सम्भोग से आत्मदर्शन-19

(Sambhog Se Aatmdarshan- Part 19)

This story is part of a series:

नमस्कार दोस्तो, इस एडल्ट कहानी के पिछले भाग में अब तक आपने पढ़ा कि हम बाबा जी का पाखंड जानने आश्रम में श्रद्धालु बनकर पहुंचे थे.
अब आगे:

बाबा जी के पास चार अलग अलग तरह के कटोरे रखे थे, दो कटोरे में दवाई की गोलियों जैसा कुछ दिखा, और दो कटोरे में पर्ची ही रखी थी, अब मैं मेज के पास पहुँचा वहाँ दो मेज थोडी दूरी के अंतराल में लगे थे, उनके आस पास बहुत सी कुर्सियां लगी हुई ही, एक मेज पर दो साधु नजर आये जो पुरुषों को कुछ समझा बता रहे थे, दूसरे मेज पर दो तीन साधवीं नजर आई जो महिलाओं को समझा रही थी।

मुझे उस मेज पर कुछ खास नहीं कहा गया, मेरी पूरी जानकारी विस्तार से पूछी गई, फिर कुछ मंत्र और पूजन विधि बताई गई और कुछ महीनों में फिर से आने को कहकर जाने को कह दिया।
अब मैं वहीं एक कोने पर प्रतीक्षा करने के लिए लगाई दरी में बैठ गया।

मैंने देखा कि बाबा महिलाओं से ज्यादा बात कर रहे थे, विस्तार से बहुत सी बातें पूछते और कटोरे में रखी गोलियां भी महिलाओं के लिए ही थी, बाबा किसी किसी महिला को वो दवाई हाथ में देते और पास खड़ी साधवी उसे गिलास में पानी दे देती इस तरह वो दवाई वहीं तत्काल खिला देते।

महिलाओं के लिए इलाज के अलग तरीके की वजह से उनकी कतार बहुत देर से सरक रही थी। तनु का नम्बर अभी भी सात आठ लोगों के बाद आने वाला था, मैं तनु की बारी आने की प्रतीक्षा भी कर रहा था, और इस कौतुहल में भी था कि तनु बाबा से क्या कहेगी, क्योंकि जब मुझे पूछा गया कि मैं क्यों आया हूं तब मैं हड़बड़ा गया था।

फिर वो वक्त भी आ गया, जब तनु का नम्बर आया, मेरा ऐसा अनुमान था कि तनु कि खूबसूरती देख कर बाबा कि आँखों मे चमक आयेगी, क्योंकि वहाँ बहुत सी खूबसूरत महिलाएं होने के बावजूद तनु का रंग रूप अलग ही निखर रहा था।
और मैंने तनु को बाबा के सामने अपना पल्लू भी गिरा देने को कहा था तो तनु ने भी वैसा ही किया, पर बाबा के चेहरे पर मैंने कोई प्रभाव नहीं देखा, वो इन चीजों का बहुत अभ्यस्त था, और तनु से ठीक पहले एक दस बारह साल की लड़की से बड़े लाड़-प्यार से बात कर रहा था, उसे देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वो बाबा बलात्कारी भी हो सकता है।

बाबा के सामने तनु ने क्या कहा मुझे इतनी दूर से कुछ सुनाई नहीं दिया पर बाबा ने उसे कटोरे में रखी गोली दी और पास खडी साधवी ने पानी दिया फिर तनु ने वहीं बैठे बैठे गोली खा ली और फिर एक साधवी ने उसे कोने पर ले जाकर कुछ समझाया और जाने को कहा।

तनु और मैं थोड़े आगे पीछे निकल कर गाड़ी के पास आकर मिले, तनु ने मुझसे से पूछा- हमारे काम के लायक कुछ समझ आया या नहीं?
मैंने निराश होकर कहा- फिलहाल तो कोई खास बात हाथ नहीं लगी है, फिर भी देखते हैं कि आगे क्या होता है.
फिर मैंने तनु को पूछा- तुम्हें बाबा ने क्या पूछा था, और तुमने क्या कहा?
तनु ने कहा- चलो गाड़ी में चलते-चलते बताती हूं।

और हम गाड़ी में बैठ रहे थे, तभी तनु ने किसी को ऑटो में बैठते हुए देखा, उसके और हमारे बीच दूरी ज्यादा थी इसलिए तनु ने कहा कि गाड़ी उसके पास ले चलो, मैंने ऑटो के पीछे-पीछे गाड़ी दौड़ा दी, तनु ने बताया वो कोई और नहीं तनु की स्कूल की सहेली प्रेरणा थी, लेकिन जब हम उस ऑटो की बराबरी में भी आ गये और उसने हमें देख लिया तब भी उसने ऑटो नहीं रुकवाई।

तनु ने कहा हो सकता है कि वो मुझे पहचान नहीं रही हो, तुम एक काम करो उसे ओवरटेक कर के रोको!
पर अब तक ऑटो की गति बढ़ चुकी थी और रास्ता कहीं कहीं को छोड़कर संकरा ही था इसलिए ऑटो से जल्दी ही आगे निकल पाना संभव ना हो पाया, और फिर आश्रम से लेकर यहाँ तक तीन किलोमीटर पीछा करने के बाद ऑटो स्वयं रुकी।

उसके पीछे ही हमने भी गाडी रोकी, और हम उतर कर उस ऑटो की तरफ बढ़ ही रहे थे कि प्रेरणा खुद चलकर आई और बिना किसी अभिवादन या मेलमिलाप के हमारी गाड़ी में बैठ गई, और कहा- चलिए गाड़ी चलाइए!
मैं और तनु चौंक गये क्योंकि हमें लगा था कि उसने हमें पहचाना ही नहीं है।

मैंने कहा- पर यह तो बताओ जाना कहाँ है?
तो उसने कहा- मेरे घर..! और कहां..!
फिर उसने कविता उर्फ़ तनु को देखकर कहा- तुम लोगों ने तो घर किराए पे दे रखा है, और मेरे रहते वहाँ बेगानों जैसा कैसे रहोगे, और साली कमीनी अभी तो मुझे तेरे से बहुत सारी बातें करनी हैं!
ऐसा कहते ही उसने गलती हो जाने पर दांतों में जीभ दबा लेते हैं वैसा करते हुए कहा- सॉरी जीजा जी, वो हमारी पुरानी आदत है तो मुंह से निकल गया।
वो दोनों पीछे सीट पर थे मैं उन्हें सेन्टर आईने में देख रहा था, अब तनु (कविता) ने कहा- ठीक है हम तेरे घर जा रहे हैं, पर वहाँ रुकने की बात बाद में सोचेंगे!
फिर मस्ती में आंख मारते हुए जानबूझ कर कहा- तुझे तेरे जीजा जी कैसे लगे?
प्रेरणा भी बोल उठी- तेरी पसंद तो हमेशा लाजवाब रहती है, देख के ही मन डोल उठा, तेरी शादी में तो मैं नहीं आ पाई थी, पर बाकि जलन खोर सहेलियां कहती थी कि तेरा पति तो तेरे सामने बंदर है।

यh कहते ही प्रेरणा ने फिर गलती वाला मुंह बनाया, और मुझसे धीरे से सॉरी कहा. मैंने भी हंसकर कोई बात नहीं कह दिया, चाहता तो मैं उस समय बता सकता था कि मैं कविता(तनु) का पति नहीं हूं, पर मुझे भी उनकी नोंकझोंक अच्छी लग रही थी।
और प्रेरणा पहले कैसी थी, मुझे नहीं पता.. लेकिन आज तो लाल रंग की साड़ी और पूरे सोलह श्रृंगार में कयामत की खूबसूरत लग रही थी किसी नव विवाहिता जैसा शृंगार देख कर लग रहा था कि अभी सीधे मंडप से उठ कर आई हो।

शरीर से पतली दुबली थी, पर कमजोर नहीं थी, 30-26-32 का फिगर नजर आ रहा था। रंग एकदम सफेद नहीं था, पर चेहरे में एक विशेष अदा और बनावट थी।

अब कविता ने मेरे मन की बात छीन ली और प्रेरणा से पूछा- और तेरे वो कहाँ है, शादी आज ही हुई है क्या, जो इतने अच्छे से सजी-धजी है!
प्रेरणा ने कहा- घर तो चल, तुझे सब बताती हूं।
वो अब भी हंस रही थी, पर मैंने उसकी हंसी में परिवर्तन महसूस किया।

ऐसी कुछ बातें करते हुए आश्रम से पंद्रह सोलह किलोमीटर दूर हम एक छोटे से गांव में जा पहुंचे। उस गांव के बाहरी हिस्से में ही एक छोटा सा मकान था, जहाँ प्रेरणा ने गाड़ी रोकने को कहा, वही उसका घर था, घर के बाहर बड़ा सा ताला लटका था, प्रेरणा ने गाड़ी से उतर कर ताला खोला और अंदर आने का आग्रह किया।

वहाँ आसपास और भी लोग रहते थे, पर एकदम से सटा हुआ कोई मकान नहीं था, पहाड़ी मैदानी इलाकों में दूर-दूर बसाहट जैसा माहौल नजर आ रहा था। कविता (तनु) भी प्रेरणा के पीछे जाने लगी और कहने लगी- यार, कितना मस्त माहौल है यहाँ, वाह यार… क्या रोमांटिक जगह है ये! अब तो तू कहे ना कहे, आज रात हम यहीं रुकेंगे।
मैंने तनु को टोकते हुए कहा- तनु, पर हमारे कपड़े और सामान?

फिर तनु ने कहा- अरे यार… हम दोनों ने पहले भी एक दूसरे के कपड़े पहने हैं, और तुम इसके पति का पहन लेना.
फिर प्रेरणा को देख कर कहा- क्यूँ तेरे पति मना थोड़े ही कर देंगे?

प्रेरणा का छोटा सा तो घर था हम इतनी देर तक घर के अंदर आ चुके थे, अब तनु के उस सवाल पर प्रेरणा कि आँखें एकदम से छलक उठी और उसने किनारे पर लगे दीवान के गद्दे के नीचे से एक दस बाई बारह साइज के फोटो निकाली, और तनु को दिखाकर कहने लगी- तू ही पूछ ले, मना करेंगे या नहीं।
और इतना कह कर वो और फूट कर रोने लगी और तनु के गले लग गई।

उसका रोना और ऐसा व्यवहार यह बता रहा था कि उसका पति मर चुका है, लेकिन उसका सोलह शृंगार कुछ और ही कह रहा था। बातें उलझती जा रही थी, हमारे सारे सवालों का जवाब प्रेरणा ही दे सकती थी, पर अभी वो खुद ही काबू में नहीं थी।
तनु ने उसे समझाने कि कोशिश की तो प्रेरणा ने कहा- मुझे रोने दे कविता… जाने कब से इन आँसुओं के सैलाब को दबा के रखे हूँ, मैं तो वो बदनसीब हूं जो अपने पति को याद करके रो भी नहीं सकती।

बात अभी स्पष्ट नहीं थी इसलिए तनु ने फिर कहा- वो तुम्हें छोड़कर चला गया, या वो अब इस दुनिया में..!
तनु इतनी बड़ी बात अचानक कैसे कह देती, उसने अपनी बात अधूरी कर दी।
पर प्रेरणा ने जवाब दिया- हाँ कविता हाँ वो अब इस दुनिया में नहीं है… और ये सब उस कमीने भोगानंद बाबा का किया धरा है।

तनु भी पहले से ही सिसक रही थी और वो अब प्रेरणा को समझाने के बजाय खुद जोरों से रोने लगी, अब मुझे माजरा कुछ कुछ समझ आ रहा था, पर पहले दोनों को समझाना और सम्हालना जरुरी था।
मैंने चारों ओर नजर दौड़ाई कि रसोई कहां है.
मुझे बैडरुम से लगी रसोई नजर आ गई, तो मैं वहाँ से पानी ले आया और दोनों को पानी पिला कर शांत किया।

पूर्ण रूप से तुरंत ही शांत करा पाना संभव नहीं था, पर स्थिति अब काबू में थी. लगभग आधे घंटे यूं ही रोने में और एक दूसरे को संभालने में निकल गये, फिर मैंने उनका ध्यान भटकाने के लिए पूछा बाथरूम किधर है.
हालांकि मुझे अभी बाथरुम की जरुरत नहीं थी, फिर भी मैंने पूछा, बाथरूम घर के बाहर बाड़ी में था, तो प्रेरणा ने आंसू पोछे और मुझे बाथरूम दिखाने चली आई।

मेरे बाथरूम से लौटने तक प्रेरणा और तनु मिल कर चाय नाश्ते का इंतजाम करने लगे थे। माहौल भारी से थोड़ा हल्का होने लगा था। मैं चुप बैठ कर पास रखी किताबें पढ़ने लगा, क्योंकि टीवी चालू करने पर उन्हें भी डिस्टर्ब होता और मेरे कानों तक जो उनकी बातें आ रही थी वो भी नहीं आ पाती।
वहाँ बहुत सी किताबें रखी थी, और मैंने महसूस किया कि सारी किताबें तंत्र मंत्र वाली या फिर जासूसी जैसी विषय वस्तु वाली ही थी।

अब तक चाय बन चुकी थी, चाय बिस्कुट के साथ मैगी और नमकीन भी टी मेज पर आ गई।
तभी प्रेरणा ने मुस्कुराते हुए कहा- वोहह तो आप हमारे नकली जीजा जी हैं… पर कविता (तनु) कह रही थी कि असली वाले से भी आप ज्यादा अच्छे हो।
मैं मुस्कुरा दिया, और महौल ठीक देखकर मैंने कहा- अगर आपके वो नहीं रहे तो आप ऐसा शृंगार और सिंदूर किसके लिए? और ये फोटो को छिपा कर रखना.. और ये किताबें.. और इस घर में अकेले रहना..! ये सब मुझे समझ नहीं आ रहा है?

तनु ने भी मेरा साथ दिया और कहने लगी- हाँ प्रेरणा, मुझे भी ये सब जानना है।
प्रेरणा ने फिर उदास होते हुए एक लंबी सांस ली और कहा- तुम लोग तो आज रुक रहे हो ना, अभी पूरी बात विस्तार से बताऊंगी।
मैंने प्रेरणा से बहुत से सवाल एक साथ पूछ लिये और तनु ने भी मेरा साथ दिया, कहने लगी- हाँ प्रेरणा, मुझे भी ये सब जानना है।

प्रेरणा एक बार फिर उदास हो गई और कहा- तुम लोग तो आज रुक रहे हो ना, अभी पूरी बात विस्तार से बताऊंगी।

प्रेरणा ने बोलना शुरू किया, मेरे पति प्राइवेट कंपनी में इंजीनियर थे, वो मुझे बहुत ज्यादा प्यार करते थे, मैं भी उनसे बहुत प्यार करती थी, हम शहर में रहते थे, हमारी शादी को सिर्फ छ: महीने हुए थे, कि उनकी कंपनी को एक काम मिला, वो काम कहीं मशीनरी और सिक्योरिटी सिस्टम की फीटिंग का काम करना था, गोपनीयता को ध्यान में रखते हुए, विश्वासपात्र लोगों को ही वहाँ भेजना था, तीन इंजीनियर और काम लेने वाले एक हेड के अलावा उस पूरे प्रोजेक्ट के बारे में कोई नहीं जानता था।

उस काम के पूरा होने तक उनमें से किसी को भी, किसी से मिलने या घर आने की इजाजत नहीं थी, मेरे पति भी उस प्रोजेक्ट का हिस्सा थे, और उन्हें काम पर गये दो महीने बीत गये थे। मैं घर पर अकेले रह कर बोर हो जाती थी, तो मैं अपनी एक नर्स सहेली से मिलने चली जाती थी।

एक दिन जब मैं हॉस्पिटल से नर्स सहेली का फोन आया, वो घबराये हुए आवाज में बात कर रही थी, उसने कहा- तू जल्दी से हॉस्पिटल आ जा, यहाँ कोई आदमी आया है, जो किसी डॉक्टर को साथ चलने कह रहा है. हमने उसे पूछा कि मरीज कहाँ है, तकलीफ क्या है, तो उसने एक फोटोग्राफ दिखाई जिसमें, हाथ में गहरी चोट आये व्यक्ति की फोटो है, और वो फोटो शायद तेरे पति की है।

मैं इतना सुनते ही फौरन हॉस्पिटल पहुंची, ऐसे तो मैं अपने पति को फोन लगाना चाह रही थी, पर उनके मिशन में फोन रखने की मनाही थी। फिर जब मैं हॉस्पिटल पहुंची तब तक वो आदमी एक डॉक्टर को लेकर जा चुका था।

मेरी सहेली ने उसका पीछा करने की कोशिश की थी, मगर नाकाम रही।

बस वो दिन था और आज का दिन, आज तक मेरे पति का कोई संदेश कोई पता कुछ नहीं मिला। हमने उस डॉक्टर का इंतजार किया कि वो कुछ बतायेगा, लेकिन उसने भी हॉस्पिटल आना बंद कर दिया, और जब हम उस डॉक्टर के घर पहुँचे तब वो कहीं विदेश दौरे पर निकल रहा था। हमारी मुलाकात उससे जब हुई तब वो कार में बैठ चुका था।

मेरे बहुत रोने गिड़गिड़ाने पर उसने बताया- आपके पति जहां काम पर गये हैं, वो लोग बहुत खतरनाक हैं, अपने रहस्यों को छुपाये रखने के लिए शायद वो काम हो जाने के बाद सभी कर्मियों को मार दें। वो साधू महात्मा होने का ढोंग करते हैं, वे खुद भी अपराधी तो हैं ही, पर राजनीतिक और व्यवसायिक लोगों के अलावा बड़े अपराधियों से भी उनके गहरे संबंध हैं। आपके पति के हाथ में चोट थी और काम अभी बहुत बाकी है इसलिए मुझे वहाँ ले जाया गया, पर आपके पति उनका राज मुझे बताने लगे, और पुलिस को बुलाने को कहा, इस बात को उनके चमचों ने सुन लिया इसलिए अब मुझे भी देश छोड़ने की धमकी मिली है, वरना वो मुझे भी मार डालेंगे।

इतना सुन कर मेरे होश उड़ गये, उन्होंने जगह का नाम पूरा स्पष्ट नहीं किया लेकिन जिस इलाके की बात कही वो हमारे इसी गांव के तरफ वाले भोगानंद का इलाका था। मेरे और गिड़गिड़ाने और कहने पर उसने पुलिस में बयान देना स्वीकार कर लिया, पर ये हमारा धोखा था। वो हमें चकमा देकर हमेशा के लिए विदेश चला गया।

कुछ दिन बाद पता चला कि मेरे पति के हेड और उसके साथ एक और इंजीनियर भी हमेशा के लिए विदेश भाग गये।

मेरी नर्स सहेली ने भी हॉस्पिटल में आये उस आदमी को मुंह में गमछा लपेटे ही देखा था, इसलिए हम पुलिस को कोई सुराग नहीं दे पाये। और पुलिस ने शुरुआती दौर में ही फाईल बंद कर दी। मैं इंतजार करती रही पर मेरे पति नहीं आये, और कुछ हफ्तों बाद मेरे पति और उसके साथी की मौत की खबर आई, दरिया किनारे से उनकी बॉडी मिली थी।

यह कहते हुए प्रेरणा और रो पड़ी और फिर खुद ही आंसू पोछ कर कहा- पर मैंने हार नहीं मानी और उस ढोंगी बाबा को बेनकाब करने की योजना बनाने लगी, पर आज तीन सालों बाद भी कुछ जानकारी हासिल करने के अलावा मैं और कुछ नहीं कर सकी हूं।

प्रेरणा का दर्द तनु के दर्द से बड़ा लग रहा था, लेकिन प्रेरणा से मिलकर हमारा साहस बढ़ गया क्योंकि जब एक अकेली औरत उससे भीड़ने का हौसला रखती है तब तो हम मिलकर लड़ रहे थे।
मैंने कहा- तुम उसकी जानकारी हमें बताना, अब तुम अकेली नहीं हो, और हमारा मकसद भी उस बाबा को नाकाम करना है। क्योंकि उसने छोटी के साथ भी घिनौनी हरकत की है।

मेरा ये कहते ही तनु और प्रेरणा दोनों फिर रो पड़ी… पर हाथ मिलाते हुए और साहस से कहा- अब कुछ भी हो जाये, उस कमीने को नहीं छोड़ेंगे।
मैंने प्रेरणा से कहा- तुम मुझे उसके बारे संकलित जानकारी देना और मैं बताता हूं कि उसके साथ क्या करना है।

और फिर रात को डिनर बनाते हुए और सोने से पहले तक बहुत सी बातें हुई।

काम की बातों का जिक्र आगे करुंगा।

और सुबह हम उस गांव वापस गये, किराये के पैसे लिए थोड़ा सा गांव को घूमा और अपने सामान लेकर वापस लौट आये।
मैंने प्रेरणा को एक हफ्ते बाद तैयारी के साथ आने का वादा किया था। तब प्रेरणा ने मुझे अपने यहाँ रुकने की बात कही थी।
बार बार तनु का मेरे साथ जा पाना संभव नहीं था, तो मैं वहाँ अपनी बाईक से ही एक हफ्ते बाद तैयारी के साथ प्रेरणा के एकांत घर में पहुँच गया।

कहानी जारी रहेगी.
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