कली से फूल-2

लेखक : रोनी सलूजा

हम दोनों लॉज में एक डबलबेडरूम लेकर उसमें गए।

शकुन स्कूल से दो दिन की छुट्टी लेकर और घर में सहेली की शादी का बहाना बनाकर आई थी। यानि चौबीस घंटे हमारे पास थे। दोनों बारी बारी से बाथरूम जाकर फ्रेश हुए। अब किसी औपचारिकता की आवश्यकता नहीं थी, सीधा लिंग संधान का काम बाकी था लेकिन शकुन की अपनी चाहत देखते हुए मैंने जल्दबाजी नहीं की। पहले कमरे का मुआयना किया, सब ठीक लगा, यह देखकर शकुन को बाँहों में भर लिया, वो मुझ से ऐसे चिपक गई जैसे हमेशा के लिए मेरी हो गई है।

फिर मैंने उसके कपड़े कुर्ती और सलवार निकाल कर अलग कर दिए। दुबली पतली छरहरी सी काया मेरे आलिंगन में थी। मैंने गोद में उसे उठाया तो फूल की तरह लगी, उसे उठाकर चूमा और बेड पर लिटा दिया।

अपने सारे कपड़े उतार दिए, अब उसकी ब्रा को उतार कर छोटे छोटे बूब्स को चूसना शुरू किया। शकुन तो पहले ही गर्म थी, उसकी कसमसाहट से लग रहा था कि उसे गर्म करने की जरुरत नहीं है सीधे सीधे लंड चूत में लेना चाह रही है।

मेरा लंड खड़ा हो चुका था, मैं भी उसे स्तन से नाभि और नाभि से सीधा योनि तक चूमता गया, फिर उसकी चड्डी उतार कर अलग कर दी। शकुन ने कोई विरोध नहीं किया। बस अपने एक हाथ से योनि को ढक लिया।

चूत को देख लग रहा था जैसे फूली हुई नानखताई पर दरार पड़ गई हो और दरार में टोमेटो सॉस भरा हो, अन्दर की लालिमा ऐसी प्रतीत हो रही थी।

यह बताने की जरुरत नहीं कि शेविंग की हुई थी। अभी यह अनछुई होगी, सोचकर मैंने 69 की अवस्था बनाई और चूत के आसपास होंठ व जीभ से सहलाने लगा। शकुन मेरे लिंग को हाथ में लेकर मसलने लगी। फिर मैंने होंठों से चूत को चूमा किया, जीभ से भी भग्नासा को छू करके आंदोलित कर दिया। उसकी चूत से चिकना रस बह चला था।

मैंने कहा- शकुन, मैं कंट्रोल नहीं कर पा रहा हूँ, तुम्हारी चूत का सुख लेना चाह रहा हूँ !

शकुन- हाँ रोनी, मेरी गर्म चूत की गर्मी को पहले ठंडी कर दो, फिर हमारे पास पूरे चौबीस घंटे हैं, तुम जैसा चाहो मुझे चोदते, बजाते और ठोकते रहना !

मैंने पूछा- शकुन तुमने पहले सेक्स किया है?

बोली- कभी नहीं किया।

अब समस्या थी, कुंवारी चूत के कारण कोई समस्या न हो जाये इसलिए पहले मैंने उंगली चूत में डालकर उसका मुआयना करते हुए अन्दर बाहर करने लगा। शकुन को एक बार स्खलित कर देना चाहता था तो जीभ से क्लैटोरिस को आंदोलित करने लगा। कुछ ही मिनटों में शकुन अकड़कर मछली जैसी तड़पने लगी, सिसकारियाँ लेती हुई स्खलित हो गई, पूरी चूत योनिरस के स्राव से गीली हो गई। शकुन ने मेरे लिंग को अभी भी अपने हाथों में ले रखा था, बार बार उसे चूम रही थी।

मैंने कहा- डियर, अब तुम अपनी चूत को जितना खोल सको खोल दो !

उसने अपने पैर घुटने से मोड़ कर दोनों ओर फैला लिए, बुर की दरार में गुलाबी छेद दिखाई देने लगा। मैंने उसके योनिरस से अपने लिंग को गीला करके चूत के छेद पर रख दिया फिर थोड़ा सा दबाव बनाया, सुपारा चूत के मुहाने में चला गया !

“..उईइ माँ ! रोनीईईईइ !” कहकर शकुन ने अपने दांत भीच लिए। मैंने रूककर उसके नींबू जैसे स्तन को मुँह में लेकर चूसना शुरु कर दिया, आधे से ज्यादा स्तन मेरे मुँह में समा गया, फिर जीभ से स्तन घुंडी को मुँह के अन्दर ही सहलाने लगा तो उसकी योनि और गीली होकर ढीली पड़ गई।

फिर मैंने धीरे धीरे दबाब बनाकर पूरा लिंग अन्दर कर दिया, शकुन ने सारा दर्द पीकर एक बार भी नहीं कहा कि अपना लंड बाहर निकाल लो, दर्द हो रहा है।

क्यूंकि वो तो इसी अनुभव को प्राप्त करने आई थी मुझे इतने कसी चूत एक मुद्दत बाद नसीब हुई थी। चूत के कसी होने से लिंग और सख्त होता जा रहा था।

जब शकुन को कुछ राहत सी महसूस हुई तो उसने अपनी कमर को उचकाना शुरू कर दिया। मुझे लगा अब यह रिलेक्स हो गई है, मैंने धक्के लगाना शुरू कर दिया, नीचे से चूतड़ उठा उठा कर शकुन लंड को ज्यादा से ज्यादा अन्दर लेने की होड़ करने लगी। हमारे होंठ आपस में जुड़े हुए थे, जीभ आपस में एक दूसरे से उलझ रही थी, सांसों की रफ्तार अनियंत्रित हो चली थी।

पांच मिनट के धक्का पेल के बाद शकुन ने मेरे बालों को खींच डाला, मेरी पीठ पर नाख़ून गड़ा डाले, इसी के साथ बहुत सा रस छोड़ते हुए अपनी मंजिल को प्राप्त कर लिया, योनिरस से बढ़ी चिकनाई में तेजी से आघात करते हुए मेरे लंड ने भी अंतिम सांसों के चलते अपना वीर्य जोरदार लहरों के साथ शकुन की चूत में भर दिया जिसकी हिलोरों से आनंदित होकर सीत्कार करते करते वो अचेत सी हो गई।

शकुन के संतुष्ट चेहरे के भाव बता रहे थे कि वो दर्द को सहन करके ख़ुशी का अहसास कर रही है। फिर दोनों एक दूसरे को चूमते सहलाते रहे।

मैंने पूछा- कैसा लगा?

तो वो बोली- बहुत मजेदार ! काश वक्त यहीं रुक जाता !

तब तक मेरा लिंग सिकुड़कर चूत से बाहर निकल आया, मैंने उठकर शकुन की चूत को देखा जिसमें से रक्तमिश्रित वीर्य बहकर बाहर आ रहा था। मैंने पेपर नेपकिन से उसे साफ कर दिया, फिर शकुन को कलि से फूल बनने की बधाई देते हुए कहा- सुबह तक यह फूल खिलकर महक उठेगा।

फिर उसे लेकर बाथरूम में साफ होने चला गया। उसके दर्द का सोचते हुए दोबारा करने का साहस न कर सका।

बाथरूम में शकुन अपने यौनांगों को धोकर मेरे लिंग अपने हाथ में लेकर धोने लगी, फिर उससे खेलते हुए बोली- मैं आज पहली बार लिंग को इस तरह से देख पाई हूँ, अभी तक अन्तर्वासना पर इसके बारे में पढ़ती थी।

कहते हुए मुरझाये लंड को मुँह में लेकर चूसने लगी। मेरी दोबारा सम्भोग करने की तमन्ना बलवती होने लगी, हथियार तन गया था। मैंने कहा- चलो बेड पर !

तो बोली- नीचे योनि में जलन सी हो रही है ! मैं चूसकर तुम्हें डिस्चार्ज करुँगी।

फिर जोर जोर से चूसते हुए जीभ की नोक से लंड के छिद्र को छेदती कभी बाहर निकालकर स्तनों पर रगड़ती, कभी मुठ मारती !

बड़ा मजा आ रहा था ! मैं अपने हाथ से उसकी चुच्ची सहला रहा था। मैं चरम पर पहुँचने लगा तो उसके सिर को दोनों हाथों से पकड़कर उसके मुँह में लंड को जोरों से अन्दर-बाहर करते हुए कहा- मेरा निकलने वाला है !

बोली- मुँह में निकालो, मैं पी लूंगी !

मैंने कहा- इतना आसान नहीं है पी लेना।

जैसे ही निकलने को हुआ, लंड को मुँह से निकालकर चुच्चियों पर वीर्य-वर्षा कर दी। अब वो इसे अपने चुच्ची पर मलते हुए वीर्य की अंतिम बूंद जो लंड से निकल रही थी, उसे अपनी जीभ पर ले लिया, फिर स्वाद लेकर थू-थू करके कुल्ला करने लगी।

मैंने पूछा- कैसा लगा?

तो कोई जवाब न देकर मुस्कुराकर शावर चालू कर नहाने लगी।

शाम पांच बजे हम घूमने निकल गए। दोनों को भूख लग आई थी इसलिए रात का खाना शाम को ही खा लिया ताकि रात में पेट पर ज्यादा भारीपन न लगे। फिर बड़ी झील में नौकायन करके घूमते-घामते आठ बजे लॉज आ गए, साथ में कुछ खाने का सामान भी लेते आये। मुझे मालूम है रात में कसरत के बाद भूख लगेगी।

रास्ते में मैंने शकुन को अपनी मुराद बताई कि मेरी दिली आरजू है कि मैं आपको खड़े होकर अपने हाथों पर झुलाते हुए आपकी चुदाई करना चाहता हूँ, मेरे लिए यह आसन सिर्फ तुम्हारे साथ संभव है !

तो वो सहर्ष तैयार हो गई, बोली- मैं तो अनुभव लेने ही आई हूँ आपसे।

कमरे में पहुँच कर शकुन अपने कपड़े उतार कर मेक्सी पहनने लगी तो मैंने एन मौके पर मेक्सी छीन ली।

वो ब्रा पेंटी में खड़ी रह गई।

मैंने कहा- क्यों दोहरी मेहनत कराने के मूड में हो डियर ! अभी ये भी निकालने पड़ेंगे !

कहकर ब्रा की हुक खोल उसे भी उतार दिया। मैं बेड पर बैठ उसके अर्धनग्न जिस्म को निहारने लगा तो वो आकर मेरी गोद शर्माते हुए बैठ गई।

मेरा हथियार पैंट के अन्दर कसमसाने लगा जिसका अहसास शकुन को अपनी गांड की दरार पर हो गया। उसने मेरी शर्ट, बनियान

और पैंट को उतार दिया, मुझे वापस बेड पर बिठाकर चड्डी के ऊपर से ही लंड को सहलाते हुए मेरे होंठ चूमने लगी।

अब वो गर्म हो चली थी, उसने अपनी पेंटी उतार मेरी चड्डी भी निकाल दी, अपने बालों को क्लिप मुक्त कर मुझे धक्का दे मुझ पर भूखी शेरनी जैसी झपट कर चढ़ गई। मेरे पैर अब भी पलंग से नीचे ही लटके थे, शकुन ने मेरी कमर के दोनों ओर पैर अपने पैरों को डाल अपने स्तनों को मेरे मुंह के सामने कर दिया जिन्हें मैं बारी बारी से मुँह में लेकर चूसने लगा। मेरे हाथ उसकी पीठ और नितम्ब को सहलाने लगे।

अब उसने कुछ कंपकंपाहट के साथ अपने लरजते होंठ मेरे होंठों पर रख लिप-किस करने लगी। मैं भी मौका देख उसके मुँह में अपनी

जीभ इस तरह बार बार घुसाने लगा जैसे जीभ से उसका मुखचोदन कर रहा हूँ। इस क्रिया से तो शकुन मानो तड़प सी गई, गुं..गुं सी…सी की अस्पष्ट आवाजें निकालने लगी वो, उसकी आँखें सुर्ख होकर नशीली हो गई, गरम सांसें छोड़ रही थी मुझ पर।

बुर का मुआयना करने के लिए मैंने हाथ नीचे डाला तो पाया कि वो पूरी तरह पनिया गई है, योनिरस चूत को भिगोकर मेरे लिंग के आस पास शरीर पर फ़ैल रहा है, मैंने अपनी अंगुली उसकी चूत पर रगड़ कर अन्दर कर दी,

इस क्रिया से शकुन चिहुंक उठी, वो मेरी जांघों पर बैठ मेरे लंड को अपनी बुर पर रगड़ने लगी। पूरा लंड उसके रस में सराबोर हो गया तो शकुन ने अपने योनिद्वार पर उसे टिका कर अपने नितम्ब से जोर से दबाब बना दिया और खुद ही चीख उठी क्योंकि आधे से ज्यादा लंड उसकी चूत में पैबस्त हो चुका था। वो गनीमत थी कि मेरे हाथ उसके नितम्बों को थामे थे इसलिए उसे लंड बाहर निकालने का मौका नहीं दिया। उसकी आँखों में आंसू छलक पड़े थे पर वो मुस्कुराते हुए बोली- इसी हसीन दर्द को तो महसूस करना चाहती हूँ।

और मेरी छाती पर चुच्चों के बल लेट गई, कच्चे कड़क चुच्चे मेरे सीने में धंस गए, वो मेरे होंठ पीते हुए कमर का दबाब बढ़ाते हुए लंड को अन्दर लेती जा रही थी।

जब पूरा लौड़ा उसकी चूत के अन्दर चला गया तो मेरी छाती पर हाथ टिकाकर उठक बैठक करते हुए गपागप लंड अपनी चूत में लेने लगी। शकुन बहुत गर्म हो चुकी थी, कुछ ही मिनट बाद सिसकती कराहती सांसों का तूफान लिए कटी पतंग की तरह मेरे सीने पर आ गिरी। उसकी बुर की रसवर्षा से मेरा खड़ा लंड रस में सराबोर हो गया। जब उसकी सांसों का तूफान थम गया तो मैंने उसे घुसे लंड के साथ गोद में उठा लिया उसने मेरी कमर को अपने पैरों से घेरा बनाकर जकड़ लिया, हाथों को मेरे गले में डाल कर उंगलियों की कैंची बनाकर जकड़ लिया। मैंने भी अपनी हथेली आपस में मिलाकर शकुन के चूतड़ों के नीचे झूले की तरह बैठक बना दी, मतलब खड़े होकर गोद में शकुन को लेकर चुदाई का सपना पूरा करने जा रहा था।

लंड पूरा जड़ तक शकुन की बुर में था, अब शकुन ने खुद बखुद अपने पैर और मेरी हथेलियों के सहारे झूल कर मेरे लंड को अपनी चूत में घुसाना शुरू कर दिया, वो तो बड़ी उतावली थी इस आसन के लिए।

वाकई इस आनन्द की अनुभूति को मैं शब्दों में बया नहीं कर पा रहा हूँ, कभी वो झटका लगा रही थी कभी मैं, सारे कमरे का भ्रमण हो गया, साथ ही शकुन मुझे लिप-किस और स्तन चुसाई का आनन्द भी देती जा रही थी। लगता था वो जन्मों की प्यासी है, सांसों का सैलाब दोनों को ले डूबा, मेरे शरीर का ज्वालामुखी फट पड़ा, सारा का सारा लावा शकुन ने अपनी बुर में समा कर अपने योनिजल में मिला लिया।

कितना समय बीता, मुझे नहीं पता लगा, पता तब चला जब हम दोनों एक दूसरे को नोचने की इन्तहा पार करने लगे, न जाने मेरे शरीर का बल कहाँ खो गया, मैं शकुन को अपने ऊपर लेकर बेड पर गिर गया, फिर उसे अपने आगोश में लेकर कितनी देर पड़ा रहा, याद नहीं।

जब होश आया रात के ग्यारह बजने वाले थे, अपनी जिन्दगी में पहली बार इस कदर से थक गया था।

भूख लग आई थी, उठकर दोनों ने कुछ नाश्ता किया, फिर फॉर प्ले और फिर सेक्स !

रात में अलग अलग आसन से तीन चार बार किया, यहाँ तक कि मेरे लिंग से वीर्य निकलना बंद हो गया।

फिर हम दोनों नींद के आगोश में समा गए।

सुबह आठ बजे वेटर ने दरवाजा खटखटा दिया। अन्दर से ही पूछा तो बोला- सफाई करने आया है।

उससे कहा- चाय नाश्ता भेज दो, फिर सफाई कर लेना !

तो वह चला गया।

मैंने शकुन को जगाकर फ्रेश होने भेज दिया, फिर मैं भी फ्रेश होकर नहा रहा था कि शकुन बाथरूम में आ गई। एक बार फिर शावर के नीचे बाथरूम सेक्स किया। शकुन घोड़ी स्टाइल में चुदकर बोली- मजा आ गया।

हमने कपड़े पहने, तब तक नाश्ता आ गया। अब हमारे जुदा होने का वक्त आ गया था।

लॉज से चेक आउट कर बाजार में थोड़ा घूमने के बाद एक होटल में हमने खाना खाया।

शकुन बहुत उदास थी, बोली- क्या फिर कभी हमारी मुलाकात हो सकती है?

मैंने बोला- शायद नहीं ! यादें ही बहुत है हमारे लिए।

फिर उसको बिछुड़ने का दर्द दिल में छुपाकर बस में बिठा कर उसके गंतव्य को रवाना कर दिया।

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