चुदक्कड़ टीचर ने पढ़ाए चुदाई के पाठ-1

(Chudakkad Teacher Ne padhaye Chudai ke Path- Part 1)

This story is part of a series:

चूतनिवास की पहली चुदाई 

मेरे प्रिय पाठको, यह किस्सा मेरी पहली पहली चुदाई का है. मैंने पहली चुदाई के लिए किसी लड़की को नहीं पटाया था बल्कि मेरी एक टीचर ने मुझे पटाकर मेरे साथ चोदन सम्बन्ध बनाए थे और एक अच्छा चोदू बनने के सभी गुर भी सिखाये थे. अगर यह कहा जाए कि मुझे चूतनिवास बनाने वाली वही थी तो गलत न होगा.

मैं ग्यारहवीं क्लास पास करके बारहवीं में आया था. बाली मैडम हमारी क्लास टीचर थी. क्लास टीचर होने के साथ साथ वह सीनियर क्लासों को इंग्लिश पढ़ाती थी. बेहद खूबसूरत और सेक्सी थी. स्कूल में कुल छह महिला टीचर थीं परन्तु बाली मैडम के बेपनाह हुस्न के क्या कहने! मैडम अपार सौंदर्य की मालकिन तो थी हीं, उनका व्यक्तित्व भी अत्यंत भव्य और प्रभावशाली था. कपड़ों जूतों का चुनाव, चलने फिरने उठने बैठने का अंदाज़, बातचीत की शालीनता इत्यादि से लगता था कि किसी रियासत की महारानी आ गयी हैं. उनकी हर एक अदा अनूठी थी, मन को मोह लेने वाली थी. उनके संपर्क में आकर यह तो संभव था ही नहीं कि आप उनका दिल से अपने आप ही सम्मान करना शुरू न कर दें.

मैडम शादीशुदा थी और एक बहुत ही रईस घर में ब्याही थी. उसके ससुर काफी ज़मीन जायदाद के मालिक थे जिसके मैनजमेंट में ही समय लगाया करते थे. मैडम के पति एक मैरीन इंजीनियर थे और साल में एक बार तीन या चार महीने के लिए आया करते थे. मैडम को नौकरी की कोई ज़रूरत नहीं थी किन्तु वह सिर्फ टाइम पास करने के लिए स्कूल में नौकरी करती थी. इसके सिवा उनको पढ़ाने का शौक भी था. उनके घर में एक एम्बेसडर कार और ड्राइवर थे. कार रोज़ मैडम को स्कूल छोड़ने आती थी और छुट्टी के टाइम वापिस घर ले जाने आया करती थी.

सब लड़के मैडम का नाम लेकर खूब मुट्ठ मारा करते थे. मैडम स्कूल के स्पोर्ट्स क्लब की इंचार्ज भी थीं. हमारा स्कूल बॉक्सिंग में काफी नामी था. पूरे प्रदेश में मशहूर था. मैं भी एक बहुत अच्छा मुक्केबाज़ था. चैंपियन तो नहीं बना लेकिन नंबर दो तो आ ही जाता था. अच्छा हट्टा कट्टा, ऊंचा लम्बा, मज़बूत कद काठी का लड़का था और शायद हैंडसम भी था.

वैसे मैं, जब से लंड से वीर्य निकलना शुरू हुआ, तभी से बहुत ठरकी था. आस पास की सभी लड़कियां तो लड़कियां, औरतों पर भी नज़र लगाए रखता था लेकिन किसी से इश्क़ विश्क़ की पहल करने से डरता था. हाँ दो लौंडे थे, बड़े चिकने चुपड़े से, लड़कियों की तरह मुलायम से. दाढ़ी मूंछ भी नहीं आयी थी. अक्सर उनकी गांड मारा करता था. कभी गांड मारने का मूड न हो तो उनसे मुट्ठ मरवा लिया करता था. हालांकि लंड चूसने को कमीने राज़ी नहीं हुए थे.

एक दिन मैं एक खाली पीरियड में लाइब्रेरी में पढ़ाई करने का नाटक करते हुए ऊँघता हुआ टाइम पास कर रहा था, तो स्कूल का सबसे सीनियर चपरासी रामजी लाल मुझे ढूंढता हुआ आया- राजे … तुम्हें बाली मैडम ने बुलाया है … स्टाफ रूम में … चलो फटाफट!
रामजी लाल को सब लोग ताऊ कहा करते थे. न जाने कब किसने यह नाम उनको दिया था और तब से ही यह नाम उनके साथ चिपक गया था. वैसे शकल सूरत और हाव भाव से लगते भी ताऊ ही थे.

“ताऊ … क्या हुआ … क्यों बुला रही हैं मैडम?” मैंने पूछा.
“मेरे को क्या मालूम … मैडम बड़े बिगड़े हुए मूड में हैं … तुमने कोई न कोई शैतानी की होगी … तुम हो ही एक नंबर के शैतान लड़के.”
“अरे नहीं ताऊ … क्यों मुझे बदनाम करते हो … कोई शैतानी नहीं की मैंने!”

मैं स्टाफ रूम में चला गया जहाँ मैडम बैठी हुई थी. स्टाफ रूम एक काफी बड़ा कमरा था जिसमें बीस बाईस कुर्सियां एक बड़ी सी अंडाकार टेबल के सब तरफ लगी हुई थी. यह कमरा स्टाफ रूम होने के साथ साथ प्रिंसिपल द्वारा टीचरों की मीटिंग लेने के काम भी आया करता था. एक दीवार पर एक बड़ी सी अलमारी थी जिसमें हर टीचर के लिए एक खाना था, जिसमें टीचर अपना लंच बॉक्स या और कुछ सामान रखते थे. दूसरी दीवार के साथ आठ दस आराम कुर्सियां लगी हुई थीं. तीसरी दीवार में दो दरवाज़े थे जिसमें एक मरदाना बाथरूम के लिए और दूसरा ज़नाना बाथरूम में जाने के लिए था. चौथी दीवार में कमरे में घुसने के लिए दरवाज़ा था.
इस कमरे में टीचर लोग खाली पीरियड में सुस्ताने, इम्तेहान की कापियां चेक करने, विद्यार्थियों का होम वर्क जांचने और लंच इत्यादि के लिए इस्तेमाल करते थे.
 
डरता हुआ मैं स्टाफ रूम में जा पहुंचा. वास्तव में मैडम उखड़े उखड़े मूड में लगती थी. लेकिन उनकी खूबसूरती हर मूड में उनको बेहद दिलकश बनाये रखती थी. 
“जी मैडम … अपने बुलाया था?”
“हाँ राजे … कुछ काम था तुम्हारे लिए … आज मेरा ड्राइवर नहीं है तो मुझे रिक्शा से घर जाऊंगी … लेकिन समस्या यह है कि इतनी सारी कापियां चेक करने के लिए ले जानी थीं … मुझे अकेले रिक्शा में इनको उठा कर ले जाने में बहुत दिक्कत होगी … मैं चाहती हूँ कि तुम मेरे साथ रिक्शा में चलो. ये कापियां ले चलने में मेरी मदद करो. तुम्हारा घर तो पास में ही है इसलिए सोचा कि यह काम तुम्हें ही दे दूँ.” मैडम के सामने टेबल पर एक मोटा सा करीब चालीस पचास कापियों का बंडल पड़ा था.

मैंने कहा- मैडम आप घर जाइये … मैं यह बंडल अपनी साइकिल पर आपके घर पर छोड़ दूंगा … आप समय बता दीजिये कि आप कब घर पर मिलेंगी?
“ठीक है राजे … तुम तीन बजे यहाँ से यह कापियां ले जाना … मैं साढ़े तीन तक घर पहुँच जाऊंगी. तुम चार बजे तक घर पर इनको पहुंचा देना.”
“यस मैडम!’ कह कर मैं स्टाफ रूम से निकल कर क्लास में चला गया. खाली पीरियड ख़त्म होने वाला था. 

तीन बजे स्कूल की छुट्टी हुई तो मैं सीधे स्टाफ रूम में मैडम से कापियों वाला बंडल ले आया और उसको अपने साथ घर ले गया. घर स्कूल से नज़दीक ही था. साइकिल से दस बारह मिनट का रास्ता था. मैडम का घर भी उसी कॉलोनी में था जहाँ मैं रहता था. यही कोई एक डेढ़ किलोमीटर दूर.

जैसा मैडम ने कहा था मैं ठीक चार बजे उनके मकान पर कापियों का गट्ठर लेकर पहुँच गया. बहुत बड़ा आलीशान बंगला था. हज़ार गज़ के प्लाट में बना हुआ. आगे बहुत बड़ा लॉन था जिसके बगल में गेराज को जाने वाला रास्ता था और घर में प्रवेश के लिए बरामदा भी था.

मैडम घर पहुँच चुकी थी और बरामदे में एक बेंत की आराम कुर्सी पर बैठी थी. मुझे देखकर उठ कर खड़ी हो गयी और घर में जाने का मेन गेट खोल के मुझे भीतर आने का इशारा किया. अंदर गए तो एक गलियारा था जिसके दोनों तरफ अलग अलग कमरों में प्रवेश करने के द्वार थे. मैडम के पीछे पीछे मैं ड्राइंग रूम में चला गया और कापियों वाला गट्ठर एक टेबल पर रख दिया.

जैसे ही मैं जाने को हुआ तो मैडम ने कहा- थैंक यू राजे … रुको थोड़ा … मैं तुम्हारे लिए कुछ नाश्ता लेकर आती हूँ.
“नहीं मैडम … मैं चलता हूँ. आधे घंटे में मुझे बॉक्सिंग प्रैक्टिस के लिए वापिस स्कूल जाना है … प्रैक्टिस के बाद ही कुछ खाता हूँ … कुछ चाय नाश्ता कर लिया तो बॉक्सिंग नहीं की जायगी.”

“अरे नहीं राजे … ऐसे तो मैं न जाने दूंगी … मैं हूँ न स्पोर्ट्स इंचार्ज … मेरी इजाज़त है … आज मत करो बॉक्सिंग प्रैक्टिस … . तुम आराम से बैठो. मैं पांच मिनट में फ्रेश होकर आती हूँ.”

मैं एक सोफे पर बैठ गया और चारों तरफ नज़रें घुमाकर ड्राइंग रूम का मुआयना करने लगा. काफी बड़ा ड्राइंग रूम था. बढ़िया किस्म के फर्नीचर और कालीनों से लैस. कई इम्पोर्टेड शो पीस जगह जगह पर रखे हुए थे. एक रईस खानदान का जैसा ड्राइंग रूम होना चाहिए वैसा ही था. सेन्टर टेबल पर एक फिल्मी मैगज़ीन पड़ी थी. मैं उसको उठाकर पन्ने पलटने लगा. एक हीरोइन की पूरे पन्ने की फोटो पर जाकर मेरी नज़रें अटक गयीं. फोटो में वो हरामज़ादी कामुकता से भरपूर हुस्न की जीती जागती तस्वीर लग रही थी. साली बहुत सेक्सी थी जिसको देखते ही लौड़ा अकड़ गया. मैं बड़ी ध्यान से उसकी तस्वीर को निहार रहा था.

तभी कानों में मैडम की सुरीली आवाज़ आयी- ओह हो … तो आँखें हरी की जा रही हैं … तुम्हारी फेवरिट है क्या वो?
मैं हड़बड़ा के उठा, मैगज़ीन भी नीचे गिर गई. अकड़ा हुआ लौड़ा किसी नोकीली चीज़ की तरह पैंट में उभरा हुआ था. उसे इधर उधर करके सेट करने का भी मौका नहीं था.

मैंने मुंह ऊपर उठाकर मैडम की तरफ देखा. मैडम ने एक निम्बू जैसा हरापन लिए हुए पीले रंग का गाउन पहन रखा था. उन्होंने ट्रे को टेबल पर रख दिया. एक गिलास मोसम्बी का रस और कुछ काजू, बादाम, पिस्ते और अखरोट एक तश्तरी में रखे थे.
मैडम मेरे सामने वाले सोफे पर बैठ गयीं और एक टांग दूसरी टांग पर टिका कर आराम से हो गयीं. टेबल पर रखे सामान की तरफ इशारा करते हुए मुझे नाश्ता करने के लिए कहा. मैंने एक दो काजू लिए और घबराया हुआ सा जूस के दो तीन सिप लिए.

“अरे राजे, तुम इतने डरे हुए क्यों हो. आराम से जूस पियो और ड्राई फ्रूट लो. जूस बिल्कुल ताज़ा मोसम्बी से खुद निकाल के लायी हूँ. मुझे सॉफ्ट ड्रिंक्स या शरबत पसंद नहीं … सेहत के लिए बुरे होते हैं … और तुमको तो मुक्केबाज़ी भी करनी है इसलिए ताक़त वाली चीज़ें हैं सब … और हाँ अगर आँखें पूरी तरह से हरी न हुई हों तो मैगज़ीन गिर गयी है, उठा लो और मज़े से देखो अपनी फेवरिट हीरोइन को!” मैडम की मीठी आवाज़ सुन के यूँ लगता था जैसे दूर कहीं हल्के हल्के से घंटियां बज रही हों. मैं बड़ा परेशान था कि लौड़ा बग़ावत पर उतारू था. कम्बख्त बैठने में ही नहीं आ रहा था. मुझे डर था कहीं ये ज़ोर से अकड़ा लंड मैडम को पैंट के पीछे दिख न जाए.

मैंने मैगज़ीन तो फर्श से उठाकर वापिस टेबल पर रख दी लेकिन दुबारा से आँखें हरी करने का विचार टाल दिया. मेरी निगाह तो मैडम के हाथों पर जाकर जाम हो गयी थी. दूध से गोरे, बहुत ही खूबसूरत सुडौल हाथ थे मैडम के. उनका चेहरा भी सौंदर्य में किसी भी हीरोइन से कम नहीं था. वैसे उनको गाउन में देखकर लौड़ा जो हड़बड़ाहट में बैठ गया था फिर से अकड़ गया.

एक दो बार डरते डरते मैंने मैडम पर नज़र डाली तो उनको अपनी तरफ ही देखते पाया. घबरा के मैं झट से निगाह नीचे कर लेता और फिर उनके हाथों को देखने लगता. मैडम ने पैरों में किसी मखमली से गहरे नीले कपड़े की स्लिपर पहनी हुई थी. स्लिपर बहुत सुन्दर थी परन्तु उसमें पांव ढक हुए थे, दिख नहीं रहे थे. लेकिन उनके टखने और एड़ी का जो थोड़ा सा भाग मैं देख पाया उससे लगता था कि मैडम के पांव भी उनके हाथों जैसे सुन्दर ही होंगे.

जूस और नाश्ता ख़त्म होने तक मैडम इधर उधर की कुछ बातें करती रही. अपने विषय में बताती रहीं. मैडम के पापा इंडियन आर्मी में ब्रिगेडियर थे और गुजरात में पोस्टेड थे. उनकी मम्मी भी आर्मी में डॉक्टर थीं. मैडम जी की पढ़ाई आर्मी पब्लिक स्कूल डगशाई, शिमला में हुई थी. कॉलेज की पढ़ाई कई स्थानों पर हुई, जहाँ जहाँ उनके पापा का ट्रांसफर होता रहा. मालूम हुआ कि मैडम जी के सास और ससुर किसी सत्संग में एक हफ्ते के लिए अमृतसर गए हुए हैं और उनका पुराना नौकर मोहन दास अचानक बीमार हो गया तो छुट्टी पर था. इसलिए आजकल मैडम जी घर में अकेली ही थीं.

जब मैं खा पी चुका तो मैडम ने गिलास और ख़ाली प्लेट उठाकर ट्रे में रखी और ट्रे को लेकर भीतर चली गयीं. दो मिनट में वापिस आईं तो मैंने पूछा- मैडम जी अब चलूँ?
मैडम ने एक उंगली उठाकर रुकने का इशारा किया और मेरे बहुत करीब आकर यकायक मुझसे लिपट गयीं. मेरे सर के पीछे हाथ लगाकर मेरा मुंह झुकाकर अपने मुंह के पास ले आईं. मैडम की गर्म गर्म मादक साँस मेरे मुंह पर लगने लगी.
मैं सटपटा गया और घबराहट के मारे मेरी टाँगें लड़खड़ाने लगीं.

“राजे, जिस लड़की की फोटो देख कर तुम्हारी मर्दानगी ज़ोर मार रही थी, ध्यान से मुझे देख कर बोलो, मैं क्या उससे कम हूँ? देखो मेरी ओर ध्यान से.”

कहानी जारी रहेगी.
चूतनिवास
[email protected]

What did you think of this story??

Comments

Scroll To Top