कमाल की हसीना हूँ मैं-32

(Kamaal Ki Haseena Hun Mai- Part 32)

“आज मैं आपके बेटे की बीवी हूँ।”

“लेकिन पहले तू मेरी सेक्रेटरी है। यहाँ पर तू मेरी सेक्रेटरी बन कर आई है… मेरे बेटे की बहू नहीं ! और सेक्रेटरी का काम होता है अपने एंपलायर को खुश रखना। देखा नहीं यहाँ मौजूद दूसरी सेक्रेटरियों को?”

“क्या हो गया है आज आपको?” मैंने थूक निगलते हुए कहा।

“मुहब्बत ! तुझे आज जी भर कर मुहब्बत करना चाहता हूँ।” आज ससुर जी के मुँह से इस तरह की बातें सुनकर अजीब सा लग रहा था।

ताहिर अज़ीज़ खान जी हमेशा से ही एक सोबर और मर्यादित आदमी रहे हैं। मैंने जब निकाह से पहले इतनी कोशिश की थी उन्हें उत्तेजित करने की, तब भी नहीं हिले थे अपने असूलों से। अगर वो चाहते तो मेरी सील तोड़ने का क्रेडिट, मौका मैं उन्हीं को देती। मैं तो चाहती ही थी उनकी मिस्ट्रेस मतलब रखैल बनना। मगर उनके ऊँचे ख्यालातों ने मेरी एक नहीं चलने दी थी। लेकिन वो ऊँचे असूलों का पुतला आज कैसे सैक्स के दलदल में गोते खा रहा है।

थोड़ी बहुत चुहलबाजी, थोड़ा लिपटना, थोड़ा मसलना ये सब तो मैं भी पसंद करती थी क्योंकि उन्हें मैं हमेशा ही मन से चाहती थी। मगर उनके साथ सैक्स? मैं असमंजस में फ़ँस गई थी। शराब का नशा तो मुझे भी था पर इतना भी नहीं था।

समझ में नहीं आ रहा था कि आज वो कैसे अपना ओहदा, अपनी मर्यादा, हम दोनों के बीच का रिश्ता, सब भूल कर इस तरह की बातें कर रहे हैं।

“अब्बू आपने आज बहुत पी रखी है ! आप आज अपने कंट्रोल में नहीं हो ! आप यहीं आराम करो… मैं दूसरे कमरे में जाती हूँ।” मैंने दरवाजे की तरफ़ अपने कदम बढ़ाये ही थे कि उनकी कड़कती आवाज से मेरे कदम वहीं रुक गये।

“खबरदार… अगर एक भी कदम आगे बढ़ाया तो ! जैसा कहता हूँ वैसा कर… नहीं तो आज मैं तेरे साथ जबरदस्ती करने से भी नहीं चूकूँगा।”

“अब्बू क्या हो गया आज आपको ! हम दोनों का रिश्ता बदनाम हो जायेगा। अगर किसी को पता चल गया तो लोग क्या कहेंगे?”

“तू उसकी चिंता मत कर ! किसी को पता ही नहीं चलेगा। यहाँ अपने वतन से दूर हमें जानने वाला है ही कौन। और तू रिश्तों की दुहाई मत दे। एक आदमी और एक औरत में बस एक ही रिश्ता हो सकता है और वो है हवस का रिश्ता। जब तक यहाँ रहेंगे… हम दोनों साथ रहेंगे। अपने घर जा कर तू भले ही वापस मुझसे पर्दा कर लेना।”

“ऐसा कैसे हो सकता है? हम दोनों के बीच एक बार जिस्म का रिश्ता हो जाने के बाद आप क्या सोचते हैं कि कभी वापस नॉर्मल हो सकेगा?”

“तू जब तक यहाँ है, भूल जा कि तो मेरे बेटे की बीवी है, भूल जा कि मैं तेरा ससुर हूँ, तू बस मेरी सेक्रेटरी है। अगर तेरा निकाह मेरे बेटे से नहीं हुआ होता तो हम यहाँ क्या करते?”

“फिर तो बात दूसरी ही होती !” मैंने कहा।

“तू समझ कि अब भी वही बात है, तू केवल मेरी सेक्रेटरी है। देखा नहीं… सारी सेक्रेटरीज़ अपने बॉस के साथ कैसे खुल्लम-खुल्ला सैक्स कर रही थीं।”

लेकिन मैं अभी भी झिझक नहीं छोड़ पा रही थी। ताहिर अज़ीज़ खान जी उठे और कमरे में बने मिनी बार से व्हिस्की की एक बोतल लेकर उन्होंने एक गिलास में डाली और मेरे होंठों से लगा दी।

“ये ले… तेरी झिझक इससे कम होगी और नशे में तुझे मज़ा भी ज्यादा आयेगा।”

मेरी धड़कनें तेज़ चल रही थीं और इस हालात में मुझे इसकी सख्त जरूरत थी। मैंने दो घूँट में ही वो तगड़ा पैग खाली कर दिया। वो कमरे में कुर्सी-टेबल खिसका कर जगह बनाने लगे।

इतने में मैंने वो बोतल ही उठा ली और दो-तीन घूँट व्हिस्की के सिप किये, मैं चाहती थी कि मुझे इतना नशा हो जाये कि मैं खुलकर बिना किसी झिझक के उनका साथ दे सकूँ।

ससुर जी ने फिर मुझे खींच कर बीच में खड़ा कर दिया, अंदर कुछ नहीं पहना होने के कारण मेरे बूब्स बुरी तरह इधर-उधर हिल रहे थे। फिर वो मेरे हाथों को अपने हाथ में थाम कर थिरकने लगे। मैं भी एक हाथ में बोतल पकड़े धीरे-धीरे उनका साथ देती हुई डाँस करने लगी।

कुछ ही देर में मुझ पर नशा हावी होने लगा, मैं मूड में आ गई और पूरे जोश के साथ मैं म्यूजिक पर थिरकने लगी।

ताहिर अज़ीज़ खान जी ने एक झटके में अपने जिस्म पर पहने गाउन को अलग किया। वो अंदर कुछ भी नहीं पहने हुए थे। वो पूरी तरह नंगे हो गये थे। अपने गाउन को वहीं छोड़ कर वो वापस जाकर बेड पर बैठ गये।

अब मैंने भी झिझक छोड़ कर खुद को समय के हवाले कर दिया और कमरे के बीच में थिरकने लगी। यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं।

“मेरी ओर झुक कर अपनी छातियों को हिलाओ !” ताहिर अज़ीज़ खान जी ने कहा।

मैंने वैसा ही किया। उन्होंने अब मुझे टॉप उतारने के लिये इशारा किया। उनके सामने नंगी होने का यह पहला मौका था। मैं झिझकते हुए अपने हाथों से अपनी टॉप को पकड़ कर ऊँचा करने लगी। जैसे-जैसे टॉप ऊँचा होता जा रहा था, मेरे बेशकीमती खजाने के दोनों रत्न बाहर निकलते जा रहे थे।

मैंने अपनी टॉप को निकाल कर अपने हाथों से पकड़ कर एक बार सिर के ऊपर हवा में घुमाया और फिर उसे ताहिर अज़ीज़ खान जी की तरफ़ फ़ेंक दिया। टॉप सीधा जा कर उनकी गोद में गिरा।

ताहिर अज़ीज़ खान जी उसे उठा कर कुछ देर तक सूँघते और चूमते रहे।

मैं टॉपलेस हालत में थिरक रही थी और बीच-बीच में बोतल से व्हिस्की सिप कर रही थी। थोड़ी-थोड़ी देर में अपने बूब्स को एक झटका देती तो दोनों बूब्स उछल उठते।

मैं डाँस करते-करते ताहिर अज़ीज़ खान जी के पास पहुँची और उनके होंठों के सामने अपने दोनों बूब्स को थिरकाने लगी। मैंने अपने एक मम्मे को अपने हाथों से थाम कर ऊँचा किया। फिर निप्पल को अपनी उँगलियाँ से खींच कर उनके होंठों के पास ले गई।

जैसे ही ताहिर अज़ीज़ खान जी ने अपने होंठ खोल कर मेरे सीने पर झपटा मारा तो मैं किसी मछली की तरह उनकी पकड़ से निकल गई।

इतने दिनों की आस आज पूरी हो रही थी, ताहिर अज़ीज़ खान जी को तरसाने में खूब मज़ा आ रहा था।

ताहिर अज़ीज़ खान जी का लंड उनकी घनी झाँटों के बीच खड़ा हुआ झटके खा रहा था। मैंने उसे एक बार अपनी मुठ्ठी में लेकर उसे ऊपर से नीचे तक सहलाया और फिर छोड़ दिया। मेरी इस हरकत से उनके लंड के ऊपर एक बूँद प्री-कम चमकने लगा।

ताहिर अज़ीज़ खान जी ने अपने सूखते हुए होंठों पर अपनी जीभ फ़िरा कर मुझे स्कर्ट उतारने के लिये इशारा किया।

मैंने स्कर्ट के इलास्टिक में अपनी उँगलियाँ डाल कर उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखें मेरी स्कर्ट से चिपकी हुई थीं। वो उतावले हुए जा रहे थे।

मैंने उन्हें कुछ और परेशान करने का सोचा, मैंने अपनी स्कर्ट थोड़ी सी ही खिसकाई जिससे मेरी चूत अभी भी नंगी नहीं हुई थी। थिरकते हुए मैं फिर उन्हें चिढ़ाने के लिये उनके नज़दीक गई और अपनी एक टाँग उठा कर अपना पैर उनकी गोद में रख दिया और उनके खड़े लंड को अपने सैंडल के तलवे और ऐड़ियों से सहलाने लगी। उनके लंड का प्री-कम छलक कर मेरे पैरों के नाखूनों और सैंडल की पट्टियों पर गिर पड़ा।

फिर मैं थिरकते हुए उनसे दूर हटी और मैंने उनकी तरफ़ अपनी पीठ कर ली और अपनी स्कर्ट को धीरे-धीरे नीचे कर दिया। वो मेरी मोटी-मोटी गाँड को ललचाई नजरों से देख रहे थे।

मैं अब खड़े होकर अपने जिस्म को म्यूजिक पर थिरकाने लगी। कुछ देर बाद मैं धीरे-धीरे सामने की ओर मुड़ी। मेरी नंगी चूत अब उनके सामने थी। वो एकटक मेरी सिल्की चिकनी चूत को निहार रहे थे।

अब तो उन्हें अपने ऊपर कंट्रोल करना मुश्किल हो गया। वो उठे और मुझे बाँहों में लेकर मेरे साथ कमर हिलाने लगे। वो मेरे पीछे से सटे हुए थे। हमारे नंगे जिस्म एक दूसरे से रगड़ खा रहे थे।

मेरी चूत गीली हो गई थी। उनका लंड मेरे दोनों नितंबों के बीच जगह तलाश कर रहा था। उनके हाथ मेरे जिस्म पर फ़िसल रहे थे। सामने आदमकद आईने में मैंने हम दोनों के अक्स को एक दूसरे से गुंथे हुए देखा तो उत्तेजना और बढ़ गई।

उन्होंने मुझे आईने में देखते हुए देखा तो मुस्कुरा कर मेरी दोनों बगलों में अपने हाथ डाल कर सामने मेरे मम्मों को सहलाने लगे। मैं अपने सुंदर मम्मों को ताहिर अज़ीज़ खान जी के हाथों से मसले जाते देख रही थी।

मेरी पीठ उनके सीने से लगी हुई थी। मैंने अपना सिर पीछे की ओर कर के उनके कंधे पर रख दिया। साढ़े-चार इंच ऊँची हील के सैंडल पहने होने से मेरा कद उनके कद से मेल खा रहा था। उनके हाथ मेरे दोनों बूब्स को बुरी तरह मसल रहे थे। आईने में हमारा ये पोज़ बड़ा ही सैक्सी लग रहा था।

कहानी जारी रहेगी।

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