अधूरी ख्वाहिशें-1

(Adhuri Khwahishen- Part 1)

This story is part of a series:

करीब पौने दो साल बाद फिर हाज़िर हूँ आपके बीच। अगर भूलें न हों याद दिला दूँ और पढ़ी न हों तो पढ़ लें.. मेरी पिछली कहानी
शीला का शील
और
वो सात दिन कैसे बीते
थीं।

असल में जिओ ने मेरी नौकरी की वाट लगा दी थी, फिर काफी संघर्ष भरा वक़्त गुज़रा इस बीच, जिससे मैं इस मंच से अपना कोई अनुभव साझा न कर सका।

अब फिर से किसी ठिकाने लग गया हूँ तो सुकून है और इस बीच जो अनुभव ख़ास रहे, उन्हें आपके साथ ज़रूर साझा करूँगा। ऐसा तो नहीं है कि इस बीच कहीं सहवास के मौके न मिले हों..

लेकिन सीधे सादे सेक्स में बताने लायक कुछ होता नहीं.. बताया तो वही जाता है जो कुछ ख़ास हो, अलग हो.. जैसे गौसिया के साथ गुज़रे पल या शीला की जिंदगी के कडुवे सच।

बहरहाल, इन पौने दो साल में कुछ अफ़साने बने तो सही जो बताने लायक हैं.. जो मन गुदगुदाने लायक हैं।

जैसा कि मैं पहले बता चुका हूँ कि मैं मूलतः भोपाल का रहने वाला हूँ लेकिन पिछले तीन साल से लखनऊ में जमा हुआ हूँ और अब तो यहाँ मन ऐसा लग चुका है कि कहीं जाने का दिल भी नहीं करता।
तो इस बीच गुज़रे वक़्त में से जो पहला किस्सा मैं अर्ज़ करूँगा वो एक ऐसी खातून से जुड़ा है, जिनके सऊदी में रहने वाले शौहर आरिफ भाई से मेरी दोस्ती किसी दौर में फेसबुक पर हुई थी।

यह दोस्ती सालों से थी लेकिन इसकी तरफ ध्यान तब गया जब एक दिन आरिफ भाई को मेरी मदद की ज़रूरत पड़ी। असल में मैंने पहले कभी इस बात पे ध्यान ही नहीं दिया था कि वे लखनऊ के ही रहने वाले थे और जिस टाइम मैं दिल्ली से लखनऊ शिफ्ट हुआ हूँ, ठीक उसी वक़्त में वे वापस सऊदी गये थे।

एक दिन उन्होंने मुझसे अर्ज की थी कि मैं उनकी बीवी रज़िया की थोड़ी मदद कर दूँ, क्योंकि उनके पीछे घर में जो माँ बाप थे, वे कोर्ट कचहरी करने की सामर्थ्य नहीं रखते थे और जो उनका छोटा भाई था वो किसी ट्रेनिंग के सिलसिले में बंगलुरु गया हुआ था।

दरअसल उनका एक बच्चा था जिसके एडमिशन के लिये बर्थ सर्टिफिकेट बनवाना था और इसमें कई झंझट थे जो कि उनकी बीवी के अकेली के बस की बात नहीं थी।
उन्होंने रज़िया का नंबर दिया और अपने घर का पता बताया.. हालाँकि यह झंझटी काम था और मैंने सोचा था कि चला जाता हूँ लेकिन किसी बहाने से टाल दूंगा।

पता सिटी स्टेशन की तरफ मशक गंज का था.. पूछते पुछाते किसी तरह मैं उनके घर तक पहुंचा।

डोरबेल बजाने पर सामना आरिफ भाई के वालिद से हुआ, मैंने उन्हें सलाम किया तो जवाब देते हुए उन्होंने अन्दर बुला लिया। शायद आरिफ भाई उन्हें बता चुके थे।
ड्राइंगरूम में बिठा कर वे मेरे बारे में पूछने लगे.. थोड़ी देर बाद चाय नाश्ता लिये रज़िया भी आ गयी। मैंने हस्बे आदत गहरी निगाहों से उसका अवलोकन किया।

चौबीस-पच्चीस से ज्यादा उम्र न रही होगी उसकी.. फिगर ठीक ठाक थी, तगड़ी तंदरुस्त थी। नाक नक्शा उतना अच्छा नहीं था लेकिन जो ख़ास बात थी उसमे, वो यह कि वो खूब गोरी, एकदम झक सफ़ेद थी और उसकी तवचा भी काफी चिकनी थी।

नाश्ते की ट्रे रखते हुए उसकी निगाह मुझसे मिली थी और एक लहर सी मेरे शरीर में गुज़र गयी थी। कुछ तो था उसकी निगाह में.. जो मैं समझ नहीं पाया।

बहरहाल आगे यह तय हुआ कि चूँकि मैंने भी कोर्ट कचहरी की दौड़ पहले नहीं लगायी तो मैं बहुत ज्यादा मददगार तो नहीं हो सकता लेकिन अगर वे चाहें तो अपने तौर पर जो हो सकता है, मदद ज़रूर कर दूंगा। कल वे खुद साथ चलें कचहरी और वहां देखते हैं कि क्या हो सकता है, तब तक मैं पता भी कर लेता हूँ कि यह किस तरह हो पायेगा।

और अगले दिन मैंने रज़िया को सिटी स्टेशन के पास से पिक किया।

कचहरी केसरबाग में थी जो ज्यादा दूर नहीं था। रज़िया ने खुद को नकाब से ढक रखा था और इस सूरत में बस उसकी आँखें ही दिखाई दे रही थीं।

कचहरी में पूरा दिन खर्च हो गया.. वकील से एफिडेविट बनवाया, चालान बनवाया और जनसुविधा केंद्र में उसे पास कराने में आधे दिन से ज्यादा निकल गया। खाना वहीं बाहर फुटपाथ पे खाया.. तत्पश्चात चालान जमा कराया और फिर सारे कागज़ एसडीएम के पास मार्क कराने ले गये तो फार्म लेके कल आने को बोल गिया गया।

इसके बाद मैंने रज़िया को जहाँ से पिक किया था, वहीँ छोड़ दिया और घर चला आया।

पहले मेरा इरादा काम को टालने का था लेकिन अगर इस बहाने एक औरत के करीब रहने को मिल रहा था तो यह किया जा सकता था, यह सोच कर मैंने आज आधे दिन छुट्टी तक करनी गवारा कर ली थी। अब तो कल भी छुट्टी होनी थी.. दिन भर मैंने रज़िया से बात करने की कोशिश की थी लेकिन वो बंद गठरी बनी रही थी।

हालाँकि ऐसा भी नहीं था कि मुझे उससे कोई ख़ास उम्मीद रही हो लेकिन ये मरदाना फितरत है कि आप नज़दीक आई हर औरत में स्वाभाविक रूप से दिलचस्पी लेने लगते हैं।

अगले दिन फिर मैंने उसे वहीं से पिक किया और सीधे एसडीएम ऑफिस पहुंचा जहाँ से थोड़े खर्चे पानी की एवज में कागज़ लेके वापस वकील के पास पहुंचे तो उसने जमा कराने भेज दिया।
दोपहर तक फ़ार्म सबमिट हो गया।

“मुझे थोड़ा काम है।” वापसी में उसने बाइक पर बैठने से पहले ही कहा।
मैंने प्रश्नसूचक नेत्रों से उसे देखा तो उसने आगे कहा- मुझे गोमती नगर जाना है।
मुझे क्या ऐतराज़ होता.. मैं उसे ले के चल दिया।

रास्ता मैंने बटलर रोड का चुना था.. लेकिन बैकुंठ धाम से पहले ही उसने एक जगह बाइक रुकवा ली, जहाँ से नीचे उतर कर गोमती के किनारे जाया जा सकता था।

“यहाँ!” मुझे चौंकना पड़ा- यहाँ क्या कोई मिलने आने वाला है?
“नहीं.. बस अकेले होने का जी चाह रहा था। हमारे नसीब में अकेला होना कहाँ नसीब… आज मौका था तो सोचा कि थोड़ा वक़्त यूँ भी सही। घर पे तो बोल के ही चले थे कि शाम हो जायेगी कल की तरह, तो कोई परेशानी भी नहीं।”
“पर यहाँ यूँ अकेले बैठना सेफ रहेगा भला? और यहाँ से वापस कैसे जायेंगी.. यह जगह भी तो ऐसी नहीं की कोई सवारी का साधन मिल जाये।”

“मतलब आप मुझे वाकयी अकेला छोड़ कर जाने वाले हैं?” कहते हुए उसने गहरी नज़रों से मुझे देखा और मेरा दिल जोर से धड़क कर रह गया। मैंने चुपचाप थोड़ा नीचे उतार कर बाइक स्टैंड पे टिकाई और उसके साथ नीचे बढ़ लिया।
नीचे कोई बैठने की जगह तो थी नहीं.. बस हरियाली थी, पेड़ थे और नदी किनारे बनी कंक्रीट की पट्टिका थी, जिस पर हम विचरने लगे।

“चुप रहने के लिये तो यह तन्हाई तलाशी न होगी।” मैंने उसे छेड़ने की गरज से कहा।
उसने सवालिया निगाहों से मुझे देखा.. फिर मेरा मंतव्य समझ कर चेहरा घुमा लिया। यहां भी उसने चेहरा कवर कर रखा था और मैं बस उसकी आंखें देख सकता था।

“कैसे जानते हैं आप आरिफ को?”
“फेसबुक से.. कभी जब फेसबुक पर ग्रुपबाजी होती थी तब हम एक ही ग्रुप में थे। बस तभी से दोस्ती है। मैं तब दिल्ली रहता था.. इत्तेफाक से जब वे इस बार सऊदी गये, मैं ठीक उसी वक्त लखनऊ शिफ्ट हुआ था तो मुलाकात न हो सकी।”
“मुझे नहीं पता था… मुझे लगा स्कूल कालेज के टाईम के दोस्त रहे होगे।”

“आप बताइये कुछ अपने बारे में।”

“मैं मलीहाबाद से हूँ.. आरिफ भी बेसिकली वहीं के हैं। बाद में इधर बस गये तो हमारा यहां रहना हो गया लेकिन सभी नजदीकी रिश्तेदार मलीहाबाद में ही रहते हैं।”
“कभी कभार मर्द की जरूरत वाले काम पड़ने पर काफी मुश्किल होती होगी।”
“हां अब हो जाती है। पहले अब्बू ठीक ठाक थे और आसिफ भी पढ़ रहा था तब कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन अब अब्बू गठिया की वजह से ज्यादा चल फिर नहीं पाते और आसिफ अब नौकरी के चक्कर में पड़ गया है।”

“तो वह अब यहां नहीं रहता?”
“फिलहाल तो रहता था, पर अब शायद मुश्किल हो। नौकरी उसकी नोएडा में लगी है.. अभी एक महीने की ट्रेनिंग पर बंगलुरू गया है, वापस आयेगा तो शायद नोएडा ही रहना पड़ेगा।”
“और मान लीजिये कोई मेडिकल इमर्जेंसी हो जाये तब?”

“पड़ोसी ही काम आयेंगे, थोड़े बहुत काम या वक्त जरूरत के लिये पड़ोसियों से बना के रखनी पड़ती है और उनकी उम्मीद भी बनी रहती है।”
“उम्मीद.. कैसी उम्मीद?” मैं उलझन में पड़ गया।
“आप के परिवार में कौन-कौन है?” उसने बात काट दी।

“दो भाई बहन हैं पर यहां कोई नहीं, सब भोपाल में रहते हैं। मैं अकेला रहता हूँ यहां.. यहीं नौकरी करता हूँ एक मोबाइल कंपनी में। शादी कब हुई आपकी?
“छः साल हो गये.. तीन साल बाद बेटा हुआ। अब उसके भी स्कूल का टाईम आ गया।”

बस ऐसे ही रस्मी बातें.. कुछ भी खास नहीं। ऐसा लगा जैसे वह अपना बताना कम और मेरा जानना ज्यादा चाहती हो।

मैं भी घाघ आदमी हूँ.. मैंने महसूस कर लिया था कि शायद वह परखना चाहती है कि मैं भरोसे के लायक हूँ या नहीं.. और मैं भी उसी नीयत से सधे हुए जवाब देता रहा।

इस बीच वक्त को चलाती सुइयों ने दो घंटे पार कर लिये और यूँ चल फिर करते बदन में थकन भी आ गयी तो हम वापस हो लिये।
मैं उसे वापस सिटी स्टेशन के पास छोड़ कर घर चला आया।

इस बात को फिर चार दिन गुजर गये, मेरी रजिया से कैसे भी कोई बात नहीं हुई। हालाँकि इस बीच मेरा दिल कई बार चाहा कि उसे फोन करूँ, लेकिन हर बार इस आशंका ने रोक लिया कि कहीं वह मेरे सब्र और परिपक्वता को आजमाने की फिराक में न हो।

फिर पांचवे दिन बृहस्पतिवार रात को उसका फोन आया, जब मैं हस्बे दस्तूर नेट सर्फिंग में रत था। फोन बजा था, लेकिन जब तक मैं उठाता.. कट गया था।
मैंने काल बैक की।
“हलो।” पांच दिन बाद उसकी आवाज सुनाई दी।
“हाँ सॉरी.. आपकी कॉल मिस्ड हो गयी।”

“अं.. नन-नहीं.. वह गलती से लग गयी थी।” उसकी आवाज़ से ऐसा लगा जैसे हिचक रही हो, घबरा रही हो।

जबकि इस गलती को मैं उससे बेहतर महसूस कर सकता था। उससे बेहतर समझ सकता था। मैंने पूरी शालीनता के साथ जवाब दिया- जी मैं समझ सकता हूँ।
“क्या?” वो कुछ चौंक सी गयी।
“बस यही.. कि इंसान अगर इस कदर अकेला हो कि उसके पास बात करने वाला भी कोई न हो तो उसके साथ ऐसी गलतियों की सम्भावना बनी रहती है।”
“नन… नहीं.. आप गलत समझ रहे। मेरे पास बात करने के लिये बहन है और सहेलियां भी हैं।” ऐसा लगा जैसे कहते हुए उसके कंठ में आवाज़ फँस रही हो।

“जी इस तरह सभी के पास होते हैं लेकिन हर किसी से इंसान अपनी तड़प नहीं कह सकता, अपनी हर तकलीफ नहीं ब्यान कर सकता.. और खास कर बहन से तो बिलकुल नहीं।”
“मैं समझी नहीं। कैसी तकलीफ?”
“तकलीफ अपने अरमानों की… तकलीफ अपने हाथ से रेत की तरह फिसलते जवानी के उस वक़्त की जो एक बार गुज़र गया तो फिर कभी वापस नहीं आता।”
इस बार उससे कुछ बोलते न बना।

“ऐसा नहीं कि मैं समझ नहीं सकता कि आप किस ज़हनी कशमकश के दौर से गुज़र रही हैं। आप कहना भी चाहती हैं लेकिन आपकी तहजीब और आपके संस्कार आपको रोक भी रहें। मैं फिर भी समझ सकता हूँ कि उस औरत के दिल पर क्या गुज़रती है जिसका पति उसे राशन की तरह मिलता हो.. दो तीन साल में एक बार। कुछ मुख़्तसर वक़्त के लिये।”

“ऐसी बात नहीं।” वह एकदम बुझे और हल्के स्वर में बोली जैसे खुद से हार रही हो।

“मेरी बात होती है आरिफ से.. मिस्री, सूडानी, चीनी, रशियन, फ्रेंच, अमेरिकन कोई बची नहीं है भाई से। हर वीक विजिट करते हैं लेकिन आपका क्या? आपको सब्र ही करना है.. ऐसा नहीं है कि यह कोई अकेले आपकी समस्या है जो आप छुपा लेंगी या मुझे बातों से बहला देंगी.. यह उन सारी औरतों का दर्द है जिनके शौहर विदेश में कहीं पैसे कमाने में खपे हुए हैं..
और उनकी बीवियां यहाँ खुद को सब्र के पहाड़ के तले दबाये दिन गिनती रहती हैं। वे नहीं रोक पाते खुद को.. ऐसे हर मकाम पे, जहाँ नौकरियों के लिये लोग जाते हैं, उनकी जिस्म की ज़रूरतों के मद्देनज़र इंतजामात रहते ही हैं लेकिन पीछे औरतों के लिये कोई इंतजाम नहीं।
उनकी ज़रूरतों को समझता ही कौन है.. ध्यान देता ही कौन है? उससे यही उम्मीद रहती है कि वो अपने जज़्बात को दफ़न कर ले। अपने जवानी की गर्माहट से भरपूर वजूद को बर्फ की सिल बना ले और अपनी उम्र के सबसे सुनहरे दौर को यूँही गुज़र जाने दे।”

“प्लीज़.. चुप हो जाइये।” उसने दबाने की कोशिश की लेकिन उसकी आवाज़ ने उसकी सिसकी ज़ाहिर कर दी।
“डरिये मत, झिझकिये मत.. मेरे सीने में बड़े बड़े राज़ दफ़न हैं। जो कहना चाहती हैं खुल के कहिये.. आप बेशक मुझे अपना वह दोस्त समझ सकती हैं जिससे आप पूरी सेफ्टी के साथ जैसी चाहें बात कर सकती हैं।”

“मैं नहीं समझ पाती.. मुझे क्या बात करनी चाहिये।” मुझे लगा, वो मुझ पर भरोसा कर रही है।
“कोई बात नहीं.. चलिये मैं ही बात करता हूँ। आप बस जवाब देते रहिये.. ठीक है?”
“ठीक है।” उसने समर्पण कर दिया।

“अच्छा बताइये, शादी से पहले कभी सेक्स किया था क्या आपने या सीधे शादी के बाद ही शुरुआत हुई?”
पर वह चुप रह गयी।

“आप शायद इसलिये चुप हैं कि ये आपकी जिंदगी से जुड़ा सीक्रेट है और किसी अजनबी के सामने इस बारे में बात करना आपको ठीक नहीं लग रहा, लेकिन यकीन कीजिये मुझे आपको कभी भी, कैसे भी ब्लैकमेल करने में दिलचस्पी नहीं और दूसरे मैं आपको अपना कोई राज़ पहले बता देता हूँ जिससे आप मुझ पर यकीन कर सकें।”
“कैसा राज़?”

मैंने फिर उसे बताया कि मैं अन्तर्वासना पे कहानियाँ भी लिखता हूँ, वो चाहे तो पढ़ सकती है। उसके कहने पे मैंने उसके व्हाट्सअप पे लिंक भी भेज दिया.. पर अब उसे इस बात का संशय हो गया की कहीं मैं उसकी कहानी भी तो नहीं लिख दूंगा, तो मैंने उसे इस बात का यकीन दिलाया कि मैं अगर लिखूंगा भी तो कोई यह नहीं समझ पायेगा कि यह कहानी उसकी है।

लेकिन वह बाद की बात थी, फिलहाल जैसे तैसे उसे यकीन हो पाया कि मैं उसके राज़ को राज़ ही रखूँगा तब आगे बात करने पर राज़ी हुई।
“मेरा पिछला सवाल अभी अधूरा है भाभी जान!”
“कौन सा सवाल?”
“शादी से पहले सेक्स वाला।”

“हाँ किया था.. मैं जिस तरह के माहौल में रही थी वहां इससे बच पाना मुश्किल था और मुझे इस बात का डर भी था कि यह बात मेरे शादीशुदा जीवन पे पता नहीं क्या असर डालेगी, लेकिन उन्होंने इस बात पे यकीन कर लिया था कि मुझे हस्तमैथुन की आदत थी।”

“मैं समझ सकता हूँ.. ये और ज्यादा तकलीफ पैदा करने वाली बात हुई कि जिस मज़े से आप अनजान नहीं थीं और शायद आदी थीं, वो आपको यूँ किश्तों में मिल पा रहा है।”

“हम्म.. कभी-कभी इतना परेशान हो जाती हूँ कि बीच रात में उठ कर पानी में बर्फ डाल कर नहाती हूँ, फिर भी चैन नहीं पड़ती।”
“कभी कोई रास्ता बनाने की कोशिश नहीं की?”
“बहुत मुश्किल है जॉइंट फैमिली में। चार छ: महीने में जब मायके जाती हूँ तब थोड़ी राहत मिल पाती है, यहाँ तो फिर वही। फिर वही बिस्तर, फिर वही करवटें, फिर वही गर्म साँसें.. कैसे समझाऊं, किसे समझाऊं कि जब मर्द पास नहीं होता तो कैसा महसूस होता है उसकी जवान बीवी को।”

“बहुत सी औरतें इसका इलाज ढूंढ लेती हैं.. आप भी ढूंढ लीजिये। इसके सिवा और कोई रास्ता नहीं.. धीरे-धीरे जो जवानी आप आरिफ मियां के पीछे फूँक डालेंगी, वह फिर कभी वापस नहीं आनी और आरिफ भाई का क्या है, वे तो सब मज़े ले ही रहे हैं.. जैसे बाहर रहने वाले सभी मर्द लेते हैं।”
इस बार वह चुप रह गयी।

“एक बात पूछूं?”
“क्या?”
“मैंने आपको देखा है और देखने के बाद से दिमाग में एक सवाल चक्कर काट रहा है, अगर उसका जवाब मिल जाये तो मुझे भी सुकून मिल जाये।”
“क्या?”
“आप एकदम गोरी हैं.. एकदम सफ़ेद.. उस हिसाब से आपके निप्पल कैसे होंगे? काले या ब्राउन?”
“क्या.. कैसी बात कर रहे हैं आप?” वह एकदम से भड़क गयी और उसने फोन काट दिया।

मुझे लगा गड़बड़ हो गयी.. शायद मैंने जल्दी कर दी। मुझे अपनी जल्दबाजी पे अफ़सोस होने लगा और सॉरी बोलने के लिये मैंने वापस फोन किया, लेकिन उसने उठाया ही नहीं तो वहाट्सअप पे ही सॉरी बोल के अपनी ग्लानि ज़ाहिर की और अपनी हार का ग़म मनाता सो गया।
सुबह उठा तो उसका मैसेज पड़ा था जो उसने रात तीन बजे किया था।
“ब्राउन!“

कहानी जारी रहेगी.

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