जन्मदिन के उपहार में गाण्ड मरवाई-1

Janamdin ke Upahar me Gaand Marvai-1
दरअसल मेरे ये भैया मेरे पापा के जूनियर हैं, उनका नाम करण है। हमेशा से ही मुझे पुलिस वाले अच्छे लगते थे और भैया भी एक पुलिस वाले हैं।
उनमें एक अजीब सी कशिश है, जिसने मुझे पहली ही नज़र में दीवाना कर दिया था और आज तक कर रखा है।
वे बड़े ही साधारण व्यक्तित्व और उच्च सोच युवा वय के, हल्का सांवले से रंग के थे।

यह उस वक्त की बात है जब मैं 12वीं क्लास में था, मेरी उम्र 18 वर्ष थी।

एक दिन भैया, जिनकी उम्र 25-26 के करीब होगी, किसी काम से मेरे शहर आए हुए थे।

रात काफ़ी हो चुकी थी तो पापा ने उनको घर पर ही रुकने को बोल दिया।

वो मेरे कमरे में ही रुके थे।

भैया मुझे शुरू से ही अच्छे लगते थे और मन ही मन मैं उनके साथ ना जाने कितनी बार चुदाई कर चुका था।

उस रात मुझे भी यह महसूस हुआ कि शायद भैया का भी मेरी तरफ थोड़ा सा झुकाव है क्योंकि जब हम दोनों रात में एक बिस्तर पर लेटे थे तो भैया बहुत देर तक मुझसे बातें करते रहे।

वो मुझे अपनी ट्रेनिंग के वक्त की बातें बता रहे थे और साथ ही किसी ना किसी बहाने से मेरा हाथ पकड़ लेते और काफ़ी देर तक नहीं छोड़ते।

मैं भी धीरे-धीरे उनके करीब हो रहा था जिससे हम एक-दूसरे को छू सकें।

भैया शायद मेरी भावनाओं को समझ गए थे लेकिन थोड़ी देर में हम दोनों सो गए।

तब तक ऐसा कुछ भी नहीं था लेकिन रात अचानक भैया ने मेरे ऊपर अपना हाथ रखा तो मुझे पूरे बदन में करेंट सा लगा, मन तो किया पलट कर लिपट जाऊँ और चुम्बन कर लूँ।

हम दोनों ही जाग रहे थे, धीरे-धीरे हम काफ़ी करीब हो गए। अब मैं उनकी तरफ होकर लेट गया था।

उनकी गर्म साँसें मेरे मुँह पर लगतीं तो दिल चाहता कि चुम्बन कर लूँ।

हम दोनों धीरे-धीरे एक-दूसरे के बहुत करीब होते गए लेकिन इस तरह जैसे हम दोनों ही सो रहे हों।

थोड़ी देर में भैया ने अपना दाएं हाथ को आगे बढ़ाते हुए मेरे सिर के पास रख दिया।

मुझसे रहा ना गया और मैंने अपना सिर उनकी बाजू पर रख दिया, जिसकी वजह से हम अब बहुत करीब आ गए थे।

इतना होते ही हम दोनों से रहा नहीं गया और मैंने अपना एक पैर भैया के दोनों पैरों के बीच में डाल दिया और अपना दायाँ हाथ उनके ऊपर रख दिया।

अब भैया भी कहा रुकने वाले थे, उन्होंने भी अपना बायाँ हाथ मेरे ऊपर रख कर मुझे पूरी तरह से अपनी तरफ खींच लिया।

अब हमारे होंठों के बीच केवल इतना ही फासला था जितना एक मोटा पेपर होता है।

भैया ने अब अपना लंड मेरे लंड से रगड़ना शुरू कर दिया था और चुम्बन करने के बहुत करीब ही थे कि पापा ने दरवाजा खटखटा दिया क्योंकि सुबह हो चुकी थी, लेकिन भैया कहाँ रुकने वाले थे दवाजा खोलने से पहले उन्होंने मुझे चुम्बन किया।

पापा का यूँ आना मुझे बहुत बुरा लगा, लेकिन हम लोग कुछ कर भी नहीं सकते थे। भैया को जाना पड़ा।

लेकिन जल्द ही दुबारा मिलने का मौका मिला।

मेरे इम्तिहान हो चुके थे और मुझे पढ़ने के लिए दिल्ली जाना पड़ा, तभी पापा ने बताया कि आजकल करण भैया भी दिल्ली में ही पोस्टेड हैं।

मैं दिल ही दिल में बहुत खुश हुआ, मेरा तो मन हुआ कि आज ही चला जाऊँ लेकिन दो दिन इन्तजार करना पड़ा।

पापा ने उनका नम्बर दिया और बोले जाकर फोन कर लेना, कमरे का बंदोबस्त हो जाएगा।

मैंने जाने के एक दिन पहले ही फोन कर दिया। मेरे आने से मन ही मन तो भैया भी बहुत खुश थे।

‘यह तो बहुत अच्छी बात है..’ बड़ी ख़ुशी से भैया मुझसे बोले।

जब मैं दिल्ली पहुँचा तो भैया मुझे लेने के लिए स्टेशन आ गए थे।

मुझे आज भी याद है कि जब भैया मुझे स्टेशन पर लेने आए थे, वो मेरा स्टेशन के बाहर इन्तजार कर रहे थे।
जब उस दिन मैंने उनको देखा तो आज तक मैं उनके उस रौबीली वेशभूषा और दमकते चेहरे को भूल नहीं पाता हूँ।
वो दिन का वक्त था, वे पुलिस यूनिफॉर्म में थे और काले रंग का चश्मा लगा रखा था।
हल्की सी धूप उनके चेहरे को और निखार रही थी।
अच्छी ऊँचाई, मस्त व्यक्तिव हल्की सी मूंछ, शर्ट के खुले बटन से उनकी छाती के घने बाल दिखना… मैं तो बस पागल सा होने लगा।

‘बाबू आज वक्त काफ़ी हो गया है और तुम थक भी गए होगे तो कमरा देखने कल चलेंगे।’ ये बोल कर भैया मुझे अपने कमरे पर ले गए, लेकिन सत्य तो मैं समझ ही रहा था कि कमरे पर ले जाने का क्या मतलब है।

खैर मन तो मेरा भी यही था और यहीं से मेरे समलैंगिक जीवन की शुरुआत हुई।

भैया कमरे में अकेले ही रहते थे, तो बिस्तर भी सिंगल था, जहाँ हम दोनों को फिर से एक साथ एक लंबी रात गुजारनी थी।

खाना खाने के बाद जब हम रात में लेटे, तो पहले तो भैया ने कुछ भी नहीं किया, मैं भी इन्तजार करते-करते सो गया क्योंकि मुझे लगा शायद उस दिन ऐसे ही हो गया होगा।

जब कुछ देर बाद भैया ने अपना हाथ मेरे ऊपर रखा, उनका हाथ रखना हुआ और मेरी आँख खुल गई।

मैं समझ गया कि आज मेरी रात सुहानी होने वाली है।

धीरे-धीरे भैया मेरे और करीब आने लगे और अपने हाथों से मेरे बदन पर अपने हाथ रगड़ने लगे।

फिर भी मैं सोने की एक्टिंग करता रहा, भैया धीरे-धीरे अपना लंड मेरी गाण्ड पर लगाने लगे।

फिर भैया ने अपने होंठों से मेरे कान के नीचे चुम्बन किया, उनके होंठों के चुम्बन ने मेरे बदन में बिजली का सा झटका लगा दिया और मैं तड़प उठा।

फिर तो भैया समझ गए कि मैं जाग रहा हूँ।
वो मेरे कान के पास अपने होंठ लाकर धीरे से बोले- बाबू अब जाग भी जाओ.. नहीं तो आज फिर सुबह हो जाएगी।

बस फिर क्या था मुझसे रहा नहीं गया और उनसे लिपट गया- भैया आई लव यू.. आप मुझे बहुत अच्छे लगते हैं।

यह कहते हुए मैं उनकी गर्दन को चूमने लगा।

जब मैं उनसे लिपटा, तब मैंने महसूस किया कि भैया अपने सारे कपड़े पहले से ही निकाल चुके थे और अब मुझे भी पूरी तरह से नंगा करने लगे थे।

उनकी छाती के घने बाल अब मेरी छाती को छूने लगे थे। उनके जिस्म की गर्मी मुझे गरम करने लगी और धीरे-धीरे मैं उनकी छाती के घने बालों पर अपना हाथ फेरने लगा।

वो भी मुझे पूरी तरह से अपनी बाँहों में भरने लगे। कभी वे अपने पैर को एक-दूसरे के पैरों से रगड़ते तो कभी अपना अपना लंड चुभाते।

अंत में हम दोनों केवल अंडरवियर में थे। वो अब बड़े प्यार से ‘बाबू.. बाबू’ कहते और मेरे पूरे बदन को चूमते।

हम दोनों की गरम साँसें एक-दूसरे की सांसों से टकराने लगीं और धीरे से भैया ने मेरा हाथ पकड़ कर अपनी अंडरवियर में डाल दिया, अपना हाथ मेरा अंडरवियर में घुसेड़ दिया।
एक-दूसरे से कुछ भी बोलने का मौका ही नहीं मिल रहा था क्योंकि भैया के रसीले होंठों ने मेरे होंठों को पूरी तरह से चूसना शुरू कर दिया।

वो कभी मेरे ऊपर के होंठ को चूसते तो मैं उनके नीचे के होंठ को चूसने लगता।

दिल तो यह करता कि पूरी तरह से उनमें समा जाऊँ।

कभी वो मेरे ऊपर लेट जाते तो कभी वो मुझे अपने ऊपर कर देते।

हमारी साँसें एक-दूसरे से टकरातीं, एक-दूसरे के दिल धड़कनों की आवाज़ सुनाई देती, ऐसा लगता जैसे आज सब कुछ मिल गया।

मैंने उनके एक हाथ पर अपना सिर रखा हुआ था और एक हाथ से उनके लंड को सहला रहा था।

उनके लौड़े का साइज़ तो उस दिन मैंने नहीं देखा लेकिन फिर भी काफ़ी मोटा और लंबा था।

मैं काफ़ी देर तक भैया के ऊपर लेटा रहा, कभी उनकी आँखों मे आँखें डाल कर उनको देखता और वो मुझे फिर उनके रसीले होंठों का रस पीता और कभी उनके बालों पर अपना हाथ फेर कर उनकी गर्दन को चूमता।

वो भी मेरे साथ ऐसा ही कर रहे थे। मेरी मरजी ना होने पर उन्होंने मेरी गाण्ड नहीं मारी।

‘बाबू जिस दिन तुम्हारा मन होगा.. उसी दिन हम पूरी तरह से चुदाई करेंगे।’ ऐसा उन्होंने मुझसे कहा।

फिर हम दोनों ने अपना-अपना लंड हिला-हिला कर अपनी आग को शान्त कर दिया।
अपने विचार भेजने के लिए मुझे ईमेल कीजिए।
कहानी अगले भाग़ में समाप्य।

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