ससुर और बहू की कामवासना और चुदाई-6

(Sasur Bahu Ki Kamvasna Aur Chudai- Part 6)

This story is part of a series:

अभी तक इस फ्री सेक्सी कहानी में आपने पढ़ा कि मैंने रात को अपनी पुत्रवधू को फर्स्ट क्लास ए सी के प्राईवेट केबिन में पूरा मजा लेकर और देकर चोदा. पूरे डेढ़ साल बाद मैंने अपनी कामुकता से भरपूर बहू की चूत की चुदाई की थी.

अब आगे क्या हुआ, कहानी का मजा लें:
तभी पेंट्री कार का स्टाफ चाय नाश्ता लेकर आ गया, साथ में ताजा न्यूज़पेपर भी था.

इन सबसे निपट कर हम दोनों यूं ही बातें करते रहे कि शादी में क्या क्या होना है.
ये… वो…
मैं बीच बीच में बहू का हाथ अपने हाथ में लेकर सहलाता रहा, बहू के बदन को भी बिना किसी हिचक के यहाँ वहां छूकर बातें कर रहा था. बहू भी मुझसे पूर्ण रूपेण स्वछंद उन्मुक्त मित्रवत व्यवहार कर रही थी.
ऐसे ही बातें करते करते दोपहर के एक बजे से ऊपर ही टाइम हो गया. लंच भी सर्व हो गया. हम लोग लंच करके दो बजे तक फ्री हो गये.
ट्रेन की लम्बी जर्नी में कुछ करने को तो होता नहीं, बस खाओ, पियो और सोओ. लेकिन मेरे साथ तो बहूरानी थी और हम लोगों का ट्रेन से दिल्ली जाने का एक ही उद्देश्य था – चुदाई चुदाई और चुदाई!

“अदिति बेटा, अब आजा फिर से!”
“क्यों आऊँ पापा जी… मैं तो यहीं ठीक हूं!”
“अरे आ ना टाइम पास करते हैं दोनों मिल के!”
“टाइम तो अच्छे से पास हो रहा है मेरा यहीं बैठे बैठे!”
“बेटा जी, इस कूपे का हजारों रुपये किराया दिया है हमने. अभी दिल्ली पहुँचने में 18 घंटे बाकी हैं. चल आ जा अपने पैसे वसूल करें!”

“वो कैसे करोगे पापा जी?”
“जैसे कल रात किये थे.”
“रहने दो पापा… मेरी नीचे वाली अभी तक दुःख रही है. आपने तो कल बिल्कुल बेरहम, निर्दयी बन के कुचल दिया मुझे. जरा भी रहम नहीं आया आपको अपनी बहूरानी पर?”
“अच्छा, अब तू मुझे ही दोष दे रही है? रात को तू ही तो ‘लव यू… लव यू…’ बोल कर कह रही थी- कुचल डालो इसे… फाड़ के रख दो मेरी चूत आज… बहुत सताती है ये!
“इसका मतलब यह थोड़ी न के आप सच में ही रौंद डालो मेरी कोमल जगह को बेरहमी से; चाहे कोई जिये या मरे; आपकी बला से!”
बहूरानी थोड़ा तुनक कर बोलीं लेकिन उनकी आँखें से शरारत झलक रही थी.

“और जो अभी सुबह सुबह तू मुझे थैंक्स बोल रही थी वो किसी ख़ुशी में था?”
“वो तो ऐसे ही आपका दिल रखने के लिये; रात में आपने इतनी कठोर मेहनत जो की थी न मेरे ऊपर चढ़ के!”
“और अब क्या इरादा है मेरी प्यारी प्यारी बहूरानी का?”
“पापा जी, जो आप चाहो… आखिर हमने हजारों रुपये रेलवे को पे किये हैं, उसमें से जितने वसूल हो जायें उतना अच्छा!”
“यह हुई न बात!” मैं बोला और बहूरानी को अपनी गोद में घसीट लिया.

“अदिति बेटा, तेरी ये नीचे वाली सच में दुख रही है?” मैंने उनकी चूत सलवार के ऊपर से ही सहलाते हुए पूछा.
“हा हा हा, अरे नहीं पापा जी. मैं तो बस ऐसे ही हंसी ठट्ठा कर रही थी. ये ससुरी ना दुखती… इसे तो लंड से जितना मारो पीटो… उतनी ही ज्यादा खुश होती है बेशरम!” बहूरानी जी खनकती हुई हंसी हंसी.
बहू रानी आगे बोली- यह आपकी चहेती हो गई है, बिगड़ गई है, पूरी की पूरी ढीठ हो गई है, हद कर दी इसने तो बेशर्मी की!

“तो फिर आ जा मेरी रानी… कुछ नया करते हैं अब इसके साथ!” मैंने कहा- बोलो बहूरानी… क्या ख्याल है?
“अब और क्या नया होना बाकी रह गया पापा जी… सब कुछ हर तरीके से तो कर चुके आप मेरे साथ. वो घुसेगा तो मेरी ही में है न?”
“अरे वो नहीं घुसेगा तेरी में; अभी तो सिर्फ एन्जॉय करेंगे अलग तरीके से!”
“अच्छा ठीक है, बताओ क्या करना है?” बहूरानी बोली.

“पहले तू पूरी न्यूड हो के बैठ जा मेरे सामने मुंह करके!”
“धत्त, दिन में ही?” बहू रानी बोली.
“अरे बेटा दिन रात से क्या फर्क पड़ता है, चल आ जा!”

बहू रानी ने पहले कूपे को चेक किया कि वो अन्दर से ठीक से बंद है या नहीं… फिर पहले अपनी बाहें ऊपर उठा कर अपना कुर्ता और सलवार का नाड़ा खोला और सलवार भी उतार डाली.
आह… क्या गजब का हुस्न दिया है ऊपर वाले ने मेरी बेटी सी बहू अदिति को. सिर्फ ब्रा और पैंटी में मेरी बहूरानी की जवानी क़यामत ढा रहीं थी. डिजाइनर ब्रा में बहू के मम्में और भी दिलकश लग रहे थे और उसकी पैंटी में वो उभरी हुई चूत… चूत का त्रिभुज और लम्बी सी दरार बिल्कुल साफ़ साफ़ दिख रही थी पैंटी के ऊपर से! पैंटी के ऊपर चूत की दरार इस तरह से दिखे तो पोर्न की दुनिया में इसे कैमल टो Camel toe कहते हैं.

Sasur Bahu Ki Kamvasna Aur Chudai
ससुर और बहू की कामवासना और चुदाई

मुझे अपनी बहू की कैमल टो बहुत सेक्सी लगी तो मैंने अपना स्मार्ट फोन निकाल कर उसकी पैंटी की एक फोटो खींच ली.

मैंने बहूरानी का हाथ पकड़ के अपने पास खींचा और पहले तो पैंटी के ऊपर से ही उसकी चूत की जो दरार दिख रही थी, उसमें उंगली फिराई, फिर बहू की पैंटी थोड़ी सी साइड में सरका कर उसकी नंगी चूत की दरार में उंगली फिराई और फिर चूत को चूम लिया.

फिर मैं उठ कर खड़ा हो गया और अपने कपड़े उतार कर बिल्कुल नंगा हो गया. मेरा मुरझाया लंड झूल रहा था जो धीरे धीरे जान पकड़ रहा था.

अब मैंने अपनी बहू की की ब्रा का हुक खोल दिया; हुक खुलते ही ब्रा के स्ट्रेप्स स्प्रिंग की तरह उछल गये और मैंने ब्रा को उतार कर बर्थ पर डाल दिया और बहूरानी को अपने सीने से लगा लिया. उनके मम्में मेरे सीने में समा गये. मैंने उसके कान की लौ को अपने होंठों और जीभ से चुभलाया और फिर कान के नीचे और गर्दन चूम डाली. फिर उसे बर्थ पर एक कोने में बैठा दिया.

बर्थ के दूसरे कोने पर मैं बैठ गया और बहूरानी के पांव पकड़ कर अपनी गोद में रख लिए.

“पापा जी… मेरे पांव छोड़िये… मुझे अच्छा नहीं लगता!” मेरी संस्कारशील बहू रानी बोली और अपने पैर पीछे खींचने लगी. मेरी बहू को उसके ससुर द्वारा उसके पाँव छूना अच्छा नहीं लगा.
“अरे बेटा, तू टेंशन मत ले… बस एन्जॉय कर मेरे साथ!” मैंने उनके पांवों के दोनों तलुए चूम डाले और अपना लंड उनके तलुओं के बीच फंसा लिया.

“अदिति बेटा, अब तू अपने पैरों से मेरे लंड से खेल; अपने पंजों में इसे दबा कर इसकी मूठ मार और इसे रगड़!”

मेरे कहने से बहूरानी ने मेरा लंड अपने पैरों के पंजों में अच्छे से दबा लिया और इसे हल्के हल्के रगड़ने लगी जैसे हम कोई चीज अपनी हथेलियों से मलते या रगड़ते हैं. उसके ऐसे करते ही मेरे लंड में जोश भरने लगा.

इस तरह का ‘फुट जॉब’ मैंने कभी किसी पोर्न क्लिप में देखा था, तभी से मेरी तमन्ना थी कि कभी मौका मिला तो ये खेल मैं भी खेल के देखूंगा.

आह… कितना प्यारा नजारा था वो… बहूरानी के गोरे गुलाबी मुलायम पैर जिनमें शादी में जाने हेतु मेहंदी रचाई हुई थी और उनके बीच मेरा काला मोटा लंड. बेहद उत्तेजक दृश्य लग रहा था ऊपर से बहूरानी की सोने की पायलें और बिछिया… इन सबका कलर कम्बिनेशन लाजवाब था. भारत में काफी परिवारों में सोने के जेवर पैरों में नहीं पहनते लेकिन हमारे घर में ऎसी कोई रोक नहीं है.

बहूरानी के कोमल पैरों का स्पर्श मेरे लंड को और कठोर बनाता जा रहा था और अब वह पूरा अकड़ चुका था.

इसी समय ट्रेन की रफ़्तार धीमी पड़ने लगी शायद कोई स्टेशन होगा. मैंने टाइम देखा तो दोपहर के साढ़े तीन होने वाले थे. यह टाइम तो नागपुर पहुँचने का था और जल्दी ही ट्रेन स्लो होती चली गई फिर रुक गई.
हां नागपुर ही तो था. पर मुझे क्या. मुझे कौन से नागपुरी संतरे खरीदने थे.

ट्रेन रुकते ही मैंने बहूरानी को थोड़ा सा अपने पास खिसका लिया जिससे मेरे लंड पर उसके पंजों की ग्रिप और मजबूत हो गयी. मेरे पास खिसक आने से बहूरानी की जांघें खुल गयीं थीं और उसकी पैंटी में से चूत की झलक दिखने लगी थी. मैंने अपना एक पैर आगे बढ़ाया और अंगूठे से उसकी पैंटी अलग करके चूत को कुरेदने लगा.

बहूरानी को भी इस खेल में मजा आने लगा तो उसने अपनी पैंटी खुद ही उतार फेंकी और मेरे और नजदीक पैर खोल के बैठ गयी. मैंने अपना लंड फिर से उसके पांवों के तलुओं में दबा लिया और अपने पैर का अंगूठा उसकी चूत में घुसेड़ दिया.

हम दोनों अब पूरी मस्ती में आ चुके थे. बहूरानी अपने पैरों से मेरे लंड की मुठ मार रही थी, बीच बीच में वो मेरे लंड को मथानी की तरह मथने लगती और मैं उसकी चूत में पैर के अंगूठे से कुरेद रहा था. मैं अपने पैर का अंगूठा कभी गोल गोल घुमाता चूत में कभी अप एंड डाउन कभी दायें बायें… उसकी चूत अब खूब रसीली हो उठी थी; मेरा अंगूठा पूरा गीला हो गया था.

मेरी बहूरानी की आँखें वासना से गुलाबी हो गयीं थीं और वो इस खेल को खूब एन्जॉय करने लगीं थी.

तभी ट्रेन ने हॉर्न दिया और धीमे धीमे चलने लगी.
नागपुर पीछे छूट चला था पर हम दोनों ससुर बहू अपने केबिन से बाहर की दीन दुनिया से बेख़बर अपनी ही दूसरी दुनिया में खोये हुए मजा कर रहे थे. हम दोनों में से कोई किसी को हाथों से छू नहीं रहा था; बस अपने पैरों से ही एक दूजे को मजे दे रहे थे.

बहूरानी ने अब अपनी कमर हिलानी शुरू कर दी थी, मैं समझ गया कि अब उसकी चूत का बांध टूटने ही वाला है. इधर मेरा लंड भी झड़ने के करीब पहुंच रहा था… और मेरे लंड की नसें फूलने लगीं.
और तभी बहूरानी ने इसे महसूस करते हुए लंड को पंजों से मथना शुरू कर दिया.

पंद्रह बीस सेकंड बाद ही मेरे लंड से वीर्य की पिचकारी छूटी और ऊपर वाली बर्थ से जा टकराई… फिर छोटी छोटी पिचकारियाँ किसी फव्वारे की तरह निकलने लगीं और बहूरानी के दोनों पांव मेरे वीर्य से सन गये.
इसके साथ ही बहूरानी की कमर जोर से तीन चार बार आगे पीछे हुई और वो भी झड़ गयी और निढाल सी होकर उसकी नंगी पीठ पीछे टिक गयी और वो गहरी गहरी साँसें लेने लगीं.

“उफ्फ पापा जी, इस खेल का भी अपना एक अलग ही मजा है; आज पहली बार जाना! अह… मजा आ गया सच में!” बहूरानी थके थके से स्वर में बोली.
“हां बेटा जी, जो काम लंड नहीं कर सकता वो काम उंगली या अंगूठा करता है. लंड तो सिर्फ अन्दर बाहर हो सकता है लेकिन अंगूठा तो हर एंगल से मज़ा दे सकता है.”
“हां पापा जी, आप शत प्रतिशत सही कह रहे हैं.”

मैंने नेपकिन से अपना लंड और बहूरानी के पांव अच्छे से पौंछ डाले और फिर बहूरानी ने अपना सलवार कुर्ता पहन लिया, मैंने भी कपड़े पहन लिये.

अब मैंने टाइम देखा तो सवा चार बजने वाले थे. ट्रेन लगातार फुल स्पीड से सीटी बजाती हुई दिल्ली की ओर दौड़ी चली जा रही थी.

ससुर बहू के सेक्सी खेलों भरी गर्म कहानी आपको कैसी लग रही है, मुझे मेल कर के अवश्य बताएं!
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