असीमित सीमा-3

लेखक : जवाहर जैन

अन्तर्वासना के सभी पाठकों को मेरा नमस्कार।

ट्रेन में श्रद्धा के सहयोग से मैंने सीमा को चोदा। ट्रेन में हमने चुदाई का लुफ्त कैसे उठाया इसे आपने कहानी के पहले भागों में पढ़ा। अब जानिए आगे का हाल।

कुछ ही देर में सीमा टायलेट से आ गई। संचेतीजी, जिन पर हम सभी लोगों का ख्याल रखने की जिम्मेदारी थी, वे भी कुछ देर में ही पहुँच गए और हम लोगों से सामान्य बातें करने लगे।

उन्होंने सीमा से कहा- तुम्हारी मम्मी रात का खाना तुम्हारे साथ ही खाने बोल रही हैं, तुम उधर चलोगी या मम्मी को यहाँ लाऊँ?

सीमा के चेहरे से लग रहा था कि अब उसे मम्मी नहीं, इसी कूपे में सैक्स का मजा लेना है।

मैं व श्रद्धा भी उसके मनोभाव समझ रहे थे।

वह अपनी गर्दन हिलाकर कुछ बोलने ही जा रही थी, तभी श्रद्धा बोली- हाँ, आंटीजी तुम्हारा कितना ख्याल रखती हैं सीमा ! तुम उनके पास खाना खाने चले जाना।

सीमा ने प्रश्नवाचक नजरों से श्रद्धा की ओर देखा फिर स्वीकृति में सिर हिला दिया। मैं सोचने लगा कि कहाँ उस समय सैक्स को छी: छी: करने वाली श्रद्धा अपना काम निकालने के लिए सीमा को दूसरी बोगी में भेज रही है, पर उसकी जगह कोई दूसरा यहाँ आ गया तो? फिर कुछ कहाँ कर पाएँगे।

मैं इस सोच में ही पड़ा था, तभी संचेतीजी बोले- मैं आता हूँ उस बोगी से।

यह बोलकर वे बाहर चले गए।

सीमा ने श्रद्धा से कहा- क्या बात है, रात को तुम्हे जस्सू के साथ मजा करना है क्या?

मैं भी बोला- अरे श्रद्धा, सीमा को उसकी मम्मी के पास क्यूं भेज रही हो? इसके बदले कोई भी आएगा तो हममें से कोई भी कुछ कहाँ कर पाएगा।

श्रद्धा बोली- सीमा तुम इसी कूपे में हमारे साथ रहो इसलिए यह कही हूँ।

हमने पूछा- कैसे?

श्रद्धा बोली- देखो यदि सीमा नहीं जाती, यहीं रहती है तो आंटी जी खाने के टाइम यहाँ आती। जाहिर तौर पर संचेती अंकल तब दूसरी जगह चले जाते और वे आंटी से बोलते जाते कि आप यहीं सो जाइएगा। ऐसे में फिर आंटीजी ऐसी जम जाती यहाँ कि फिर पूरी रात हममें से कोई भी कुछ नहीं कर पाता। आंटीजी पहले ही बता चुकी हैं कि ट्रेन में उन्हे नींद नहीं आती, ऐसे में कोई भी कुछ नहीं कर पाता ना।

यह बोलकर वो हमारी ओर देखने लगी।

सीमा ने उसकी बात का पूरा समर्थन किया और इस पर राजी हुई कि वह मम्मी के पास खाना खाने जाएगी और जल्दी ही वापस आ जाएगी।

श्रद्धा बोली- हाँ, अब अंकल किसी को यहाँ सोने मत भेज दें, इस पर भी ध्यान रखना होगा।

हम दोनों ने सहमति में सिर हिलाया। रात को एक बड़े स्टेशन पर ट्रेन रूकी और कुछ देर में हमारा खाना भी आ गया।

संचेतीजी सीमा को उसकी मम्मी के पास लेकर गए। जाते समय श्रद्धा ने जल्दी आ जाना का अनुरोध सीमा से किया ताकि संचेतीजी उसके वहाँ रूकने या किसी और को यहाँ रखने की बात न सोच सकें।

संचेतीजी ने हमारे साथ ही खाना खाया। खाना खाकर निपटने के बाद मैंने श्रद्धा की ओर देखकर संचेतीजी से सीमा को यहाँ लाने का इशारा किया।

श्रद्धा संचेतीजी से बोली- अंकल सीमा यहाँ कब आएगी?

संचेतीजी हंसते हुए बोले- इस टूर की यह एक खास बात रही कि तुम दोनों इतनी जल्दी इतनी अच्छी सहेली बन गई कि सीमा को भी उसकी मां ने वहीं साथ ही सोने को कहा। उसकी मौसी यहाँ उसकी सीट पर आकर सोने तैयार भी हुई, पर सीमा बोली कि नहीं यदि वो यहाँ रहेगी तो श्रद्धा को भी यहीं रखना होगा। तब उसकी मम्मी बोली कि ठीक हैं चली जाना।

यह बोलकर हंसते हुए संचेतीजी सीमा को लाने चल दिए।

मैंने श्रद्धा से कहा- तुमने उस समय अच्छा दिमाग लगाया, नहीं तो अभी यहाँ सीमा के बदले कोई और आ जाता।

श्रद्धा मुस्कुराती रही।

मैं बोला- पर यह तो बताओ कि मुझे क्या करना होगा?

श्रद्धा बोली- बस थोडी देर ही बाकी है, पता लग जाएगा तुम्हें।

इसके बाद हम ऐसे ही बात करते रहे। थोड़ी देर में सीमा संचेतीजी के साथ आ गई। अब चौथी बर्थ पर कौन सोएगा इसका टेंशन था।

तभी संचेतीजी बोले- आप लोग टायलेट से आ जाइए, रात का समय है, यात्रियों में कोई बदमाश भी हो सकता है। तुम दोनों सावधानी से रहना !

दोनों ने सिर हिलाया।

मैं बोला- आप भी तो यहीं हैं ना?

उन्होने कहा- हाँ यार, मैं हूँ तो यहीं पर, यदि कहीं जाना पड़े, तब के लिए बोल रहा हूँ। जस्सू, तुम भी ध्यान रखना सबका।

मैं भी हाँ बोला और इस सोच में पड़ गया कि रात का हमारा खेल संचेतीजी के यहाँ रूकने से कहाँ बन पाएगा? अब हम लोगों ने बर्थ पर चादर डालकर बिस्तर बिछा लिया। इस बीच सीमा और श्रद्धा धीरे-धीरे बात करती रहीं।

संचेतीजी बोले- तुम दोनों ऊपर की बर्थ पर चले जाओ। मैं व जस्सू नीचे सो जाते हैं।

श्रद्धा ने सिर हिलाया और ऊपर की एक सीट पर आ गई, पर सीमा बोली- मुझे ऊपर अच्छा नहीं लगता, मुझे नीचे सोना है।

यह सुनकर संचेतीजी बोले- ठीक है जस्सू, तुम ऊपर सो जाओ, मैं व सीमा यहीं नीचे की बर्थ पर रहेंगे।

“ठीक है।” बोलकर मैं भी श्रद्धा के सामने वाली सीट पर अपने सोने की तैयारी करने लगा। श्रद्धा व सीमा टायलेट गईं। संचेतीजी भी अपनी बर्थ ठीककर उस पर लेटे।

“मैं टायलेट होकर आता हूँ।” बोलकर निकला। वहीं गेट के पास ही दोनों बात करते हुए मिलीं।

मैंने पूछा- अब कैसे होगा?

श्रद्धा बोली- आप ऊपर सोने पहुँचो, मैं वहीं आपको बताती हूँ।

मैं बोला- कैसे? अंकल सुनेंगे नहीं क्या?

श्रद्धा बोली- अंकल के सोने के बाद आप मेरी बर्थ में आ जाना।

मैं बोला- हाँ, यह ठीक रहेगा, पर तुम्हें अपनी जींस बदल लेनी थी, इसके कारण परेशानी होगी ना।

श्रद्धा बोली- कोई परेशानी नहीं होगी, पर यह ध्यान रखना कि मुझे चोदने के फिराक में मत रहना।

मैं हड़बड़ाया- अरे यार जब साथ रहेंगे तब चुदाई ही होगी ना?

श्रद्धा बोली- नहीं, मैंने आपको पहले ही बोला ना कि मुझे चुदवाना नहीं है, मैं जैसा इशारा करूंगी, आप वैसा ही करना बस।

यह बोलकर वे लोग कूपे की ओर चल दिए।

मैं टायलेट में घुसा और फ्रेश होकर कूपे में पहुँचा। संचेतीजी और सीमा नीचे थे, श्रद्धा संचेतीजी के ऊपर की बर्थ में थी। मैं सीमा के ऊपर की बर्थ पर आ गया। श्रद्धा की ओर देखा तो उसने सफर के लिए रेलवे द्वारा दी गई चादर के अलावा अपने पास की चादर भी ऊपर डाल ली, इससे उसका शरीर नजर तो नहीं आ रहा, मैं अनुमान बस लगा पा रहा था। मुझे लगा कि उसने अपने जींस का हुक खोला, फिर कमर थोड़ा ऊपर उठाकर जींस को नीचे की।

मैं समझ गया कि इसने जींस तो नीचे कर ही ली हैं, बस मुझे वहाँ पहुँचकर अपना लंड ही इसकी चूत में डालना है।

कूपे में एक लाइट जल रही थी। अब मेरा मन उसकी चूत देखने का कर रहा था। मैंने उसे चादर हटाकर चूत दिखाने का इशारा किया। श्रद्धा मेरी ओर घूमी और चादर हटाई, जींस के नीचे उसका शरीर बहुत गोरा था। चूत में बहुत छोटे-छोटे बाल थे। चूत सीमा की चूत से भी ज्यादा फूली हुई थी। उसनें जींस नीचे और टी शर्ट ऊपर की, तब मुझे लगा कि इसने पैन्टी व ब्रा दोनों ही उतार दी हैं।

अब मैं श्रद्धा के शरीर की एक बात आप लोगों से बताना चाहता हूँ, वह सुनिए।

श्रद्धा जब अपना नंगा बदन मुझे दिखा रही थी तो उसके पूरे शरीर की जो चीज मुझे सबसे ज्यादा हसीन लगी, वह थी उसकी नाभि।

जी हाँ उसकी नाभि !

दूसरों से ज्यादा गहरी थी और ऊपर से बहुत सुन्दर। मेरा दावा है कि तब यदि वह जींस टी शर्ट के बदले कोई ऐसी पोशाक पहनती जिससे उसकी नाभि दिखाई देती तो निश्चित ही अब तक कई लोग इसके पीछे पड़ गए होते।

खैर अब हम संचेतीजी के नींद में जाने का इंतजार कर रहे थे। मैंने कूपे की आखिरी जलते बल्ब को भी बंद कर दिया। कुछ देर बाद जब संचेतीजी थकने के कारण जल्दी ही सोते नजर आए, तो मैंने श्रद्धा की ओर हाथ बढ़ाकर उसे झझकोरा।

श्रद्धा जाग रही थी उसने इशारे से पूछा- क्या करना है?

मैंने उसे इशारा किया कि वो सो गए हैं, मैं आ जाऊँ?

श्रद्धा और पीछे सरकी और मुझे आने का इशारा की। मैं बहुत संभलकर उसकी बर्थ पर शिफ्ट हुआ, और जाते ही उसके खुले बूब्स से चिपक गया। श्रद्धा मेरी हरकतों का कुछ मजा ले रही थी और कुछ उसका ध्यान नीचे संचेतीजी पर लगा हुआ था। मैं उसके निप्पल को चूसने लग गया। उसके निप्पल का रंग तो मुझे नजर नहीं आया पर वे थे बहुत छोटे- छोटे। दोनों निप्पलों को जी भर कर चूसने के बाद अब मैंने श्रद्धा को सीधा लेटाया और खुद चादर के अंदर घुसकर उसके ऊपर आ गया।

उसके होंठों को अपने होंठों में दबाकर लंबा चुम्बन लिया, श्रद्धा मेरे इस चुम्बन का अपनी ओर से जैसा जवाब दे रही थी, वैसा जवाब मुझे आज तक नहीं मिला है।

श्रद्धा के हाव भाव देखकर मैं खुश होकर सोच रहा था कि यह फालतू में ही न चुदने का बोल रही थी, अब तो बढ़िया उछल-उछल कर चुदेगी, उसके होंठ छोड़ने का दिल तो नहीं कर रहा था, पर इसे जल्दी चोदने के लालच में उसके होंठ छोड़कर पजामा नीचे करके अपना लंड निकालने में लगा।

तभी श्रद्धा मुझे कान में फुसफुसाई- आप अपना लंड मत निकालो अभी चुदाई नहीं करनी है।

मुझे उसकी बात से करंट सा लगा अब मैं उसके कान के पास जाकर बोला- फिर क्या होगा?

श्रद्धा ने अपना हाथ मुझे दिखाकर रूकने का बोली, और मेरे सिर को पकड़कर अपनी चूत पर ले जाकर टिका दिया। मैंने उसकी चूत को चाटना शुरू कर दिया।उसकी चूत के गजब स्वाद से मेरा मुँह मानो उसकी चूत से चिपक ही गया था। मैंने उसकी चूत को चाटा, फिर छेद में जीभ डालकर चोदने लगा।

थोड़ी ही देर में उसकी चूत से फव्वारा सा छूटा और मेरे मुँह में थोड़ा नमकीन और थोड़ा कसैला सा स्वाद भर गया।

मैंने उसे मुंह में ही रखा, उसे कहाँ थूकूं ! यह सोचने में ज्यादा समय बर्बाद न करके उसे पी लिया।

अब मैं श्रद्धा के कान के पास आया और कहा- तुम्हारा तो हो गया है, अब मेरा क्या होगा?

वह पूछने लगी- क्या होना है?

मैं बोला- अब तो मुझे चोदने दो ना।

श्रद्धा बोली- नहीं, अभी दो दिन पहले ही मेरा पिरीयड हुआ है, इसलिए अभी चुदाई तो नहीं करेंगे, क्यूंकि यह मेरे लिए रिस्की हो सकता हैं। मेरा तुम्हारी और सीमा की चुदाई देखकर ही मूड बन गया था, पर खुद पर कंट्रोल किया। अभी भी अपनी चूत में तुम्हारा लंड न लेकर उसे जीभ से चटवाया।

मैं बोला- वह सब तो ठीक है पर मेरा क्या होगा?

श्रद्धा बोली- तुम भी अपना लंड मेरे मुंह में डालकर गिरा लो, फिर बाद में मैं पक्का तुम्हें अपनी चूत को चोदने दूंगी।

“चलो ठीक है !” बोलकर मैंने अपना लोअर नीचे किया और खुद उसकी चूत पर आया और उसके मुंह में अपना लंड दे दिया।

वह मेरा लौडा मुंह में रखकर चूसे जा रही थी, मैं उसकी चूत से थोड़ा ऊपर होकर उसकी नाभि में अपनी जीभ डालकर घुमाने लगा। मेरी इच्छा तो हो रही थी कि उसकी नाभि में ही लौड़ा घुसेड़कर श्रद्धा के शरीर का एक नया सुख उठाऊँ पर मेरा लौड़ा उसके मुंह में था और लौडे को सिर्फ मुंह में रखकर वह चूस ही नहीं रही थी बल्कि बीच में लंड को बाहर निकालकर वह उसे जीभ से चाट भी रही थी।

उसकी यह स्टाइल मुझे अद्भुत सुख दे रहा था इसलिए मैं भी अब उसकी चूत चोदने से ध्यान हटाकर चूसने और चाटने में ही मग्न हो गया। कुछ देर में ही मैंने अपने लंड की स्पीड बढ़ाई, फव्वारा उसके मुँह में ही छोड़ दिया। मेरे माल का स्वाद श्रद्धा को अच्छा नहीं लगा पर थूकने के लिए नीचे उतरना पड़ता, इसलिए वह भी मजबूरी में मेरा वीर्य गटक गई।

मैंने उससे पूछा- तुम्हारा माल फिर गिराना है क्या? चाटूं और?

वह बोली- नहीं, अब सो जाओ। बाद में देखेंगे कहीं मौका मिला तो फिर चोद लेंगे।

लिहाजा मैं उसके पूरे शरीर को एक बार अच्छे से चाटने के बाद अपनी बर्थ पर वापस आ गया।

तो दोस्तो, इस तरह हमने ट्रेन के सफर में भी अपने चुदाई के कार्यक्रम को बनाए रखा और इस सफर में बढ़िया मज़ा किया। सफर में ही श्रद्धा का भी चुदने का मूड बना तो एक स्थान पर श्रद्धा ने भी मस्त होकर चुदवाई। हाँ इसे चोदते समय सीमा ने हमें साथ गए लोगों की नजरों से बचाया। हालांकि सीमा इस टूर में छ: बार चुदी।

सबसे अच्छी बात यह रही कि चोदते या चुदते समय हमें किसी ने देखा नहीं, इस कारण हम समाज की जिल्ल्त से बच गए।

यह कहानी आपको कैसी लगी, कृपया बताएँ !

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