मौसी की देवरानी का मचलता बदन

(Mausi Ki Devrani Ka Machalta Badan)

38 साल ननकू एकदम सीधा-सादा और मेहनतकश मर्द था. वह उत्तरप्रदेश में कानपुर के एक जूते बनाने वाली फैक्ट्री में नौकरी करता था जबकि उसकी 35 बरस की बीवी मीना और बच्चे कानपुर से साथ सत्तर किलोमीटर दूर ननकू के पैतृक गांव गाजीपुरा में रहते थे. मीना के घर के साथ वाले वाले घर में उसका जेठ यानि ननकू के भाई हरक लाल का परिवार भी रहता था.

हरक लाल की बीवी सूरती की बहन का बेटा यानि सूरती का भांजा चिन्टू अकसर गाजीपुरा में अपनी मौसी के घर आता-जाता रहता था. उसकी मौसी की शादी ननकू के भाई हरकलाल के साथ हुई थी.

ननकू की बीवी मीना ननकू की गैर-मौजूदगी में भी अपने घर की जिम्मेदारियाँ पूरी निष्ठा के साथ पूरी कर रही थी. ननकू और मीना की एक बेटी 18 साल की हो चुकी थी और उसकी शादी करने के जुगाड़ में थी.

लेकिन मीना की जिन्दगी कब और कैसे बदल गयी, ननकू को पता ही नहीं चला. पिछली कई बार से ननकू जब भी इतवार की छुट्टी पर गाँव आता तो उसे कई बार अपने घर में या अपने भाई के घर चिन्टू भी दिखा था. चिन्टू हालांकि उसके भाई हरक लाल की बीवी का भांजा था, फिर भी ननकू सोचता था कि यह जवान लड़का उसके भाई के घर में इतना ज्यादा क्यों आता है. ननकू ने दो-एक बार चिन्टू को कहा भी कि मौसी के घर में पड़े रहने से बेहतर है वो कोई कामधंधा करे, दो पैसे कमा कर अपने माँ बाप का सहारा बने.

ननकू की बीवी मीना ने भी चिन्टू पर कोई ज्यादा ध्यान नहीं दिया था लेकिन वह जब भी उसके घर आता था तो वह मौसी होने के नाते उसे अच्छे से चाय पानी पूछ लेती थी. चिन्टू के दिल में क्या चल रहा था, मीना इस से बेखबर थी.

एक दिन चिन्टू दुपहरी में मीना के घर आया और खाट पर बैठकर इधर-उधर की बात करने लगा. अचानक चिन्टू मीना के एकदम पास आया और बोला- मौसी, तुम बहुत सुंदर हो?
चिन्टू की यह बात मीना को अजीब सी लगी, पहले तो मीना चौंकी, उसके बाद हंसकर टालती हुई बोली- चिन्टू बेटा, तुम मजाक अच्छा कर लेते हो.
“नहीं मौसी, मैं मज़ाक नहीं कर रहा … आप मुझे सच में बहुत पसंद हो, मेरा दिल बस आपको देखते रहने का करता है, इसीलिए तो मैं आपके घर बार बार आता हूं.”
चिन्टू ने हंसते हुए अपनी मौसी की देवरानी मीना से कहा.

चिन्टू की अटपटी सी बातें सुनकर मीना को थोड़ा गुस्सा आया और उसके माथे पर सिलवटें उभर आई, वो बोली- तू क्या कह रहा है? मतबल क्या है तेरा?
“कुछ नहीं मौसी, आप मेरे पास बैठो और बताओ कि मौसाजी कब आएंगे?” उसने पूछा.

“तेरे मौसा को मेरे पास आने की फुरसत ही कहां है. तू सब जानता तो है कि वो कितने कितने दिन गाँव नहीं आता, फिर भी पूछ रहा है?” मीना ने कुछ गुस्से से कहा.
“मौसी मुझे तेरे ऊपर तरस आता है, मौसा को तो तेरी ज़रा फिकर नहीं है. उसे तेरी फिकर होती तो इतने इतने दिन बाद तेरी सुध ना लेते. वो चाहता तो यहाँ ही गांव में रह कर ही कोई धंधा कर सकता था.” यह बात कहकर चिन्टू ने जैसे मीना की दुखती रग को छेड़ दिया.

यह कह कर चिन्टू मीना के और पास आ गया और मीना का हाथ पकड़ कर बोला- मौसी, अब तू चिंता ना कर, अब मैं तेरी मदद करता हूँ, सब-कुछ ठीक हो जायेगा.

इतनी बात बोलकर चिन्टू चला गया मगर मीना के दिल में काफी सारे प्रश्न उठा गया. मीना सोचने लगी कि आखिर चिन्टू उसके यहां क्यों आता है, इतना ज्यादा आने जाने का क्या कारण हो सकता है?

22 साल का चिन्टू दीखने में ठीक ही था, अभी तक उसकी शादी नहीं हुई थी. अपने गांव में साईकिल पंचर बनाने का काम करता था. सड़क किनारे एक पम्प, टूटे घड़े में पानी, कैंची, सोलुशन की ट्यूब और कुछ पुरानी रबड़ की ट्यूबें लेकर बैठ जाता था. वहां उसे अच्छी कमाई हो जाती थी.

अपनी मौसी के घर आता तो उसकी देवरानी मीना पर चिन्टू का दिल आ गया था. उसे पता लग गया था कि मीना का पति ननकू शहर में रहकर नौकरी कर रहा था तो मीना को अपने मर्द की दूरी बहुत परेशान कर रही थी. इसी बात का फ़ायदा उठा कर उसने मीना के मन में जगह बनाने की कोशिश शुरू कर दी. मौसी भांजा के रिश्ते की मजबूरियाँ रास्ते में रुकावट थीं. चिन्टू को भय भी था कि अगर मीना मौसी को बुरा लग गया तो तीनों घरों में कहर बरपा जाएगा.

उस दिन चिन्टू के जाने के पश्चात मीना काफी देर तक चिन्टू के बारे में ही सोचती रही कि आखिर चिन्टू क्या चाह रहा है. उस पूरी रात मीना को नींद ना आयी. चिन्टू जिस अंदाज से, अपनेपन से बात मीना से बात करता था, वो मीना का मन मोह लेने वाला था परन्तु मीना आयु और रिश्ते में चिन्टू से बड़ी थी. मीना को अपने पति ननकू पर गुस्सा भी आ रहा था क्योंकि ननकू के दूर रहने के कारण ही तो उसका मन चिन्टू के बारे में सोच सोच कर डगमगा रहा था.
उसने अब निश्चय कर लिया कि अबकी बार जब ननकू गाँव आयेगा तो वो अपने पति से कहेगी कि या तो वो गांव में ही रहकर कोई धन्धा करे या फिर उसे भी अपने साथ शहर लेकर जाए.

थोड़े दिन बाद ननकू जब गाँव आया तो उसे अपनी बीवी मीना का मिजाज़ बर्ताव बदला बदला सा लगा.
मीना ने कहा- देखो जी, तोहार बीना जी ना लगे घर में … तुम्हारे बिना मेरा घर में तनिक भी दिल नहीं लगता. या तो आप यहीं पर गाँव में कोई काम करो… या फिर बच्चों को और मुझको लेकर कानपुर चलो, सब चल कर तुम्हारे साथ रहेंगे.

अपनी विचलित बीवी की बात सुन ननकू बोला- कैसी बतिया कर रही हो? तुम पगला गई हो का … अपनी उम्र तो देखो. बच्चे बड़े हो रहे हैं और तुझे रोमांस सूझ रहा है?
“तो क्या अब हम बूढ़ीया गये हैं?” मीना ने कहा.
“नहीं नहीं … ऐसा नहीं … पर मीना तू मेरी मजबूरी समझ … मेरी तनखा इत्ती नई के वहां किराये का कमरा ले तुझे साथ रख पाऊँ. और तू क्या सोचती है कि वहां शहर में मैं अकेला खुश हूं? तेरे बगैर मैं भी परेशान हूं. ना खाने का ना पहनने का!

ननकू के जवाब पर मीना कुछ नहीं बोल पाई. ननकू दो दिन ही घर में रहा, इन दो दिनों में मीना काफी खुश रही क्योंकि उसके तन की भूख को ननकू रात भर पेल कर शांत कर देता था. मगर ननकू के शहर लौटने के बाद मीना के जिस्म की आग फिर भड़कने लगी. वह चुदास से परेशान हो गई. तब उसके दिल-दिमाग में चिन्टू आने लगा. मीना अपनी जेठानी के भानजे से मिलने को आतुर हो उठी.

जब उसकी वासना काबू में नहीं रही तो अपनी जेठानी के कमरे में जाकर मीना ने पूछ ही किया- कई दिन से चिन्टू दिखाई नहीं दिया? आया नहीं क्या?
जेठानी ने जवाब दिया- वो आया तो था, पर चला गया, कुछ जल्दी में था. क्यों मीना, उससे कोई काम था क्या तुझे?
“नहीं नहीं … मैं तो यूं ही पूछने लगी!” व्यथित दिल से मीना वापस आने के लिए मुड़ी कि तभी उसकी जेठानी ने कहा- चिन्टू शायद कल आयेगा.

अपनी जेठानी की बात सुन मीना का दिल जोर जोर धड़कने लगा. उसे लग रहा था कि शायद चिन्टू उससे नाराज है, तभी तो वो उसके घर नहीं आया.

अगले ही दिन सुबह के समय उसके दरवाजे पर खटखट हुई. मीना ने दरवाजा खोला तो देखा कि सामने चिन्टू खड़ा था.
“चिन्टू तुम?” उसे देख मीना अंदर से बहुत खुश हुई पर हैरानी दिखाती हुई बोली.
“हां मौसी … लेकिन आप मुझको देखकर ऐसे हैरान क्यों हो? मुझे तो बड़ी मौसी ने बताया कि आप मुझे याद कर रही थी तो मैं आपके पास आ गया. बताओ, क्या बात है?” चिन्टू घर में घुसते हुए बोला.

मीना ने दरवाजा बंद किया और अंदर आकर चिन्टू से बात करने लगी. थोड़ी देर में मीना 2 गिलास में छाछ ले आई तो चिन्टू ने पूछा- मौसा जी आये थे क्या?
“हां … आये थे, लेकिन दो दिन बाद ही चले गए.” मीना दुखी मन से बोली.

चिन्टू को लगा कि मीना मौसा से खुश नहीं है तो उसने अवसर का लाभ उठाते हुए कहा- मौसी, मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूं, लेकिन भय लगता है कि कहीं आपको बुरा न लगे?
“नहीं, तुम कहो चिन्टू, क्या कहना है?”
“मौसी, बात यह है कि आप मुझे बहुत अच्छी लगती हो और मैं आपको चाहने लगा हूं.” चिन्टू ने एक झटके में दिल की बात बोल दी.

चिन्टू की बात पर मीना बोल पड़ी- चाहने लगा है? तेरा क्या मतलब है? और चाहने का मतलब जानता है? अपनी और मेरी उम्र में अंतर तो देख ज़रा … मैं रिश्ते में तेरी मौसी हूं.
“हां मौसी … लेकिन मेरा दिल तो आप पर आ गया है. अब दिल-दिमाग पर आप ही छायी रहती हो.” चिन्टू ने कहा.
“लगता है, तू पगला गया है. जरा सोच के देख … अगर तेरे या मेरे घरवालों को पता चला तो मेरा क्या हाल बनेगा?” मीना ने कहा.

चिन्टू खाट से उठा और मीना के पास जाकर उसके गले में अपनी बाहें डाल दीं. मीना ने चिन्टू की इस हरकत का कोई विरोध नहीं किया. इससे चिन्टू का हौसला बढ़ गया और इसके बाद मीना भी अपने को नहीं रोक पायी तो मौसी भांजा रिश्ते की मर्यादा तार तार हो गई.

वासना का उबाल उतरने पर जब दोनों को होश आया तो दोनों के मन में रत्ती भर भी पछतावा नहीं था.

मीना मौसी को अपना मोबाईल नम्बर देकर, दोबारा आने का वायदा करके चिन्टू चला गया. उसके बाद से तो जैसे मीना की दुनिया ही बदल गई. पर कभी कभी उसे भय भी सताता था कि अगर भेद खुल गया तो क्या होगा.
अब चिन्टू का आना-जाना लगा ही रहने लगा. जब भी आता, मीणा के लिए कुछ खाने पीने को लाता और कुछ बिंदी सुर्खी चूड़ी भी ले आता.

इसी दौरान एक दिन ननकू अनायास ही गाँव आ गया, उसकी तबीयत कुछ नासाज़ थी. उस दिन तो मीना बच गयी क्योंकि उस वक्त चिन्टू नहीं आया हुआ था. लेकिन मीना डर गई कि कहीं अब ननकू के होते हुए चिन्टू न आ जाए. इसलिए उसने चिन्टू को फोन करके सतर्क कर दिया.

कुछ दिन रहने के बाद ननकू शहर चला गया पर मीना के दिल में भय सा बैठ गया.

इधर गाँव वालों को भी को मीना के घर चिन्टू का रोज रोज का आना-जाना अखरने लगा. एक दिन एक पड़ोसन ने मीना को कह दिया- पराये जवान लड़के का इस तरह घर में आना-जाना ठीक नहीं … तेरी बेटी जवान हो चुकी है, उसका तो कुछ तो ख्याल कर!
मीना उसकी बात तो ताना समझ कर क्रोध में बोली- अपने घर की फ़िक्र मैं खुद कर लूंगी. तुझे क्या लेना है?

चिन्टू मीना के घर अब बेखटके और बिना किसी रोक टोक के आने जाने लगा था. आस पास रहने वाले लोगों को भी अब उन दोनों पर शक होने लगा था.

आखिर एक बार जब ननकू गाँव आया तो उसके एक पड़ोसी ने उसे बताया- ननकू, मेरी बात का बुरा मत मनाना लेकिन यह सच है कि तेरी भाभी का भानजा चिन्टू तेरी गैर-मौजूदगी में तेरे घर अक्सर आने लगा है. मुझे लगा कि यह बात तुझे बतानी चाहिए, अब तू जान तेरा काम जाने! लेकिन यह सबके लिए अच्छी बात नहीं है.

यह बात सुन कर ननकू को भी महसूस हुआ कि कुछ ना कुछ गड़बड़ तो है.
उसने अपनी जोरू मीना से थोड़ा रौब से पूछा- ये चिन्टू का यहाँ रोज रोज आने का क्या काम? क्या चक्कर है ये?

अपने पति की बात सुन मीना के हृदय की धड़कन बढ़ गई- ये आप क्या कह रहे हैं? वो आपका रिश्तेदार है तो कभी कभार आपके घर आ जाता है. इसमें क्या गलत है?
“घर में जवान बच्ची है. वो भी जवान है, तू समझ बात को … तू उसे यहां आने से मना कर दे.” ननकू ने कहा.

“मैं अपनी बेटी का पूरा ख्याल खुद रख रही हूँ. पर आपने कभी मेरे बारे में सोचा कि आपके बिना मैं यहाँ कैसे रह रही हूं?”

“तुम लोगों के लिए ही तो मैं बाहर रहता हूं. जरा सोचो क्या तुम्हारे बिना मुझे वहां अच्छा लगता है क्या?”
ननकू को मीना की इस बात से विश्वास हो गया कि उसके पड़ोसी ने उसे उसकी जोरू और भानजे चिन्टू के बारे में जो कुछ भी कहा है, वो सच है.

ननकू तीन दिन घर में रुका और फिर अपनी नौकरी पर कानपुर लौट गया. पर अबकी बार काम में उसका दिल नहीं लगा. उसे लगने लगा कि जैसे उसका घर-बार उजड़ जाएगा.

आखिर शक मन में लिए एक रोज अचानक ननकू नौकरी से छुट्टी ले गाँव आ गया. उसने घर में कदम रखा तो घर में कोई नजर नहीं आया. उसने अंदर के कमरे का दरवाजा खोला तो वो सन्न सा रह गया; उसकी बीवी उसके भानजे चिन्टू की बांहों में नंगी पड़ी थी और चिन्टू भी सर से पाँव तक पूरा नंगा था. मीना ने चिन्टू के यौन अंग को हाथ में पकड़ रखा था और वो उसे धीरे धीरे सहला रही थी. अपनी बीवी की यह घिनौनी हरकत देख ननकू से रहा नहीं गया और उसने लाठी उठा ली और अपनी नंगी बीवी मीना को खूब पीटा. चिन्टू को भी दो चार लाठी पड़ी लेकिब वो बच कर भाग गया. नंगी मीना कहाँ जाती भाग कर!

लेकिन इतना सब होने के पश्चात भी मीना के चेहरे पर कोई खौफ न था, वह चीखकर बोली- यह जो तुम देख रहे हो, इस सबमें मेरी कोई गलती नहीं, बल्कि तुम्हारी गलती है. मैंने पहले ही कहा था न कि मुझे अपने साथ ले चलो पर तुमने मेरी बात पर गौर नहीं किया.

लेकिन ननकू का क्रोध सातवें आसमान पर था. वह इस बात से परेशान था कि उसकी बीवी मीना ने अपना मुंह काला करते समय रिश्तों का भी ख्याल नहीं रखा. चिन्टू तो उसके बेटे जैसा है.
परन्तु उसने खुद पर काबू करते हुए कहा- जो हुआ सो हुआ, अब मैं आगे ये सब नहीं होने दूँगा. मैं अब यहीं रहूँगा.
“यहीं रहूँगा … क्या मतलब?” मीना ने पूछा. मीना को तन का जो सुख चिन्टू से मिल रहा था, वो सुख ननकू के बस में नहीं था, चिन्टू का नया खून था, नया जोश था उसमें … और फिर चोरी का फल तो ज्यादा मीठा लगता ही है. उसे लगा कि अगर ननकू गाँव में रहा तो उसके जिस्म को प्यासा रहना पड़ेगा. जब तक उसने गैर मर्द का स्वाद नहीं चखा था, तब तक वो अपने पति से ही खुश थी लेकिन … अब क्या होगा?

“मैं आज नौकरी छोड़ के हमेशा के लिये गाँव में आ गया हूं. यहीं रहकर किसी जमींदार के पास खेती का काम कर लूंगा. फिर देखूंगा तुझे और उस हराम के जने चिन्टू को!” ननकू ने कहा.

ननकू के नौकरी छोड़ गाँव में रहने की बात सुन मीना परेशान हो गयी क्योंकि अब उसे चिन्टू से मिल कर अपनी कामवासना शांत करने का अवसर नहीं मिल सकता था. मीना ने चिन्टू को सारी बात बताई और उसे होशियार रहने को कहा. वह किसी भी हालत में चिन्टू से अपने सम्बन्ध तोड़ने की बात नहीं सोच सकती थी. तन की आग होती ही ऐसी है.
मीना ननकू से नफरत करने लगी.

इधर ननकू को भी अपनी दुराचारी बीवी से नफरत हो गई थी. लेकिन उसकी बेटी जवान थी तो उसकी चिंता भी थी इसलिए वह मीना की इस हरकत को पी गया.

ननकू अब चौकस रहने लगा था लेकिन फिर भी मीना और चिन्टू मौका पाकर घर से बाहर खेत खलिहान में मिलने लगे. मौसी भांजे प्रेमी जोड़े की ये हरकतें भी ननकू को पता चल गयी. उसने अपनी जवान बेटी की खातिर मीना को दोबारा समझाया लेकिन मीना अपनी दुराचारी हरकतों से बाज नहीं आई. घर का माहौल काफी बिगड़ गया था.
रोज रोज की मार पिटाई से मीना को लगा कि अब वो ननकू संग और ज्यादा नहीं रह सकती. वह चिन्टू के साथ अपनी अलग गृहस्थी बसाना चाह रही थी.

उधर चिन्टू के मन में कुछ और ही खिचड़ी पक रही थी. उसने अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से मीना की युवा बेटी को फुसला लिया और एक दिन चिन्टू ने उसे भी अपने बिस्तर की रानी बना लिया.

आखिर मीना की आँखें तब खुली जब उसने अपनी आँखों से अपनी बेटी को अपने प्रेमी के संग हमबिस्तर होते देखा.

अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत …

रचनाकार फुलवा की पिछली प्रकाशित रचना थी: सफ़ेद चादर

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