गलतफहमी-5

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नमस्कार दोस्तो, आपको कहानी थोड़ी लंबी जरूर लग रही होगी, पर कहानी की सभी कड़ियाँ आपस में जुड़ी हुई हैं इसलिए आप सभी कड़ीयों को ध्यान और सब्र के साथ पढ़ें।

अब तक आपने मेरी काल्पनिक कल्पना के साथ मुलाकात और उससे जुड़ी गलतफहमियों को जाना, अब वह मुझे कोई सरप्राईज देने वाली है और मैं उसके साथ उसकी गाड़ी में बैठ कर एक कॉलोनी की तरफ जा रहा हूँ।

कॉलोनी के सभी मकान एक जैसे दिख रहे थे, मैं रास्ते को समझने की कोशिश कर रहा था क्योंकि मैं मन ही मन दुबारा आने का भी प्लान कर रहा था।
मैंने गौर किया कि कल्पना ने गली नम्बर 32 में गाड़ी मोड़ी और कुछ दूर जाकर 30 नम्बर के मकान पर गाड़ी रोक दी।
मकान महल जैसा तो नहीं था पर एकदम छोटा घर भी नहीं था, अच्छा डिजाइन किया हुआ सुंदर सा मकान था। मकान के पोर्च पर कार खड़ी थी, उसी के बगल में कल्पना ने स्कूटी खड़ी की और बेल बजाई।

उधर दरवाजा खुला, और इधर मेरा मुंह खुला, और मेरा मुंह खुला का खुला ही रह गया क्योंकि मेरे सामने कल्पना की वही दीदी दूधिया क्रीमम कलर की पतली सी नाईटी पहने खड़ी थी जिसकी तस्वीर से मैं दिल लगा बैठा था।
पर वो मुझे या मेरे बारे में जानती है या नहीं, यह मेरी समझ से परे था।

कल्पना ने मुझे चिकोटी काटी और कहा- अब अंदर चलो..! यही मुंह फाड़े खड़े रहोगे क्या?
सच में अभी तक मुझे लग रहा था कि घर जाते ही टूट पड़ूंगा पर यहाँ तो मैं पूरा ही ठंडा पड़ गया।

मैंने किसी रोबोट की तरह आदेश का पालन किया, पर उलझन की वजह से मैं सहज व्यवहार नहीं कर पा रहा था।
कल्पना ने कहा- ज्यादा परेशान मत हो, दीदी को मैंने सब बता दिया है और आज रात इस घर में हम तीन ही लोग हैं, मैं हूँ निशा… जिसे तुम कल्पना कहते हो, ये है मेरी दीदी आभा… और तुम जिसे हम संदीप के नाम से जानते हैं। और हाँ..! आज रात का मेरा सरप्राईज यही है!
उसने ये कहते हुए अपनी दीदी आभा की ओर इशारा किया।

अब मैं थोड़ा होश में आया, मैं खुश तो था पर मैंने कहा- पहली बात तो ये है कि मैं तुम्हें कल्पना ही कहूँगा। और मुझे ये समझ नहीं आ रहा है कि अगर आभा सब जानती है तो फिर स्कूल के सामने इसने मुझे पहचाना क्यों नहीं? और यहाँ कोई नहीं रहता या आज ही नहीं है। वो प्यारा सा बच्चा भी तो था ना..! वो कहाँ है..?
कल्पना ने मुंह बनाते हुए कहा- तुम फिर सवाल करने लगे ना..! बीच सड़क पर तुम्हें पहचान कर क्या ये बताती कि तुम हमें अंतर्वासना की साइट पर मिले थे? मैंने तुम्हें पहले ही मना किया है कि कुछ मत पूछना..! और जो बताने लायक बात होगी हम तुम्हें बता देंगे।

तभी आभा ने कहा- निशा तुम रुको! इसके सवालों का जवाब मैं देती हूँ!
और उसने लगातार बोलना शुरू किया- ये मेरा और मेरे पति का घर है, इसी शहर में मेरा मायका भी है, जहाँ मेरे म्ममी-पापा, भैया-भाभी रहते हैं। और तुम्हारी कल्पना इस घर से उस घर घूमती रहती है। जब भी मुझे या हमें कुछ काम रहता तो हम बच्चे को मेरी मम्मी के पास छोड़ आते हैं। आज भी वो वहीं है।
मेरे पति अक्सर काम के सिलसिले में बाहर ही रहते हैं। कभी-कभी पन्द्रह दिन तो कभी एक महीने तो कभी दो महीने भी लग जाते हैं। वो शिपिंग कंपनी में काम करते हैं। वो हैंडसम हैं और मुझसे बहुत प्यार भी करते हैं। उनका लिंग भी शानदार है और जब वो घर पर होते हैं तो हम खूब सैक्स करते हैं। पर वो चले जाते हैं और लंबे दिनों तक नहीं आते तो शरीर की जरूरत पूरी नहीं हो पाती। और अभी तुम्हारी कल्पना भी जवानी की दहलीज पर है तो इसका भी खून उबाल मारता है। एक दिन मैंने इसे योनि पर फिंगरिंग करते देख लिया, और उस दिन से हमने लेसबियन सैक्स करना शुरू कर दिया।
और ऐसे भी एक लड़की के शरीर का सुख एक लड़की ही दे सकती है। मैं चूचियों के मामले में थोड़ी गरीब हूँ इसलिए मुझे पहले भी बड़ी चूचियों और नितंब दबाने सहलाने का मन होता था, पर मेरी ये इच्छा मेरी बहन ने ही पूरी की, देखो इसकी साईज 36-28-34 की है, वो भी सुडौल, कटाव भी स्पष्ट नजर आते हैं, इसकी गहरी घाटियाँ देखकर, मेरा ही क्या किसी का भी मन इससे सैक्स करने को करेगा।

तभी कल्पना ने बीच में कहा- और दीदी ने तो अपना साईज मोहल्ले में टांग रखा है।
मैंने चौंक कर कहा- क्या मतलब?
तब आभा ने हंसकर कहा- अरे मेरी गली.. यानि की सुरंग जहाँ तुम घुसना और घुसाना चाहते हो.. मतलब की मेरी पेंटी का साईज 32 है, और अभी तुमने देखा होगा कि हमारी गली का नं. 32 लिखा था, और मकान मतलब मेरे उरोज जो मकान की तरह उठे हुए हैं उसका साईज 30 है, हमारा मकान नं. भी 30 ही है। वैसे तो यह इत्तिफाक है पर है मजेदार!
हम तीनों हंस पड़े।

फिर उसने गहरी सांस ली और कहा- अब कुछ मत पूछना! मैंने शायद तुम्हारे सवालों से ज्यादा ही जवाब दे दिया है।
उसने टेबल पर उल्टे रखे गिलास को सीधा किया और उसमें पानी डालते हुए कहा- पानी पी लो और जाओ फ्रेश हो जाओ, और कपड़े बदल लो। पहले खाना खाते हैं फिर रूम में जायेंगे, तब तक हम घुल मिल भी जायेंगे।

मैं तो इतनी बातें सुन कर पहले ही जड़ हो गया था। फिर मैंने मजाकिया लहजे में… ‘जो आज्ञा देवी जी…’ कहते हुए पानी पी लिया.
आभा मुस्कुरा उठी और कल्पना ने जोर की हंसी के साथ मेरा हाथ पकड़ा और मुझ पर झुकते हुए ‘चलो, तुम्हें बाथरूम दिखाती हूँ.’ कहकर एक कमरे में ले गई.

मैंने उसे चूमने की कोशिश की तो उसने बदमाश कहते हुए मुझे धकेला और फिर अलमारी से एक ढीला पजामा निकाल कर दिया और कहा- चाहो तो पहनना या फिर नंगे भी रह सकते हो..
मैंने कल्पना से कहा- नंगा रहने का वक्त भी आयेगा, अभी पजामा पहन लेने दो।
‘जैसी तुम्हारी मरजी…’ कहकर कल्पना मुस्कुराते हुए वहाँ से चली गई।

मैं बाथरूम में अच्छे से फ्रेश हुआ, अपना अंडरवियर निकालकर वहीं छोड़ दिया और अब मैं सिर्फ पजामाँ और बनियान पहन कर उनके पास आया।
खाना डायनिंग पर लग चुका था और मेरा इंतजार हो रहा था।

मैं एक ओर बैठा और दोनों बहनें टेबल के उस पार एक ओर बैठी। खाना बहुत अच्छा बना था, पर मेरा ध्यान तो उन दोनों बहनों पर ही था।
पता नहीं मैंने किस जन्म में कितने पुण्य किये होंगे कि आज मुझे इस तरह का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। दोनों किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी। आभा की हाईट 5’5″ के लगभग होगी, दिखने में वह स्टाइलिश थी, चलती भी अदा के साथ थी, उसकी कमर की लचक मादक लगती थी। चंचलता, शोखी भरी अदा, छरहरा बदन, आँखें सुनहरी, बाल लालिमा लिये हुए बिखर कर खूबसूरती को और भी बढ़ा रहे थे। गर्दन सुराहीदार थी, गले में सोने की पतली सी चैन थी। मुझे सोने और आभा के शरीर का रंग एक जैसा नजर आ रहा था।
उभार भले ही छोटे थे पर तीखे नोकदार, पतले-पतले होंठ देखकर लिंग महाराज भी उसके चुम्बन को लालायित हो उठे, नाजुक मुलायम हाथ, लंबी-लंबी उंगलियाँ और उन पर सजे-धजे खूबसूरत नाखून…

मैंने तो ‘खाना अच्छा बना है.’ कहते हुए बहाने से आभा का हाथ चूम ही लिया।
उसने भी आँखें नचा कर अपनी तारीफ स्वीकारी और कहा- लेकिन खाना तो हम दोनों ने मिल कर बनाया है।
उसके इतना कहते ही मैंने कल्पना के हाथ को पकड़ना और चूमना चाहा पर कल्पना ने अपना हाथ हटा लिया और एक अदा के साथ कहा- जरा रुकिये जनाब.. अभी तो आपको बहुत कुछ मिलेगा चूमने चाटने को.. तब दिखाईयेगा अपना जोश!
मैंने मुस्कुरा कर हाँ में सर हिलाया।

अब मैं कल्पना को निहारने लगा: वो आभा से थोड़ी ही कम गोरी रही होगी, पर होंठ उभरे हुए थे, ऐसा लग रहा था मानो भरपूर रस भरा है उनमें… और ‘आओ मुझे चूस लो…’ कह कर आमंत्रित कर रहे थे। आँखें काली और नशीली थी, मुझे उन आँखों में प्यास नजर आ रही थी जो मेरी प्यास बढ़ा रही थी। पेट सपाट था और बाल ऊपर से स्टाइलिश तरीके से बंधे हुए थे। आजकल लड़कियाँ अकसर ऐसा बांधती हैं।
उरोजों और नितम्बों की प्रशंसा मैं पहले भी कर चुका हूँ लेकिन जितनी बार प्रशंसा करूं कम ही होगा। दरअसल कल्पना का फिगर बहुत ही मस्त तरीके से उभरा हुआ था, नितम्ब उसके मुकाबले कम उभरे थे। जबकी आभा की चूचियाँ उसके नितम्बों के मुकाबले और छोटी थी।

दोनों की बनावट में भले ही फर्क हो पर ना ही आभा पतली दुबली थी और ना ही कल्पना मोटी थी। मतलब की दोनों ही कामुकता और सुंदरता से परिपूर्ण थी।

हमने खाना खत्म किया। अब तक रात के नौ बज रहे होगें।
मैं सोफे पर बैठ गया, सोफा डाइनिंग के सामने ही कुछ दूरी पर था। आभा एक दो बर्तन उठा कर किचन में चले गई और बाकी बर्तन कल्पना उठाने लगी, मैं बड़ी गौर से कल्पना को देखने लगा, कल्पना जब डाइनिंग के बर्तनों को उठाने के लिए झुकती थी, तब उसके टाप के गले से उसकी चूचियों के दर्शन हो जाते थे, उसके कटाव और घाटियों को देखकर मैं वहीं आह भर के रह जाता था.

कल्पना काम में लगी थी इसलिए उसका ध्यान मुझ पर नहीं था और उसके मम्में उसकी हलचल के साथ ही हिलने डुलने लगते थे।

फिर कल्पना डाइनिंग की दूसरी तरफ के बर्तन उठाने आई और उसके झुकते ही उसकी मांसल खूबसूरत चिकनी जांघों के दर्शन हो गये, स्कर्ट बहुत छोटी थी इसलिए कूल्हों के समीप तक दर्शन हो गये।
मन तो हुआ कि अभी दौड़ कर पीछे से ही उसके कूल्हों में लिंग डाल दूं पर मैंने खुद को काबू में किया, पर लिंग को पजामे से बाहर निकाल कर सहलाने लगा।

कल्पना बर्तन रख कर अपने हाथ में एक कपड़ा लेकर डाइनिंग पौंछने आई, तभी उसकी नजर मुझ पर पड़ी और मुझे लिंग सहलाता देख उसने मुस्कुराते हुए आँखों को छोटा किया, अपने होंठों को कामुक अंदाज में दांतों से काटा, अपने दोनों हाथों से अपने उभारों को मिलाने जैसा दबाया और मुझे चिढ़ाने के लिए मुंह को चूं चूं चूं चूं बजाया और मेज को साफ़ करने लगी.
जब उसका मुंह मेरी तरफ था तब वो बार-बार मुझे आँख मार रही थी, फिर एक तरफ की सफाई करके वो दूसरी तरफ आई तब उसकी जांघे और कूल्हे मेरे सामने थे।

अब मेरा रुक पाना मुश्किल हो गया, मैं कल्पना के पास गया और उसकी स्कर्ट को पकड़ कर ऊपर उठाते हुए मैं नीचे बैठ कर उसके कूल्हों को पेंटी के ऊपर से ही काटना चाटना शुरू कर दिया.
वो अचानक हुए हमले से थोड़ा कसमसाई पर बहुत जल्दी मेरा प्रतिउत्तर देने लगी, जिससे मुझे लगा कि शायद वो भी यही चाहती थी।
उसने मेरे बाल नोचने शुरू कर दिये.

अब मैं उठा और उसके मुंह में अपनी जीभ घुसा दी, उसने भी ऐसा ही किया और हम बदहवास होकर चुम्बन करने लगे।

तभी आभा की आवाज सुनाई दी- अरे, मैं भी आ रही हूँ!
उसके शब्दों से ऐसा लगा मानो हम कुछ खा रहे हों और उसे खत्म होने का डर है।

वो भी हड़बडा कर दौड़ती हुई आई और मेरे पीछे से लिपट गई, हाँफती हुई बोली- हाय एक काम खत्म…. अब दूसरा काम शुरू!
हम तीनों ही मुस्कुरा उठे।
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मैं दोनों तरफ से नाजुक बदन के बीच फंसा हुआ था। शायद इसी को सैंडविच मसाज कहते हैं।
पर माफ कीजिये… मैं फंसा नहीं था, क्योंकि इतने आनन्दित करने वाले पल को फंसे शब्द का प्रयोग करके मैं उसकी तौहीन नहीं करना चाहता।
वास्तव में मैं दो अप्सराओं के बीच कामदेव बनकर स्वर्ग का सुख भोग रहा था। एक तरफ गद्देदार भरे हुए स्तन थे तो दूसरी तरफ नोकदार छोटी चूचियों का आनन्द…
मैंने पीछे पलटने जैसा होकर गर्दन मोड़ कर आभा को चुम्बन दिया, तभी आभा ने पीछे से ही पजामे को खींच दिया, मेरा इलास्टिक वाला पजामा जमीन पर आ गया और फटने की कगार पर पहुंच चुका मेरा तना हुआ सात इंच लंबा और तीन साढ़े तीन इंच का मोटा लिंग कल्पना के पेट के पास टकराया।

मैंने हाथ पकड़ कर आभा को सामने की ओर किया और कमर को पकड़ कर उठाते हुए डाइनिंग पर लिटा दिया, आभा ने मेरा साथ दिया और खुद को सेट करते हुए पैरों को मोड़ लिया, उसके ऐसा करते ही उसका हाफ कटिंग गाऊन खुद ब खुद टांगों से हट कर पेट में जाकर इकट्ठा हो गया।

मैं आभा की मखमली मुलायम टांगों को देखता ही रह गया, आभा ने लाल पेंटी पहन रखी थी, पेंटी के ऊपर से ही आभा की गीली योनि के आकार का आभास हो रहा था, वो ज्यादा फूली तो नहीं थी पर अपना खूबसूरत आकार लिये हुए थी।

मैंने उसकी नंगी टांगों पर अपना हाथ आहिस्ते से फिराया और योनि पर ले जाकर हल्के से दबाव डाला, आभा के मुंह से सिसकारी निकल गई- इस्स्स संदीप…
और मेरे हाथों के ऊपर हाथ रखकर और दबाने लगी… पर मैंने हाथ हटा लिया और उसकी पेंटी की इलास्टिक पर हाथ फंसाया।

इधर कल्पना नीचे बैठ गई और मेरे लिंग को निहारने लगी, उसने अपनी दोनों हाथों से मेरी जांघों को पकड़ा और सबसे पहले मेरी गोटियों को चूम लिया, फिर एक हाथ से लिंग को ऊपर की ओर करके पकड़ा और लिंग के जड़ से जीभ चलाना शुरू किया, फिर टोपे पर आकर एक चुम्बन किया और टोपे को मुंह के अंदर कर लिया।
कसम से उसकी इस अदा ने तो मेरी जान ही निकाल ली।

मेरे हाथ उसके बालों पे चले गये और मैं उसे लिंग की ओर दबाने लगा, मैं लिंग जड़ तक उसके मुख में घुसाने के लिए बेचैन था, पर वो तो खिलाड़ी थी मुझे और तड़पा रही थी।

ये सारे उपक्रम लगभग एक साथ चल रहे थे.
मैंने फिर आभा की पेंटी एक झटके से निकालनी चाही और आभा ने भी मेरा साथ दिया। आभा अब कमर के नीचे बिल्कुल ही निर्वस्त्र थी और मैं उसकी चिकनी कसी हुई योनि को आँखें फाड़े देखता ही रह गया।

कहानी लंबी है, चलती रहेगी..
आपको कहानी कैसी लगी इस पते पर अपनी राय दें..
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