अधूरी ख्वाहिशें-8

(Adhuri Khwahishen- Part 8)

This story is part of a series:

पिछले भाग में आपने पढ़ा कि कैसे एक मौका मिलने पर हम राशिद के कमरे तक गये और वहां ब्लू फिल्म दिखा कर राशिद हम दोनों के साथ उसी अंदाज में सेक्स किया।
अब आगे पढ़ें:

उस रात तीन बजे जब वापसी की तो एक चीज अजीब हुई कि अपनी साइड के जीने के दरवाजे में हमने जो अद्धा फंसाया था, वह अपनी जगह से हटा मिला, हालाँकि दरवाजा उसी तरह बंद था।

इसका कोई मतलब तब हम नहीं समझ पाये थे, लेकिन करीब चार दिन बाद शाम को जब मैं छत पर टहल रही थी तब समर आ गया और उसकी बातों से पता चला कि उस रात क्या हुआ था।
उम्र में वह मुझसे एक साल बड़ा था, घर में सबसे ज्यादा लंबा चौड़ा था और शक्ल में भी ठीक ही था। सना उससे बड़ी थी और यह इस बार इंटर में गया था।
छत पे उस घड़ी कोई और नहीं था.. यह कोई खास बात नहीं थी। घर के बाकी लोग ऊपर कम ही आते थे, बस कभी मैं या सना ही ऊपर टहलते थे।

“एक फिल्म दिखाऊं तुझे?” उसने गौर से मेरी आँखों में झांकते हुए कहा।
“कैसी फिल्म?” मैं उलझन से उसे देखने लगी।

उसने हाथ में पकड़े मोबाइल जो कि एन सेवेंटी था, पर कोई फिल्म लगा कर मुझे पकड़ा दी।
अंधेरे में कोई फिल्म थी शायद.. लेकिन जब कंप्यूटर की मद्धम रोशनी में चमकते चेहरों में अपना चेहरा पहचाना तो आंखें फैल गयीं, मेरे दिल की धड़कनें रुकते-रुकते बचीं।

वह अजीब अंदाज में हंसने लगा- जब इंसान मजे लेने के लिये पगलाया हो तो जनरल बातों पर भी ध्यान नहीं देता। उस रात तुम लोगों ने यह इंतजाम तो कर दिया कि कोई नीचे से न आ सके लेकिन यह ध्यान न दिया कि कोई पहले से ऊपर हो सकता था।
“मतलब?” मैं भौंचक्की सी उसे देखने लगी।

“मैं ऊपर कमरे में ही था और तुम्हारे आगे ही आया था, लेकिन इससे पहले कि पंखा बत्ती जलाता, तुम दोनों खुसुर फुसुर करती पहुँच गयी तो दिलचस्पी से बस यह देखने में लग गया कि तुम लोग कर क्या रही थी। तुम लोगों ने दरवाजे में अद्धा फंसाया और ठंडे पड़े कमरे देख कर अंदाजा लगाया कि यहाँ कोई नहीं था और उधर उतर गयी, तब पीछे से मैं उतरा।
मुझे पता था कि चूँकि उधर राशिद के सिवा कोई था नहीं तो तुम लोग उधर ही हो सकती थी और वही सच साबित हुआ।
पहले मेरा जी चाहा कि मैं भी भंडा फोड़ देने की धमकी दे कर शामिल हो जाऊँ लेकिन राशिद बहुत सुअर है, वह बाद में कैसे भी बदला निकालता ही निकालता, इसलिये बस किसी तरह बाहर की सांकों-दरारों से यह फिल्म बनाई और मुट्ठी मार कर रह गया.. लेकिन सोच लिया था कि जब राशिद पेल सकता है तो मेरे में कौन से कांटे हैं।”

“दिमाग खराब है तुम्हारा?” एकदम से मेरी जान सुलग गयी।
समर- अच्छा.. राशिद चोदे तो ठीक और हम कहें तो दिमाग खराब है। वह रंडियों वाले आसन हैं सब इसमें.. पूरे परिवार को दिखाऊँगा।
मैं- वह चूँकि हम हैं इसलिये हम समझ सकते हैं लेकिन इतनी कम रोशनी में यह कौन हैं क्या है, कोई नहीं समझ पायेगा।
समर- ढक्कन.. जो बातें कर रहे थे ब्लू फिल्म देखने के बाद और चुदने के टाईम, वह सब भी फिल्म में है।
मैं बेबसी से होंठ कुचलती उसे देखने लगी।

समर- वैसे मेरी आदत है लोगों के वीडियो शूट करने की.. एक बार जमीर चच्चा और तेरी अम्मी की भी शूट की थी।
मैं- छी!
समर- छी काहे की बे.. करने वालों को शर्म नहीं, हम शूट करने वालों को क्यों शर्म हो, पर वह इतनी ओपन नहीं थी, हां फिर भी कभी जरूरत पड़ी तो चच्ची का मुंह बंद रखने के काम जरूर आ सकती है।
“कितने गंदे जहन के हो।” मुझे उससे एकदम नफरत सी होने लगी।

समर- बहुत ज्यादा। पूरा खानदान यह समझता है कि पकड़े जाने के बाद से शाहिद भाई और शाजिया अप्पी का रिश्ता खत्म हो गया था लेकिन आज भी कहीं मौका मिल जाये तो शाहिद भाई चोदने से बाज नहीं आते। ऐसे ही एक मौके की उनकी भी पोर्न क्लिप बना रखी है।

मेरा जी चाहा कि उसका फोन ही तोड़ दूं.. मैंने हाथ उठाया लेकिन उसने झपट कर फोन छीन लिया।
“इससे कुछ नहीं होगा.. सारी क्लिप्स मेमोरी कार्ड में हैं।”
“तुम आखिर चाहते क्या हो?” मैंने बेबसी से उसे देखते हुए कहा।

“तुम दोनों को चोदना और वह भी फुल इत्मीनान से। कुछ इंतजाम बनाता हूँ कि सुहैल को दिन भर के लिये बालागंज, लखनऊ या बाराबंकी भेज दूं.. फिर शाजिया अप्पी को ब्लैकमेल करूँगा कि वह चच्ची को ले के कहीं बाहर टहल आयें रिश्तेदारी में। या सुहैल समेत तुम्हारे ननिहाल ही हो आयें.. तब बताता हूँ।” इतना कह कर वह चला गया।

उसके जाने के बाद मेरे लिये भी वहां रुकना मुश्किल था तो मैं सनसनाता दिमाग लिये वहां से चली आई।

नीचे मैं अपनी उलझन में पड़ी घर के किसी भी काम से दूर रही और रात में जब अहाना ने इसका कारण पूछा तो मैंने बता दिया और सुन कर वह भी सन्न रह गयी।

लेकिन रात तक सोचते-सोचते हमारा दिमाग बदल गया- वैसे एक तरह से सोच तो इसमें बुराई क्या है। तन हम दोनों के पास है, भूख हमें रोज लगती है और राशिद महीने दो महीने में कहीं हमारे हाथ लग पाता है।
“तो इसे चढ़ा लें खुद पे?” मैंने फिर भी प्रतिरोध किया।

“बुराई क्या इसमें.. हमारे लिये जैसे राशिद है वैसे ही यह है। राशिद को समझ हमने चुना था, इसने हमें चुन लिया। फिर राशिद इक्कीस-बाईस साल का है, यह अट्ठरह साल का.. उससे ज्यादा ही कड़क साबित होगा।”

मैं अपने तौर पर विरोध करती तो रही लेकिन खुद से जानती थी कि विरोध का कोई मतलब ही नहीं था। दोनों से हमारा समान रिश्ता था और उससे ज्यादा कोई बात ही नहीं थी.. न ही राशिद से इश्क था।

बहरहाल, मन ही मन मैं भी आखिर इस नये और एक और तजुर्बे के लिये तैयार हो ही गयी और सुबह उठी तो कल रात वाला कोई बोझ बाकी नहीं था।
अब इस बात का इंतजार था कि वह मौका कब आयेगा। इस बीच चूँकि एक ही घर में रहते थे तो समर से मेरा और अहाना का सामना कई बार हुआ लेकिन उसने किसी भी तरह रियेक्ट ही नहीं किया।
हफ्ता गुजर गया.. इस बीच रात में हम दोनों बहनों का खेल भी जारी रहा।

फिर एक दिन अम्मी ने कहा कि वह आज दुबग्गे जा रही हैं तो मुझे अहसास हुआ कि शायद समर का अप्पी पर दबाव काम कर गया है।
दुबग्गे में ननिहाल था हमारा और जब भी अम्मी जातीं तो सुबह की गयी शाम को ही वापस लौटती थीं।

उस दिन भी यही हुआ.. वह सुबह तैयार हो कर शाजिया अप्पी और सुहैल को ले कर चली गयीं और पीछे रह गयीं तो हम दोनों योनियां।

और अगले घंटे में ही शैतान की तरह समर मुसल्लत हो गया था। हालाँकि उसने पूछने पर बताया कि उसे शाजिया अप्पी से बात करने की हिम्मत ही नहीं पड़ी थी और न ही मौका मिल पाया था.. जो हुआ था वह सहज रूप से हुआ था।

चलो जैसे भी हुआ पर कमीने की तो बन आई।

“तो उतार दें कपड़े?” अहाना ने उसे देखते आंख मारते कहा।
“पहले घर ठीक से लॉक कर दो कि कहीं कोई आ न सके और देख लो कि उस दिन की तरह पहले से ही कोई हो न..”

पहले से वहां खैर कौन होता, यह हमारा हिस्सा था, छत की तरह कोई साझी संपत्ति तो थी नहीं। बहरहाल, हमने घर अच्छी तरह लॉक कर दिया।

“तुम लोगों को याद है कि बचपन में हम कैसे गलियारे में पानी में रपट लगाते फिसलते थे।”

हमारे हिस्से में ही एक लंबा गलियारा था जिसके इधर उधर कमरे और किचन थे। सालों पहले जब हम छोटे बच्चे थे तो गैलरी के फर्श को पानी से गीला कर लेते थे और स्लिप हो कर एक सिरे से दूसरे सिरे तक रेस लगाते थे।

लेकिन आज उसे यह क्या सूझी।

“चलो एक बार फिर बच्चे बन जायें.. तब हम निक्कर पहने होते थे, आज बिना निक्कर के ही।”

और इस बेशर्मी की शुरुआत उसी ने की.. एकदम से कपड़े उतार के नंगा हो गया। बाकी उसका जिस्म तो देखा भाला था लेकिन मुनिया ही देखी भाली नहीं थी। वह सुहैल के ही साइज की थी.. मतलब राशिद से थोड़ी कम ही थी और इस बात से जहां मुझे थोड़ी मायूसी हुई, वहीं अहाना को शायद ज्यादा खराब लगा था।

लेकिन उसने हमारी मायूसी पर कोई ध्यान दिये बगैर दो बाल्टी पानी गैलरी में उड़ेल दिया और उसमें फिसल गया।
फिर अहाना ने पहल की.. उसने सारे कपड़े उतारे और वह भी फिसल गयी। मुझे नहीं लगा कि अहाना के नंगे बदन ने समर पर कोई बहुत बड़ा असर डाला हो। हां बच्चे की तरह खुश जरूर हो गया था।

फिर मुझे भी खिलवाड़ करने का दिल करने लगा और मैंने भी सारे कपड़े उतार दिये और एकदम नंगी हो कर फर्श पर फिसल गयी।

“चलो रेस लगाते हैं।” समर ने अहाना के चूतड़ पर चपत लगाते हुए कहा।

अब उसकी मर्जी थी तो लगानी ही थी। हम एक सिरे पर, जिधर गैलरी की कगर थी, एक लाईन से रुकते फिर जोर लगा कर आगे की तरफ मछली की तरह फिसल जाते।

पानी कम पड़ता तो और डाल लेते.. और यूँ ही कभी दो-दो तो कभी तीनों रेस करते।

लेकिन कभी बच्चे होंगे.. अब बच्चे नहीं थे। अब हमारे अंग यूँ फर्श से रगड़ने पर उत्तेजना पैदा कर रहे थे। खुद उसका लिंग भी खड़ा हो गया था।

“अब दो-दो हो के स्लिप होते हैं।” अंततः उसने अहाना को दबोचते हुए कहा।
“वह कैसे महाराज?”
“बताता हूँ।”

हम औंधे पड़े नंगे-नंगे फिसल रहे थे तो उस कंडीशन में मैंने हम लोगों के शरीर में जो वाज़ेह फर्क नोट किये वह यह थे कि हम दोनों बहनों के दूध और घुंडियां अब समान हो चुके थे, जबकि मेरे चूतड़ अहाना के मुकाबले ज्यादा बाहर निकले हुए थे और समर के चूतड़ हम दोनों के मुकाबले एकदम फ्लैट थे।

उसने अहाना के ऊपर हो कर अपनी लार से अपने लिंग को गीला किया और पीछे से ही उसकी योनि में ठूंस दिया।

अब दो औंधे बदन एकदूसरे पे लदे पेट के बल फिसल रहे थे। मुझे सिंगल बदन उनके साथ रेस लगानी पड़ रही थी तो मैं ही जीत जाती थी।

फिर इसी अंदाज में वह पीठ के बल हो गये। पहले अहाना नीचे थी और उसकी योनि में लिंग ठूंसे समर ऊपर था। फिर समर पीठ के बल नीचे हो गया और अहाना उसके लिंग को योनि में लिये-लिये ऊपर हो गयी।

इस फार्मेट में मुझे भी पीठ के बल फिसलना पड़ा, लेकिन सिंगल बदन होने की वजह से जीत तब भी मेरे ही हाथ लगी।

“अब तू आ मेरे नीचे।” उसने अहाना को अलग करते हुए कहा।

फिर अहाना की जगह मैं हो गयी। हम फिर पेट के बल हो गये। उसने पीछे की तरफ से मेरी योनि में अपना लिंग ठूंस दिया। मेरी योनि इन सब तमाशों से पहले ही बुरी तरह गीली हो रही थी और दूसरे उसका राशिद जितना था भी नहीं जो मैं पहले ले चुकी थी.. तो कोई खास परेशानी हुई भी नहीं।

हम फिर फिसलने लगे लेकिन अब अहाना जीत जाती थी सिंगल शरीर के कारण।

फिर पीठ के बल हो कर उल्टी फिसलन हुई।

इसके बाद उसने एक अजीब खेल किया कि गैलरी के अंतिम सिरे पर मुझे और अहाना को बारी-बारी इस तरह टिका दे कि हमारी दोनों टांगे आखिरी हद तक फैल जायें और उसे हमारी एकदम खुली पुसी दिखती रहे..

और वह पीछे से इस तरह फिसलता आये कि उसका जिस्म हमारे चूतड़ से टकरा कर ऊपर चढ़ता चला जाये और उसका लिंग अंत में हमारी योनि में आ धंसे।

शुरुआत में यही चीज खतरनाक भी हो सकती थी लेकिन तब तक हम तीनों ही काफी गरम हो चुके थे और लसलसा पानी छोड़ रहे थे जिससे उसके पूरे लिंग पर और हमारी योनि के आसपास इतनी चिकनाहट हो गयी थी कि निशाना गलत भी लगता तो भी वह फिसल कर गड्ढा ढूंढ ही लेता।

जब टेम्प्रेचर काफी बढ़ गया तो खेल रुक गया.. उसने वहीं बारी-बारी हमारा योनिभेदन करना शुरू कर दिया।
पोजीशन वहां क्या बनती.. हमें औंधा लिटाये वह पीछे से जैसे लिंग डाल के फिसल रहा था, वैसे ही फिर लिंग डाल के धक्के लगाने लगता।

लेकिन फिर भी हमें मजा तो आ ही रहा था और हम दोनों ही सिसकार-सिसकार कर मजे ले रहे थे। और इसी तरह धक्के लगाते-लगाते उसका लिंग फूल कर मेरे चूतड़ों की दरार में बह गया और वह साइड में लुढ़क कर हांफने लगा।

हालाँकि हम मंजिल तक नहीं पंहुचे थे.. आर्गेज्म तो क्या उसके आसपास भी नहीं पंहुचे थे लेकिन कर भी क्या सकते थे जब पहलवान ही धराशायी हो गया था।

वैसे भी औरत को यह सिफत हासिल है कि जैसा मजा मर्द को स्खलन पर आता है उसके आसपास का मजा औरत हर धक्के पर ले सकती है, इसलिये ही मर्द का औरत को आर्गेज्म तक पंहुचाये बिना स्खलित हो जाना उतना मैटर नहीं करता।

मैंने चूतड़ों से उसका वीर्य धो दिया और तीनों करीब दस मिनट तो उसी हाल में पड़े रहे।

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