जीजू संग खेली होली-1

प्रेषिका : कामिनी सक्सेना

मेरी उम्र 26 साल की हो गई, पर अभी तक मेरे लिये कोई भी लड़का पापा ने नहीं देखा। वो इस बात को समझने के लिये तैयार ही नहीं हैं कि अब मैं अब बड़ी हो गई हूँ और मेरी चूत में भी खुजली होती है। मेरी बहन की तो 22 वर्ष में ही शादी कर दी थी, वो मुझसे दो साल बड़ी है। उसका नाम चन्दा है और जीजू का नाम प्रकाश है। रात को मैं अक्सर अपने कमरे में वासना से वशीभूत होकर करवटें बदलती रहती हूँ और अपनी चूंचियों और चूत को मसल कर, नोच कर पानी निकाल लेती हूँ। हाय कोई मेरी भरी जवानी में मुझे चोदता, मेरी प्यास बुझा देता ! सपने में भी मुझे मोटे-मोटे लण्ड दिखाई देते थे। मेरी नजरे भी अब घर के बाहर अपने दोस्तों की तरफ़ उठने लगी थी। पर किसको अपनी बात बताऊं।

होली का त्योहार आने वाला था। दीदी और जीजू होली पर आने वाले थे। मेरे हाल तो बस यह था कि कोई मर्द होना चाहिये, बस जी भर कर मुझे चुदाई का आनन्द दे जाये। अचानक मुझे जीजू का ख्याल आया कि वो भी तो मुझ पर लाइन मारता है …. वो तो जल्दी पट जायेगा। फिर घर की बात घर में ही रहेगी। ये सोच मुझे सुरक्षित भी लगी, और लगा कि कामयाबी की भी काफ़ी गुंजाईश है।

दीदी और जीजू दो दिन पहले ही आ गये थे। घर में चहल-पहल शुरू हो गई थी। जीजू अपने साथ सभी को नये कपड़े और रंग दिलाने ले गये।

रास्ते में मैंने ही उनसे छेड़छाड़ शुरू कर दी थी। उन्होंने तुरन्त भांप लिया कि मामला आज कुछ अलग सा है, गरम सा है। मुझे पटाने की गरज से और मुझे खुश करने के लिये उन्होंने मेरी पसन्द की तीन-चार ड्रेस दिलवा दी। मैं भी कार में और मार्केट में उन्हें यहाँ-वहाँ छूती रही। उन्होंने तो बस एक बार मुझे इशारा करके जायजा लिया और एक दुकान में मेरा हाथ दबा दिया। मैंने भी वासना की झोंक में उनकी हथेली में बीच में अंगुली को दो बार दबा दी। समझदार को इशारा ही काफ़ी था। अब हम नजरों से बात करने में लगे थे। बात बन चुकी थी और इशारा पाकर अब हम दूर हो गये ताकि दीदी को शक ना हो। मेरा मन तो बाग बाग हो गया। शायद जीजू भी खुश थे, उन्हें अपनी मेहनत रंग लाती दिख रही थी। एक बार तो जीजू दुकान के अन्दर गये तो मैंने कार से ही उनसे मोबाईल पर बात कर ली।

“जीजू ! क्या कर हो ….?”

“साली, मुझे मरवायेगी क्या …. घर पर मिलेंगे….”

“मुझे गाली दी तुमने….”

“साली नहीं है क्या ….”

“जीजू…. मान गये डबल जोक करते हो।”

जीजू ने फोन बंद कर दिया। दीदी और जीजू कार में आ गये थे और हम सभी घर की ओर चल दिए थे। घर पर जीजू ने घर पर मम्मी पापा को सभी चीजें दिखाई। दीदी ने अपने कपड़े रख लिये और जीजू मेरे कपड़े ले कर मेरे कमरे में आ गये। उस समय मैं बाथ रूम में थी। वो कपड़े वहीं रख कर सीधे बाथरूम में आ गये। एक कोने में दीवार के सहारे उन्होंने मुझे अचानक ही घेर लिया। मैं कुछ समझती, उसके पहले ही उन्होंने मुझे अंधेरे कोने में खींच लिया और मेरे स्तन धीरे से दबा दिये, उन्हें सहलाने लगे। मेरे शरीर में जैसे बिजलियाँ कौंधने लगी। ये अप्रत्याशित आक्रमण जैसा था।

“जीजू ये क्या …. कोई देख लेगा !”

“श …. श …. एक बार तो मजे ले लूँ …. “

“अरे …. हाय मेरे चूतड़ …. बस करो ना …. मत दबाओ !”

“मस्त चीज़ हो तुम तो …. ऐ, कल मौका निकालते हैं….”

और वो तेजी से बाहर निकल आये। मेरे कुर्ते पर सीने पर कपड़े में सिलवटें पड़ गई थी। मेरे चूतड़ पर भी क्रीज खराब हो गई थी। मैंने उन्हें जैसे-तैसे हाथ से ठीक किया और शर्माई सी बाथरूम से बाहर आ गई। जीजू जा चुके थे। मैं खुशी के मारे उछल पड़ी…. और ठुमके लगा कर नाचने लगी। मेरा दिल बल्लियों उछल रहा था, मेरा काम सच में पूरा हो गया था। ऊपरवाले ने इतनी जल्दी सुन ली, यकीन ही नहीं हुआ। रात भर मैं उनके सपनो में खोई रही और समापन किया एक जोरदार मुठ मार कर पानी निकालने के साथ। अब मैं सोच रही थी अगले दिन कैसे मौका फ़िट किया जाये, एक तो होली का त्योहार, फिर इतनी चहल पहल, और भी लोग तो आयेंगे। जाने कैसे मौका मिलेगा।

पर भगवान ने अगले दिन क्या, तीन चार दिनों का सुनहरा मौका दिया।

अगले दिन मेरी खास सहेली नीतू दिन को मेरे से मिलने आई। मैंने उसे अपने दिल की बात उसे बताई। वो सोच में पड़ गई, फिर बोली,”मेरा घर फिलहाल खाली पड़ा है …. तू चाहे तो वहाँ जीजू के साथ होली खेल लेना !”

“पर लोग क्या सोचेंगे ….” मैंने शंका जताई। घर में तो बस मैं ओर जीजू ही होंगे ना।

“तो मेरा टेक्स दे देना …. मैं सब सम्भाल लूंगी …. ” नीतू के स्वर में वासना जाग उठी।

“टेक्स, क्या मतलब …. क्या पैसे लेगी …. अभी दे दूँ क्या ?” मैं चहक उठी।

“नहीं रे पैसे नहीं…. बस मेरा भी नम्बर लगा देना ना, मैं भी होली मना लूंगी !” नीतू ने मुझे शंकित नजरों से देखा।

“ओह …. चुदना है क्या ….” वो शर्मा गई।

मैंने उसे चूम लिया।

मैंने जीजू को फोन लगाया और उसे बताया कि नीतू के घर आ जाना …. वहीं हम दोनों होली खेलेंगे। जल्दी आना…. हम दोनों जा रही हैं।

हम दोनों स्कूटी पर रवाना हो गई। उसका घर काफ़ी बड़ा था। नीतू के घर वाले दक्षिण भारत से थे सो वे केरल गये हुये थे। घर में बहुत से कमरे थे। मैंने वहाँ पहुँचते ही सबसे पहले अपनी ब्रा निकाल दी और अपनी पेण्टी भी हटा दी। नीतू की छोटी सी स्कर्ट और एक छोटा सा टॉप पहन लिया।

“तू तो चुदने के लिये एक दम तैयार है !”

“नहीं, आज तो बस आगाज है …. हम दोनों बस मजे करेंगे…. !”

“क्या मतलब …. पर मुझे तो चुदना है ना”

“देख जितनी बेताबी बढ़ायेंगे, फिर चुदने में उतना ही मजा आयेगा।”

“बड़ी सयानी हो गई है रे तू तो….?”

तभी घर के बाहर टू सीटर रुका और जीजू उतरे। नीतू ने तुरन्त दरवाजा खोला।

“नेहा है क्या….?” जीजू ने ने यहाँ-वहाँ देखते हुये पूछा।

नीतू मुस्कराई …. और दरवाजा खोल दिया।

“नेहा, देखो तो कौन आया है ?”

“हाय ! मेरे जीजू …. स्वागत है आपका, नीतू ये मेरे जीजू है, जीजू ये नीतू है !”

“हाय नीतू ….” उसने फिर मुझे ऊपर से नीचे तक देखा “नेहा, आज तो कयामत लग रही हो !”

हम तीनों नीतू के बेडरूम में आ गये।

“जीजू, चाय पियोगे ….?” नीतू ने जाने का बहाना ढूंढ लिया था।

“जरूर नीतू जी….”

जैसे वो गई। मेरी नजरे शर्म से नीची झुक गई। जीजू यहाँ क्या करने आये थे । ये वो भी जानते थे। वो धीरे से मेरे पास आये और मुझे बाहों में समेट लिया।

“अरे ये क्या, ब्रा नहीं पहनी….”

“उसकी क्या जरूरत थी, वो तो आप उतार ही देते ना….!” मैंने अपनी बड़ी बड़ी आंखें उठा कर उनकी तरफ़ देखा। जीजू हंस पड़े….। फिर जैसे ही उनका हाथ मेरे चूतड़ों पर गया ….

” क्या चड्डी भी उतार दी है…. ओह, यू आर वेरी सेक्सी !”

जीजू ने स्कर्ट ऊपर उठा कर मेरे नंगे चूतड़ सहला दिये। यहां कोई भी रोकने टोकने टोकने वाला नहीं था। मैंने अपनी दोनों बाहें उनके गले में डाल दी और उनसे चिपकने लगी। उनके अधर मेरे अधरों से मिल गये और उनके हाथ मेरा स्कर्ट ऊपर तक उठा कर मेरे चूतड़ और नंगी कमर सहलाने लगे।

“कैसा लग रहा है नेहा….?”

मेरा शरीर तो जैसे वीणा के तारों जैसा झनझना रहा था। पूरे शरीर में जैसे तरंगें उठने लगी थी।

“मैं तो कब से तड़प रही थी आपके लिये …. इस सुख के लिये !” मेरे मुख से जैसे सच्चाई निकल पड़ी।

उनके हाथ अब मेरी भरी हुई और उभरी हुई गुदाज़ चूंचियों पर आ गए थे। उत्तेजना के मारे मेरे स्तन कड़े हो गये थे और निपल कड़क हो कर फ़ूल गये थे। मुझे बहुत मजा आ रहा था। मेरी दिल की इच्छा पूरी हो रही थी। मेरे नंगे उभार जीजू मसल रहे थे। इतने में नीतू चाय ले कर आ गई।

“बस अब रुको, अब हम एक छोटा ब्रेक लेंगे …. तब हम सब चाय पियेंगे।”

जीजू ने नीतू को देखा और शरमा से गये,”नीतू, तुमने हमें ऐसी हालत में देख लिया …. प्लीज किसी को कहना मत !”

“जीजा जी, खुले आम आप नेहा को दबा रहे है …. ये भी कोई बात है …. और फिर यहां कोई और भी तो है…. लो चाय पियो…. बाप रे इतनी बेशर्मी ?” नीतू ने इठला कर कहा।

हम तीनों सोफ़े पर बैठ गये और चाय पीने लगे।

तभी नीतू ने कहा,”ये देखो, ये है तेल की शीशी, जीजा जी रख लो, अभी काम में आयेगी।”

“धत्त नीतू, कुछ ज्यादा ही मजाक हो रहा है….” मेरी नजरें तेल की शीशी देख कर नीचे झुक गई।

“अरे हां, ये भी रख लो, कण्डोम है …. बहुत काम का है…. ” उसने कण्डोम का बड़ा पैकेट जीजू को थमा दिया और खिलखिला कर हंस दी। जीजू ने पास बैठी नीतू को दबोच लिया …. और उसकी जांघों को चूत के पास से दबा दिया, “तू तो और भी मस्त चीज है …. ये सब तेरे लिए काम में लूंगा।”

“आह …. जीजा जी, मजा आ गया, जरा मस्ती से दबाओ….” नीतू आनन्द से भर गई।

“नेहा, जरा इसे सम्भालना …. इसे बिस्तर पर ले चल ….” जीजू का लण्ड भी महौल देख कर फ़ड़फ़ड़ा उठा था, गरम हो गया था।

“जीजू, जरा रुको, ऐसी जल्दी भी क्या है, हम कोई भागे थोड़े ही जा रहे हैं, नीतू का मजा तो मैंने भी नहीं लिया है।” मैंने नीतू को उठा कर खड़ा कर दिया।

“नेहा, जीजू को मजा लेने दे ना !” नीतू वासना से भरी हुई थी।

“चल आराम से कपड़े उतार ले….” मैंने नीतू को आंख मारते हुये कहा।

हम दोनों ने अपने पूरे कपड़े उतार दिये। जीजू ये देख कर तड़प उठा, उसने भी अपने कपड़े उतार दिये। नीतू मुझे देख कर हंस दी…. जीजू को यूं छटपटाते देख कर हम दोनों बहुत खुश हो रही थी। मैंने नीतू को बिस्तर पर लेटा दिया।

“नीतू, पहले तू मजे ले, तू मेरे से छोटी है और ये तेरा पहला मौका है !”

“पहला होगा तेरा, मैं तो दो तीन बार लण्ड ले चुकी हूँ !” नीतू ने अपनी पोल खोल दी। जीजू हंस पड़े। जीजू उसके शरीर को सहलाने लगा। नीतू आनन्द के मारे सिहर उठी। तेल लगा कर हौले से मलने से उसके स्तन कठोर हो गये …. चुचूक भी तन उठे। जीजू भी हाथ से नीतू की मुनिया सहलाने लगे। उसने अपनी चूत ऊपर उठा दी…. मैं समझ गई थी कि जीजू वर्जित क्षेत्र में पहुँच चुके हैं।

“जीजू ये लो तेल, वो एरिया आपका है …. इसे मस्त कर दो ….”

जीजू का लण्ड तन्ना उठा। मुझे वो तन्नाता हुआ कठोर लण्ड बड़ा मोहक लगा। मैंने जीजू का लण्ड पकड़ लिया। हाय राम ! कितना गरम था। मैंने चमड़ी नीचे खींच दी, लाल टोपी वाला मर्द फ़ड़फ़ड़ा उठा। होली के रंग की तरह उसे मैंने तेल से रंग दिया। उसकी चमक बढ़ गई। मेरा तेल भरा हाथ उसके लण्ड पर ऊपर नीचे चलने लगा। उसके मुख से सीत्कार निकल गई। उधर नीतू अपनी टांगें ऊपर उठा कर चुदने के लिये बेताब हो रही थी। मैंने जीजू का लण्ड छोड़ दिया और नीतू पर अपना ध्यान केन्द्रित कर दिया। उसके निपलों को धीरे धीरे मलने लगी। जीजू अब तेल उसकी गाण्ड में लगा रहे थे। उन्होने अपनी एक अंगुली उसकी गाण्ड के छेद में दबा दी और हल्के से अन्दर प्रवेश करा दी। दो तीन बार तेल ले कर वो अपनी अंगुली अन्दर बाहर करने लगे। उसकी गाण्ड तेल से अन्दर तक रवां हो कर चिकनी हो गई। अब नीतू को इसमें बहुत मजा आने लगा था। वो जैसे आनन्द के मारे तड़प उठी, उसकी सिसकारियाँ जोर-जोर से निकलने लगी। तभी वो झड़ गई…. पर शान्ति से करवाती रही।

मैंने जानते हुये भी उसे धीरे से कहा ….”चुप से पड़ी रह …. मजा आ रहा है ना …. और मजे ले ले …. होली पर चुदाई का श्रीगणेश करेंगे !”

“पर बिना लण्ड के तो मैं मर जाऊंगी …. बस एक बार लण्ड खिला दे !”

“जीजू को घास मत डाल, वरना भाव खायेगा …. उसे भी तो तड़पने दे जरा….”

“ओह …. नेहा, तू बड़ी जालिम है….”

अचानक जीजू की अंगुली मेरी गाण्ड के आस-पास चलने लगी। मुझे झुरझुरी सी लगी…. और मैं सिहर गई। नीतू ने मुझे देखा तो वो उठ कर बैठ गई और अपने पावों पर मुझे लेटने को कहा। वो अपने पांव बिस्तर पर लंबे करके बैठ गई और मैं अपनी गाण्ड उसकी जांघों पर रख कर उल्टी लेट गई। जीजू मेरी गान्ड के छेद में तेल लगा कर अंगुली दबा कर घुसाने लगे।

आह, सच में, नीतू ने इसीलिये पानी छोड़ दिया था। उसकी अंगुली छेद में घुस घुस कर मुझे असीम आनन्द दे रही थी। जीजू मेरी पनियाती चूत में भी हाथ से गुदगुदी कर रहे थे। तभी उनकी अंगुलियों ने मेरी काम-कलिका को छेड़ दिया। मेरे मुख से आनन्द भरी चीख सी निकल गई। मेरे कठोर स्तन नीतू घुमा घुमा कर दबा रही थी। मेरी तो जान निकली जा रही थी। मेरा दिल लण्ड को चूत में भर लेने को कर रहा था। मन कर रहा था कि रसीली चूत में उसका लण्ड घुसा कर जोर से चुदा लूँ …. हाय रे ….

कैसे इन्तज़ार होगा अब होली तक। मेरी मार दे रे …. हाय मेरी मां । दोनों बेरहमी से मेरे नाजुक अंगो को मसले जा रहे थे। बची हुई कसर गाण्ड में घुसी हुई अंगुली कर रही थी। तभी जैसे मेरी जान निकल गई। मेरा रज छूट गया। हल्की गुलाबी ठण्डक में भी मेरा पसीना चूने लगा था।

अब हमने जीजू का नम्बर लगा दिया। उसे हमने लिटाया नहीं बल्कि खड़े हो कर मेज़ के सहारे थोड़ा सा झुका दिया था। हम दोनों के लिये ये आसान था कि हम उसे अगाड़ी और पिछाड़ी दोनों ओर से आनन्दित कर सकें। नीतू ने जीजू की पिछाड़ी पकड़ ली और मुझे मौका मिला उसके मस्ताने लण्ड का मजा लेने का। हमने जीजू की टांगे फ़ैला दी और उनके चूतड़ों की गहराई का मुआयना करने लगे। वाकई उनके चूतड़ सुडौल और सुन्दर थे। एक दम कसे हुये, चुस्त और अन्दर गहराई लिये हुए। हम दोनों उसे सहलाते रहे। जीजू पर तरावट चढ़ने लगी। उनका लण्ड कूद कर 120 डिग्री पर आ गया। सुन्दर सा लम्बा और मोटा लण्ड हमें अहसास दिला रहा था कि जब वो अन्दर घुसेगा तो हमारा फिर क्या होगा।

नीतू ने जीजू के चूतड़ों को थपथपाया और तेल उसके चूतड़ों पर मल दिया। फिर उसके गोलों को चीर कर उसके छेद को घिस दिया। और तेल भरी अंगुली अन्दर उतरती चली गई। जीजू ने आनन्द से अपना सर ऊपर उठा कर आह भरी। मैंने उसका लण्ड थाम लिया और उसके लाल सुपाड़े को नरम हाथों से सहलाने लगी। उसके डन्डे को हाथों में कस कर धीरे धीरे पीछे खींचने लगी। उसके सुपाड़े का मुँह थोड़ा सा खुल गया। उसकी लाल छोटी सी लकीर का छेद खुल गया था। उसमे दो प्रेम रस की दो बूंदें बाहर निकल पड़ी। मैंने सुपाड़े को अपने मुख के द्वार पर रख लिया और अपनी लम्बी सी जीभ निकाल कर वो बूंदें चाट ली…. चूतड़ों के बीच नीतू की अंगुली लहरा रही थी और लण्ड धीरे धीरे कुत्ते की तरह हिल कर मेरे मुख मण्डल की आभा बढ़ाने लगा। उसका लण्ड मेरे मुख में घुस कर आनन्दित हो रहा था। उसकी झूलती हुई गोलियां मेरे हाथों में खेलने लगी। उसके गोलियों को मैं हौले हौले से मसल कर खींचने लगी। उसकी गोलियां को मैं गड़प से मुख में लेकर चूसने भी लगती थी। उसके लण्ड का डण्डा मेरे हाथों में कसा हुआ था जो धीरे धीरे आगे पीछे चल रहा था। सब मिला कर जीजू जैसे छटपटा उठा। आनन्द भरा लुत्फ़ उसे पागल सा किये दे रहा था।

“आह्ह्ह्…. उफ़्फ़्फ़्फ़्…. चुदा लो रे मेरी गोपियो ! …. मेरा लण्ड ले लो रे….” जीजू जैसे कराह उठा।

“कान्हा के संग तो होली कल खेलेंगे …. तैयार रहना कन्हैया जी….”

“देखना, होली को मैं तुम दोनों को कैसा फ़ोड़ता हूँ …. याद करोगी…. बड़ी चली हो गोपियां बनने !”

“जीजू, कैसा लग रहा है …. देखो तो लण्ड कैसा मचल रहा है …. अब माल निकाल भी दो, मेरे कान्हा….”

“हाय…. अरे मैं तो गया …. मेरा माल निकला …. दूर हट जाओ, नेहा …. हट जा….”

जैसे वो चीख सा पड़ा…. पर मैंने उसे छोड़ा नहीं, और ही कस कर मुठ मारने लगी।

“अरे निकलने वाला है …. नेहा हटो तो….”

वो कुछ और कहता, उसका वीर्य निकल पड़ा…. और उसके निकलने की तीव्रता मैं अपने के अन्दर महसूस करने लगी। मैं वीर्य का स्वाद ले लेकर उसे पीने लगी।

“ऐ नेहा …. छीः ये क्या कर रही है ….” नीतू ने देख कर मुँह बिगाड़ लिया।

मैंने अपनी बड़ी बड़ी आंखों से जीजू को मुस्कराते हुये देखा और उसके लण्ड को कस के चूस कर साफ़ कर दिया।

“नीतू …. कल तू इस माल क स्वाद लेना …. मजा आयेगा।”

“चल झूठी …. इसमें क्या मजा …. मुझे तो मितली आ रही है।”

जीजू सीधे खड़ा हो कर गहरी सांसे भर रहा था।

“तुम दोनों ने मुझे खूब तड़पाया, मुझे बेवकूफ़ बनाया” जीजू ने शिकायत की।

“नहीं जीजू, बस आरम्भ तो ऐसे ही करना चहिये ना …. जो सुहानी तड़पन इस में है, दिल को तड़पा जाती है …. उसमे अन्दर तक सुख मिलता है, ये सुख दो क्षण का नहीं…. बहुत लम्बे समय का होता है…. समझे !”

हम सब अब अपने आप को ठीक करके जाने की तैयारी करने लगे।

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