पाठिका संग मिलन-6

(Pathika Sang Milan- Part 6)

This story is part of a series:

उसने एक क्षण सोचा, फिर साँस खींची और कह दिया- लंड!
और गिलास खाली कर दिया बिल्कुल मरदों जैसी फिल्मी स्टाइल में।
स्त्री मुख से इस घोर वर्जित शब्द का उच्चारण एक तीखी गैस की तरह मेरे माथे में चढ़ गया। मैंने लपककर उसे खींचा और पलटकर अपने नीचे ले आया।
“लंड, लंड, लंड!” मैंने उसके मुंह पर जोर जोर से तीन बार कहा और उसकी पैंटी खिसकाने लगा।

उसकी आँखों में लाल रेशे वैसे ही चमक रहे थे जैसे मेरे कठोर लिंग पर नसें। उसने खिलखिलाकर अपनी बाँहें मेरे गले में कस दीं। मैंने व्याकुल होकर उसके होंठों पर अपने होंठ गाड़ दिये। इन्हीं खिलखिलाते होंठों से ऐसा गंदा शब्द निकला था! मैंने उन होंठों को चबा लिया। उसने मेरे चेहरे को दबोच लिया और मेरे ऊपरी होंठ पर दाँत गड़ा दिये। मेरी नंगी पीठ, गरदन, कमर पर हाथ फिराते हुए उसने नाखूनों की खराशें छोड़ दी।

चूमते हुए किसी की पैंटी उतारने का यह अनुभव बहुत कम बार मैंने पाया था। वह मुझसे चिपटी रहकर खिसकाने में बाधा देकर खेल रही थी। उंगलियों में उसके उभार पर के बालों और भग-होंठों में परिचित चिपचिपाहट महसूस हो रही थी। वह अपने भगों को मेरे लिंग पर रगड़ रही थी। मतलब साफ था- रति का समय आ गया है।

मैं उसके ऊपर लम्बा हो गया। हुमक हुमककर उसके स्तनों को अपनी छाती से मसला। पैंटी को नीचे खिसकाते हुए उसके नितम्बों को हथेली में भर-भरकर और उंगलियाँ गड़ा-गड़ाकर दबाया। अंततः उतारने में सफल होकर मैंने पैंटी को उसके चेहरे के सामने लहरा दिया। पैंटी के छेदों में जांघों की गोलाई का और बीच की पट्टी में योनि-स्थल की सिलवटों का खिंचाव एकदम ताजा थे।
“छी…” देखकर उसने चेहरा मेरे कंधे में घुसा लिया।

मेरा पौरुष गर्व से फूल उठा। लिंग उसकी जाँघों के बीच इधर-उधर टकराता लक्ष्य ढूंढने लगा। चुभन महसूस कर नीता ने मुझे आतुरता से कस लिया।
अफसोस, अभी मैंने इसके चूचुक भी नहीं चखे। लेकिन अब महीन खेलों का मौका नहीं था। लिंग द्वारा लक्ष्य संधान जारी रखते हुए मैं उसके स्तन टटोल रहा था, जो मेरी छाती से दबकर बगल से उभर आए थे। वह कभी दाएँ कभी बाँए करवट लेकर बचने की कोशिश कर रही थी। मैं उसे ऊपर से दबाए, एक हाथ नीचे उसकी कमर में घुसाए उसकी कोशिश को असफल करता खेल का आनन्द ले रहा था। वह जांघों को कसे रखकर प्रवेश रोक रही थी और मैं लिंग को उसके कोमल होंठों के ऊपर कोंच-कोंचकर प्रवेश देने के लिए उकसा रहा था।

वह हँस रही थी। मैं जानता था अंततः ये जाँघें खुल जाएंगी और अगाध आनन्द के स्वर्ग में बिना बाधा के दाखिला मिल जाएगा। विवाहिता की रगड़ खा-खाकर चिकनी हो चुकी योनि का स्वर्ग! उसकी प्राप्ति के लिए ऐसे जोड़ का खिलाड़ी हो तो रति का स्वाद अद्भुत मसालेदार हो जाता है।

मैंने जरा सा उठकर हाथ घुसाकर उंगलियों के बीच उसका एक चूचुक फँसा लिया। उंगलियों को आपस में चाँपता गया जब तक वह सी सी न करने लगी। उसने मेरा हाथ खींचने की कोशिश की। उंगलियों में फँसे चूचुक खिंच गए। दर्द की लहर ने उसे असावधान कर दिया और एक क्षण के लिए जांघें शिथिल पड़ीं। ताक में लगे शत्रु की तरह लिंग ने इसी वक्त हमला कर दिया और योनिद्वार में अपना सिर गीली मिट्टी में खंभे की तरह ठोक दिया। घोर दबाव से उसके माथे के अगल बगल से योनि-रस के बुलबुले निकलने लगे। मैं दबाव बनाए रहा। देखता हूँ कितनी देर विरोध बनाए रखती है।

उसने जांघें फिर से कस लीं।
उसे हार नहीं मानता देखकर मैंने लिंगमुण्ड से ही होंठों के ऊपरी सिरे पर धीरे धीरे घर्षण किया। भगनासा की रगड़ को सह पाना किसी भी संभोग की अभ्यस्त औरत के लिए मुश्किल बात है।
“छोड़ दूँ?” मैंने पूछा।
उसने ठुड्डी उठा दी। उसकी आँखें उलट रही थीं। मैंने भगनासा पर घर्षण और बढ़ा दिया।
“हाँ।”
मैं उलटे उसमें और धँस गया। उसकी जांघों का कसाव घट रहा है, मैं महसूस कर रहा था।
“छोड़ दूँ?”
“हाँ।”
“सचमुच छोड़ दूँ?” मैंने दुहराया।
“हाँ।”
“कमाल है!” मेरा लिंग अंदर सरकता जा रहा था और वह ना ना कर रही थी। उसकी खेलने की प्रवृत्ति प्रबल थी। मैं इस युवती के सम्मोहन में डूबता जा रहा था। मेरी पत्नी भी सुंदर और कामुक थी लेकिन इस लड़की की कामुकता कुछ और ही थी। क्यों न हो, अलग अलग स्त्री का अलग अलग स्वाद!
मैंने उसकी जांघों के बीच अपने घुटने धँसाने की कोशिश की। ज्यादा जोर नहीं लगाना पड़ा कि उसकी जांघें फैल गईं और मैं उसमें जड़ तक दाखिल हो गया।
“छोड़ दूँ?”
“हाँ।”
यह कभी नहीं नहीं बोलेगी। मैंने जरा सा लिंग निकाला और जोर का धक्का दिया।
“ओह हो हो हो …” पहली बार उसने मुँह से उत्तेजना का परिचय दिया। शायद लिंग ने गर्भाशय मुख पर चोट कर दी थी।

मैं फिर से एक ‘अन ब्याई योनि’ का कसाव महसूस कर रहा था। मैं ओवरसाइज तो नहीं हूँ, लेकिन लग रहा था इसके पति का लिंग मुझसे छोटा होगा। इतना अधिक खिंचाव शायद पहली बार पा रही है। मुझे शादी के आरंभिक दिनों की याद आने लगी।
उसने मुझे एक क्षण के लिए देखा और मुझे देखते पाकर नजर घुमा ली।

‘अभी लिंग नहीं चलाऊंगा।’ मैंने सोचा। लचकते स्तनों पर उसके चूचुक हिल रहे थे। अभी तक मैंने उनका स्वाद चखा नहीं था। मैं उन पर झुक गया। तब तक इसकी योनि को लिंग पर फैलने का अवकाश मिल जाएगा।
चूचुक को मुंह में लेते ही वह सिसकारियाँ भरने लगी। मेरा सिर हटाने लगी लेकिन फिर जल्दी ही उस पर हाथ फेरने लगी।

चूसते हुए मैं बीच बीच में कमर भी हिला रहा था ताकि लिंग पर ठुंसी योनि की पेशियों को हरकत मिलती रहे और मुझे, और उसे भी, उत्तेजना का प्रसाद मिलता रहे।
क्या कमाल चीज है संभोग! कितना भी करो, कितनों से भी करो, मन नहीं भरता। इससे मिलने वाली खुशी का कोई अंत नहीं है। हर स्तन-युगल अनूठा, हरेक के चूचुकों का स्वाद और मुँह में अनुभव अलग, हर योनि का कसाव, उसकी कोमलता-स्निग्धता-फिसलन और उसकी जवाबी हरकतें अलग!

वह गर्म, और गर्म, होती जा रही थी। अपनी टांगों को पूरी तरह फैला कर योनि को पूर्णतया समर्पित कर चुकी थी। मैं एक ‘कुलीन भारतीय नारी’ को व्यभिचार के आनन्दलोक में उतारकर जीत के एहसास से आकाश में उड़ रहा था।
दुनिया में कहीं स्वर्ग है तो यहीं है, यही है।

मैं सुध-बुध खोकर नीता के होंठों, गले, कंधों, छातियों, बगलों, पेट नाभि, कमर को चूम-चूस-दबा-सहला रहा था। जिधर भी उसके शरीर का जो भी हिस्सा हथेलियों के संपर्क में आता, मैं उसी का दीवाना हो जाता। वह मुझे भींचती, कमर उचकाती, कभी मेरे नितंबों पर अपने पाँव कस देती, कभी पाँव गिरा लेती, कभी वह मेरे गले में झूल सी जाती, कभी बिल्कुल बेसुध होकर गिर जाती- स्त्री के कामानंद के जितने भी रूप हो सकते थे सब मुझे देखने को मिल रहे थे।
मैंने भी उसके जोश को देखते हुए धक्के लगाना शुरू कर दिया था। यहाँ धक्कों में ‘फच फच’ की आवाज नहीं थी जो मेरी पत्नी से आती थी (हालांकि वह भी मुझे कम आनन्ददायी नहीं लगती), बल्कि ‘चिट चिट’, ‘थप थप’ की अजब सी कसी कसी आवाज, जो यौवनावस्था, कसाव और अंगों में आंतरिक बल के कारण आती है।

मैंने उसकी टांगें उठा दी और अपने कंधों पर रख लिया। लिंग और घुसकर चोट करने लगा। आज इसको अपने लंबे-चौड़े लिंग की मारक क्षमता का एहसास करा ही दूँ।
वह तो परेशान ही हो गई। “ओह ओह ओह….” मुझे ठेलने लगी, लेकिन मैंने जोर लगाकर उसे अपने से सटाए रखा। मेरे पेड़ू उसके नितंबों से लगे थे। मेरे फोतों पर उसकी गुदा छिद्र की सिकुड़न और गर्माहट महसूस हो रहे थे।

कम से कम एक मिनट तक वह तनी रही। मैंने उसी अवस्था में कुछ धक्के निष्ठुरता से लगाए लेकिन उसे परेशान देख पुरानी मिशनरी मुद्रा में लौट आया। कष्ट देकर रति सुख लेने में क्या फायदा?

पुरानी मुद्रा में आते ही उसका उत्साह लौट आया। कुछ बेशर्म मैंने उसे बना ही दिया था।
“हाँ, हाँ, हाँ…” करती कमर उचकाने लगी। मर्द की यही असल परीक्षा होती है और मैंने इसमें सौ में दो सौ अंक लाने के लिए जी-जान लगा दिया। उसकी कमर बिस्तर छोड़कर उठती और पुनः मेरे धक्के की चोट खाकर बिस्तर पर पटका जाती। होटल का फैशनेबल लेकिन कमजोर पलंग आवाज कर रहा था, लेकिन चिंता किसे थी। चर चर चूँ चूँ की कर्कश आवाज मीठा संगीत लग रही थी।

वह छोटे छोटे स्खलनों की शृंखला से गुजरती हुई बड़े और अंतिम सुख- परम सुख- के द्वार पर आ पहुँची।
मैं भी नजदीक ही था।

लेकिन पुरानी दुविधा ने सिर उठा लिया। अभी माँ नहीं बनी है, मुझसे मिलने आई है तो निश्चित ही गर्भनिरोध की गोली वोली लेकर आई होगी।
फिर भी, क्या पता? जहाँ खोई हुई थी, उससे कुछ पूछना संभव नहीं था। मैंने हाँफते हुए खुद का स्खलन रोके रखा और उसे ठोकते हुए मुकाम तक पहुंचा दिया- ‘आ हा हा’, ‘आ हा हा!’ यह उसका प्राप्य था। पुरुष होने के नाते मुझे उसे देना ही था। वह मुझसे चिपटी थरथराती और झटके खाती रही। फिर निढाल पड़ गई। उसके भगोष्ठों की गीली फाँकें खुली थीं और चमक रही थीं। मेरी पत्नी ऐसे समय में एक करवट होकर आनन्दलोक में खोती थी।

अपने जाँबाज लिंग को अंत समय में यूँ हवा में अकेले खड़े देखकर मुझे दया सी आई, पर कोई उपाय नहीं था। बगल से तौलिया उठाया और हाथ से उसकी क्रिया संपन्न कर दी।
मैं उसके बगल में लेट गया, साँसों को नियंत्रित करने लगा।

तो यह औरत अंततः मुझसे चुद ही गई। अपने मेल संदेशों में क्या-क्या कहती थी:
“लीलाधर जी, वास्तव में स्वैप करना? किसी दूसरे पुरुष की बांहों में जा पड़ना? ना ना ना … ! लीलाधर जी, मैं एक कुलीन भारतीय स्त्री हूँ। … ओह, आप ऐसी कहानियाँ क्यों लिखते हैं जिससे चरित्र स्खलन हो जाए?”

चरित्र का यह कैसा सुंदर स्खलन है! जीवन की डाल पर खिला बेहद सुंदर फूल। जिंदगी भर गर्व करने लायक अनुभव। यह पुरुष के रूप में जन्म लेने की सबसे बड़ी सार्थकता है- इससे फर्क नहीं पड़ता कि आप विवाहित हैं या अविवाहित। मेरी बगल में एक स्त्री बारिश में भरपूर सिंचे खेत-सी पड़ी है। इसे मैंने सींचा है, यह एहसास ही गदगद कर देने वाला था।

मैंने मुँह बढ़ाकर उसकी गर्दन में बालों की जड़ को चूमा। स्त्री देह सुकून और खुशी का बहुत बड़ा स्रोत है। मैंने उसका कंधा पकड़कर अपनी ओर बुलाया। वह मुड़ी और मुझमें लिपट गई। अपनी एक टांग मुझ पर चढ़ा दी- अधिकार भाव से। मुझे हँसी आई। क्या सुंदर बात है कि समर्पण करके औरत उस पुरुष पर अधिकार कर लेती है। मैंने उसके चिकने, कोमल, सुगठित, सुखदायी, शांतिदायी बदन को ढीले से अपने में समेट लिया। उसकी ललाट, आँखों, गालों पर हल्के हल्के चुम्बन दिये। यह असल प्यार था। दैहिक मिलन के बाद काई छँटकर निकले साफ मीठे पानी सरीखा। शुद्ध, सुस्वादु, पौष्टिक प्यार।

“ऊँ… तंग मत करो ना।” उसने मेरे चुम्बनों पर मीठी आपत्ति की।
मैंने उसके गाल से अपने गाल सटा दिए। कहना चाहता था- नीता आय लव यू!
वह मुझसे और सट गई। मेरे कानों में उसके निश्चिंत सांसें सुनाई देने लगीं।
“क्या मुझसे प्यार करने लगे हैं?”
लो, यह सवाल उसी ने पूछ लिया। मैं कहना चाहता था हाँ। और मैंने कह भी दिया। दुविधा किस बात की है।
“जानते हुए भी कि विवाहित हूँ?”
“उससे फर्क नहीं पड़ता। इतने सुंदर मिलन के बाद प्यार किए बिना रहा नहीं जा सकता।”

वह चुप रही। हम परस्पर लिपटे एक दूसरे के नंगे बदन को अपने बदन पर महसूस करते रहे। शुद्ध आदिम रूप में।
यह मिलना, यह रूप इसी वक़्त का है। फिर वापस चली जाएगी। ये सुंदर स्तन, रसीली योनि, बीज के लिए प्रतीक्षारत गर्भाशय, पति के प्रेम में डूबा लेकिन परपुरुष से सम्बन्ध बनाने की दुविधा से ग्रस्त मन- ये सब कुछ सास-ससुर-ननद-पति की सामाजिक सम्बन्धों की पहचानरहित दुनिया में जाकर खो जाएंगे। ये सभी पुरुष के साथ अकेले में ही अर्थवान हैं। अभी, इस वक्त वह पुरुष मैं हूँ।

“लीलाधर जी, वापस भी जाना है।”

इतनी जल्दी? कैसे रोकूँ। मैंने इसे सारा दिन साथ रखना चाहा था।
“खाना नहीं खाना है?” अचानक से मुझे याद आया। मैंने दोपहर का भोजन साथ में करने को कहा था।
एक बार के प्यार से दिल कहाँ भरता है। मैंने उसके होठों पर चुम्बन लिया। उसने भी मुझे किस किया। मुझे उसके पके संतरे की फाँकों जैसे भग-होंठों को भी चूसना था। कल अगर आ सके तो….!
मैंने फोन उठाया और खाने का ऑर्डर दे दिया।

मैंने उसे सहारा देकर उठाया। बदन में होटल की सफेद चादर लपेटकर बाथरूम गई। सहारा देकर ही मैं उसे बाथरूम तक ले गया। उसे कौतुक सा लग रहा था। यह मैं क्या कर रहा हूँ। पर मैंने ज़िद की। ऐसी दुर्लभ, ऐसी प्यारी, ऐसी सुंदर स्त्री। यह तो फूलों की पंखुड़ियों में जिंदगी भर सुरक्षित और सहेजकर रखने लायक है।

मुझे अपनी पत्नी की याद आई। एक दूसरी औरत पर इतना अनुराग दिखा रहा हूं। क्या यह गलत नहीं है? पता नहीं, लेकिन मैं अपने अनुभवों और इस स्त्री के प्रति ईमानदार हूं। अपनी पत्नी को भी मैंने दिलो-जान से चाहा है, उसे पलकों पर बिठा कर रखा है। एक मनुष्य के रूप में भी तो मुझे कुछ अनुभव करने और विचार करने का अधिकार है। आई लव यू नीता। अगर मैं तुम्हें यूं ही बिना किसी लगाव के जाने दूंगा तो यह मेरे मनुष्यत्व और मेरे पुरुषत्व के प्रति भी बेइमानी होगी।

हमने साथ खाना खाया। सफेद बेदाग चादर में लिपटी अजब निर्दोष लग रही थी।
एक बार मैंने कहा- जानती हो इसमें कैसी लग रही हो? कुमारी कन्या-सी। अछूती।
“वाह लीलाधर जी। अछूती! इस सबके बाद!”
“जी चाहता है तुम्हें शुभ्रा कहूँ। white beauty. श्वेत सौंदर्य वाली।”
“आप तो कविता करते हैं। खैर, आपकी कहानियाँ कविता से कम कहाँ हैं। ऐसे ही आपकी दीवानी हूँ।”

उसका प्रसन्न तृप्त चेहरा पूर्णमासी के चाँद सा जगमगा रहा था। कभी वह मुझे खिलाती, कभी मैं उसके मुंह में कौर देता। उसने औरत की ही ममता से अपना ज्यादा से ज्यादा खाना मुझे ही खिला दिया। मैं रोकता तो बोलती- खाइए न लीलाधर जी, आपने बहुत मेहनत की है।
मैं हँसते हुए कहता- अभी तो मुझे और मेहनत करनी है। इसी के लिए तो आया हूँ।

खाना खाकर हमने थोड़ी देर आराम किया। एक दूसरे को पकड़े लेटे रहे। मैं उसे मुग्ध होकर देख रहा था और वह मुझे उसी तरह मुग्ध भाव से देख रही थी।
“जाने की बेला आ गई।”
“अभी और रुको न? कल आओगी ना?”
“आज तो अब जाने दो लीलाधर जी। कल का पता नहीं। लेकिन आज जल्दी जाने दोगे तभी तो कल आ सकूंगी। रोज तो देर देर तक बाहर नहीं रह सकती ना!”

वह कपड़े पहनने लगी। नग्न शरीर जैसे-जैसे कपड़ों में ढकता जा रहा था वैसे वैसे एक व्यक्तित्व धारण करता जा रहा था। जी चाह रहा था उसका हाथ पकड़ लूँ, उसे अपने साथ फ्लाइट में बिठाकर घर ले जाऊं। भूल जाऊं कि इसका कोई पति भी है।

उसे निर्वस्त्र किया था, अब कुछ वस्त्र पहनाने का भी आनन्द लेना था। उसकी पैंटी मैंने पकड़ी जिसमें उसने अपने पांव डाले। उसकी योनिद्वार को पेंटी में मैंने ही बंद किया। ब्रा के फीते मैंने पकड़े जिसमें उसने अपनी बांहें घुसाईं।
इस बार मैंने पीछे हुक लगाने की मेहनत नहीं की। लेकिन उसके कपों को स्तनों पर चढ़ाने का मजा जरूर लिया। ब्लाउज के ऊपरी दो बटन उसने लगाए, नीचे के दो बटन मैंने।
“लीलाधर जी, आप बड़े रोमांटिक हैं।” उसने कहा था।

चोली के कपों में स्तनों पर ठीक ठीक सेट करने के पहले मैंने दोनों चूचूकों को एक बार चूस लिया।
“ओह लीलाधर जी! आप मुझे जाने नहीं देंगे।”
साड़ी पहनना एक कौशल है जिसे औरतें ही जानती हैं। चोली को छाती पर आंचल के पीछे पुनः आधा छिपते देखना इस समय भी कम उत्तेजक नहीं था। बीच बीच में मैंने छिपते जा रहे अंगों को मैंने कुछ विदास्वरूप चुंबन भी भेंट किए।

“लीलाधर जी, यू आर लवली। लवली नहीं, फुल ऑफ लव। तुमसे सेक्स करके सेक्स नहीं, प्यार करना महसूस होता है।”
“थैंक्यू नीता।”
“थैंक्यू नहीं कहते डियर सर। आप वन्डरफुल हैं।”
मैंने विनम्रता में सिर झुका दिया।

“लगा जैसे किसी बेहद अपने से मिली हूँ। पति से भी ज्यादा, प्रेमी से भी ज्यादा कोई अपना। आश्चर्य है!” उसने मेरे चेहरे को हथेलियों में भर लिया- लेकिन मेरे पति का भी हो जाता तो अच्छा लगता। पता नहीं मैंने ठीक किया या गलत?
“नीता कोई अफसोस मन में मत रखना। हमने अपने साथियों को चीट नहीं किया।”
“आपको सचमुच ऐसा लगता है? चीटिंग तो नहीं है, पर यह सही भी है, कह नहीं सकती।”

वह मुझसे ज्यादा ईमानदार थी। मैंने अपनी पत्नी को बताया नहीं था जबकि वह अपने पति को बताकर आई थी। लेकिन इस तरह के सेक्स सम्बन्ध के लिए मैं और कल्पना सहमति रखते थे।
हम दोनों चुप रहे। बात में आँच थी।

काश इस वक्त कल्पना मेरे पास होती। मेरे और नीता के सेक्स का वैसे ही मजा लेती जैसे मैं उसके दूसरे पुरुष के साथ सेक्स का आनन्द लेता हूं। काश वह फोटोग्राफर की तरह हमारे इस अदभुत मिलन की तस्वीरें खींचती। काश इस घटना का कोई वीडियो बन जाता। बाद में हम पति-पत्नी उस वीडियो को देखकर आनन्द लेते। पता नहीं नीता ऐसा वीडियो बनाने की इजाजत देती कि नहीं।

समय बीतता जा रहा था। मैं एक राउंड और चाहता था। लेकिन आश्चर्य कि उससे इतना सफल सेक्स करने के बाद भी मुझे थोड़ा सा भी अधिकार जताने में संकोच हो रहा था।
अभी और रुको जानेमन! मेरा मन हाहाकार कर रहा था।
वह उठी. पर्स कंधे में डाल कर जाने को उद्यत हुई।

“कल किस समय?”
वह मुझसे सट गई। समर्पण करके जैसे बड़ी हो गई थी।
“नीता … ” मेरा गला रुंधने लगा।

“अभी पति महोदय से तो मिलने दो। क्या कहते हैं। तैयार हुए तो उन्हें लेकर आऊंगी। अच्छा नहीं लगेगा कि इतना सब कुछ हो जाने के बाद वे तुम्हें देख भी न पाएँ।”
“ओके, आना तो एक वीडियो कैमरा भी रख लेना। छोड़ो, आजकल तो मोबाइल में भी सब संभव हो जाता है।”
“बाप रे, वीडियो बनाओगे?”
“मैं नहीं, तुम्हारे पति!”
वह सिहर सी उठी।

“चलो, अब जाने दो।”
“कैसे जाओगी? लेने क्या पति आ रहे हैं? मैं गाड़ी कर दूँ?”
उसने फोन उठाया और पति को लगाया। कुछ हाँ हूँ में बातें की।
“वे आ गए हैं, नीचे हैं, उनसे मिलोगे?”
“कोई आपत्ति नहीं, चलो।”
“जबरदस्ती नहीं है। अगर सही रहा तो कल भी मिल सकते हो।”
“नहीं। चलो। एक बार देख तो लूँ। पता चल जाएगा मेरा प्रतिद्वन्द्वी कैसा है।”
“लीलाधर जी बहुत बोलते हो।” उसने मुझे प्यार से चपत लगाई।

हम नीचे उतरे। कार से निकलकर उसका पति आया। हैंडसम बंदा था, शरीफ भी … प्यार से मिला, ‘हाय’ कहकर हाथ मिलाया। मैंने उम्मीद नहीं की थी कि कोई आदमी उसकी पत्नी को ही भोगने वाले पुरुष से सौजन्यता से मिल सकता है। इसीलिये तो पत्नी की हिम्मत बढ़ी हुई है।

वह बार-बार नीता को देख रहा था। नीता अपने मनोभाव छिपाने की कोशिश कर रही थी। फिर भी चेहरे की चमक और गालों की लाली से अंदाजा लग जा रहा था।
मैंने कहा- कल मिलते हैं।
मुझे और बात करने की इच्छा नहीं थी। अभी उसकी पत्नी के रस में मन-मस्तिष्क डूबा था।
आशा के विपरीत उसने कहा- ठीक है।
गाड़ी चली गई।

कल आएगी? पता नहीं। उसके पति की हाँ शिष्टाचार का भी हिस्सा हो सकती है। आई तो मेरे लिये अनोखा होगा। एक मर्द के सामने उसकी पत्नी से संभोग करना पड़ेगा। कल मैं उसकी योनि चूसुंगा। बोलना भूल गया कि वहाँ के बाल साफ करके आना। मैं खुद भी उसके मुख मैथुन का आनन्द लूंगा। पता नहीं वह लिंग चूसना पसंद करती है या नहीं।

कमरे में लौटकर देखा- उस बिस्तर को, टेबल को, कुर्सी को, बिस्तर के नीचे रखे जूठे प्लेट-गिलासों को। मैं बाथरूम में भी गया। यहीं उसने योनि धोई होगी। खालीपन के बावजूद एक मादकता, एक गंध, कुछ घटना घटी है, इसका एहसास हर ओर था।

मैंने बिस्तर पर आँखें बंद कर लीं। नींद और ख्यालों में खो गया।
जिंदगी कितनी हसीन है!
नीता … नीता … नीता …
कल आओगी ना?

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