चचेरी बहनें-1

प्रेषक : पाण्डेय कुमार

मैं हरी पटना से, मेरी उम्र 35 वर्ष है। मैं एक दूर के चाचा के लड़के के साथ बिजनेस करता हूँ जो हमारे घर के बगल में ही रहते हैं।इस कारण चाचा के घर मेरा रोज का आना जाना लगा रहता है। चाचा की दो बेटियाँ हैं, दोनों की शादी हो चुकी है। सबसे बड़ी बेटी ही है जिसका नाम डौली है। डौली मुझसे तीन साल की छोटी है। छोटी बेटी का नाम जौली है जो अपने ससुराल में ही रहती है और वह मुझसे पाँच साल छोटी है।

डौली का अपने पति के साथ कुछ लड़ाई हो जाने के कारण अब अपने मायके में ही रहना हो रहा है। मैं और डौली शुरू से दोस्तों की तरह रहते थे। दोनों ही एक दूसरे का दु:ख-सुख का ख्याल रखते थे और यह अभी तक बरकरार है।

उसके पति से अलग होने के कारण उसके प्रति मैं थोड़ा ज्यादा ही ध्यान रखता था। इस कारण हम लोगों में कुछ और नजदीकियाँ बढ़ गई। उसकी आँखों में वासना साफ दिखती थी लेकिन कुछ बोलने से वह डरती थी, लेकिन उसकी बोली एवं मेरे सामने रहने के ढंग में बहुत परिवर्तन दिखता था। अब मेरा भी मन उसके प्रति डोलने लगा था लेकिन एक डर हमारे मन में भी था, यानि वासना की आग दोनों तरफ बराबर लगी थी लेकिन दोनों एक दूसरे से कहने में डर रहे थे।

वह जब भी अब मेरे सामने आती तो अपना दुपट्टा नहीं ओढ़ती थी। उसके वक्ष का उभार देखकर हमारा मन करता कि अभी उसके चूचों को खूब मसलने लगूँ। वह जानबूझ कर हमारे सामने किसी बहाने झुक कर बात करती। उसके अन्दर का माल देखकर मेरा लण्ड लोहे की तरह कड़ा हो जाता, लगता कि अभी पटक कर चोद दूँ लेकिन डर कर कुछ नहीं कर पाता था।

एक बार किसी बात पर हम दोनों में शर्त लगी।

डौली बोली- अगर तुम शर्त हार गए तो मुझे कहीं घुमाने ले जाओगे।

मैंने कहा– ठीक है। लेकिन मैं जीत गया तो?

डौली बोली– तुम जो चाहो।

मैंने कहा– सोच लो।

डौली बोली- मैंने सोच लिया। तुम जो बोलोगे मैं वही करूँगी। वैसे तुम क्या चाहते हो?

मैंने बोला– नाराज तो नहीं होगी?

डौली– नहीं।

मैंने कहा- तुम्हारे ओंठों को मैं काटूँगा।

डौली- धत्त ! कोई देख लेगा तो हम दोनों बदनाम हो जाएँगे।

मैंने कहा- घर पर तो कोई है ही नहीं, तो देखेगा कौन?

वह बोली- ठीक है।

और वह जानबूझ कर शर्त हार गई। मैंने उसे अपने बाहों में लेकर उसके ओंठ को अपने दांतों से हल्का सा दबाया। वह मदहोश होने लगी। फिर मैं उसके ओंठों को चूसने लगा, वह भी मेरा साथ दे रही थी।

धीरे धीरे वह भी हमारे ओंठों को पागल की तरह चूसने लगी। हम दोनों एक दूसरे को काफी देर तक चूसते रहे। एक दूसरे की जीभ भी एक दूसरे के मुँह में डालते रहे। फिर मैं अपने दोनों हाथों से उसकी चूची को दबाने लगा। उसने भी अपनी चूचियाँ खूब मलवाई।

फिर मैंने उससे कहा- डौली, तुम बहुत सेक्सी हो। तुम्हारे ओंठ बहुत रसीले हैं।

डौली बोली- तुम भी तो बहुत सेक्सी हो। तुम्हारे ओंठ भी बहुत रसीले हैं।

मैंने कहा- तुम्हारी चूची बहुत ही मस्त हैं।

वह शरमा गई।

मैंने कहा- डौली क्या तुम मुझसे चुदवाओगी?

इस पर उसने मना कर दिया, बोली- अभी नहीं हरी, बाद में। तुम मेरे साथ ऊपर-ऊपर कुछ भी कर सकते हो। हमसे कुछ भी बात कर सकते हो।

मैं भी मान गया। लेकिन उस दिन के बाद हम दोनों गन्दी गन्दी बात के अलावा एक दूसरे के खूब ओंठ चूसना और वह अपने चूचे मुझसे खूब मलवाने लगी। लेकिन इतना से मन भरता नहीं था। कल्पना में मैं उसे खूब चोदता और उसे बताता भी था।

वह भी खूब मजा लेकर सुनती थी। यह कहानी आप अन्तर्वासना.कॉम पर पढ़ रहे हैं।

लेकिन भगवान ने हमारी एक दिन सुन ली। मेरी बीवी एक महीने से ससुराल में रह रही है क्योंकि उसे बच्चा होने वाला है। इधर डौली का भाई एवम् उसके माँ-पापा एक रिश्तेदार के यहाँ शादी में एक सप्ताह के लिए रांची चले गए, यह कह कर कि डौली का ध्यान रखना और रात में यहीं आकर सो जाना।

मैंने भी झट से हाँ कह दिया और रात होने की इंतजार करने लगा। अपने घर पर खाना खा कर रात नौ बजे डौली के पास पहुँचा। दरवाजा ठीक से बंद करने के बाद पहले उसे अपने बांहों में भर लिया। कुछ देर इधर उधर की बातें करने के बाद हम दोनों एक ही बिस्तर पर लेट गए।

फिर वह बोली- मैं आती हूँ पेशाब करके और कपड़े बदल कर।

दस मिनट में वह एक नाईटी पहन कर आई और मेरे ऊपर लेटकर मेरे ओंठों को चूसने लगी। कभी मैं उसके ऊपर तो कभी वो मेरे ऊपर हो कर एक दूसरे के ओंठ चूस रहे थे। एक दूसरे के ऊपर नीचे होने से उसकी नाईटी कमर के ऊपर हो गई थी।

मैंने कहा- अपनी नाईटी उतार दो।

वह अपनी नाईटी उतारते हुए बोली- तु्म भी अपने कपड़े उतार दो।

अब वह लाल ब्रा और लाल पैंटी में गजब की सेक्सी लग रही थी। मैं भी केवल अंडरवियर में उसके ऊपर चढ़ कर उसकी चूचियों को खूब मल रहा था। फिर मैंने उसकी ब्रा को उससे अलग किया और अपना हाथ उसकी पैंटी में डाल कर उससे कहा- आज मुझसे चुदवाओगी ना?

उसने शरमा कर अपना मुँह मेरे सीने में छुपा लिया।

अब मुझसे बरदाश्त नहीं हो रहा था, मैंने उसकी पैंटी भी उतार दी और अपना अंडरवियर भी। अब हम दोनों नंगे थे। मैंने उसे बिछावन पर लेटा कर उसके दोनों पैरों को फैला कर अपने दोनों अंगुठों से उसकी बुर को फैला कर अपना लंड उसमें रगड़ने लगा।

वह पागल की तरह सिसकारने लगी- आह मेरी जान ! डाल दो ना अपना लण्ड मेरी बुर में… बहुत तड़पाते हो। आह… आह…

मैंने भी उसके ऊपर झुक कर दोनों हाथों से उसके उरोजों को मलते हुए उसके ओंठों को चूसते हुए कहा- मेरी रानी, तुमने भी तो मुझे बहुत तड़पाया है।

“….अब डालो ना जान…. मेरे राजा…. मेरे चोदने वाले जान !”

“….हाँ मेरी जान…. मेरी रानी ! मेरी जान !”

फिर मैं अपना लंड उसकी बुर में घुसाने लगा। वह भी अपना कमर को ऊपर नीचे कर के चुदवाने लगी। मैंने भी उसकी बुर की खूबचुदाई की।

लगभग आधा घंटे में मेरे लंड से गर्म-गर्म रस से उसकी बुर भर गई। उस रात हम लोगों ने दो बार चोदा-चोदी का खेल खेला।

सुबह उठ कर मैं अपने घर आ गया।

कहानी जारी रहेगी।

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