ताप के हैं चार दिन- कबीर रहीम के दोहे

(Kabeer Rahim ke Dohe)

रहीमन कूलर राख़िये.. बिना कूलर सब सून!
क़ूलर बिन ना क़िसी को.. ताप से मिले सकून!!

ऐ सी जो देखण मैं गया.. ऐ सी ना मिलया कोए!
जब घर लौटा आपने.. गर्मी में ऐसी तैसी होए!!

बिजली परचा देख के .. दिए क़बीरा रोए!
क़ूलर एसी के फेर में.. पैसा बचा ना कोए !!

बाट ना ताकिये ऐ सी की.. चला लीजिए पंखा!
चार दिन की बात है.. फिर आगे सब होगा मन का!!

पंख़ा झोलत भौर भई.. आई ना लेकिन बिजली!
मच्छर सुनाते रहे क़ान में अपनी अपनी मुरली!!

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