एक नारी होने की व्यथा कथा-1

(Ek Nari Hone Ki Vytha Katha- Part 1)

सभी पाठकों को नमस्कार!
दोस्तो, आप लोगों ने मेरी कई कहानियाँ पढ़ी और सराहा भी, मुझे ढेरों ईमेल मिले जिसके लिए मैं आप सभी लोगों का आभारी हूँ और सहृदय धन्यवाद करना चाहता हूँ।
एक लेखक को क्या चाहिए, उसके प्रशंसक और उनका ढेर सारा प्यार… जो मुझे आप लोगों से भरपूर मिला है।

मैं विंश शांडिल्य फिर एक बार अपनी एक नई कहानी को लेकर आपके समक्ष प्रस्तुत हूँ और इसमे जैसा मुझे प्रतीत हुआ बिल्कुल वैसा ही लिखने की कोशिश कर रहा हूँ, आशा करता हूँ कि आप लोगों को मेरी ये कहानी भी उतनी ही पसंद आएगी जितनी मेरी बाकी कहानियाँ भी पसंद आई।

मेरी यह कहानी थोड़ी हट कर है क्योंकि इसमें नारी जीवन की सबसे बड़ी व्यथा का उल्लेख किया गया है। जब इस घटना का अनावरण हुआ तब मुझे एहसास हुआ कि नारी का ऐसा भी एक पहलू है जो सबके सामने आना चाहिए और शायद आप भी इसे जानने के बाद स्तब्ध हो जाएंगे, शायद आप के पास भी शब्द न हो कुछ कहने के लिए। अब मैं आपको भी उस यथार्थ से अवगत कराने की अनुमति चाहूँगा.

नारी के जीवन की कई व्यथाएँ हैं जो उसे समय समय पर विचलित करती रहती हैं, पर उनसे कैसे उभरना है वो नारी को बहुत ही अच्छे से पता होता है. लेकिन इसके अलावा भी उसकी एक सबसे बड़ी व्यथा पर अगर हम ध्यान दें तो वो है उसकी अन्तर्वासना… जिसको शायद हम अनसुना या अनदेखा कर देते हैं और अपनी वासना को पूरा करने के लिए हम उन व्यथाओं को दरकिनार करते हुए नारी को बस एक वासना का साधन समझकर उसके साथ खेलते रहते हैं और फिर भूल जाते हैं कि नारी की भी कुछ इच्छाएँ हैं जिनके पूरा होने पर उसको उसके होने का एहसास होता है।
प्राचीन काल से ही यही रीतियाँ चली आ रही हैं।

जहाँ नारी मात्र एक घर चलाने का और परिवार बढ़ाने का साधन मानी जाती थी और जहाँ प्रतिदिन उसकी इच्छाओं का मर्दन होता था, जो कभी बताया ही नहीं गया।
काम क्रीड़ा का ज्ञान हमें महर्षि वात्स्यायन की पुस्तक कामसूत्र से मिला और उनको जीवंत करने की शिक्षा का उद्गम भी वहीं से हुआ जिसका वृतांत हमें खजुराहो की मूर्तियों से भी प्राप्त होता है।
काम का अर्थ होता है इच्छा का सम्मान और मर्यादाओं की लाज रखते हुए चरम की प्राप्ति अर्थात आत्मा का परमात्मा से मिलन अर्थात स्वयं के होने की अनुभूति। जो आपको आपके होने का एहसास कराती है.
लेकिन ऐसा होता कहाँ है, आज कल तो यह मात्र एक व्यापार रह गया है। जिसमें भावनाओं का व्यापार, इच्छाओं का व्यापार, रिश्तों का व्यापार, पैसे का व्यापार और ऐसे कई व्यापार इसमें निहित हो गए हैं।

नारी का स्पर्श एक ऐसा एहसास है जो सारी परेशानियों को दूर कर देता है लेकिन तब जब उसमें नारी की भी सहमति हो। उसका आलिंगन आपके समक्ष आने वाले हर प्रकार के समस्याओं को इस प्रकार दूर करता है जैसे आपके समक्ष ऐसी कोई समस्या कभी थी ही नहीं, फिर संसर्ग का संदर्भ ही अपने आप में मीठा और सुखद होता है और अगर उसमें नारी की सहमति और संतुष्टि भी मिल जाए तो मानो स्वर्ग की अनुभूति का परिचय दे जाता है, परन्तु हम अपने स्वार्थ में निहित नारी की इच्छाओं का सम्मान तो दूर उसकी कोई अभिलाषा भी है उसे भूल जाते हैं और उसे मात्र एक साधन बना कर उसकी इच्छाओं का हनन करते हैं।

ऐसी ही एक घटना है एक औरत की जो मुझसे आज से एक साल पहले मिली थी।

बारिश का समय था और ऑफिस में ज़्यादा काम आ जाने के कारण मैं लेट हो गया था और घर के लिए निकल रहा था। उस वक्त करीब 11:15 हो रहे थे, मैं जल्दी जल्दी ऑफिस से निकला कि कहीं बारिश शुरू न हो जाए, नहीं तो मैं घर नहीं पहुँच पाऊँगा।
अभी कुछ ही दूर निकला था कि पानी की फुहारें शुरू हो गई लेकिन रुकना अब संभव नहीं था मैंने गाड़ी रोकी अपना सारा सामान एक प्लास्टिक के पैकेट में रखा और चलने लगा।

मैं अपनी ही धुन में चलता चला जा रहा था कि आगे से एक औरत मुझे हाथ दे कर रुकने का संकेत दे रही थी।
पहले तो मैंने सोचा कि रुकना सही नहीं है क्योंकि आजकल ठगी का ये एक साधन मात्र सा हो गया है लेकिन मैंने थोड़ा ध्यान से देखा तो वो शादीशुदा थी और हाथ में दो तीन पैकेट भी पकड़े हुई थी, शायद उसे कोई साधन नहीं मिल रहा होगा घर जाने के लिए!
मैंने सोचा कि रुक कर देखता हूँ कि क्या बात है.

फिर जहाँ वो खड़ी थी उससे थोड़ी ही दूरी पर एक चौक था, मैंने वहाँ जाकर गाड़ी रोक दी और मुड़कर पीछे देखा तो मेरी ही तरफ आ रही थी। मेरे पास आकर उसने बोला- मुझे लिफ्ट मिल सकती है क्या? मुझे कोई ऑटो या रिक्शा नहीं मिल रहा और रात भी बहुत हो गई है तो जहाँ तक कोई साधन नहीं मिल रहा, मुझे वहाँ तक आप छोड़ देंगे प्लीज?
मैंने उसको ऊपर से नीचे तक देखा, दिखने में तो वो शरीफ ही लग रही थी तो मैंने सोचा ‘चलो यार किसी की मदद कर देनी चाहिए और अगर ये गलत नहीं है और मैंने इसे यहाँ छोड़ दिया तो ये भी अच्छा नहीं है। चलो अब जो होगा देखा जाएगा’

और मैंने उसको अपनी मूक सहमति दे दी और गाड़ी पर बैठने का इशारा किया और वो बैठ गई.
मैंने उसको पूछा कि कहाँ तक छोड़ दूँ, तो उसने कहा- जहाँ भी कोई ऑटो दिख जाए, मुझे वहाँ ड्रॉप कर दीजिएगा।
मैंने कहा- ठीक है!

मैं गाड़ी चलाने लगा, वो भी शायद उसी रास्ते में कहीं आगे रहती थी जिस पर मेरा घर था। हम लोग चलते चलते मेरे घर के पास पहुँच गए लेकिन कोई ऑटो नहीं मिला.
मैंने गाड़ी रोकी और कहा- अभी तक तो कोई साधन नहीं मिला और मेरा घर भी आ गया, तो आप कैसे जाएंगी?
उसने कहा- कोई नहीं, आप मुझे यहीं ड्रॉप का दीजिये, मैं यहीं इंतज़ार कर लूँगी।

अभी हम बातें ही कर रहे थे कि अचानक तेज़ बारिश शुरू हो गई तो मैंने कहा- यहाँ कोई ऑटो इस समय नहीं मिलेगा और अगर आप को कोई समस्या न हो तो आप आज रात मेरे घर पर रुक सकती हैं। मेरा घर यहीं बगल में है, सुबह मैं आपको आपके घर छोड़ दूंगा।
उसने कुछ देर कुछ सोचा और हाँ कर दिया और हम तुरंत मेरे घर के लिए निकल गए।

बारिश तेज़ होने के कारण हम पूरे भीग गए थे तो मैंने उसे अपने कमरे के बाथरूम में भेज दिया और अपना एक कुर्ता और तौलिया वही टेबल पर रख दिया और अपने कपड़े लेकर मैं बाहर के बाथरूम में चला गया।
मैं कपड़े बदल कर निकला और किचन में जाकर दो कॉफी बनाई. तब तक वो भी कपड़े बदल कर बाहर आ गई तो मैंने उसे ड्राइंग रूम में बैठने का इशारा किया और थोड़ी ही देर में मैं कॉफी और कुछ नमकीन लेकर वहाँ गया.

हमने कॉफी पी और बैठ कर कुछ बात करने लगे।
उसने बताया कि वो मेरे घर से 22 किलोमिटर दूर रहती है और आज उसके बॉस के घर पार्टी थी तो आज वो लेट हो गई और उसे कोई साधन नहीं मिल रहा था तो वो वही रास्ते पर खड़ी होकर किसी ऑटो का इंतज़ार कर रही थी।

कुछ देर हम चुप बैठे टीवी देखते रहे।
फिर उसने पूछा- आप यहाँ अकेले रहते हो? आप की शादी नहीं हुई?
मैंने कहा- नहीं, अभी मेरी शादी नहीं हुई।
मैंने पूछा- और आपकी?
उसने कहा- मेरी शादी हो चुकी है और पिछले महीने मेरी शादी को 9 साल हुए हैं।

मैंने कहा- लेकिन आपको देखकर नहीं लगता कि आपकी शादी को 9 साल हो गए हैं, ऐसा लगता है जैसे आपकी शादी को 2 या 3 साल हुए होंगे।
उसने कहा- मेरी शादी 19 साल में ही हो गई थी। जब मैंने पढ़ाई खत्म की, तभी मेरे पापा ने मेरी शादी करवा दी। मेरा शादी का मन नहीं था अभी मैं और पढ़ना चाहती थी लेकिन माँ और पापा के ज़िद के सामने मुझे अपनी इछाएँ छोड़नी पड़ी।
मैंने पूछा- तो आप अपने परिवार के साथ रहते हो?
वो पहले तो कुछ देर शांत रही फिर शायद हिम्मत करके बोली- मैं अकेले कमरा किराए पर लेकर रहती हूँ और यहाँ एक कंपनी में जॉब करती हूँ।
मैंने पूछा- और आपके पति? वो कहाँ रहते हैं और क्या करते हैं? वो आप के साथ क्यों नहीं रहते? आप के कितने बच्चे हैं? वो कहाँ रहते हैं?

उसने मेरी तरफ बड़ी ही आश्चर्य और क्षोभ भरी नजरों से देखा, मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने उसे क्या बोल दिया।
उसने कुछ नहीं बोला और शांत रही।
मैंने फिर से उससे वही बात पूछी तो उसने कहा- आपको इससे क्या करना है, आप का एहसान है जो आपने मुझे इस वक़्त रहने की जगह दी, नहीं तो मैं इस बारिश में कहाँ जाती, लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि आप जो भी पूछेंगे मैं आपको बता दूँगी, मेरी इन बातों से आपका कोई मतलब नहीं तो कृपया आप ऐसी बातें न करें।
और वो शांत हो गई।

मुझे बड़ा अजीब सा लगा कि मैंने ऐसा तो कुछ नहीं पूछा था जिससे वो मुझसे ऐसा व्यवहार करे!
खैर मैंने उससे क्षमा मांगी और किचन में जाकर खाना बनाने की तैयारी करने लगा।

कुछ देर में वो भी मेरे पीछे आई और बोली- आप खाना बना लेते हैं क्या?
मैंने कहा- हाँ जब रोज़ खाना ही है तो कब तक मैं होटल और ढाबे के खाने पर ज़िंदा रहूँगा तो सीख लिया, बस काम चलाने भर का बना लेता हूँ।
उसने कहा- ठीक है, फिर आप रहने दीजिये, आज मैं आपके लिए खाना बना देती हूँ।
मैंने कहा- अरे नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है।
उसने कहा- जब आप के एक बार कहने पर मैं आपके घर रुक सकती हूँ तो क्या आप मेरी बात नहीं मानेंगे।

मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था तो मैंने उसे सारे सामान बताए और बाहर आकर टीवी देखने लगा।
कुछ देर बाद उसने मुझे कहा- खाना बन गया है अभी खाना है या कुछ देर बाद?
मैंने कहा- जैसे आप कहें, मैंने तो कुछ देर पहले नाश्ता किया था और अगर आप को भूख लग रही है तो अभी कर लेते हैं।
उसने कहा- नहीं, अभी मुझे भी भूख नहीं है कुछ देर बाद ही खाना खाते हैं।

हम दोनों बाहर बैठ कर टीवी देखने लगे। काफी देर तक चुप रहने के बाद वह बोली- आप जो पूछ रहे थे वो मेरी ज़िंदगी का सबसे कड़वा सच है और मैं हर किसी को इसके बारे में बता कर अपने आपको कमजोर होने का एहसास नहीं करवाना चाहती और अगर यहाँ किसी को पता चल जाए कि मैं अकेली हूँ और मेरी कहानी ऎसी है तो लोग हर तरफ से फायदा उठाने का इरादा बना लेते हैं शायद इसीलिए मुझे उस वक़्त अच्छा नहीं लगा और मैंने आपको कुछ ज़्यादा ही बोल दिया, इसके लिए आप मुझे माफ कर दीजिये।

मैंने कहा- अरे नहीं, ऐसी कोई बात नहीं, सबकी अपनी ज़िंदगी है और अपना ज़िंदगी जीने का तरीका। आप नहीं बताना चाहती तो कोई बात नहीं और सच मानिए मुझे बिल्कुल बुरा नहीं लगा और आप बिल्कुल निश्चिंत रहे, मैं आपका कोई फायदा नहीं उठाने वाला और सुबह होते ही मैं आपको आपके घर छोड़ दूँगा।
उसने कहा- मुझे पता है आप ऐसा कुछ नहीं करेंगे क्योंकि अच्छे और बुरे नीयत वाले लोग एक नज़र में पता चल जाते हैं।
मैंने कहा- ठीक है, फिर चलिये अब खाना खा लेते हैं, फिर बात करते हैं।
उसने कहा- ठीक है।

हम दोनों खाना खाने चल दिये. खाना खाकर मैं बालकनी में चला गया क्योंकि आज मौसम बारिश की वजह से बड़ा ही अच्छा हो रहा था, ठंडी ठंडी हवाएँ चल रही थीं तो मैं वहाँ गया और मैंने एक सिगरेट जलाई और पीने लगा।
अभी मैंने अपनी सिगरेट खत्म ही की थी कि वो पीछे से दो कप कॉफी का लेकर आई।
मैंने कहा- इसकी क्या ज़रूरत थी।

उसने कहा- मुझे आदत है खाने के बाद कॉफी पीने की तो मैंने आप के लिए भी बना ली शायद आपको भी अच्छी लगे।

मैंने उसका धन्यवाद किया और हम बालकनी में खड़े होकर कॉफी पीने लगे।

काफी देर बाहर खड़े रहने के बाद मैंने उससे अंदर चलने के लिए कहा क्योंकि अब मौसम कुछ ज़्यादा ही ठंडा हो रहा था तो हम अंदर आए और बैठ कर टीवी देखने लगे।
कुछ देर बाद उसने पूछा- चाय पियोगे आप?
मैंने कहा- मुझे क्या… मैं तो पी लूँगा।

वो गई और चाय बना कर लाई और हम दोनों चाय पीते पीते बात करने लगे.

फिर उसे ना जाने क्या सूझी कि उसने कहा- मेरी कहानी ऐसी है जिसको याद करके मेरी रूह काँप जाती है और मैं इसको याद नहीं करना चाहती लेकिन आज आपने फिर से उसकी याद दिला दी है और ना जाने क्यों ऐसा लग रहा है जैसे अगर मैं आपको अपनी कहानी बताऊँ तो आप उसे समझेंगे।

मैंने कहा- देखिये ये आपकी ज़िंदगी है और आपको अगर लगता है कि मुझे बताना चाहिए तो मैं पूरी कोशिश करूंगा कि मैं आपके दर्द और भावनाओं को समझ सकूँ।
उसने फिर एक लंबी सांस ली और अपने बारे में बताना शुरू किया:

मेरा नाम माधवी है, मैं उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर से हूँ। मेरे घर में मेरे माँ बाप और हम दो बहनें हैं, मेरी बहन मुझसे छोटी है और हमारा कोई भाई नहीं है।
बात तब की है जब कॉलेज में मैंने एडमिशन लिया था, वहाँ का माहौल बहुत अलग था। वहाँ लोग पढ़ाई से ज़्यादा मौज मस्ती में दिखाई देते थे, करीब करीब हर लड़की और लड़के के बॉयफ्रेंड और गर्लफ्रेंड थे। लेकिन मैं इन सबसे बिल्कुल अलग केवल वहाँ पढ़ने गई थी। मेरा ऐसा कोई शौक नहीं था कि मेरा भी कोई बॉयफ्रेंड हो।

शुरू से ही मेरी सोच थी कि मेरी जिससे शादी होगी, मेरा सब कुछ भी उसी का होगा। वही होगा जो मेरी हर ख़्वाहिशों को पूरा करेगा, मुझे अपने जान से भी ज़्यादा प्यार करेगा, मेरा तन और मन बस उसी के लिए होगा। वो चाहे मुझसे छेड़छाड़ करे या बिस्तर पर पागलों की तरह मुझे प्यार करे। लेकिन जो भी हो वही पहली बार और आखिरी बार होगा।

मैं कॉलेज में दिखने में कोई बहुत खूबसूरत नहीं थी लेकिन कुल मिला कर मेरा व्यक्तित्व आकर्षक था। काफी लड़के भी मेरे पीछे थे और मुझे प्रपोज़ भी कर चुके थे। लेकिन जो मेरी सोच थी, मैं उसी पर अडिग थी।

मेरी पढ़ाई खत्म हुई और अंततः मैंने स्नातक अच्छे नंबरों से पास कर लिया। अब मुझे परास्नातक के लिए जाना था तभी मेरे लिए एक रिश्ता आया और मेरे पिता ने मुझे पढ़ाई बंद करने को कहा तो मैंने इसका विरोध किया लेकिन मेरी एक न चली और मुझे ही हार माननी पड़ी।
लड़का मुझसे 8 साल बड़ा था लेकिन पारिवारिक दबाव में आकर मुझे शादी के लिए हाँ कहना पड़ा। मैंने सोचा चलो अगर यही मेरी किस्मत में है तो कोई बात नहीं… इसी के साथ एक खुशियों भरी ज़िंदगी की शुरुआत करूंगी।

धीरे धीरे मेरी शादी का दिन करीब आ गया और मैं मन ही मन खुश होने लगी कि अब मेरी भी इच्छा पूरी होगी, अब मुझे भी कोई प्यार करने वाला मिलेगा जो मेरा होगा। मैंने भी अब सुनहरे सपने सजाने शुरू कर दिये थे कि वो मुझे ऐसे प्यार करेगा, वैसे मानेगा। मेरे साथ सुहागरात में पहले मुझसे बातें करेगा और मुझे समझेगा और फिर प्यार करेगा.

मैं तो सातवें आसमान पर थी कि पहली बार कोई मेरे बदन को छूएगा। ऐसी कल्पना से ही बस मैं तो सिहर उठती थी।

लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंजूर था।

मेरी शादी का दिन भी आ गया और मेरी शादी भी हो गई, शादी के बाद मैं विदा होकर अपने ससुराल आ गई और काफी थकान और रस्म-ओ-रिवाज के बाद मुझे मेरे कमरे में आराम करने के लिए भेजा गया।

अपने कमरे में पहुँच कर मैंने कपड़े बदले और नहा कर सो गई। थकान के कारण मुझे गहरी नींद आ गई थी और मेरी नींद तब खुली जब मेरी ननद ने मुझे शाम को जगाया।

अब समय जैसे जैसे नजदीक आ रहा था मेरे दिल की धड़कनें बढ़ती जा रही थी, आज पति के साथ पहला मिलन था जब मैं अपने सपने को खुल कर जीने जा रही थी और फिर कुछ ही देर में मेरी ननद ने मुझे तैयार किया और मेरे कमरे में छोड़ आई।

रात के करीब 9:30 बजे दरवाजे पर एक दस्तक हुई तो मेरे दिल की धड़कनें और बढ़ने लगी।

मेरे सहेलियों ने बताया था कि जब पहली बार संसर्ग होता है तो बहुत दर्द होता है। तो मुझे डर भी लग रहा था और रोमांच भी हो रहा था कि कैसे मेरे पति मेरा घूँघट उठाएंगे मेरे चेहरे को अपने हाथों में भरेंगे फिर मुझे अपने होने का एहसास कराएंगे। फिर धीरे धीरे मेरे शरीर से एक एक कर सारे गहने और कपड़े उतरेंगे फिर मुझे अपनी बाँहों में भर कर हौले से बिस्तर पर लिटाएंगे और फिर इस तरह प्यार करेंगे कि मुझे थोड़ा सा भी दर्द का एहसास न हो।
मैं उस वक़्त बिल्कुल फिल्मी दुनिया वाली कल्पनाओं में घूम रही थी।

तभी मेरे पति अंदर आए और आकर बिस्तर पर बैठे। मेरा दिल ज़ोरों से उछल रहा था कि अचानक मेरे पति ने मेरा हाथ पकड़ा और अपनी ओर खींचा. मैं उनके ऊपर जा गिरी और मुझे एक अजीब सी बदबू उनके मुँह से आई।
मेरे पति शराब पी कर आए थे।
मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा था, मैंने चाहा था कि जो भी मेरा हो वो कभी कोई नशा न करे।

खैर मुझे अपने ऊपर खींच कर उन्होंने मेरे होठों पर अपने होंठ रख दिये और बुरी तरह से उनका मर्दन करने लगे। सब कुछ इतना जल्दी हुआ कि मैं समझ नहीं पाई और अगले ही पल मैं एक कैदी की तरह कैद हो चुकी थी, मुझे अब डर लग रहा था कि न जाने आगे क्या हो।

और फिर अचानक ही उन्होंने अपने कपड़े उतारे और मुझे बिस्तर पर धक्का दे दिया, मैं बेसुध बिस्तर पर गिर पड़ी।
फिर वो मेरे ऊपर आए और मेरे साड़ी को ऊपर उठा कर मेरे दोनों पैरों को अलग किया और अपना लिंग मेरे योनि में रगड़ने लगे और जब तक मैं समझ पाती, उन्होंने एक ही झटके में पूरा का पूरा लिंग मेरे योनि में घुसा दिया।
दर्द के मारे मानो मेरी तो जान ही निकल गई, ऐसा लगा जैसे किसी ने जलता हुआ लोहा मेरे अंदर डाल दिया हो।

आज ऐसा लग रहा था जैसे मेरी मर्यादाओं का हनन हो रहा हो, मेरी इच्छाएँ मर रही थी और मेरे ही सामने मेरे सपनों का बलात्कार हो रहा था, यह कोई और आदमी है जो मेरे साथ है। ये मेरा पति नहीं हो सकता।
मैं ये समझ नहीं पा रही थी कि ये मेरी सुहागरात है या मैं अपने ससुराल में नहीं बल्कि किसी कोठे पर किसी की हवस का शिकार हो रही हूँ।

मेरा पति बिना रुके मेरे साथ जानवरों कि तरह बिना किसी दया के संभोग कर रहा था, ऐसा लग रहा था मानो मेरे सपने मेरी आशाएँ सारी आज कुचली जा रही हैं।
मैं बहुत कोशिश कर रही थी कि मैं उस इंसान से अलग हो जाऊ और अपनी अस्मत बचा लूँ, मैं पूरी ज़ोर लगा कर सबको आवाज़ भी दे रही थी लेकिन मानो सभी उस समय या तो बहरे हो गए थे या मर गए थे।

मैंने फिर एक बार कोशिश कि तो मेरे पति ने मुझ पर थप्पड़ों की बारिश कर दी और गंदी गंदी गालियां देने लगे।
अब तो ऐसा लग रहा था कि अगले ही पल मेरी जान निकल जाये। पता नहीं मैं किस घर में आ गई थी कि जहा कोई मेरी चीख़ों को सुन भी नहीं पा रहा। बार बार यही लग रहा था कि कहीं से कोई फरिश्ता आ जाए और मुझे इस राक्षस से बचा ले लेकिन ऐसा बस किताबों और कहानियों में होता है सच में नहीं।

मन मानने को तैयार ही नहीं था कि क्या ये सच में हो रहा है, क्या मैंने यही सोचा था, क्या मैंने यही सपने सजाये थे और इन बातों से अनभिज्ञ मेरा पति हवस का शिकारी बना हुआ था और मैं उसका शिकार!
वो मुझे जैसे चाह रहा था मेरा शरीर नोच रहा था, मुझे गालियां दे रहा था, मार रहा था और मैं कुछ भी नहीं कर पा रही थी. मेरे लिए तो ये सब बिल्कुल ही अजीब था। मैंने तो सपने में भी ऐसा नहीं सोचा था या ये कहूँ कि मेरे सपनों कि दुनिया ही बिल्कुल अलग थी, जहाँ मैं एक राजकुमारी की तरह रहना चाहती थी किसी राजकुमार के साथ।
मेरी ख्वाहिशें बहुत नहीं थी लेकिन जितनी भी थी वो सब उस वक़्त दम तोड़ रहीं थी।

काफी देर तक मेरे साथ हवस का नंगा नाच करने और मुझे नोचने के बाद वो मेरे ऊपर से हटा और बिना एक शब्द बोले दूसरी तरफ मुँह घूमा कर सो गया और मैं बेसुध घंटों तक वैसे ही पड़ी रही।
जब मुझमें थोड़ी जान आई तो मैंने उठने की कोशिश की लेकिन न ही मैं उठ पा रही थी और न ही चल पा रही थी।

कैसे कैसे कर के घिसट के मैं बाथरूम गई और नल खोल कर उसके नीचे बैठ गई, जब मेरे ऊपर पानी कि फुहारें पड़ी तब जा कर थोड़ी शांति मिली।
फिर मैंने जब अपनी नीचे के हिस्से को देखा तो वो पूरा सूज चुका था, ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने वहाँ पर चाकू से छलनी कर दिया है।

मेरी आँखों से आँसू आ गए अपनी हालत को देख कर!

उसके बाद मैं धीरे धीरे चल कर बिस्तर पर आई और बैठ कर देखा तो पूरा बिस्तर भी खून से सना हुआ था मैंने एक दूसरी चादर बिछाई और लेट गई.

लेकिन मुझे नींद कहाँ आ रही थी।
क्या मैंने यही चाहा था भगवान?
मैंने तो तुमसे बस थोड़ी सी खुशियाँ मांगी थी और तुम्हें वो भी देना मुनासिब नहीं लगा।
और सोचते सोचते कब मुझे नींद आ गई पता ही नहीं चला।
सुबह जब मेरी आँख खुली तो मेरे पति अपने काम पर जा चुके थे।

मैं उठी और जल्दी से अपना बिस्तर बदला कि कहीं कोई देख न ले, नई चादर बिछा कर उस पर बैठ गई.
कहानी जारी रहेगी.
[email protected]

इस कहानी को पीडीएफ PDF फ़ाइल में डाउनलोड कीजिए! एक नारी होने की व्यथा कथा-1