गलती की सज़ा में मज़ा-1

(Galti Ki Saja Me Maza-1)

यह कहानी निम्न शृंखला का एक भाग है:

मेरा नाम पूजा है।
कुछ दिनों पहले ही मैंने अन्तर्वासना डॉट कॉम के बारे में सुना और कुछ कहानियाँ पढ़ी भी !
मैं भी आपके साथ मेरा साथ कई सालों पहले घटी एक घटना के बारे में बताना चाहती हूँ।
यह एक सच्ची घटना है जिसमें मेरी एक गलती के कारण मेरी जिंदगी ही बदल गई।
उस दिन मुझे पता चला कि अनचाहा सेक्स क्या होता है, कैसे आपके अपने रिश्तेदार आपके जिस्म से खेलते हैं।
उस दिन मुझे मेरे एक नजदीकी रिश्तेदार से यह गहरा लेकिन यादगार आनन्ददायक जख्म मिला।
मैं अब आपको इस बारे में पूरी बात बताती हूँ।
मैं राजस्थान के एक जिले की रहने वाली हूँ। मैं एक पतिव्रता औरत हूँ, मेरा कभी किसी और मर्द के साथ कोई चक्कर या सम्बन्ध नहीं रहा।
घर वालों ने 18 साल की उम्र में ही मेरी शादी करवा दी थी।
मेरे घर में पति, सास-ससुर, देवर और दो बच्चे हैं।
मेरी ननद की शादी हो चुकी है और उसे भी एक बच्चा है। ननद भी हमारे ही शहर में रहती है। ननदोई जी खुद का काम करते हैं।
एक बार मैंने अपनी बहन को खुद के जेवरों में से कुछ जेवर दे दिए थे और उनका नाम अपनी सास पर लगा दिया कि मैंने उनको दिए थे और उन्होंने खो दिए होंगे।
हमारे घर में इस बात का काफी बवाल रहा था पर समय के साथ बात आई गई हो गई थी।
पर पता नहीं कहाँ से, कैसे एक दिन ननदोई जी को यह बात पता लग गई कि मैंने वो जेवर अपनी बहन को दे दिए थे।
ननदोई जी ने यह बात मुझे बताई तो मैं डर गई क्योंकि अगर यह बात मेरे पति को या घर वालों की पता चल जाती तो वो तो मुझे घर से बाहर ही निकल देते।
मैंने उनसे गुहार लगाई कि वो यह बात किसी को न बतायें।
उन्होंने कहा- इस बात को छुपाने में मेरा क्या फायदा हो सकता है। मैंने कहा- मेरे पास अभी तो कुछ नहीं है मगर मैं बाद में आपको जो चाहिए वो दे दूँगी।
इस पर वो मान गए और किसी को नहीं बताया।
इन बातों को कुछ महीने बीत गए और ननदोई जी ने किसी को नहीं बताया तो मैं थोड़ी निश्चिंत हो गई पर मन में डर तो लगा ही रहा।
इन्हीं दिनों हमारे रिश्तेदारी में एक शादी होनी थी और उसमें हम सभी को और ननद और ननदोई जी को भी जाना था।
शादी की खरीददारी के लिए सबने तय किया कि बाजार एक साथ चलेंगे।
रविवार का दिन जाने के लिए तय हुआ।
रविवार सुबह ननद का फोन आया कि ननदोई जी मार्किट नहीं जा सकेंगे, वो आराम करना चाहते हैं।
तो मेरे ससुर ने कहा- जंवाई जी यही यहाँ आकर आराम करें, तुम्हे छोड़ भी देंगे और घर और बच्चों की देखभाल भी हो जाएगी।
दोपहर 12 बजे के करीब वो आ गये और हम सब जाने को तैयार होने लगे।
इतने में ननदोई जी मेरे पास आए और कहा- आज तुम मार्किट नहीं जाओगी, बहाने से मना कर दो वरना मैं जेवर वाली बात सब को शाम को बता दूँगा।
मैं डर गई और सिरदर्द का बहाना बना कर घर पर ही रुक गई।
बच्चों को छोड़ कर सब दोपहर दो बजे तक मार्किट चले गए।
तीनों बच्चे हॉल में खेल रहे थे। मैं और ननदोई जी हॉल में सोफे पर बैठे थे।
ननदोई जी मेरे पास आकर बोले- तुम बगल वाले कमरे में जाकर मेरा इंतजार करो।
मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था, मैं बगल वाले कमरे में जाकर उनका इंतजार करने लगी।
करीब दस मिनट बाद वो आये और कहने लगे- भाभी, आपने कहा था कि मुझे जो चाहिए वो आप मुझे देंगी।
मैंने कहा- हाँ कहा तो था, पर आपको क्या चाहिए?
मैंने डरते हुए पूछा और कहा- मेरे पास अभी तो कुछ नहीं है।
ननदोई जी- आपके पास तो देने के लिए बहुत कुछ है।
मैं- मेरे पास क्या है? मैं समझी नहीं !
हालाँकि मैं समझ गई थी कि वो क्या चाहते हैं पर मैंने टालने के लिए ऐसा कह दिया।
ननदोई जी- मुझे आप चाहिएँ !
मैं- क्या मतलब?
ननदोई जी- मतलब यह कि इस बेड पर मैं आपके साथ सोना चाहता हूँ।
मैं बुरी तरह से डर गई और रोते हुए उनसे कहा- ऐसा मत करो, किसी को पता चला तो मेरा क्या होगा !
ननदोई जी- किसी को पता नहीं चलेगा। जब जेवर वाली बात किसी को पता नहीं चली तो यह कैसे पता चलेगी?
पर मैं मानने को तैयार ही नहीं थी।
काफी देर तक मनाने के बाद भी जब मैं उनके साथ सेक्स के लिए राजी नहीं हुई तो उन्होंने मुझे बेड पर पटक दिया और मेरे ऊपर चढ़ गए।
ननदोई जी- अगर चिल्लाने की कोशिश की तो अब सबको पता लग जायेगा और सारी बात खुल जाएगी।
मेरे बच्चे बगल में हॉल में खेल रहे थे, इस कारण मैं चिल्ला भी नहीं सकती थी, बस चुपचाप उनका निर्जीव सा विरोध कर रही थी क्योंकि मैं जानतैइ थी कि मेरी करनी मेरे सामने आ रही है, आज तो मुझे ननदोई जी के नीचे आना ही है।
मैं अपने हाथ पैर चला कर उन्हें मुझ से दूर करने की कोशिश करने लगी।
मैं जानती थी कि ये सब बेकार ही जायेगा क्योंकि ननदोई जी एक ताकतवर मर्द हैं, मेरी ननद रानी पहले ही उनकी ताकत के किस्से मुझे सुना चुकी थी।
मुझे सोच कर रोमांच भी हो रहा था कि पता नहीं इतना बांका मर्द मुझे कित्ना मज़ा देगा चोद कर ! मानसिक रूप से मैं चुदने के लिए तैयार हो चुकी थी पर विरोध तो जारी था।
ननदोई जी एक हाथ से मेरे दोनों हाथ पकड़े और दूसरे हाथ से मेरी साड़ी को ऊपर कर दिया।
साड़ी को ऊपर करके उन्होंने मेरी पैंटी को नीचे सरका दिया। पैंटी को नीचे सरकते ही उन्होंने अपना एक पांव उस पैंटी पर रख कर उसे नीचे करने लगे। यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं !
मेरे पैर मारने से उनका यह काम आसान हो गया और मेरी पैंटी नीचे हो गई और मेरे एक पैर से निकल गई।
अब मेरे दोनों पैर आजाद हो गए और ननदोई जी का काम मेरी गलती से आसान हो गया।
मैं अब भी खुद को बचने की पूरी कोशिश कर रही थी।
मैं अब थक चुकी थी पर कोशिश कर रही थी।
पैंटी के उतरते ही बिना समय गंवाए ननदोई जी मेरे ऊपर आकर मेरी टाँगों के बीच में लेट गए।
ननदोई जी फिर एक हाथ से मेरे दोनों हाथ पकड़े और दूसरे हाथ से अपनी पैंट और अंडरवियर उतारने लगे।
मैं डर गई और उनसे रोते हुए उनसे छोड़ने के लिए कहने लगी पर वो कहाँ मनाने वाले थे।
ननदोई जी- इस काम के लिए इतने दिन इंतजार किया और तुम कहती हो को छोड़ दूँ?
अब तक उनकी पैंट और अंडरवियर उतर चुकी थी। वो थोड़ा ऊपर उठ कर मेरी चूत पर अपने लौड़े से निशाना लगाना चाहते थे।
और निशाना लगा भी दिया।
उनका लंड…

कहानी जारी रहेगी !

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