बहन का लौड़ा -4

(Bahan Ka Lauda-4)

अभी तक आपने पढ़ा..

नीरज- सुन.. आज ये पुराना पेपर मुझे मिला.. इसमें दिया नम्बर मैंने देखा और एसटीडी से कॉल किया.. मैं बस ये देखना चाहता था.. वो लड़की मिली या नहीं। जैसे ही मैंने फ़ोन किया.. एक आदमी ने उठाया और मैंने बस इतना कहा कि आपकी बेटी खो गई थी ना.. उसके बारे में बात करनी है। वो रोने लगा.. कहाँ है मेरी बेटी.. प्लीज़ बताओ.. बरसों बाद आज उसकी कोई खबर आई है.. वो उतावला हो गया.. मैंने कहा कि सुबह बताऊँगा.. बस फ़ोन काट दिया।

राधे- तो लड़की कहाँ है।
नीरज- तूने शायद पूरी खबर को गौर से नहीं देखा.. उस लड़की के हाथ पर निशान देख.. बिल्कुल वैसा ही है.. जैसा तेरे हाथ पर है।
राधे- त..त..तू कहना क्या चाहता है साले.. मुझे लड़की बना कर ले जाएगा क्या साले?
नीरज- हाँ यार.. अब इतने साल बाद वो थोड़े ही पहचान पाएँगे अपनी बेटी को.. तगड़ा माल मिलेगा.. साले ऐश करेंगे हम दोनों।

अब आगे..

नीरज की बात सुनकर राधे कुछ सोचने लगा।

नीरज- अरे सोच मत.. बस हाँ कर दे तू.. कितने साल से लड़की बन रहा है.. बस एक बार कुछ दिनों के लिए लड़की बन जा.. उसके बाद सारी लाइफ इस अभिशाप से छुटकारा मिल जाएगा।

राधे- बात तो सही है.. मगर मैं उनके बारे में कुछ नहीं जानता.. अगर उन लोगों ने कोई सवाल पूछ लिया तो?
नीरज- अरे मेरे भाई भगवान ने इसी लिए तुझे ऐसा बनाया है कोई सवाल पूछे तो कहना याद नहीं और तुम उस समय बहुत छोटी थीं.. याद रहना जरूरी नहीं यार।

राधे- बात तो ठीक है.. चल मान ले वो मुझे अपनी बेटी मान भी लें और तुझे 5 लाख दे दें.. उसके बाद मैं वहाँ से निकलूंगा कैसे?

नीरज- अरे यार 5 नहीं अब हम 10 लेंगे.. सुन तू कुछ दिन वहाँ रहना.. तेरा हिस्सा तुझे दे दूँगा.. डर मत.. उसके बाद कोई गेम बना लेंगे यार.. अभी तो बस पैसे की सोच।

राधे- ओके चल.. अब बता करना क्या है और उस साले मास्टर का क्या करना है उसको क्या बोलेंगे?

नीरज- अरे मास्टर की माँ की आँख.. साले को बोल देंगे गाँव में दादी मर गई हैं.. कुछ दिन के लिए जाना होगा.. तू छोड़ मास्टर को.. वहाँ क्या करना है.. उसकी सुन।

दोनों काफ़ी देर तक बातें करते रहे.. उन्होंने कोई प्लान बनाया.. जिससे दोनों खुश थे कि इस प्लान में कोई कमी नहीं है.. अब पैसे आए ही समझो।

रात को दोनों आराम से सो गए और सुबह जल्दी उठकर नीरज बाहर गया और एसटीडी से दिलीप जी को फ़ोन लगा दिया।

दिलीप- हैलो, कौन हो आप? प्लीज़ मुझे अपनी बेटी के बारे में जानना है.. प्लीज़ पूरी बात बताओ।

नीरज- देखिए मैंने अच्छे से पता लगा लिया है.. वो आपकी बेटी राधा ही है मगर।

दिलीप जी- मगर क्या.. बोलो.. बताओ.. क्या हुआ मेरी बेटी ठीक तो है ना?
नीरज- नहीं.. नहीं.. ऐसी बात नहीं है.. वो ठीक है.. मगर जिसने उसे पाला है.. अब उसको भी तो कुछ मिलना चाहिए ना.. आप 10 लाख दे दोगे तो राधा आपको मिल जाएगी।

दिलीप- दे दूँगा.. बस तुम मुझे मेरी बेटी से मिलवा दो प्लीज़।
नीरज- ठीक है दोपहर तक मैं राधा को ले कर आ जाऊँगा आप पैसे तैयार रखना।

दिलीप जी ने नीरज को पता दे दिया.. नीरज ने फ़ोन काट दिया।

मीरा वहीं पास खड़ी थी.. दिलीप जी ने ख़ुशी से मीरा को गले लगा लिया और पूरी बात बताई।
मीरा- मगर पापा ऐसे अचानक दीदी का मिल जाना और 10 लाख.. मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा.. कहीं वो आदमी कोई फ्रॉड ना हो?
दिलीप- शुभ-शुभ बोल बेटी.. ऐसा कुछ नहीं होगा.. उसको आने तो दो हम अच्छे से राधा को देख कर उसको पैसे देंगे।

दोनों बाप-बेटी बड़े खुश थे.. दिलीप जी ने पैसों का बंदोबस्त किया और बड़ी बेताबी से नीरज का इन्तजार करने लगे।

उधर नीरज और राधे ने पूरी तैयारी कर ली थी.. सब को ‘बाय’ बोल कर वहाँ से निकल गए।

दोपहर के 3 बजे थे.. मीरा ने जींस और टी-शर्ट पहनी हुई थी.. वो बड़ी ही प्यारी लग रही थी.. दिलीप जी और मीरा हॉल में बैठे राधा के आने का इन्तजार कर रहे थे।
तभी डोरबेल बजी.. मीरा भाग कर गई और दरवाजा खोला तो सामने नीरज खड़ा था.. मगर राधा उसके साथ नहीं थी।

मीरा- हाँ कहिए.. कौन हो आप?

मीरा को देख कर नीरज की जीभ लपलपा गई.. ऐसी सुन्दरता को देख कर वो उस को देखता रह गया।
नीरज- ज्ज्ज..जी.. मैं नीरज हूँ.. फ़ोन पर बात हुई थी ना।

मीरा- ओह आइए.. अन्दर आइए.. राधा दीदी कहाँ हैं?

नीरज कुछ बोलता उसके पहले राधे उर्फ राधा पीछे से सामने आ गई। उसने सिंपल सलवार-कमीज़ पहना हुआ था और हल्का सा मेकअप किया हुआ था। वैसे भी उसका चेहरा लड़कियों जैसा था.. मेकअप से एकदम लड़की लग रही थी।

राधा- मैं यहाँ हूँ..

मीरा की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा.. वो भाग कर राधा से चिपक गई।

मीरा के चिपकते ही राधे का लौड़ा सलवार में तन गया.. मीरा के जिस्म की भीनी भीनी खुश्बू उसकी नाक में जाने लगी.. उसका संतुलन बिगड़ता देख कर नीरज ने उनको अलग किया।

नीरज- अरे अरे.. बाद में आराम से मिल लेना.. अन्दर तो चलो।

तभी दिलीप जी भी आ गए और राधा को सीने से लगा लिया.. उनकी आँखों में आँसू आ गए थे।

जब मिलना-मिलाना हो गया.. तो सब अन्दर चले गए.. अब इतना तो आप भी समझ सकते हो कि ऐसे ही कोई किसी को अपनी बेटी कैसे मान लेगा।

दिलीप जी ने निशान को गौर से देखा और राधा को बचपन की बातें पूछी जो सही निकलीं.. और निकलती भी कैसे नहीं.. नीरज और राधे ने बड़ी शालीनता से ये प्लान बनाया था। आप खुद सुन लो पता चल जाएगा ऐसी बातें तो अक्सर सब के साथ होती हैं। बेचारे दिलीप जी उनके जाल में फँस गए।

दिलीप जी- अच्छा बेटी निशान तो वही है.. ये बताओ उस दिन क्या हुआ था.. कुछ याद है तुम्हें?

राधा- पापा, ठीक से तो कुछ याद नहीं.. मगर जब आप कहीं नहीं मिले.. तो मैं रोने लगी और इधर-उधर भागने लगी.. तब एक आदमी ने मुझे गोद में ले लिया और आपको ढूँढा.. मगर जब आप नहीं मिले तो वो मुझे साथ ले गया और बेटी बना कर पाला।

दिलीप जी- ओह मेरी बेटी.. सॉरी.. मैंने भी तुमको बहुत ढूँढा.. मगर तुम नहीं मिलीं.. अच्छा उस दिन की बात जाने दो.. पहले की कुछ बात याद है?

नीरज और राधे एक-दूसरे को देखने लगे उनको लगा कि कहीं पकड़े ना जाएं.. मगर राधे बोल पड़ा।

राधे- पापा उस समय में बहुत छोटी थी.. ठीक से कुछ याद नहीं.. मगर हाँ मैं ज़िद करती थी.. तो आप गोद में मुझे ले जाते और मैं जो मांगती.. आप दिला देते।

इतना सुनते ही दिलीप जी ने राधा का हाथ पकड़ लिया और खुश हो गए- हाँ सही कहा.. तुम सही बोल रही हो.. तुम ही मेरी राधा हो।

दोस्तो, राधे को पता था ये नॉर्मल सी बात है कि सब पापा ऐसे ही करते हैं और दिलीप जी फँस गए।
अब उनको कोई शक नहीं था।

नीरज- अच्छा अंकल जी.. अब आपकी बेटी आपके हवाले.. मुझे मेरा इनाम दे दो.. मैं जाता हूँ।

दिलीप जी- तुमने अपने बारे में कुछ बताया नहीं और राधा इतने साल कहाँ रही.. कैसे रही?

नीरज- व्व.. वो जिस आदमी ने राधा को पाला.. वो मेरा चाचा है.. मैंने भी राधा को अपनी बहन की तरह माना है.. मगर साहब हम गरीब लोग हैं.. बड़ी मुश्किल से गुजारा होता है.. राधा अब बड़ी हो गई है.. इसकी शादी भी करनी है.. हमारे तो खाने के फ़ाके हैं.. शादी कहाँ से करवाते.. किस्मत से पुराना अख़बार मिल गया था.. उसमें आपका नम्बर मिला और आगे तो आप सब जानते ही हो।

दिलीप जी- ओह हाँ सही किया तुमने बेटा.. लो इस बैग में पूरे पैसे हैं.. मगर एक बात कहूँगा.. तुम लोगों ने मेरी बेटी को बड़े प्यार से पाला वरना.. आजकल की वहशी दुनिया में ना जाने क्या-क्या होता है।

राधा- नीरज ऐसे मत जाओ ना.. इतने साल साथ रहे.. खाना खाकर जाना आप हाँ।
मीरा- हाँ दीदी… आपने सही कहा.. इनको ऐसे नहीं जाने देंगे.. खाना तो आपको खाना ही होगा।

सब के ज़िद करने पर नीरज मान गया और बस सब इधर-उधर की बातें करने लगे। कुछ देर बाद दिलीप जी को किसी काम से बाहर जाना पड़ा और मीरा भी इधर-उधर कुछ काम कर रही थी। तब मौका देख कर दोनों ने बात की।

राधे- अबे साले यहाँ तो एक आइटम भी है अब क्या होगा?
नीरज- होना क्या है भोसड़ी के.. तेरी बहन है.. आराम से साथ रह कर मजे ले.. तब तक मैं जल्दी ही यहाँ से तुझे निकालने का कोई प्लान बनाता हूँ।

राधे- कुत्ते बहन होगी तेरी.. साले ऐसी गजब की आइटम के साथ कैसे रह पाऊँगा.. उससे गले मिल कर तो मेरा तो लौड़ा फड़फड़ा गया था।
नीरज- अबे काबू कर अपने आपको.. नहीं तो हवालात की हवा खानी पड़ जाएगी.. चुप.. वो आ रही है।

मीरा वापस आ गई और दोनों से बातें करने लगी.. दोनों की गंदी नजरें मीरा के जिस्म की बनावट का मुआयना कर रही थीं।

दोस्तो, उम्मीद है कि आप को मेरी कहानी पसंद आ रही होगी.. मैं कहानी के अगले भाग में आपका इन्तजार करूँगी.. पढ़ना न भूलिएगा.. और हाँ आपके पत्रों का भी बेसब्री से इन्तजार है।
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