चूत में अन्तर्वासना के अंगारे

(Choot Me Antarvasna Ke Angarey)

यह कहानी निम्न शृंखला का एक भाग है:

मेरा नाम साहिल है। आज मैं आपको एक काल्पनिक कथा सुनाने जा रहा हूँ जो मैंने सोची तो है, पर असल में यह संभव नहीं हो पाई।

पिछले दिनों मेरे साथ एक बड़ा ही अजब वाकया हुआ, वो मैं आपको बताने जा रहा हूँ।

मेरी उम्र 41 साल है, मैं अपनी पत्नी और बेटे के साथ अपने घर में रहता हूँ, शादी को 16 साल हो चुके हैं, घर परिवार सब अच्छा चल रहा है, पत्नी भी बहुत अच्छी मिली है।

हमारे घर से कुछ ही दूरी पर यही कोई 20 घर छोड़ कर हमारे एक परिचित रहते हैं, वो मेरे पिताजी के बचपन के मित्र थे। अंकल की तो अब मृत्यु हो चुकी है, आंटीजी अभी हैं, उनके दो बेटियाँ और एक बेटा है, सब बच्चे शादीशुदा हैं।

आंटी की बेटियाँ दोनों बहुत खूबसूरत हैं। मेरी हमेशा से ही उन पर बुरी नज़र रही है। मगर कभी ऐसा मौका नहीं मिला कि मैं उन्हें पटा पाता।
मेरी अपनी शादी हो गई, मेरी शादी के कुछ साल बाद उन लड़कियों की भी शादियाँ हो गई। मगर अपनी खूबसूरती का गुमान ही उन दोनों लड़कियों को ले बैठा, शादी से पहले ही दोनों बहनें कच्ची उम्र में ही किसी न किसी से सेट हो गई और शादी से पहले ही दोनों ने खूब सुहागदिन और सुहागरात मना ली।

जब कोई आ कर बताता ‘अरे तुम्हारी वो आज किसी नए बॉयफ्रेंड के साथ गाड़ी में बैठी जा रही थी।’ तो दिल पे बड़े साँप लोटते कि भेणचोद, हमारे भी तो लंड लगा है, साली हमसे चुदवा ले… मगर हमारी किस्मत में तो वो थी ही नहीं।

खैर ऐसे ही ज़िंदगी चलती रही।

अब आते हैं आज पर!

सर्दियों के दिन, सुबह सुबह मैं उठ तो गया मगर फिर भी कम्बल में ही घुसा रहा, बीवी अपने घर के काम काज में लगी थी।

तभी अचानक आंटी जी अपनी छड़ी टेकते आ गई। पहले तो मैंने सोचा कि यह कहाँ से आ गई मोटी भैंस!
बस बेड पे लेटे लेटे ही मैंने थोड़ा सा झुक कर उनके पाँव छूने का ड्रामा किया।

‘और भई साहिल, क्या हाल हैं तेरे?’ कहते हुये आंटी जी मेरे पास ही बेड पर बैठ गई।
‘सुनाओ आंटीजी, क्या हाल चाल हैं आपके?’ मैंने उनसे पूछा और अपनी बीवी को आवाज़ लगाई- अरे रेणु, आना ज़रा!

मेरी बीवी आई और आंटीजी के पाँव छूए, आपस में दोनों ने एक दूसरी का कुशल क्षेम पूछा, उसके बाद रेणु चाय बनाने चली गई।
मैं कम्बल में ही लेटा रहा।

आंटी जी बेड पर पूरी तरह से फैल कर बैठ गई पीछे टेक लगा कर! घुटने की प्रोब्लेम की वजह से वो अपनी टाँगें मोड़ नहीं पाती थी। ठीक तरह से बैठने के बाद उन्होंने एक पाँव मेरे पाँव से लगा दिया।

मैंने पहले उनका पाँव देखा, फिर अपना कम्बल उनके पाँव पे डाला, तो उन्होंने अच्छी तरह से कम्बल अपनी दोनों टाँगों पे ले लिया। अब बहुत पुरानी सम्बन्ध थे हमारे, घर वाली बात थी, अक्सर वो हमारे घर आकर बड़ी बेतकल्लुफ़ी से बैठ जाती थी, खा पी लेती थी, तो मुझे इस में कोई खास बात नज़र नहीं आई।

जब वो बैठ गई, तो मैंने भी उठ कर बैठना ही मुनासिब समझा।

पहले तो इधर उधर की बातें चलती रही, फिर बात आ गई आंटीजी के घुटनों की। आंटीजी अपने दुखड़े रोने लगी- बेटा नहीं पूछता, घुटनों में बहुत दर्द रहता है, ये… वो…!

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