अंतहीन प्यास-1

आपकी सारिका कंवल
नमस्ते, आप सबके प्यार और अनुरोध ने मुझे फिर से एक नई कहानी लिखने पर विवश कर दिया।
मैं नहीं चाहती थी कि अब कोई कहानी लिखूँ, क्योंकि यह कोई कहानी नहीं बल्कि मेरे जीवन का अनुभव है जो मैं आप लोगों से बाँटना नहीं चाहती थी, पर कुछ लोगों के जोर देने पर मैं कुछ और बताने पर राजी हो गई हूँ।
मैंने अब विचार किया है कि मैं अपने जीवन का हर अनुभव आपसे बाँटू, क्योंकि कुछ लोगों का मानना है कि वो लोग मेरे अनुभवों से बहुत कुछ सीख रहे हैं।
अब तक मैंने अमर और विजय के बारे में बताया आज मैं मुर्तुजा के बारे में बताने जा रही हूँ।
उसका पूरा नाम मुर्तुजा अंसारी था और वो मुझे पुरी में मिला था। जब मैं अपने पति के साथ घूमने के लिए गई थी।
मैं उस वक़्त पति के तबादले की बात हो रही थी, तो मेरे पति ने मुझे और बच्चों को घुमाने के लिए पुरी ले गए। अमर से भी अब मैं दूर रहने लगी थी, क्योंकि वो पत्नी की बीमारी की वजह से ज्यादातर घर आने-जाने लगे थे।
अमर और मेरे बीच बातें तो रोज होती थीं, पर करीब एक महीने से शारीरिक मिलन नहीं हो रहा था। पति के तबादले के ठीक एक हफ्ते पहले हमने घूमने का विचार किया और मेरे पति मुझे और मेरे बच्चों को लेकर पुरी चले गए।
हम दो दिन घूमे, फिर जिस रात वापस आना था उसी शाम को हम खाना खाने एक रेस्टोरेन्ट में गए। तभी मैंने गौर किया एक 35-36 साल का आदमी जो ठीक हमारे सामने बैठा, अपनी बीवी और 3 बच्चों के साथ खाना खा रहा था, बार-बार मुझे घूर रहा है।
वो काफी लम्बा-चौड़ा, गोरा हल्की दाढ़ी, एकदम जवान, उसे देख कर लग रहा था जैसे कोई अँगरेज़ हो।
पहले तो मैंने नजरअन्दाज करने की कोशिश की, पर मुझे कुछ अजीब सा लगा। उसके देखने के तरीके से ऐसा लग रहा था, जैसे वो हमें जानता हो।
काफी देर देखने के बाद उसने मुझे मुस्कुरा कर देखा।
मैंने तब अपने पति से कहा- वो हमें बार-बार देख रहा है।
जब मेरे पति ने उसकी तरफ देखा तो वो उठ कर हमारे पास आया और कहा- आप लोग अंगुल से हो न..?
मेरे पति ने जवाब दिया- हाँ, पर आपको कैसे पता चला?
उसने तब कहा- मैं भी वहीं से हूँ और मेरी एक कपड़ों की दुकान है।
तब मेरे पति ने पूछा- हाँ.. पर मैं तो कभी आपसे नहीं मिला।
फिर मेरे पति ने मेरी तरफ देखा तो मैंने भी कह दिया- मैं भी नहीं जानती!
तब उसने बताया- नहीं.. हम पहले कभी नहीं मिले, दरअसल आपकी पत्नी को मैंने अंगुल में बहुत बार देखा है। बच्चे को स्कूल से लेने जाती हैं तब..
फिर उसने कहा- आप लोगों को देखा तो बस यूँ ही सोचा कि पूछ लूँ कि घूमने आए होंगे!
यह कह कर उसने हम लोगों को अपने परिवार से मिलाया। फिर कुछ देर जान-पहचान की बातें हुईं और हम लोगों ने वापस अपने घर आने के लिए ट्रेन पकड़ ली।
मुझे ऐसा लगा जैसे आम मुलाकात होती है लोगों की राह चलते वैसी ही होगी, पर कहते है कि अगर नदी में बाढ़ आई है तो कहीं न कहीं बारिश हुई होगी।
मतलब कि हर चीज़ के पीछे कोई न कोई कारण होता है, हमारी मुलाकात भी बेवजह नहीं थी, इसका भी कारण था जो मुझे बाद में पता चला।
अगले दिन हम घर पहुँच गए।
मेरे पति का तबादला तो हो चुका था, पर हम इतनी जल्दी नहीं जा सकते थे क्योंकि दिसम्बर का महीना था और मार्च के शुरू में मेरे बच्चे का इम्तिहान शुरू होने वाला था।
इसलिए पति ने फैसला लिया कि उसके इम्तिहान के बाद ही हम यहाँ से जायेंगे ताकि नई जगह में जाकर बच्चे की पढ़ाई के लिए फिर से उसी क्लास में दाखिला न लेना पड़े।
इसलिए पति ने मुझे और बच्चों को यहीं छोड़ दिया और खुद रांची चले गए और हर हफ्ते छुट्टी में आने का फैसला किया।
पुरी से वापस लौटने के दो दिन बाद पति जाने वाले थे सो मैंने उनका सारा सामान बाँध दिया और रात को वो चले गए।
उसी रात अमर ने मुझे फोन किया और मेरा हाल-चाल पूछा। उससे बातें किए एक हफ्ता हो चुका था तो काफी देर तक हम बातें करते रहे।
उसने बताया कि उसकी बीवी की तबियत बहुत ख़राब है, सो अभी उसे महीने में हर बार आना जाना पड़ेगा। मैंने भी सोचा कि हाँ.. अब यहीं तक का साथ लिखा था हमारे नसीब में, सो उसे अपने दिल से निकालने की सोचने लगी क्योंकि जितना याद करती उतना ही दुःख होता। एक लम्बे समय तक किसी के साथ  समय गुजार लेना कुछ कम नहीं होता।
खैर… मैं अगले दिन अपने बच्चे को लाने स्कूल गई।
ये मेरा दूसरा वाला बच्चा था। बड़े बेटे को लाने और ले जाने की अब जरुरत नहीं होती थी।
मैं जब उसे लेकर आ रही थी, तभी किसी ने मुझे आवाज दी। मैंने पलट कर देखा तो ये वही आदमी था जो हमें पुरी में मिला था।
मैंने कभी सोचा नही था कि इस आदमी से दुबारा मुलाकात होगी। पर किस्मत का खेल ही ऐसा होता है कि कब किससे मिला दे और कब किससे जुदा कर दे।
उसने मेरे पास आकर ‘सलाम’ कहा, फिर बताया कि वो हमारे पास के मोहल्ले से कुछ दूर ही रहता है। हम साथ बात करते हुए चलने लगे। फिर वो एक गली की तरफ मुड़ गया और हमें अलविदा कह चला गया।
उसने बातचीत के दौरान बताया कि उसका नाम मुर्तुजा अंसारी है, उसकी बीवी का नाम फरजाना है और 3 बच्चे हैं। उसकी बीवी की उम्र कुछ ज्यादा नहीं थी। महज 25 साल थी और बच्चों में भी कोई खास फर्क नहीं बस एक साल का था।
अगले दिन हम फिर मिले और बातें करते हुए जाने लगे।
तभी मैंने पूछा- आप अपनी दुकान छोड़ अपने बच्चों को लेने आते हैं, अपनी बीवी को क्यों नहीं भेजते?
तब उसने कहा- मेरी बीवी पढ़ी-लिखी नहीं है और मुस्लिम संस्कार में पली-बढ़ी है सो ज्यादा घर से बाहर नहीं निकलना पसंद करती..
मैंने कहा- इस जमाने में भी ऐसी है वो!
तब उसने कहा- क्या करूँ बदलने की कोशिश करता हूँ पर बदलती नहीं और ज्यादा जोर देने पर माँ-बाप से कह देती है इसलिए खुद ही सब कुछ करता हूँ।
तब मैंने पूछा- आप कितने पढ़े-लिखे हैं?
उसने जवाब दिया- जी एम.ए. किया है इंग्लिश में!
मैंने कहा- फिर अनपढ़ लड़की से शादी क्यों की?
उसने जवाब दिया, जी शादी तो घरवालों ने करा दी और हमारे यहाँ तो शादियाँ नजदीक के रिश्तेदारों में ही हो जाती हैं।
मैंने कहा- फिर भी आपको तो सोचना चाहिए था कि अपने बच्चों का एक पढ़ी-लिखी औरत जैसा ख्याल रख सकती है वैसा एक अनपढ़ औरत नहीं रख सकती है!
तब उसने कहा- जी पढ़ी-लिखी तो है, पर सिर्फ उर्दू!
फिर मैंने कहा- आपने इतनी जल्दी-जल्दी बच्चे क्यों किए? क्या जल्दबाजी थी?
उसने हँसते हुए कहा- अब क्या कहूँ, रहने दीजिए!
मेरी अंतहीन प्यास की कहानी जारी है।
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