स्त्री-मन… एक पहेली-3

साली की युवा बेटी संग यौनानन्द की रोमांटिक कहानी के पिछले भाग
स्त्री-मन… एक पहेली-2
में आपने पढ़ा कि प्रिया मेरे घर में मेरे साथ अकेली है, रात हो चुकी है, वो एक बेडरूम में गयी और उसने अंदर से दरवाजा बंद कर लिया.

मैं मायूस सा हुआ और हस्तमैथुन करके आकर अपने बेडरूम में सो गया.
अब आगे:

रात नींद में ही मैंने करवट ली तो किसी नर्म-गुदाज़ चीज़ से मेरा हाथ टकराया. यह एक जनाना कंधा सा था. मैंने झट्ट से आँखें खोली तो पाया कि बैडरूम का दरवाज़ा भी बंद था और बैडरूम की ट्यूब-लाइट तो बंद थी ही अपितु फुट-लाइट भी बंद थी. पूरे बैडरूम में घुप्प अँधेरा छाया हुआ था.

मैंने कपड़ों की हल्की सी सरसराहट और साँसों की मध्यम सी आवाज़ सुनी. मेरे ही बैड पर, मेरे दायीं ओर कोई था. एक पल को तो मेरे रौंगटे खड़े हो गए लेकिन जैसे ही मुझे प्रिया के वहाँ होने का ध्यान आया तो मेरे लिंग में भयंकर तनाव आ गया. मैंने अपना बायाँ हाथ आगे बढ़ाया तो प्रिया का मरमरी और नाज़ुक हाथ मेरे हाथ पर कस गया.

अँधेरे में साईड-वॉल पर रेडियम वाल-क्लॉक 1:10 का टाइम दिखा रही थी. दो चार पल मैं बिना कोई हरकत किये ऐसे ही करवट लिए पड़ा रहा. अचानक मैंने अपने सिरहाने लगी टेबल लैंप ऑन कर दिया.
सचमुच यह प्रिया ही थी. प्रिया ने तत्काल मेरा हाथ छोड़ा और चादर अपने सर तक ओढ़ ली और अपना सर जोर जोर से दाएं-बाएं हिलाती हुयी घुटी सी आवाज़ में बोली- प्लीज़… नहीं! लाइट बंद कर दीजिये.
“मगर क्यों?”
“मुझे शर्म आती है.”
“शर्म आती है… मगर किस से?”
“मुझे नहीं पता… लेकिन आप लाइट बंद कर दीजिये.”
“लेकिन यहाँ तो मैं और तुम ही हो और तीसरा तो कोई है ही नहीं.”
“पता है… पर प्लीज़ लाइट बुझाइये.”
“प्रिया! लाइट बंद कर दी तो वादा कैसे पूरा होगा? ”
“मुझे नहीं पता… लेकिन आप लाइट बंद कीजिये.”

अगर मेरी प्रियतमा को ये सब छुप छुप कर करना पसंद था तो ठीक है… मैं जो उस को पसंद है वैसे ही करूंगा. मैंने हाथ बढ़ा कर टेबल लैम्प बंद कर के हल्की नीली लाइट वाली नाईट लैंप जला दी.
प्रिया ने चादर से सर बाहर निकाला और नीली लाइट जलती देखकर मेरी ओर शिकायत भरी नज़रों से देखा लेकिन कहा कुछ नहीं। चलो! बात थोड़ा तो आगे बढ़ी. अब तक मैं पूर्ण तौर पर चैतन्य हो चुका था.

“सुनो!” अचानक प्रिया ने सरगोशी की.
“सुनो!” की प्रिया की आवाज़ सुन कर मुझे हल्का सा झटका सा लगा. यह संबोधन मेरे लिए सिर्फ सुधा प्रयोग करती थी. मैंने तकिये पर से सर उठाया और प्रिया की ओर सवालिया नज़रों से देखा.
“उठो तो… ज़रा!” प्रिया ने इल्तिज़ा सी की.
” ठूँ…?? बोले तो…?”
“अरे बाबा! उठ कर खड़े हो जरा…!”
“बैड पर…?”
“ज़मीन पर!!… बुद्धू राम!”

एक झटका और लगा. सिर्फ सुधा ही कभी-कभार एकांत में मुझे बुद्धूराम कहती थी. भगवान् जाने… क्या चल रहा था लड़की के दिमाग में? मैं आहिस्ता से उठा और बैड से नीचे उतर कर फर्श पर खड़ा हो गया.
“ज़रा ट्यूब-लाइट जलाओ तो.”
प्रिया के लफ़्ज़ों में एक अधिकारपूर्ण और सत्तात्मक गूँज सी थी. मैंने नाईट-लैंप ऑफ़ कर के ट्यूब-लाइट ऑन कर दी. तभी प्रिया बैड के परली तरफ से नीचे उतर आयी और आ कर ठीक मेरे सामने खड़ी हो गयी. अजीब हालत थी मेरी… बिना अंडरवियर के मेरा लिंग पजामे को तम्बू बनाये हुये था.
“अब आगे क्या?” मैंने मज़ाकिया लहज़े में पूछा.

अचानक ही प्रिया ने झुक कर अपने दोनों हाथों से मेरे पैर छू कर अपना दायाँ हाथ अपनी मांग में ऐसे फेरा जैसे सिन्दूर लगाते हैं.
पल-भर के लिए मैं स्तब्ध रह गया- यह… यह क्या कर रही हो… प्रिया?
कहते हुए मैंने प्रिया को दोनों कांधों से पकड़ कर उठाया।
देखा तो काली कजरारी आँखों में आंसू बस गिरने की कगार तक भरे थे.

“मेरा ईश्वर गवाह है कि आप मेरे जीवन में आये प्रथम पुरुष हैं और उस रात के बाद से मैंने हमेशा आप को अपने पति के रूप में ही देखा और चाहा है. आज के बाद हम दोनों की जिंदगी में क्या क्या मोड़ आएं… मैं नहीं जानती लेकिन जो अभिसार अभी आप के और मेरे बीच में होने वाला है, मैं चाहती हूँ कि उसका स्वरूप एक पति-पत्नी के अभिसार का हो… ना कि प्रेमी-प्रेमिका के अभिसार का. आने वाले चंद घंटे मैं पूर्ण तौर पर आप की अर्धांगिनी की तरह गुज़ारना चाहती हूँ. इन चंद घंटों की मीठी याद के सहारे मैं जिंदगी की मुश्किल से मुश्किल दुश्वारी हसीं-ख़ुशी सह लूंगी. क्या आप आज मुझे यह अधिकार देंगें?”

बाप रे! … तो ये सब चल रहा था प्रिया के दिमाग में! अब मैं समझा सारी बात. मेरे गले लग कर बेवज़ह रोना, अधिकारपूर्ण मुझे पुकारना, मेरे पांव छूना और फिर मेरे पांव की वही धूल अपनी मांग में लगाना… प्रिया खुद को सुधा के स्थान पर रख कर मुझे अपना पति कह रही थी.
“प्रिया! आने वाले चंद घंटे तो क्या तू हमेशा मेरे दिल में मेरी अपनी बन कर रहेगी। हो सकता है कि हम बरसों ना मिले लेकिन याद रखना कि मुझ पर तेरा इख़्तियार और अधिकार सुधा से कम नहीं.” कहते हुए मैंने भी कुछ भावुक हो गया और प्रिया को अपने अंक में समेट कर उस के माथे पर प्यार की मोहर लगा दी.

ज़वाब में प्रिया ने मुझे जोर से अपने आलिंगन में ले लिया। आलिंगन में बंधे-बंधे दोनों बैड पर आजू-बाजू (मैं दायीं तरफ, प्रिया बायीं तरफ) लेट गए. अब की बार प्रिया ने मुझे ट्यूब-लाइट बंद करने को नहीं कहा.
“अच्छा प्रिया! दो-एक बातें तो बता?”
प्रिया की भवें प्रश्नात्मक तौर पर मेरी ओर उठी.

“आम तौर पर तू मुझे “मौसा जी नमस्ते” कह कर ही टाल देती रही है लेकिन उस दिन जब मैं और सुधा तेरे घर गए थे तो क्या हुआ था तुझे?”
“उस दिन? उस दिन आप के आने से ज़रा पहले मेरी अपने पापा से जोरदार बहस हुई थी और उस टाइम मैं दिल से आप को याद कर रही थी.”
“और वो मेरा लिंग दबाना, सहलाना और पीठ पर चिकोटी काटना?”
” दबाने का तो ऐसा है कि वो या तो सिर्फ आप को पता या मुझे और यही बात पीठ पर चिकोटी काटने पर लागू होती है लेकिन सहलाने वाली बात का तो मैं कहूँगी कि वो सिर्फ एक एक्सीडेंट था.”
” और आज जब हम वापिस आये थे तो क्या हुआ था तुझे? तू क्यों अपने कमरे में बंद हो गयी थी और कहने पर भी दरवाज़ा क्यों नहीं खोला तुम ने?”
“आप समझे नहीं? पिछले तीन महीने से आप का इम्तिहान चल रहा था. इन तीन महीनों में आप ने मुझ से कभी कोई छिछोरी हरक़त नहीं की और आज शाम को आप का आखिरी इम्तिहान था. अगर आप ने मेरे कमरे का मुझ से दरवाज़ा खुलवाने की मनोमुनौवल की होती या जबरदस्ती दरवाज़ा खोलने की कोई जुगत की होती तो मुझे समझ आ जाना था कि आप सिर्फ एक जनाना जिस्म के पीछे पड़े हैं और प्रिया से आप को कोई लेना-देना नहीं और बीते समय में आप का मेरे साथ कोई ग़ैर-इखलाकी हरकत ना करने का कारण सिर्फ मौका नहीं मिलना ही था. अगर ऐसा होता तो मैंने आप को खुद को कभी भी छूने नहीं देना था और तमाम उम्र आप के साथ कोई वास्ता भी नहीं रखना था.”

तौबा तौबा! क्या खुराफाती सोच थी… लड़की की!
“अच्छा! अब बता… मैं पास हुआ या फेल?”
“आप को क्या लगता है?”
“तू बता?”
“मुझे ख़ुशी है कि जिसे मैंने देवता माना, वो सच में एक देवता ही है.”

भावावेश में मैंने प्रिया के चेहरे पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी. हम दोनों के साँसों की गति निरंतर बढ़ती जा रही थी लेकिन इस से आगे ना वो बढ़ रही थी न मैं…
लेकिन मैं पुरुष था… पहल तो मुझे ही करनी थी!
आखिरकार आहिस्ता से मैंने अपना दायाँ हाथ ऊपर उठा कर प्रिया के बायें गाल पर रख दिया. प्रिया का दिल तेज़ी से धड़क रहा था, उसकी जलती गर्म सांसें मेरी कलाई झुलसाये जा रही थी. मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाया तो मेरी तर्जनी और मध्यमा उंगली के बीच में प्रिया के बाएं कान की लौ आ गयी जिसे मैंने हल्के से मसल दिया।
“सी… ई… ई… ई… ई… ई…!!!” शाश्वत आनन्द की पहली आनन्दमयी सिसकारी प्रिया के होंठों से फूट पड़ी. हम दोनों के बीच में कोई डेढ़-एक फुट का फ़ासला था. मैं थोड़ा सा प्रिया की तरफ़ सरका. अब मेरा दायाँ हाथ प्रिया की पीठ पर धीरे धीरे दायें-बायें, ऊपर-नीचे फिर रहा था. कपड़ों के ऊपर से प्रिया की कसी हुयी ब्रा की आउटलाइन स्पष्ट महसूस हो रही थी.

जैसे ही मैंने प्रिया का बायाँ हाथ उठा कर अपने ऊपर रखा तो प्रिया ने मुझे अपने साथ कस कर भींच लिया. दोनों के बीच का रहा सहा फासला भी ख़त्म हो गया. प्रिया के उरोज़ मेरी छाती में धँसे हुये थे और उस का बायाँ हाथ मेरी पीठ को कस कर जकड़े हुए था.
कयामत तो तब बरपा हुई जब प्रिया ने अपनी बायीं टांग उठा कर मेरे ऊपर रख दी. कपड़ों के ऊपर से ही प्रिया की उतप्त योनि का ताप मेरे कठोर लिंग को जैसे जलाने पर आमादा था. मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई जलती हुयी अंगीठी मेरे लिंग के पास पड़ी हो.

मेरा दायाँ हाथ प्रिया की पीठ पर ऊपर-नीचे गर्दिश करता करता अब नितम्बों पर से होता हुआ, पैंटी-लाइन नापता-नापता योनि-द्वार तक जा रहा था. प्रिया की आँखें समर्पण के आनन्द के अतिरेक से बंद थी और प्रिया का पूरा जिस्म रह रह कर हल्के-हल्के झटके खा रहा था.

मैंने अपना बायाँ हाथ प्रिया की गर्दन के नीचे से ले जा कर प्रिया को अपनी ओर खींचा तो प्रिया के रस भरे होंठ मेरे प्यासे होंठों से आ मिले. तत्काल मैंने प्रिया के होठों का अमृतपान करना शुरू कर दिया।
प्रिया भी आज बहुत गर्मजोशी से मेरा साथ दे रही थी.

अचानक मेरे निचले होंठ पर किसी मधुमक्खी ने डंक मारा हो जैसे… मैं एकदम से हड़बड़ा गया और बैडरूम प्रिया की खनकदार हंसीं से गूँज उठा. प्रिया ने मेरे निचले होंठ पर काट लिया था. स्पष्ट था कि आज मेरा सामना छुई मुई प्रियतमा से नहीं बल्कि किसी जंगली बिल्ली से होने वाला था. मुझे सतर्क रहने की जरूरत थी लेकिन एक चीज़ मेरे हक़ में थी और वो थी मेरा बिस्तर में लम्बा अनुभव.
प्रिया जिन शारीरिक अहसासों से अभी नयी नयी दो चार हो रही थी, वो सब मेरे बरसों के जाने पहचाने थे. मैंने प्रिया के होंठों पर फिर से अपने होंठ फिराने शुरू कर दिए. बीच बीच में प्रिया अपनी जीभ बाहर निकाल कर मेरे होंठों की गति अवरुद्ध करने की कोशिश कर रही थी लेकिन मैं उस की जीभ को ही चाटना चूसना शुरू कर देता था जिस से प्रिया के जिस्म में बेचैनी और ज्यादा बढ़ती जा रही थी.

मेरे दोनों हाथ प्रिया की पीठ पर सख़्ती से क्रॉस हो रहे थे. जैसे ही मेरा कोई हाथ उसकी पीठ सहलाते सहलाते उसकी दायीं या बायीं बगल की ओर बढ़ता तो प्रिया उत्तेजनावश मुझे अपने आलिंगन में और जोर से कस कर मेरे मुंह पर यहाँ-वहाँ चुम्बनों की बारिश कर देती.

इधर मेरा दायाँ हाथ प्रिया की पीठ पर पहुँच कर कपड़ों के ऊपर से ही ब्रा का हुक टटोल रहा था. जैसे ही मेरी उंगलियाँ ब्रा के हुक पर ठहरती तत्काल प्रिया का बायाँ हाथ मेरे दाएं हाथ को इधर उधर झटक देता.

लड़की अभी और खेलने के मूड में थी…
ठीक है! मुझे भी कोई जल्दी नहीं थी, सारी रात अपनी थी.

अब हालत यह थी कि हम दोनों के बीच में से हवा भी नहीं गुज़र सकती थी. उत्तेज़ना के मारे हम दोनों के दिल धक धक कर रहे थे. तत्काल मेरा दायाँ हाथ प्रिया के बाएं कंधे पर से गर्दिश करते-करते नीचे की ओर अग्रसर हुआ, कोहनी और कलाई से होते हुये अंदर पेट की ओर मुड़ गया. नर्म गुदाज़ पेट और मेरे हाथ के बीच में सिर्फ एक टीशर्ट का पतला सा आवरण था.
मैं अपनी हथेली पर प्रिया के जवान और मदमस्त जिस्म की झुलसा देने वाली गर्मी साफ़ महसूस कर रहा था. मैंने अपना हाथ ज़रा सा नीचे किया तो टीशर्ट का निचला सिरा मेरी उँगलियों के नीचे आ गया.

मैंने फ़ौरन टीशर्ट का सिरा उठा कर अपना हाथ अंदर सरका दिया और इसके साथ ही प्रिया की टीशर्ट थोड़ी और ऊपर को ख़िसक गयी; तत्काल प्रिया के सारे शरीर में एक कंपकंपी सी हुई और प्रिया ने अपना दायाँ हाथ उठा कर मेरी गर्दन के नीचे से निकाल कर मुझे खींच कर अपने साथ लगा लिया.

अब मेरे दायें हाथ की उंगलियाँ प्रिया के सपाट पेट पर ब्रा की निचली सीमा से ले कर कैपरी के ऊपरी इलास्टिक की सीमा तक ऊपर-नीचे, दाएं बाएं हरकत करने लगी. मैं जानबूझ कर ना तो प्रिया के वक्ष को अभी सीधे हाथ लगा रहा था और ना ही उसकी योनि को!
पेट पर ऊपर की ओर गर्दिश करती मेरी उंगलियाँ ब्रा की निचली पट्टी को छूते ही और ऊपर को जाने की जगह दायें बायें बग़ल की ओर मुड़ जाती थी, ऐसा ही नीचे की ओर उँगलियों की गर्दिश करते वक़्त प्रिया की कैपरी के ऊपरी इलास्टिक को छूते ही और नीचे जाने की बजाए पेट पर ही इधर उधर हो जाती थी.

अचानक मैंने गौर किया कि प्रिया की काँखें एकदम रोमविहीन हैं, वहाँ एक भी बाल नहीं था और बग़लों के नीचे की त्वचा एकदम नरम और मुलायम थी.
“ऐसी ही बालों से रहित, रोमविहीन प्रिया की मनमोहक और कोमल योनि भी होगी…” ऐसा सोचते ही मुझ में तीव्र उत्तेज़ना की लहर उठी.

कहानी जारी रहेगी.
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सेक्सी कहानी का अगला भाग : स्त्री-मन… एक पहेली-4