स्त्री-मन… एक पहेली-6

(Nari Mann... Ek Paheli- Part 6)

मेरी साली की जवान बेटी की कामुकता से भरपूर इस सेक्स स्टोरी के पिछले भाग
कहानी का प्रथम भाग: स्त्री-मन… एक पहेली-1
स्त्री-मन… एक पहेली-5

में आपने पढ़ा कि यौन पूर्व काम क्रीड़ा के चलते उसकी कामवासना पूरे चरम पर थी.
अब आगे:

यह सही था कि अब प्रिया अक्षत-योनि नहीं थी क्योंकि पिछले साल मैंने ही तो प्रिया को सुहागिन बनाया था तदापि सवा साल पहले के किये गए एक बार के मैथुन का असर तो कब का योनि पर से विदा हो चुका था. प्रिया की योनि के पद्म दल फिर से सिकुड़ कर योनि की गुफा को फिर से अत्यंत संकरा बना चुके थे, इसी कारण मेरी उंगली प्रिया की योनि के जरा सी अंदर जाने से प्रिया के मुंह से दर्द भरी सिसकारी निकली थी.

लेकिन इस बार मैं काम-क्रीड़ा से पहले अपनी उंगलियों से योनि के छेद को ख़ुला करने के मूड में हरगिज़ भी नहीं था. आज लिंग का काम लिंग ही करने वाला था. प्रिया की योनि से काम-रस बेतहाशा बह रहा था. मैंने प्रिय के बाएं निप्पल को मुंह में ले कर चुमलाया, तत्काल प्रिया मेरे लिंग को अपनी योनि की ओर खींचने लगी.

एक बार फिर से आजमायश की घड़ी आ रही थी लेकिन मुझे खुद पर, अपने कौशल पर, अपने प्यार पर और सब से बढ़ कर अपनी जान प्रिया पर भरोसा था कि सब ठीक हो जाएगा. प्यार हो रहा था… कोई लड़ाई नहीं जिस में किसी के जीवन-मृत्यु का सवाल हो!

“आओ न…!” प्रिया कसमसाई और उस ने बिस्तर पर अपनी टाँगे खोल दी.
मैं थोड़ा अचकचाया।
“आप को मेरी कसम… अब के जो तरसाया तो…!” प्रिया के लफ़्ज़ों में मनुहार के साथ साथ आदेशात्मक गूंज थी.

अब न कहनी मुश्किल थी; मैं प्रिया की खुली टांगों के बीच में आया. चाहे कामऱज़ की वजह से प्रिया की योनि पहले से ही खूब चिकनी हो रही थी, तदापि चित टांगों के साथ योनि भेदन में प्रिया को बहुत दर्द होना था तो मैंने प्रिया के दोनों पैर मोड़ कर प्रिया के नितंबों से करीब एक फुट की दूरी पर रख दिए; इससे प्रिया की योनि की मांसपेशियाँ थोड़ी सी ढीली हो गयीं जिस से मुझे प्रिया की योनि में अपना लिंग प्रवेश करवाने में थोड़ी सुविधा होने वाली थी.

मैंने अपना लिंग अपने दायें हाथ में ले कर शिश्न-मुंड प्रिया की ऱज़ से सराबोर प्रिया की योनि पर नीचे से ऊपर भगनासा तक और फिर भगनासा से नीचे की ओर, और फिर नीचे से ऊपर भगनासा तक घिसाना-रगड़ना शुरू किया।
अचानक मेरा लिंग प्रिया की योनि की दरार पर घिसाते-घिसाते, योनि की दरार के बीच में जरा सा नीचे की और किसी नीची जगह पर अटक सा गया. उत्तेजना के मारे प्रिया के मुंह से व्यर्थ से, आधे-अधूरे ऐसे लफ़्ज़ निकल रहे थे, जिन का कोई अर्थ नहीं था.

“आह… मर गयी… तरसा दिया मुझे… ओ पतिदेव… आप ने… ओ गॉड!… आई..ई… मेरे अंदर समा जाओ… मार डालो मुझे… आह..ह..ह..ह.. सी… ई… ई..ई..ई..ई..!!!” इत्यादि!

बेखुदी के इस आलम में भी प्रिया मुझे अपना पति ही तस्सवुर कर रही थी. इधर कितनी ही रातों का भटका हुआ और प्यासा मुसाफिर आखिरकार अपनी मंज़िल-ऐ-मक़्सूद के मयख़ाने के दरवाज़े पर दस्तक़ दे रहा था. मैं अपने लिंग-मुंड को वहीं अटका छोड़ कर प्रिया के ऊपर लम्बा लेट गया. आने वाले क्षणों में मिलने वाले आनन्द का तस्सवुर कर के प्रिया ने भी आँखें बंद कर के मुझे ज़ोर से अपने आलिंगन में ले लिया.

मैंने प्रिया के होंठों के कई चुम्बन लिए और कहा- प्रिया!
“हुँ..!”
“आँखें खोलो!”
“मैं नहीं… आप करो.”
“अरे! खोलो तो…!”

प्रिया ने अपनी आँखें खोली. मेरी आँखें ठीक उस की आँखों से तीन इंच ऊपर थी. मोटी-मोटी काली आँखें जिन में प्यार और काम अपनी सम्पूर्णता के साथ झलक रहे थे. प्रिया ने झट से मेरे होंठों पर एक चुम्बन जड़ा और अपने दोनों पैरों से मेरी कमर पर कैंची सी मार ली और लगी मेरी कमर अपनी ओर खींचने.

“नहीं प्रिया, ऐसे नहीं… आराम से! ऐसे तुम्हें दर्द होगा.”
“मुझे परवाह नहीं!”
“लेकिन मुझे है.”

प्रिया ने मुदित आँखों से मुझे देखा, मुस्कुरायी और फिर प्यार से मेरे होंठों को चूम लिया. मैंने वापिस प्रिया के दोनों पैर मोड़ कर प्रिया के नितंबों से करीब रख दिए और मैंने अपना लिंग थोड़ा सा पीछे को खींचा और जरा से और ज़ोर से आगे को धकेला।
“सी… ई… ई..ई..ई..ई..!!!” एक लम्बी सिसकी प्रिया के मुंह से निकल गयी लेकिन हर चीज़ अभी कंट्रोल में ही थी, मैंने थोड़ा सा ज़ोर और लगाया, अब लिंग-मुंड प्रिया की जलती धधकती योनि के अंदर था.

प्रिया के दोनों हाथ मेरी पीठ पर कस कर जमे थे; प्रिया की योनि के अंदर का उत्ताप मेरे लिंग को जलाने पर उतारू था जैसे. लेकिन पीछे हटने का तो सवाल ही नहीं था. इसी पल का पूर्ण समग्रता से सामना कर के बिस्तर पर अपना विजय अभियान सार्थक करने वाला ही सही मायने में मर्द कहलाता है और मुझे तो कुछ नया साबित भी नहीं करना था, सिर्फ अपने सामर्थ्य के पिछले कृत्य को एक नया मोड़ दे कर दोहराना भर था.

अभी भी प्रिया के दोनों पैर उसके नितम्बों के पास थे और दोनों टांगों के घुटने हवा में खड़े थे. एक बार मेरा लिंग प्रिया की योनि की अंतिम सीमा छू ले तो मैं प्रिया की टांगें सीधी करवा देता लेकिन अगर कहीं अभी से प्रिया ने टांगें सीधी कर ली तो प्रिया को फिर से अक्षत-योनि भेदन वाला दर्द याद आ जाना था. मैंने प्रिया के बाएं उरोज़ के निप्पल के साथ अपनी जीभ लड़ायी. अर्धसुप्त योद्धा एकदम से चैतन्य हो कर तन गया.

मैंने धीरे से निप्पल को चूमा और हल्के से उस के आसपास अपनी जीभ फेरी. प्रिया के मुंह से निकली सिसकारी ने बता दिया कि प्रिया की समस्त चेतना अभी उस के बाएं उरोज़ पर केंद्रित थी, मैंने अपने लिंग को हल्का सा पीछे खींच कर ज़रा ज़ोर से आगे को किया. अब आधा लिंग योनि में समा चुका था.

तत्काल प्रिया ने मेरे सर के पीछे से बाल पकड़ मुझे थोड़ा परे धकेलने की कोशिश की लेकिन मैं ऐसे कैसे पीछे हटता!
मैंने अपनी वही पुरानी तक्नीक अपनायी, लिंग थोड़ा सा योनि से बाहर खींच कर जहाँ था, फिर से वही पहुंचा दिया, फिर थोड़ा बाहर निकाला और फिर जहाँ था, वही पहुंचा दिया, ऐसा मैं करता ही चला गया. पांच-सात मिनट बाद प्रिया थोड़ा सहज़ हो गयी और मेरी ताल पर अपनी ताल देने लगी, इधर मैं अपना लिंग उस की योनि से बाहर खींचता तो प्रिया अपने नितम्ब पीछे खींच लेती और जैसे ही मैं अपना लिंग उस की योनि में आगे धकेलता, प्रिया अपने नितंब ऊपर को उछालती।

हर थाप के साथ मेरा लिंग, प्रिया की योनि में थोड़ा और ज्यादा गहरे समाने लगा. तीन-चार मिनट बाद ही मेरा लिंग पूरे का पूरा प्रिया की योनि में आने-जाने लगा. इधर ऊपर मेरा मुंह प्रिया की बायीं बगल में कब समा गया, मुझे पता ही नहीं चला. मैं जीभ से प्रिया के रस-भरे उरोज़ चाटता, चूसता प्रिया की बालों रहित बगल में प्रिया के पसीने की मादक सुगंध लेता-लेता बगल की रेशमी त्वचा चूम रहा था. प्रिया इस आनन्द के कारण सातवें आसमान में थी और मैं जन्नत में. थप्प-थप्प… थप्प-थप्प… थप्प-थप्प…!! नीचे कबीरदास की चक्की पूरे यौवन पर चल रही थी.

प्रिया ने चूस-चूस कर मेरा निचला होंठ सूज़ा दिया था, आवेश में आ कर अपने तीखे नाखूनों से मेरी पीठ पर अनगिनत खूनी लकीरें उकेर दी थी. मैंने भी उत्तेज़ना-वश चूस-चूस कर प्रिया के दोनों उरोजों पर जगह जगह अनगिनत निशान डाल दिए थे.

मैं इन आनन्द के क्षणों को पूर्ण रूप से महसूस करना चाहता था इस लिए मैंने अपने लिंग को प्रिया की योनि में गहराई में लेजा कर अचानक वहीँ रोक दिया. मैं अपने लिंग के चारों ओर प्रिया की योनि की हल्की-हल्की पकड़ और स्पंदन महसूस कर रहा था. जैसे रेशम की नर्म-गर्म सी, नाज़ुक सी मुट्ठी जैसी कोई चीज़ मेरे मेरे लिंग पर रह-रह कर कस रही हो.

कुछ पल मैं इस स्वर्गिक आनन्द का मज़ा लेता रहा और फिर प्रिया ने मुझे टहोका तो मैंने फिर से काम-क्रीड़ा शुरू की. अभी तीन चार बार ही अपने लिंग को प्रिया की योनि के निकाला डाला था कि अचानक प्रिया ने अपनी दोनों टांगें सीधी कर ली; तत्काल मुझे अपने लिंग पर प्रिया की योनि का एक ज़बरदस्त खिंचाव महसूस हुआ. मेरा लिंग जैसे किसी नर्म-ग़र्म संडासी में कस गया था. प्रिया की योनि की दीवारों की मेरे लिंग पर रगड़ कई गुना बढ़ गयी थी और साथ ही प्रिया के मुंह से निकने वाली आहों कराहों में गज़ब की तेज़ी आ गयी थी.

प्रिया के टाँगें बिस्तर पर सीधी करने से प्रिया की योनि में आये अति कसाव के कारण मेरे लिंग का प्रिया की योनि में घर्षण बहुत ही बढ़ गया था और लिंग का योनि में आवा गमन बहुत मुश्किल हो रहा था.
जैसे ही अपने लिंग को मैं बाहर निकाल कर दोबारा योनि में धकेलने के लिए जोर लगाता था, प्रिया के मुंह से इक दर्द भरी आह निकल जाती थी. प्रिया की योनि में से कामरस के साथ साथ जैसे आग की लपटें निकल रही थी.

दोनों के लिए काम-शिखर अब ज्यादा दूर नहीं था. मैंने अपनी कमर की स्पीड बढ़ानी शुरू कर दी; प्रिया ने भी उसी अनुपात में अपनी कमर आगे पीछे करनी शुरू कर दी. प्रिया की आँखें बदस्तूर बंद थी लेकिन प्रिया स्वार्गिक-आनन्द के इन पलों के एक-एक क्षण का मज़ा ले रही थी. मेरे हर धक्के के साथ प्रिया के मुंह से एक जोरदार “हक़्क़…” या “हा…!” की आवाज़ निकल जाती थी.
शनै:शनै: प्रिया के शरीर में एक अकड़न सी उभरने लगी और मुंह से अस्पष्ट से शब्द निकलने लगे “ऊँ… ऊ… ऊँ… ऊँ… हाँ… आँ… हा… हाय… उ… हक़्क़… ई… ई… इ… ई… ई..इ… ग… यी”. प्रिया का स्खलन अब दूर नहीं था और मैं भी अपनी मंज़िल के करीब ही था. मैंने अपना सारा वज़न अपनी कोहनियों पर ले लिया और अपनी कमर को बिजली की सी तेज़ी से चलाने लगा.

प्रिया की सिसकारियाँ पूरे बैडरूम को गुँजाये दे रही थी जिन्हें सुन कर मैं और उत्तेजित हो कर हर वार पर बेरहमी से प्रिया की योनि में अपने लिंग को जड़ तक उतारे जा रहा था.

तभी प्रिया ने अपने दोनों हाथ मेरी पीठ पर ऐसी सख्ती से जकड़े कि प्रिया का ऊपर वाला धड़ हवा में मेरी छाती के साथ चिपक गया. प्रिया बेसाख्ता मुझ पर चुम्बनों की बरसात किये दे रही थी और नीचे मेरा लिंग प्रिया की योनि को बिजली की तेज़ी से मथे दे रहा था.

अब तक मेरे लिंग पर प्रिया की योनि की दीवारों का दबाब इस कदर बढ़ गया था कि मेरे लिए अपना लिंग प्रिया की योनि से बाहर खींचना लगभग नामुमकिन सा हो गया था. अचानक प्रिया का तमाम शरीर अकड़ने लगा, प्रिया ने मेरे बाएं कंधे पर जोर से काटा और एक जोर से “आ… आ… आ… आ… आ… ह… ह… ह..ह…!!! ” की चीख सी मारी. साथ ही प्रिया की आँखें उलट गयी तथा वो निष्चेष्ट सी हो कर मेरी बाहों में झूल गयी.

प्रिया स्खलित हो चुकी थी.

मुझे प्रिया की योनि के अंदर अपने लिंग के आसपास गर्म-गर्म द्रव सा महसूस होने लगा. जैसे ही मैंने अपना लिंग पूरी सख्ती से प्रिया की योनि से बाहर खींच कर वापिस प्रिया की योनि की गहराई की आखिरी हद तक पंहुचाया, तभी मेरे अंदर… मेरे खुद का ज्वालामुखी फट पड़ा. मैंने प्रिया को सख्ती से अपनी बाहों में कस लिया और प्रिया की योनि के अंदर मेरे लिंग से वीर्य की जोरदार एक बौछार हुई… फिर दूसरी… फिर तीसरी. मेरे वीर्य से प्रिया की योनि बाहर तक सराबोर हो उठी और मैंने पसलियाँ तोड़ देने की हद तक प्रिया को अपने आलिंगन में दबा डाला.

अचानक ही प्रिया जैसे होश में आयी और मेरी सख्त पकड़ से खुद को छुड़ा कर प्रिया ने मुझे ठीक अपने ऊपर, अपने आगोश में ले लिया और मेरे सर के बालों में अपनी उंगलियाँ फेरने लगी. सामने दीवार घड़ी पर साढ़े चार बज़ रहे थे. हम दोनों ने एक-दूसरे के साथ किया वादा निभा दिया था. अभी तो हम दोनों एक-दूसरे के आगोश में थे लेकिन अब जिंदगी में कभी ऐसा मौक़ा दोबारा आएगा या नहीं… और अगर आएगा भी तो प्रिया पॉजिटिव रेस्पॉन्स देगी या नहीं, इस का जवाब तो भविष्य के गर्भ में ही था.

लेकिन यह भी सच है कि
“त्रिया चरित्रम् पुरुषस्य भाग्यम्, देवो न जानति कुतो मनुष्यम्”
देखते हैं कि जिंदगी आगे क्या-क्या रंग दिखाती है?
अगर आगे ऐसा कुछ हुआ तो आप सब से अपने अनुभव जरूर बाँटूगा.
तब तक विदा!!!

राजवीर
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