सम्भोग से आत्मदर्शन-23

(Sambhog Se Aatmdarshan- Part 23)

This story is part of a series:

नमस्कार दोस्तो, अब तक आपने प्रेरणा की चुदाई और बाबा की गिरफ्तारी तक की हिंदी एडल्ट कहानी पढ़ी.

अब आश्रम के अंदर की बातों और छोटी से जुड़ी बातों को और विस्तार से जानने आ वक्त आ गया था।
लेकिन उससे पहले ये जानना भी जरूरी है कि ये प्रेरणा है कौन, मुझे ये आपको दो कड़ी पहले ही रिमाइंड करा देना था, वास्तव में प्रेरणा कोई नई करेक्टर नहीं है, प्रेरणा कविता (तनु) की स्कूल की सहेली है जो स्कूल के टूर के वक्त भी कविता के साथ थी, प्रेरणा तनु की सबसे बड़ी राजदार भी थी और दोनों ने अश्लील पुस्तक भी साथ साथ देखी थी। इसलिए प्रेरणा और तनु (कविता) के मिलन पर कोई आश्चर्य या विशेष वर्णन मैंने नहीं दिया क्योंकि प्रेरणा की किशोरावस्था से लेकर जवानी तक का नजारा मैंने आपको बता दिया है।

और अब तो तनु प्रेरणा की और भी ऋणी हो गई क्योंकि प्रेरणा ने अपनी जान जोखिम में डाल कर बाबा को पकड़वाया जिससे छोटी पूर्ण रूप से ठीक हो सकी। हालांकि प्रेरणा के मन को भी इस कार्य से शांति मिली क्योंकि वह अपने पति की हत्या का बदला ले चुकी थी।
पर माहौल अभी हल्का नहीं हुआ था, इसलिए हमारे मेलजोल और हल्की मस्ती वाले माहौल की जरूरत थी, जो कि उनके बीच जाकर मैं ही कर सकता था.

प्रेरणा अभी आंटी और छोटी के साथ रह रही है, और अब मंजिल पा लेने की खुशी में धीरे धीरे सबके चेहरे खिलने लगे थे, जाहिर सी बात है ऐसे में किसी मर्द का आकर्षित होना स्वाभाविक है।
मेरा भी आकर्षण उनके प्रति बढ़ रहा था.

तभी एक दिन तनु ने शाम के नाश्ते पर छोटी से कहा- छोटी तुम्हारे साथ क्या घटा था, क्या अब तुम बता सकती हो?
छोटी इस सवाल से थोड़ा चौंक सी गई पर घोर आश्चर्य नहीं किया क्योंकि उसे आज नहीं तो कल इस बारे में तो बताना ही था।

प्रेरणा भी छोटी का चेहरा देखने लगी क्योंकि अभी अभी वो भी अनुभव लेकर आई थी और उसके बाद उसे भी बताना था। छोटी अपने उस दर्द भरे पल को ही सोच कर ही सिहर उठी, उसकी आंखों में आंसू आ गये।

छोटी ने लंबी सांस ली और कहा- मैं उस पल को हमेशा के लिए भूल जाना चाहती हूँ, पर आप लोगों को उस पल की भयावहता को संक्षिप्त में बता रही हूँ, आप लोग वादा कीजिए कि फिर मेरे बताने के बाद दुबारा इस विषय में बात नहीं करेंगे।
सबने हाँ में सर हिलाया, और छोटी ने फिर बोलना शुरू किया:

बाबा के पास जाने के पहले मुझे रोहन की मौत का झटका लगा था और उसके अलावा मैं क्यों परेशान थी ये सब तो तुम लोग जानते ही हो। पर उस वक्त की गलतफहमी की वजह से मुझे माँ बाबू जी ने बाबा को इलाज के लिए दिखाया।
तब तक सब कुछ ठीक था, पर उन्होंने मेरे इलाज के लिए विशेष अनुष्ठान की बात कही जो अमावस्या के दिन रखा गया था।

ऐसे अनुष्ठान आश्रम में खास मौकों पर ही होते हैं इसलिए साल में आठ दस बार ही ये अनुष्ठान रखे जाते हैं। उनके इन अनुष्ठानों के दिन तय होते हैं, जिसके लिए वे अक्षत यौवनाओं को शिकार बनाते हैं, बाबा के साधिकाएं लड़की के अक्षत यौवना होने की पुष्टि पहले ही कर चुकी होती हैं।

इस अनुष्ठान को एक भीतरी हाल में संपन्न करने के बाद बाबा लड़की को गुप्त ज्ञान देने गुप्त कक्ष में ले जाता है, जहाँ वह उस अक्षत यौवना का सील भंग कर उसकी योनि से निकले खून को एक चांदी के पात्र में रख लेता था, और फिर अनुष्ठान की अग्नि में उसके कुछ बूंद डाल कर पूर्णाहुति दी जाती थी।

मेरा दुर्भाग्य यह था कि मैं उनके अनुष्ठान के कुछ दिन पहले ही वहाँ पहुँच गई, और उन्हें इस समय तक कोई शिकार नहीं मिला था, इसलिए उन्होंने मेरा ब्रेनवाश किये बिना ही मुझे अनुष्ठान में शामिल कर लिया। उनके इस विशेष अनुष्ठान की ज्यादातर शिकार बदनामी और मौत के डर से अपना मुंह बंद कर लेती हैं और बहुत सी लड़कियां इसे सच में बाबा की कृपा या भगवान का आशीर्वाद समझ लेती हैं, और कुछ लड़कियां मेरे जैसा विरोध करके अपने प्राण भी गंवा देती है, जैसे कि मैं मरते मरते बची।

उस आश्रम में एक बात और थी कि हर बात हर कोई नहीं जानता था, हर कोई सिर्फ उतना ही बता सकता था जो उसके साथ घटित हुआ है या उसे वो कार्य सौंपा गया है।

छोटी की इस बात पर प्रेरणा ने भी अपना सर हाँ में जोरों से हिलाया, चूंकि प्रेरणा भी वहाँ से रह के आई थी इसलिए वो छोटी की बातों पे मोहर लगा रही थी।

मुझे अनुष्ठान में बिठाने के लिए साधिकाओं द्वारा पूर्ण निर्वस्त्र किया गया, फिर गंगाजल और दूध से स्नान कराया गया, कम उम्र में ऐसे भी त्वचा में कसावट होती है, और ऐसे स्नान से मेरी काया और चमक उठी साथ ही बाबा की आंखों में भी चमक आने लगी।
उस कमीने भोगानंद बाबा ने मुझे देखते ही कहा- बारह बरस के इस महायज्ञ में मैंने पांच वर्ष पूरे कर लिए पर आज तक इस कन्या जैसी भोग प्रसाद हमारे हाथ नहीं आई थी।

मुझे वहाँ सब कुछ अजीब लग रहा था, पर मैं पहले ही दिमागी तौर पर कमजोर थी, इसलिए कुछ सोचना समझना मेरे वश का ना था, मैं तो बस उनके हाथों कि कठपुतली ही थी।

फिर उन्होंने अपने अनुसार सारे कार्य किये और वो वक्त भी आ गया जब बाबा के दो साधिका ने मुझे उठा कर गुप्त कक्ष में पहुंचा दिया, साथ ही बाबा भी आ गये मुझे एक मेज पर लेटा कर पैर को फैला दिया गया, वो दोनों तो पहले से ही निर्वस्त्र थी ही, अब बाबा भी निर्वस्त्र हो गये, और उन दोनों ने बाबा का लंड चूस कर खड़ा कर दिया।

बाबा मेरी ओर बढ़ा, तब पता नहीं कैसे मुझे अहसास हुआ कि मेरे साथ क्या होने वाला है, मैं झटपटाने लगी, मैं अब तक शांत थी और अचानक ही ऐसा करने लगी इसलिए वो मुझे संभाल ना सके, मैं मेज से नीचे गिर गई, तभी मेरे हाथों में उनके नींबू काटने वाला एक चाकू हाथ में आ गया, वो चाकू छोटा था किसी को मौत नहीं दे सकता था, लेकिन मेरी सुरक्षा के लिए वही बहुत था, मैं पागल तो थी ही पर अभी मुझे अपनी जान और इज्जत सब जोखिम में नजर आने लगा इसलिए मैं उग्र हो गई।

बाबा मेरी ओर बढ़े तो मैंने चाकू घुमा दिया जिससे उसकी जांघ में गहरा चीरा लग गया। इस समय तक चार साधक दौड़ के अंदर आ गये थे, उन्होंने पीछे से आकर मेरा हाथ पकड़ा और चाकू छुड़ा दिया और मेज पर फिर लिटा दिया, मेरे हाथ पैर चार हृष्ट पुष्ट साधकों ने पकड़ रखे थे.

बाबा शील भंग करने का अनुभवी था, उसने मिनटों में अपना काम कर लिया और एक साधिका ने मेरी योनि का रक्त चांदी के पात्र में रख लिया, उन्हें पूर्णाहुति के लिए अक्षत यौवना का रक्त मिल चुका था, उन्हें मेरे रोने चीखने का कोई असर भी नहीं होना था क्योंकि वो तो आदतन अपराधी थे।

अब बाबा ने मेरे हमले और विरोध के बदले के लिए मुझे अपने साधकों को सौंप दिया और आदेश दिया कि प्रथम श्रेणी के सभी साधक इस दुष्ट कन्या के सभी छिद्रों का बेरहमी से भोग करें। संभवतः उस आश्रम की प्रथम श्रेणी में पंद्रह से बीस साधक रहे होंगे।

प्रेरणा ने इस बार फिर जोर से हां में सर हिलाया, क्योंकि वो आश्रम व्यवस्था को अच्छे से जानती थी।

फिर मुझे एक कक्ष में उठा कर ले जाया गया और उसके बाद मेरे साथ किसने क्या किया कितना किया कब तक किया ये बता पाना मेरे लिए मुश्किल ही है, क्योंकि वहाँ हर कोई वहशी था, वहशी शरीर, वहशी लंड और वहशी व्यवहार की मार मैं बीस मिनट भी नहीं सह पाई और बेहोश हो गई थी। फिर भी वो लोग मुझे नोचते रहे, वो तो चाहते थे मैं मर जाऊँ पर शायद ऊपर वाला मुझे बचाना चाहता था, मुझे सीधे दूसरे दिन होश आया, तब मुझे मेरे कपड़े पहना दिये गये थे और आश्रम के बाहर जंगल में लिटा दिया गया था, मेरे हाथों में एक कागज था जो किसी ने मुझे पकड़ा दिया था.
उसमें लिखा था- मुझे तुम्हें मार कर फेंकने का आदेश मिला है, पर मैं तुम्हें जिंदा छोड़ रहा हूं, मैं सब कुछ कर सकता हूँ पर हत्या करने में मेरे हाथ कांप गये। जब तुम्हें होश आये तो तुम घर चली जाना, और अपने लिए ना सही मेरी सलामती के लिए अपना मुंह बंद रखना।

मेरा सर दुख रहा था, शरीर तो जैसे शून्य हो चुका हो। मैं लड़खड़ाती, हुई घर की ओर बढ़ रही थी तभी रास्ते में बाबू जी मिल गए वो मुझसे ही मिलने आश्रम आ रहे थे. उनको देख कर मैंने उस कागज को तुरंत फाड़ दिया, फिर जब बाबू जी और अंकल ने पूछा- तुम अकेले कैसे आ रही हो?
तो मैं सिर्फ इतना ही बता पाई कि उनका अनुष्ठान हो गया और उन्होंने मुझे जाने को कहा और मैं बाबू जी से लिपट गई, वो मुझे घर ले आये।

घर में मैं माँ से लिपट गई और कहा- अब दुबारा आश्रम मत भेजना.
छोटी की इस बात पर रोक कर आँटी ने कहा- और मैंने कहा ‘हाँ बेटी, तू जैसा कहेगी वैसा करेंगे।’
फिर आँटी ने हमें बताया कि मुझे छोटी की हालत देख कर उसके साथ घटित घटना का अहसास हो रहा था, पर इज्जत लड़की की लुटने पर भी समाज लड़की को ही प्रताड़ित करता है, और छोटी कुछ दिनों में ठीक हो जायेगी तो सब ठीक हो जायेगा सोचकर मैंने भी चुप्पी साध ली।

शायद मैंने चुप्पी साध कर गलती ही की थी क्योंकि छोटी उस सदमे से उबर ही नहीं पाई और कुछ दिनों बाद बाबा के आदमी छोटी का पता लगाने आये थे, वो जानना चाहते थे कि छोटी से उनको कोई खतरा है या नहीं… पर मैंने उन्हें आश्वस्त कर दिया कि छोटी सब भूल चुकी है उसका पागलपन बढ़ गया है और उसने किसी को कुछ नहीं बताया है।

छोटी अपनी व्यथा कह कर अपने माँ से लिपट गई.

हम सभी की आंखों में आंसू थे, माहौल बहुत गंभीर था तभी प्रेरणा ने अपने आंसुओं को पौंछते हुए कहा- तभी उस ढोंगी बाबा ने मेरा पहला शिकार नहीं किया, मुझे अपने साधकों के लिए छोड़ दिया, उसकी खास पसंद अक्षत यौवना कन्याएं हैं, और उनके अलावा वो अपने पसंद की कुछ खास साधिकाओं के साथ ही सेक्स करता है।
जब आश्रम में मुझे शामिल करने के लिए मेरा शुद्धि करण किया गया तब मेरे साथ भी सभी कुछ छोटी जैसा हुआ, पर मेरे साथ एक बात और होनी थी जिसका अनुमान मुझे पहले ही था, वो है ग्रुप सेक्स.. मेरा सामूहिक उपभोग होना था जिसमें मेरी रजामंदी और खुशी भी होनी थी, तभी मुझे उस आश्रम में साधवी बनाया जा सकता था। वहाँ रह रही सभी साधवी इस परीक्षा से गुजर कर ही आश्रम की सदस्य बनी थी।

अनुष्ठान के पहले मेरे पास दो साधिका आई और उन्होंने मुझसे पूछा कि मैंने कितने लोगों से सेक्स किया है, मेरा सेक्स ज्ञान कैसा है, मैंने उन्हें अपने जवाब से संतुष्ट किया और साथ ही ये भी जानने का प्रयास किया कि मेरे साथ बाबा सेक्स करेंगे या नहीं, तब मुझे अनुमान लग गया कि बाबा के पास या उस गुप्त कक्ष तक पहुंचने में अभी मुझे समय लगेगा इसलिए मैंने उस छोटे ट्रांसमीटर और वीडियो कैमरे को जिन्हें मैंने अपनी गांड की छेद में छुपाया था, निकाल कर वहीं एक गमले की मिट्टी में गड़ा कर छुपा दिया, वो वाटप्रूफ थे इसलिए उनके खराब होने का डर नहीं था और मैंने सोचा कि एक बार यदि मैं इस आश्रम की सदस्य बन गई तो फिर मैं इन्हें जब चाहूं जहा चाहूं लगा लूंगी।

अब मुझे ले जा कर अनुष्ठान किया गया और फिर एक कक्ष में ले जाया गया जहाँ गोलाकार बिस्तर लगा था, मेरी सामूहिक चुदाई वहीं होनी थी, और उस चुदाई के आखिर में ही अनुष्ठान पूर्ण माना जाता।

मैं पूर्ण नग्न अपने हर अंग में चमक लिए हुए उनके लंड को सलामी देने पर मजबूर कर रही थी, उस कमरे में एक एक करके साधक घुसते रहे और मैं गिनती कर रही थी ये कितने कमीने मुझे एक साथ चोदेंगे तीन.. चार तक ज्यादा डर नहीं लगा क्योंकि उतना तो मैंने सोच ही रखा था, पर जब पांचवें, छटवें और सातवें साधक ने उस कक्ष में प्रवेश किया तो मेरी गांड पहले से फटनी शुरू हो गई।
मैं डर रही थी कि और भी कोई ना आ जाये.

तब मुझे दिशा निर्देश देने और सिखाने के लिए दो साधवी वहाँ आई वो भी निर्वस्त्र ही थी और गजब की खूबसूरत भी थी, उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया, और बताया कि ये सात साधक बाबा जी से विशेष दीक्षा प्राप्त साधक हैं, अभी जो तुम्हारे साथ होने वाला है उसे सप्तक भोग कहा जाता है, इसमें तुम्हें इन सातों से एक साथ चुदना होगा।
अगर तुम ये सब अपनी स्वेच्छा और खुशी से करोगी तो तुम्हें आनन्द मिलेगा और अनिच्छा में करोगी तो कष्ट होगा, यह एक तरह की काम साधना है, इसके जरिये तुम अपनी इंद्रियों पर काबू पा सकती हो। आज तुम्हारा प्रथम दिवस है इसलिए आज हम तुम्हें आसन और काम क्रीड़ा के संबंध में सहयोग करेंगी, पर इन सातों को तुम्हें अकेले ही संतुष्ट करना है.
फिर मुझसे पूछा कि क्या तुम इस सप्तक भोग के लिए तैयार हो?
मैंने बिना मन के मुस्कुराहट बिखेरी और हाँ में अपना सर हिलाया।

हम सब दम साधे प्रेरणा की बात सुन रहे थे, कौतुहल और क्रोध के बीच वासना के प्रभाव से मेरा लंड अकड़ने लगा और प्रेरणा को मिला कर कुल चार औरत वहाँ बैठी थी, और मेरा अनुमान है कि उनकी चूत में भी प्रेरणा की इस चुदाई को सोच कर ही पानी आ गया होगा।

फिर प्रेरणा ने कहा- मुझे उस सप्तक भोग में पहले पीड़ा हुई, फिर आनंद आया और अंत में मैंने उनके वीर्य को पीकर परीक्षा पास कर ली, फिर मैं उस आश्रम की साधवी बन गई।

प्रेरणा ने दो लाईन में बात खत्म कर दी और हम सब उसकी पूर्ण कहानी जानने के लिए बेचैन हो उठे क्योंकि चुदाई की बातों के समय ऐसी बकरचोदी किसे पसंद आती है।

लेकिन हम सबमें सबसे ज्यादा बेचैन आंटी थी, उन से रहा नहीं गया और उन्होंने कह दिया- अरे ढंग से बता न… किसने किया, क्या किया, कैसे किया… सब कुछ अच्छे से बता! हम कहीं भागे जा रहे हैं क्या जो बात को ऐसे खत्म कर रही हो।
हम सबने एक साथ उँहहह कहते हुए हंसी के आटी के चेहरे पर नजर गड़ा दी, आंटी शरमा गई और उठ कर जाने लगी, तब मैंने ही उनका हाथ पकड़ा और बिठाते हुए कहा- आपने जो कहा, वही सब हमारे मन में भी है आप शरमाओ नहीं।

फिर भी आंटी शरमाते हुए बैठी और प्रेरणा ने गहरी सांस लेकर कहा- अच्छा बाबा ठीक है.. जब मुझे चुदने में शर्म नहीं आई तो बताने कैसी शर्म।

यहाँ पर मैं आप लोगों को यह बता देना चाहता हूं कि प्रेरणा ने सब कुछ विस्तार से बताया पर एकदम खुले शब्दों का प्रयोग नहीं किया था, कहानी में आनन्द लाने के लिए खुले शब्दों का प्रयोग मेरे द्वारा किया जा रहा है।

प्रेरणा ने कहा- मेरे हाँ में सर हिलाते ही सबसे पहले मुझे जमीन में खड़ा किया गया और सातों साधक मेरे चारों ओर एक गोला बनाकर खड़े हो गए, उन्होंने गोला उल्टा मुंह करके बनाया मेरी ओर सबकी पीठ थी, सभी साधक अभी भी धोती पहने हुए थे, उनका ऊपरी बदन नग्न था, मैं काफी देर से उनके चौड़े छाती और उन पर उगे बालों को निहार रही थी, और अब मेरे सामने उनकी दमदार पीठ, बलिष्ठ भुजा और कमर थे।

एक साधवी का आदेश मेरे कानों में टकराया- इनकी सबकी धोती खोलो, सबकी धोती एक अंदाज के साथ खोलनी है, और सभी को एक निश्चित अनुपात में समय देना है।

कहानी जारी रहेगी.
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