मेरे गांडू जीवन की कहानी-21

(Mere Gandu Jiwan Ki Kahani- Part 21)

यह कहानी निम्न शृंखला का एक भाग है:

अभी तक आपने पढ़ा कि रवि के साथ सुहागरात मनाने के बाद अगली सुबह मैं उसके साथ अखाड़े में गया और वहाँ जाकर किस्मत ने संदीप के रुप में मेरे मुंह पर एक और तमाचा मारा जिसकी गूंज अभी मिटी भी नहीं थी कि रवि ने मुझे अपनी बहन की शादी वाली एल्बम दिखा दी जिसमें उसकी गर्लफ्रेंड का फोटो था. यह वही लड़की थी जिसको मैंने संदीप के साथ बस में उसका लंड चूसते हुए देखा था.
उस लड़की का फोटो देखकर मेरे अंदर की सांस अंदर और बाहर की बाहर ही रह गई। किस्मत की ये क्या आंख मिचौली हो रही है मेरे साथ। मेरी नज़रें उस लड़की की फोटो पर गड़ गईं थी और मेरे माथे पर पसीना आना शुरु हो गया।

मैंने रवि से कहा- पीने का पानी कहाँ है?
वो बोला- क्या हुआ?
मैंने कहा- कुछ नहीं, मुझे प्यास लगी है। पीने का पानी कहाँ है?

सुन कर वो हंसने लगा और बोला- तेरी आंखें भी फटी रह गई ना मेरी जान को देख कर…
मैंने उसकी बात की हामी भरते हुए कहा- हाँ, काफी सुंदर लड़की है।
वो बोला- एल्बम रख दे, चल मैं इसके साथ पहली चुदाई की कहानी सुनाता हूं तुझे!
उसने एल्बम मेरे हाथ से लेकर एक तरफ रख दी और मुझे अपने साथ बिस्तर पर लेटा लिया।

मेरे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था, मैं बस रवि के हाथ की कठपुतली सा बना यूं का यूं बेड पर लेट कर छत की तरफ देखने लगा। उसने अपने हाथ में मेरा हाथ लिया और कहानी सुनाने लगा..
वो बोला- जब पहली बार ये मेरी बहन के साथ घर पर आई थी तो मुझे इससे देखते ही प्यार हो गया था जैसे तुझे मुझसे हो गया। उसके बाद ये काफी दिनों तक घर नहीं आई तो मैंने अपनी बहन से पूछा कि तेरी वो सहेली कौन थी?
बहन ने बताया कि वो मेरे कॉलेज में साथ ही पढ़ती है।

बस फिर क्या था, ये बात पता लगते ही मैंने कॉलेज के चक्कर लगाने शुरु कर दिए, वो जब भी दिखती मैं उसे ताड़ने लगता, वो भी मुझे देख कर मुस्कुरा देती थी। उस टाइम मैं इस की सेक्सी फिगर की तरफ अट्रैक्टेड था लेकिन धीरे धीरे मुझे इस से प्यार होने लगा।

फिर तो मैंने इसका नम्बर भी निकलवा लिया, इससे बातें शुरु हुईं तो घंटों इसके साथ लगा रहता था। मेरे घर वालों को भी मुझ पर शक होने लग गया था। इसलिए हमने फोन पर बातचीत कम कर दी। मैंने इसको मिलने के लिए बाहर बुलाया और हम पार्क में बैठकर घंटों बातें करते रहते थे।

फिर एक दिन मैंने इसके होठों को किस किया तो इसने भी मना नहीं किया। इसके बाद हम जब भी मिलते तो किसिंग शुरु हो जाती। ऐसा काफी दिन तक चलता रहा। फिर एक दिन शाम का टाइम था हम पार्क में बैठे हुए थे, अंधेरा होने वाला था, हमने मौका देखकर किसिंग शुरु कर दी। मैं इसके होठों को चूस रहा था और ये मेरे… बहुत मजा आ रहा था। फिर इसने खुद ही मेरी पैंट में तने लंड पर हाथ रख दिया और उसको अपने हाथ से ऊपर ही ऊपर सहलाने लगी।

इसके नर्म हाथों में जाकर मेरा लौड़ा मेरे काबू से बाहर हो गया। मैंने उसके सूट पर से उसकी चूचियों को दबाना शुरु कर दिया, उसने भी मुझे मना नहीं किया। मैं आगे बढ़ता ही जा रहा था, मैंने इसकी चूचियों को ज़ोर से दबाना शुरु किया तो इसने मेरी पैंट की चेन खोल कर अपना हाथ अंदर डाल लिया और मेरी फ्रेंची के ऊपर से मेरे लौड़े को अपने हाथ में लेकर दबाने लगी।

मैं तो जैसे पागल सा हो रहा था, मैंने इसकी सलवार का नाड़ा खोला और इसकी पैंटी के ऊपर से इसकी चूत को सहलाने लगा। इसने अपनी टांगें फैला लीं और अपनी चूत रगड़वाने लगी। हम दोनों ये भूल ही गए थे कि हम पार्क में ये सब कर रहे हैं।

इसके बाद मैंने इसकी पैंटी में हाथ डालकर देखा तो इसकी चूत से पानी सा निकला हुआ था। मैंने इसकी चूत को रगड़ना शुरु कर दिया। इसने मेरे होठों को और ज़ोर से चूसना शुरु कर दिया। मैंने अपनी दो उंगली इसकी चूत में डाल दी और इस हरकत पर इसने मुझे अपने ऊपर लेटा लिया। मैंने इसकी सलवार को नीचे निकलवा दिया और इसकी चूचियों पर मुंह रखकर इसकी चूत में उंगलियों को अंदर बाहर करने लगा।

इसने नीचे से मेरी पैंट का हुक खोला और मैंने पैंट निकाल निकाल दी। इसने मेरी फ्रेंची भी निकलवा दी और मेरे लंड को अपने हाथ में लेकर सहलाने लगी। इसके नर्म हाथों में जाकर ऐसा लग रहा था जैसे अब झड़ ही जाऊँगा.. अब मैं रुक नहीं सकता था, मैंने इसके हाथों को दोनों तरफ ज़मीन में नीचे दबोचा और लंड को इसकी चूत पर लगा कर इसके ऊपर लेट गया। मेरे वज़न से लंड इसकी चूत में पूरा एक ही बार में अंदर उतर गया।

मैंने इसके होठों को चूसते हुए इसकी चूत में लंड अंदर बाहर करना शुरु कर दिया। मैंने स्पीड बढ़ाई तो इसने दोनों हाथों को मेरी कमर पर बांध लिया और अपनी चूत चुदवाने लगी। मैं भी चूत के नशे में बावला सा होकर इसकी रगड़ाई कर रहा था। इसने अपने नाखूनों से मेरी कमर को नोचना शुरु कर दिया। इसे भी बहुत मजा आ रहा था और मुझे तो इतना आ रहा था कि क्या बताऊं… चूत की बात ही अलग है…
कह कर रवि ने मेरी छोटी छोटी चूचियों पर मेरी निप्पलों को मसल दिया। लेकिन मुझ पर उसकी इस हरकत का कोई असर नहीं हुआ.

उसने मेरा हाथ हिलाया और बोला- तू सुन रहा है ना?
मैंने कहा- हाँ, फिर आगे क्या हुआ?

रवि बोला- फिर क्या, मैंने उस दिन पहली बार पार्क में इसकी चूत मारी थी। उसके बाद तो धीरे धीरे ये मेरे घर भी आने लगी। जब घर पर कोई नहीं होता था तो मैं इसको बहन के बहाने बुला लेता था और इसकी चूत मारता था। लेकिन फिर मेरी बहन की शादी बीच में आ गई, उसके बाद हम काफी दिनों तक नहीं मिले क्योंकि बहन तो जा चुकी थी।
और कुछ दिनों बाद इसका फोन आया कि इसका रिश्ता तय हो गया है, अब वो घर से बाहर नहीं आ पाएगी।

जब इसने रिश्ते की बात बताई तो मुझे धक्का सा लगा, मैंने इससे कहा- तू तो कह रही थी तू मुझसे प्यार करती है?
ये बोली- हाँ, तो मैंने कब मना किया है… कि मैं नहीं करती। लेकिन घर वालों ने रिश्ते की बात पहले ही कर रखी थी। इसलिए मैं तेरा दिल नहीं तोड़ना चाहती थी।

मैंने सोचा कि ये भी मुझ से इतना प्यार करती है कि मेरा दिल रखने के लिए इसने इतना बड़ा जोखिम उठा लिया इसलिए मेरे दिल में इसके लिए प्यार और बढ़ गया। मैंने सोचा कि अब जब शादी हो गई है तो इसकी ज़िंदगी में दखल देना ठीक नहीं है । इसलिए मैंने इसको फोर्स करना बंद कर दिया और ये भी कभी मिलने नहीं आई। लेकिन ये मुझे बहुत याद आती है… इसलिए जब भी मन करता है, मैं इसकी फोटो देख लेता हूं।

मैंने रवि की बातें तो सुन ली और मुझे समझ भी आ गईं। लेकिन मेरे अंदर जो तूफान चल रहा था वो अभी किस दिशा में जाने वाला है, ये समझना मेरे लिए मुश्किल हो रहा था।
मैंने कहा- मेरा गला सूखा जा रहा है, पीने का पानी कहाँ रखा है?
वो बोला- बिनौले खा कै आया है क्या? मैं यहाँ इतनी सेक्सी स्टोरी सुना रहा हूं और तू पानी पानी किए जा रहा है… रुक अभी लाता हूं!

वो बेड से उठा और कमरे से बाहर निकल कर किचन में चला गया, अब मुझे सब समझ में आ रहा था कि सुबह जब संदीप ने मुझे अखाड़े में देखा तो वो मुझसे डर क्यों रहा था। भले ही उसने अपने दोस्तों के साथ मिलकर चुदाई की थी लेकिन अब उसको ये डर था कि मैं रवि के पास कैसे पहुंच गया… और कहीं मैं रवि को उस लड़की के बारे में न बता दूं जिसने सोनीपत से आ रही बस में संदीप का लंड चूसा था और संदीप उसे कई बार चोद भी चुका था।

वो लड़की रवि के साथ रिलेशन में भी थी, रिलेशन ही नहीं, रवि तो उससे प्यार भी करता है।
यह सोच कर मेरा दिल बैठा जा रहा था… अब मैं क्या करुं। मैं तो अपने रवि से मिलने आया था और किस्मत मेरे साथ क्या खेल कर रही है। अपना प्यार पाना मुझे इतना महंगा पड़ेगा मैंने कभी इसकी कल्पना भी नहीं की थी।
मैं तो अपनी गांडू जिंदगी के सागर से निकलने के लिए यहाँ आया था लेकिन मैं तो इस भंवर में और फंसता ही जा रहा हूं… अब तक हुआ जो हुआ लेकिन अब क्या…
क्या करुं… कहाँ जाऊं… किसको बताऊं… और किस से छिपाऊं… हे भगवान… इतना बड़ा खेल… पहले ही जिंदगी से परेशान हूं अब कुछ सुकून मिला तो वो भी इस कीमत पर?

ये सब सोच कर मेरे दिमाग की नसें फटने को हो रही थीं। जिस रवि को मैं जान से ज्यादा चाहता हूं, मैं उससे इतनी बड़ी बात कैसे छिपाऊं… और मान लो अगर उसका दिल टूटने से बचाने के लिए छिपा भी लूं… मगर कल को कहीं से ये बात खुल गई तो उस विश्वास का क्या जो वो मुझ पर करता है। इतना बड़ा धोखा जो उसके साथ हुआ है अगर उसको बताता हूं तो वो कैसे झेलेगा… और अगर छिपाता हूं तो मैं अपनी अंतरआत्मा को क्या जवाब दूंगा।
कुछ देर के लिए उसकी खुशी के लिए मैं ये बात अपने सीने में दफन भी कर लूं… लेकिन उसको कहीं और से पता लग गया… फिर दोनों तरफ से धोखा खाकर उसका क्या हाल होगा.

ये सारी बातें मेरे दिमाग पर हर पल प्रेशर बढ़ाती ही जा रही थीं, मुझे वहाँ पर एक पल भी रुकना भारी हो रहा था, इतने में रवि पानी का गिलास लेकर आ गया।
मैंने गटक-गटक करके एक ही सांस में सारा पानी पी लिया, मैंने कहा- एक और ला दे यार प्लीज़…

उसने मेरी तरफ हैरानी से देखा, मैं गहरी सोच में था पर नॉर्मल दिखाने की कोशिश कर रहा था।
वो दूसरा गिलास लेने के लिए गया।
मैंने सोचा कि यहाँ से निकलना पड़ेगा… अगर यहाँ पर रहा तो कुछ न कुछ गड़बड़ हो ही जाएगी। मैंने तय कर लिया कि मैं अभी निकल जाता हूं।

रवि दूसरा गिलास लेकर आ गया, मैंने पानी पीया और रवि से कहा- रवि यार, घर से मां का फोन आया है… मुझे अभी जाना होगा।
वो बोला- क्या बात हो गई…सब ठीक तो है ना?
मैंने कहा- पता नहीं, लेकिन मां कह रही थी कि जल्दी से जल्दी घर आ जा, बहुत जरूरी काम है। इतना कहकर मां ने फोन काट दिया। इसलिए मुझे अभी जाना होगा।
रवि बोला- रोटी तो खा ले, फिर चला जाइयो…
मैंने कहा- नहीं, फिर दोबारा कभी आऊँगा तुमसे मिलने… अभी मुझे जाना होगा।

कह कर मैं चलने के लिए उठा और दरवाज़े की तरफ बढ़ा तो उसने हाथ पकड़ लिया…
वो बोला- फिर कब आएगा?
मैंने कहा- जल्दी ही आऊँगा, तेरे सिवा और जाऊँगा कहाँ… उसने मुझे अपनी तरफ खींचा और मैं उसके पेट से सट कर उसकी छाती से जा लगा, उसने पीछे से दोनों बाहों का घेरा बनाते हुए मुझे जकड़ लिया।
मैंने नज़रें उठाकर उसकी आंखों में देखा… जिनमें सेक्स की जगह प्यार की धुंधली सी झलक दिखाई दे रही थी, जिसे वो तो छिपाना चाहता था लेकिन मैं तो उसकी आंखों को पढ़ने में माहिर था।
वो बोला- जल्दी आना… अब मेरी आदत बिगाड़ दी है तूने… ज्यादा दिन मन नहीं लगेगा तेरे बिना!

मेरी बदकिस्मती मेरी आंखों से आंसू बनकर गिरने लगी, मैं उसके सीने से लिपट गया और जितना दम मेरी नाजुक बाजुओं में था मैंने सारा समेटते हुए उसे बाहों में भर लिया। उसके सीने से लिपट गया… उसने मेरी कमर पर प्यार से हाथ फिराया और सिर को प्यार से सहलाया।

मैं उससे अलग होकर मुड़ते हुए कमरे के दरवाज़े को पटकते हुए बाहर आ गया और गेट खोल कर बाहर गली में निकल गया।
जाते जाते उसने मुझे फिर रुला दिया, अब मेरा कलेजा फट रहा था, मैं दौड़ कर जोहड़ के पास पहुंचा और वहाँ एक पेड़ के पीछे जाकर चीख-चीख कर रोने लगा। लेकिन वहाँ रुकना भी उसी की याद दिला रहा था, मैंने अपने आंसू पौंछे और बदहवास सा होकर बाहर मेन रोड की तरफ चल पड़ा।

मैं… रवि का अंश बजाज… जल्द ही लौटूंगा कहानी के अगले भाग के साथ!
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