गांडू की महालंड से भेंट-1

(Gaandu Ki Mahalund Se Bhent- Part 1)

गांड मराने का शौक एक ऐसा शौक है कि इसकी जब आदत पड़ जाती है तो बिना गांड मराए चैन नहीं आता।
गांड कुलबुलाती रहती है.. एक कीड़ा सा काटता है.. जिसे भी देखो उसके पैन्ट पर लंड की जगह ही नजर जाती है।
मन में चुल्ल रहती है कि कैसे भी बस लंड मिल जाए।
सपने में यही दिखाई देता है कि दोस्त मेरी गांड मार रहे हैं, अपना मोटा लंड मेरी गांड में पेल रहे हैं।

दोस्तो, मैं भी ऐसी ही बुरी हालत से गुजरा हूँ। क्या कभी आपकी ऐसी हालत हुई। लंड कैसा भी हो.. पतला, छोटा, ढीला, कड़क, लम्बा-मोटा, काला-गोरा, गांठदार, चिकना, टेढ़ा-सीधा सब चलेगा, बस लंड हो, गांड में डाल दो।

मैं तब एक माशूक किस्म का चिकना लौंडा था, गोरा और खूबसूरत नमकीन जिस पर किसी भी लौंडेबाज का दिल आ जाए।
यह मैं नहीं कह रहा, तब मेरे सारे दोस्त साथी कहते थे।

कई बार मोहल्ले के बड़े लड़के भी ‘ए चिकने’ कह कर बुलाते थे, मेरे गाल सहलाते.. चूतड़ पर हाथ फेरते, कुछ आगे बढ़ कर चुम्मा लेने की कोशिश करते, कुछ सफल भी हो जाते, किन्हीं-किन्हीं को मैं ही दोस्ती में उपकृत कर देता।

कई दोस्ती के बहाने प्यार जता कर मेरे से लिपट जाते.. उनका खड़ा लंड कभी मेरे लंड से कभी चूतड़ से, कभी मेरी गांड से टकराता। मैं समझ जाता कि वह मेरी गांड में अपना लंड पेलना चाहता है।

कह कुछ भी रहा हो भैया.. बेटा.. दोस्त.. साथी यार.. मगर भैन के लौड़े की मंशा मेरी गांड मारने की ही रहती थी।

तो दोस्तो तब मैं ऐसा था।
कई शौकीन मेरी याद करके अपने लंड पर हाथ फेरते थे और मुठ मारते थे।

तब मैं पढ़ता था, मैं अपने दूर के रिश्ते के चाचा के घर में रहता था। उनके कई घर थे.. उन्होंने एक खाली घर में मुझे कमरा दे दिया।
चाचा शहर के रईस थे.. जमींदार नेता और मशहूर लौंडेबाज, लम्बे तंदुरुस्त थे, लोग उन्हें लंडधारी कहते थे।

वे लगभग चालीस-पैंतालीस साल के थे, लौंडिया भी निपटाते थे, शादीशुदा थे, उनका बेटा मेरी उम्र का था, पर भयंकर लौंडेबाज थे।

हर दस-बारह दिन के बाद एक न एक नए लौंडे की गांड मारते थे। कभी रुपए खर्च करके, खिला-पिला कर कभी एडमीशन कराने का प्रलोभन देकर, कभी सरकारी अटका काम कराने का आश्वासन देकर, कभी-कभी दादागिरी से फंसा कर, शराब पिला कर, कैसे भी जो लौंडा नजर में आ जाए, उसकी गांड मार कर ही मानते थे।

उनकी गांड मारने की लालसा इतनी अधिक थी कि कोई रेंज भी नहीं थी। किशोर से लेकर पैंतीस-चालीस तक सब चलते थे।
ऐसा भी नहीं है कि नया माल ही होना, जिनकी पहले मारी थी, उनकी भी मारते रहते थे।
पर जब किसी नए लौंडे की मारते तब जश्न होता था।

ये सब उसी घर में होता था, जिसमें मैं रहता था।
उस घर के कुछ कमरे उनके दोस्तों के रेस्ट हाउस से थे। वे लड़के दोस्त वहाँ ठहरते, चाचा से गांड मरवाते.. कभी-कभी एक-दूसरे की मारते, कभी-कभी दोस्त लौंडियां भी लाते थे और दो-तीन दोस्त मिल कर उसे चोदते थे।

कई बार चाचा जब किसी नए लौंडे की गांड मारते, तो उनके बाद उनके जो गांडू दोस्त वहाँ रहते थे, वे भी उस लौंडे की मारते थे।

मेरा स्कूल पहले एक राजा का महल था। कई कमरे, बड़ी बाउन्ड्री, चारों तरफ मैदान, स्कूल बिल्डिंग में कई खाली कमरे थे। सामने सड़क, सड़क के उस पार राजा का बहुत बड़ा बगीचा, जिसमें फासला देकर इमारतें बनी थीं.. जिन्हें मकबरा कहते थे।
वे राजाओं की समाधियां थीं.. उनमें खिड़की दरवाजे तो थे.. पर किवाड़ नहीं थे, खाली पड़ी थीं।

इंटरवल में या छुटटी के बाद स्कूल के लड़के उनमें अपनी गांड मरवाते थे।

बड़े लौंडे दूसरे माशूक लौंडों की गांड मारते। रात में शहर के आवारा लौंडे उनमें लौंडियां चोदते और लौंडों की गांड मारते थे।

एक दिन मेरा क्लास का दोस्त राम प्रसाद बोला- थोड़ा रुक जाओ, मैं शुक्ला जी मास्टर साहब से मिल लूँ, फिर चलते हैं.. तुम यहीं बैठना, जाना नहीं।

मैं छुट्टी के बाद कक्षा में अकेला बैठा रहा।
जब बड़ी देर ही गई, तो मैं शुक्ला जी के कमरे की तरफ गया।

मैंने खिड़की से मेरे दोस्त को देखा.. वो वहाँ एक टेबल पर कमर झुकाए हुए था, उसका पैन्ट खुल कर नीचे पैरों पर था.. चूतड़ खुले चमक रहे थे।
शुक्ला जी पीछे खड़े थे.. उनका खड़ा लंड उनके हाथ में था, उनका लंड राम प्रसाद की गांड में से निकल आया था।

उन्होंने अपनी हथेली पर थूका और थूक को राम प्रसाद की गांड में लगाया, फिर उसकी गांड में उंगली डाली.. उंगली अन्दर-बाहर की। फिर दुबारा हथेली पर थूका और अपने लंड के सुपारे पर चुपड़ा।

लंड के सुपाड़े को राम की गांड पर टिकाया और धक्का लगा दिया।
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शुक्ला जी का सुपारा गांड के अन्दर घुस गया, दूसरे धक्के में पूरा लंड ही गांड के अन्दर था।
वो अब राम प्रसाद के पीछे चिपके थे और लंड अन्दर-बाहर कर रहे थे।

राम चीखा- मास्साब धीरे!
शुक्ला जी बोले- बस एक मिनट और थोड़ा सहन कर.. गांड ढीली कर ले, सिकोड़ मत, टाइट करेगा तो दर्द होगा। अब तो तू दो-तीन बार करवा चुका है।

राम बोला- मास्साब.. बहुत दर्द हो रहा है.. आपका बहुत बड़ा है, करवाने में गांड फट जाती है।

शुक्ला जी धक्के पर धक्के लगाते लंड अन्दर-बाहर करते हुए बोले- तूने और लौंडों से भी तो मरवाई है.. उनसे मरवाने में दर्द नहीं होता?
राम प्रसाद- इतना बड़ा किसी का नहीं है।

शुक्ला जी- तूने राजा से भी तो मरवाई.. उसका लंड तो मेरे से बड़ा है। तू नया लौंडा है.. तेरी गांड टाइट भी बहुत है।
राम प्रसाद- मास्साब.. राजा बहुत धीरे-धीरे गांड मारता है। उसका लंड तो बड़ा और टाईट है.. पर इतने प्यार से अन्दर डालता है कि गांड में दर्द नहीं होता, मरवाने में आनन्द आता है.. वो बड़ा अनुभवी हो गया है।

मैं बाहर से राम प्रसाद की बात सुन कर सोचने लगा कि हाँ गुदा मैथुन के बारे में सुना तो था, पर किसी को गांड मराते पहली बार देखा था।
वे दोनों मुझे देख नहीं पाए, दोनों अपने काम में मस्त थे।

मैं चुपचाप लौट आया।

थोड़ी देर में राम प्रसाद आ गया.. फिर हम दोनों घर लौट आए।

मैंने अभी तक लंड का प्रसाद चखा नहीं था।

एक दिन मैं कमरे में स्कूल के कपड़े बदल रहा था, केवल अंडरवियर बनियान पहने रह गया।
उस वक्त राम प्रसाद मेरे साथ था।

उसने आगे आकर मेरे अंडरवियर का नाड़ा खोल दिया, अंडरवियर नीचे गिर गया।

वह झट से मेरे पीछे चिपक गया अपने लंड में थूक लगा कर मेरी गांड में अपना हथियार पेल दिया।

मैं जब तक कुछ समझता उसका लंड मेरी गांड के अन्दर था।
वह मेरा दोस्त था मैं उसे रोक नहीं पाया.. वह मेरे पीछे चिपका मस्त धक्के पर धक्का लगाए जा रहा था।
पांच-छः मिनट बाद उसके जोरदार धक्के ढीले पड़ गए.. लंड सिकुड़ कर बाहर आ गया।

फिर उसने अपना लंड पोंछा और मेरी खाट पर उलटा पेट के बल लेट गया, नंगा ही टांगें चौड़ा लीं और बोला- अब तू मेरी मार ले।

मैं उसकी टांगों पर बैठ गया, मैंने थूक लगा कर अपना लंड उसकी गांड पर टिकाया तो वह बोला- अबे तू थोड़ी सी क्रीम या तेल लगा ले.. मेरी गांड थोड़ी तेरे लिए टाइट होगी.. तेरा लंड घबराहट के मारे ढीला होगा, पहली बार है न। कभी किसी की मारी है?

मैंने ‘नहीं’ में सिर हिलाया और उठ कर लंड पर क्रीम मल ली, थोड़ी सी क्रीम उंगली पर लगा ली और उसकी गांड पर लगाई।

वह खुश हो कर बोला- ये हुई न बात, अब डाल!
उसने टांगें और चौड़ा लीं.. गांड ढीली कर ली।

मैंने अपना क्रीम लगा हुआ लंड उसकी गांड पर टिकाया, अब धक्का दिया तो मेरा लंड आसनी से अन्दर घुस गया।

मैं अन्दर-बाहर करने लगा, वह भी अपनी गांड उचका रहा था।
फिर बोला- अबे.. धीरे-धीरे कर, थोड़ी देर न हो तो रुक जा.. तेरा सनसना रहा होगा।

मैं उसकी गांड में से लंड निकालने लगा तो बोला- अबे निकाल मत, गांड में डाले रख.. बस धक्का मत लगा, वरना जल्दी झड़ जाएगा। मेरी गांड को तेरे लंड से कोई परेशानी नहीं है। चुपचाप ढीला बदन करके थोड़ी देर मेरे ऊपर लेटा रह, फिर धक्कम-पेल चालू कर कर देना। मजा आ रहा है कि नहीं?

मैं तो जन्नत में था, गांड मैं मार रहा था, पर उसका नियंत्रण उसके हाथ में था, वह पल-पल पर मुझे गाइड कर रहा था कि कैसे क्या-क्या और कब करना है, कब रुकना है, कब चालू होना है।
मैं अनाड़ी था.. पर वह खिलाड़ी था।

वो इस खेल में मेरा गुरू था, इस तरह हम दोनों एक-दूसरे की मारने लगे।

एक दिन मैं इसी तरह अपने कमरे में शाम के करीब सात-आठ बजे राम प्रसाद से अपनी गांड मरा रहा था.. हम दोनों मस्ती में थे।
मैं उसके लंड के धक्के पर ‘आह.. आह.. और जोर से..’ कह रहा था।
वह ‘हूँ.. ले.. हूँ.. ले..’ कर रहा था।

वो बीच-बीच में मुझसे पूछता जाता था ‘मजा आ रहा है.. लग तो नहीं रही..’

इस वक्त हम सोच रहे थे कि घर खाली है। पर बगल के कमरे में चाचा के दोस्त एक गांडू चाचा ठहरे थे.. वे लेटे हुए थे।
हमें उनके बारे में कोई पता न था, हम अपनी मस्ती में थे।

उन्होंने अपनी माशूकी में, जब वे लौंडे थे.. तब तो कई लौंडों से गांड मराई थी।
चाचा और उनके चमचों से अब भी मराते थे।

चाचा हमारी आवाजों पर कान किए रहे, फिर उठ कर हमारे दरवाजे के सामने आ गए, बड़ी देर न जाने कब तक देखते रहे।
उन्हें भी शायद गांड मराई देखने में मजा आ रहा था।

अचानक राम प्रसाद की निगाह उन पर पड़ी, वह मेरी गांड में से लंड निकाल कर खड़ा हो गया।
मैंने उन्हें बाद में देखा, मैं भी खटिया से उठ कर खड़ा हो गया।

अब आगे लिखूंगा.. कि बगल के चाचा ने हम दोनों का क्या इलाज किया।

आपको मजा आ रहा हो तो यहीं आ जाओ.. मिल कर मजा लेंगे।

कहानी जारी है।

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