसके निप्पल को हल्के दांतों से काट भी लेता था तो उसकी सिसकारी में दर्द भरी आह भी निकल जाती थी- ईईईस्स स्सस्स!

अब वह मेरे बालों को नोंचने लगी थी, वह मेरे सर के बालों को पकड़ कर मेरा सर अपनी चूचियों पर जोर से दबाने लगी। वह अपनी कामवासना की चरम सीमा पर पहुंच रही थी।

मैंने भी अब देर ना करते हुए अपनी पैंट को खोला और अपनी जॉकी चड्डी को उतार दिया। शर्ट और गंजी तो उसने मेरे पहले ही उतार दिये थे। अब मैं सीट पर बैठ गया और वो नीचे बैठ गयी। उसने बिना कुछ कहे सीधे मेरे लंड को मुँह में ले कर चूसना शुरू कर दिया।
वह कमाल का लंड चूसती थी। लंड चूसने की माहिर खिलाड़ी थी वो, नहीं तो छः इंच के लंड को पूरी तरह से मुंह में कैसे ले सकती थी। जब वो मेरे लंड को पूरा निगल कर सर को ऊपर नीचे करने लगी तो मैं तो सीधे जन्नत की सैर करने लगा।

जब मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने उसके बालों को पकड़ा और उसके मुंह को ही चोदने लगा। वह गूँ गूँ ही करती रह गयी। मेरे वीर्य से उसका मुंह पूरी तरह से भर गया। वह मेरे वीर्य को पी गयी और लंड को चाट चाट कर साफ कर दिया।
वह फिर से मेरे लंड को चूसने और चाटने लगी, उसकी इन हरकतों की वजह से मेरा लण्ड जो आधा तो खड़ा ही था, फिर से उत्तेजित हो कर फिर से अपने पूरे साइज में आ गया।

अब वो सीट पर बैठ गयी, मैंने उसके पैरों के अँगूठे से चूसने और चाटने की शुरुआत करते हुए उसकी चूत के पास अपनी जीभ को ले गया तो मेरी नाक में अजीब सी कसैली गंध समा गयी।
मुझे उबकाई सी आने लगी।

उसने कहा- तुम्हारा पहली बार है क्या?
तो मैंने कहा- हाँ।
तो उसने कहा- इसी वजह से… जब आदत लगेगी तब खूब चाटोगे। कोई बात नहीं!

अब हम चुदाई के लिए पूरी तरह से तैयार थे। मैं सीट पर दोनों पैरों को नीचे कर के बैठ गया, वो मेरी जांघों के ऊपर वज्रासन की स्थिति में बैठ गयी। सिर्फ अंतर यह था कि उसने अपने दोनों पैर को मोड़े हुए ही मेरे कमर के दोनों साइड में लगा रखा था।

अब उसका चेहरा ठीक मेरे चेहरे के सामने था, हमारे लब फिर से आपस में जुड़ गए, मैंने एक हाथ से उसकी कमर को पकड़ा और एक हाथ से उसकी चुची को दबाने लगा। फिर से मैं अब पूरी तरह से तैयार था।
उसने अब अपने चूतड़ों को उठाया और हौले से मेरे लंड के सुपारे पर रख कर हौले हौले से दबाने लगी। मैंने भी थोड़ा कमर को उचकाया तो लंड का सुपारा अंदर चला गया, उसकी चुत तो पहले से ही पानी छोड़ने की वजह से गीली हो गयी थी तो ज्यादा परेशानी नहीं हुई।
वह थोड़ा चीख़ी- आआह!

मैंने पूछा- तुम्हारा तो पहली बार नहीं है ना… तो फिर?
उसने बताया- मेरी दो साल पहले ही शादी होने की वजह से ज्यादा चुदी भी नहीं हूँ क्योंकि घर पर वो कम ही रहते हैं और वो पांच महीने से आये भी नहीं हैं तो थोड़ी टाइट भी हो गयी है।

मैंने उसकी एक चूची को बाएं हाथ से पकड़ा और दाएँ हाथ को उसके कमर पर थोड़ा कस दिया। हमारे होंठ तो अलग होने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
मैं उसके मुंह में जब भी अपनी जीभ को डालता, वह कुल्फी की तरह जीभ को चूसने लग जाती। अभी तो सिर्फ सुपारे का ही उसके चुत में प्रवेश हुआ था। वह अपनी कमर को उठाये हुए ही हिला रही थी।

मैंने उसकी कमर को जोर से पकड़ा और नीचे से अपने कमर को जोर से उचका दिया, वह छटपटा गयी लेकिन वह पूरी तरह से मेरे शिकंजे में थी। मुझे महसूस हो रहा था कि लंड आधा घुस चुका था।
फिर से मैंने उसी तरह का शॉट लगाया तो मेरा लंड पुरी तरह से चूत में घुस गया।
उसने अपना मुंह मेरे मुंह से हटा के जोर से सिसकारी ली- ईईस्स्सस्स स्स्सस!

मुझे महसूस हो रहा था कि जैसा मेरा लण्ड किसी गर्म मुलायम गद्दे से चारों तरफ से दबा दिया गया हो। मेरा लंड भी लोहे की रॉड की तरह टाइट हो गया था। अब उसके चूतड़ पूरी तरह से मेरी जांघों में लग गए थे और लण्ड उसकी चूत में अपनी जगह अच्छे से बना चुका था।

अब उसने अपनी दोनों हाथों का घेरा बना कर मेरी गर्दन पर लगा दिया, अब उसकी दोनों चूची मेरे मुंह के सामने थी, मैं एक पर अपना मुंह लगा करके चूसने लगा।

मैंने भी अपने दोनों हाथों को उसके गोलमटोल चूतड़ों पड़ लगा दिया। अब मैंने उसको चूतड़ों के सहारे उसके शरीर को तब तक उठाया जब तक उसके चूत से मेरा लंड के सुपाड़े का लगभग ऊपरी सिरा तक नहीं निकल गया।
वह अपनी चुत को मेरे लंड के ऊपर रगड़ने लगी। मैंने उसकी कमर को पकड़ा और ऐसा धक्का दिया कि एक ही बार में पूरा लंड जड़ तक समा गया।

वह भी जोर से मेरे से लिपट गयी, ‘अआआ अह्ह्ह्ह…’ की आवाज करते हुए अब वह लय में अपने चूतड़ों को हिलाने लगी, मैं भी उसके चूतड़ों को दबाने लगा।

मैंने उसकी चुचियों को भी चूस चूस कर के लाल कर दिया था। अब ट्रेन की धड़ाधड़ और चुदाई की आवाज फ़काफ़क फ़काफ़क मिलने लगी थी। इस आसन में चुदाई करने की वजह से हमें ट्रेन की हिलने की भी सहायता मिल रही थी। अब हम ‘आआअह ओह्ह्हह ह्ह हह्हह…’ जैसी आवाजें निकलाने लगे थे।

वह तो चुदाई में पूरी तरह से खो ही गयी थी, वह हिल भी रही थी ‘और चोदो मुझे, चोदो मुझे…’ कहते भी जा रही थी- हाँ मेरे राजा, बस इसी तरह से… और जोर से चुदाई करो… चोद दो मेरी चूत को… बहुत परेशान करती है। सारी रात अंगुली करती रह जाती हूँ। मेरी चुत की प्यास को बुझा दो। मेरे चुची को खा जाओ। दबा दबा के दूध निकल दो इनका।

मैंने कहा- मेरी रानी, अब तुझे अंगुली करने क्या जरूरत है, मेरा लंड है ना… जब चाहे पटना में बुला लेना, आ के चोद जाया करूँगा। अब तेरी चुत में तेरी अंगुली की नहीं, मेरे लंड की जगह है। मैंने उससे कहा- तेरी चुत तो बहुत टाइट है मेरी जान, मेरे लिये रखी थी क्या?
उसने कहा- हाँ जानू, देखो न तुम्हारे लिये ही तो अपने चूत की सफाई भी की है। घुसा दो अपना पूरा लंड! फाड़ दो मेरी चूत को… बहुत तड़पती है अकेले में! पांच महीने से प्यासी है, लंड खोज रही है। चोदो मुझे, और जोर से, और जोर से, और जोर से, चोदते रहो जब तक मेरी चुत का पानी न निकल जाये। उफ़्फ़ हाआआ आआयईई इस्सस स्सस्सस… बड़ी दिनों के बाद लंड मिला है। आज तो जी भर के चुदूँगी। ऊम्मम्म मम्मम उम्म्ह… अहह… हय… याह… आआ आआह्ह हाआआ… निहाल हो गयी आज मेरी चुत!

वो पता नहीं और क्या क्या बोले जा रही थी।

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