डांस में गांड हिलाई फैन्स से मरवाई-1

(Dance Me Gand Hilai, Fans Se Marvayi- Part 1)

मेरे प्यारे दोस्तो, मेरा अनुभव है कि अगर लौंडा माशूक है, चिकना है तो उसके दोस्त यार उसे गांड मरवाने में चालू कर ही देते हैं। किस किस से गांड बचाएगा बेचारा… पहले गले में हाथ डालते हैं फिर गले मिलते हैं फिर चुम्मा लेते हैं, गाल काटते हैं, फिर ओंठ चूसते हैं फिर गांड पर हाथ फेरते हैं और गांड मार कर ही दम लेते हैं।

सब यही कुछ नटखट हरकतें करते हैं, आखिर उसे गांडू़ बना कर ही दम लेते हैं। पहले गांड मजबूरी में, दोस्ती में मरवाता है, लगती है, दर्द होता है, फटती है पर दोस्ती में सह लेता है. फिर मजा आने लगता है, फिर शौक हो जाता है फिर बिना मराए चैन नहीं पड़ता।

यह अलग बात है कि दोस्त कभी कभी उस दोस्त को खुश करने के लिए उससे भी खुद गांड मरवाते रहते हैं। उसे किसी और चिकने की दिलाते हैं और वह लौंडा लौंडेबाज भी हो जाता है. उमर बढ़ने से उसका लंड भी बड़ा हो जाता है, सुरसुराने लगता है, वह स्वयं लौंडे पटाने लगता है, लौंडे चालू हो जाते हैं.
अधिकतर मामलों में यही होता है।

पर मेरा सवाल यह है कि लौंडेबाज जाने कैसे किसी भी माशूक लौंडे को देख कर समझ जाते हैं कि कि यह पट जाएगा और उसकी मार कर ही दम लेते हैं.
मैं आज तक यह कला ठीक से नहीं सीख पाया, कई बार मामला बिगड़ गया, जूते पड़े सो अलग… मेरे दोस्तो, मेरी मदद करें.

अब मैं अपनी कहानी शुरू करता हूँ.

ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ। तब मैं अठारह-उन्नीस बरस का था, मेरा पांच फीट सात इंच की लम्बाई छरहरा, मस्कूलर कसरती शरीर, गोरा रंग, मेरा माशूक चेहरा और पतली नाजुक कमर जिसे छूकर दोस्त कहते- मादरचोद, ये लौडियों की जैसी कमर है तेरी… और मस्त चूतड़ जिन्हें देख कर किसी भी लौंडे बाज का लंड खड़ा हो जाए।
दोस्त मजाक में छूते दबाते, कभी पीछे चिपक जाते, गाल खींचते, चूमते, खम्भे जैसी जांघें जिन्हें सहलाते।

मैं हॉस्टल में नया आया था, एक छोटे शहर से नया नया महानगर में आया था, कुछ झेपूं सा, कुछ संकोची अकेलापन भी था. नया हॅास्टल, नया कॉलेज, नए दोस्त… वे सब दिन भर कॉलेज से आते, नॉन वेज जोक मारते, लड़कियों के किस्से सुनाते. हालांकि अच्छी तरह मालूम था मुझे कि किसी से कोई लड़की नहीं पटी थी।
मैंने भी नकल में वे जोक रट लिए, दोस्त सुनाते, एक आध मैं सुना देता।

मेरे हॅास्टल में एक सीनियर थे, वे शाम को हर दूसरे तीसरे दिन लड़की बन नाचते, एक कोई लड़का उनका लवर बन सवाल करता.
उन्होंने मुझे चुना, वे कमर मटकाते आंख मारते सामने कमर से झटके देते, उनके बोल होते- मेरी चू चू चू चूत!
फिर मेरी ओर इशारा करते- तेरा लंड लंड लंड!
फिर अपने कमर के निचले हिस्से में इशारा करते- इसमें डाल डाल डाल!
मैं जबाब देता:
फट जाएगी, फट जाएगी
न न मचल न मचल
न पाएगी संभाल,
तेरा बुरा होगा हाल।

ऐसा ही चलता रहता ड्रामा चलता रहता। फिर कभी कभी मैं लड़की बनने लगा जब सीनियर नहीं होते कभी वे स्वयं ही कहते, वे लवर लड़का बनते।

ऐसे ही शायद दूसरा साल था, जनवरी या फरवरी का महीना था, याद नहीं, दतिया जिले के एक गांव में मेरी मौसी रहती थीं, उनकी देवरानी के मायके में, दतिया जिले का ही एक दूसरा गांव था, शादी में जाना था, मौसा जी व्यस्त थे, अतः मेरी ड्यूटी लगी कि मैं मौसी को शादी में लेकर जाऊं!

मैं मौसी के साथ दतिया झांसी रोड पर बस से उतरा, वहां से आठ किलोमीटर अंदर पैदल गए. एक छोटा सा… लगभग पचास घर का गांव… पहुंच विहीन!

हम शादी के पांच छः दिन पहले गए. वहां मेरी किसी से पहचान नहीं थी, मौसी की देवरानी से बस शादी में मिले. सभी लोग नए थे. एक और लड़का बलवीर उनका कोई रिश्तेदार ग्वालियर से आया था, मेरी तरह स्टूडेन्ट था मेरी ही उमर का, मेरा दोस्त बन गया.

शादी में हम सब लड़के लड़कियां नाच रहे थे, मैं भी नाचा, सबने पसंद किया। हर बार मुझे बुलाया जाता, मैं नाचता।

झांसी मेजबान के साथ सामान लेने गया, हिसाब किताब में मदद की पर वहां ज्यादा कााम नहीं था, फिर हम मेहमान थे, घर के सदस्य ज्यादा व्यस्त थे।

उनके घर में कमरे तो कई थे पर अधिकतर खपरैल के कच्चे मिट्टी के घर थे. एक दिन मैं और बलवीर एक घर में अकेले बैठे थे, मैं गुनगुनाने लगा- मेरी चू… चू… चू… चूत!
वह हँसने लगा.
मैं उसकी ओर देखने लगा.

वह हँसते हँसते बोला- तुम सुर में गा रहे हो, गला अच्छा है पर शब्द गलत हैं तुम्हारे चू…. चू… चू …चूत कहां है?
मैंने कहा- पर हॅास्टल में तो हम सब मिल कर यही गाते हैं, सब पसंद करते हैं, बहुत पॉपुलर है!
पर वह हँसता रहा.

मैंने उसे संतुष्ट व चैलेंज करने के लिए गीत के बोल बदल डाले एक ‘गे’ थीम का गीत बना डाला. इसमें बलवीर ने भी मदद की. फिर हमने इसके सुर ताल (स्टेप) तैयार किए व एक्शन (भंगिमाएं) भी सोचे. हम दोनों कई बार साथ मिल कर नाचे प्ले तैयार किया, आपको बताता हूँ।

मैं- मेरी गां गां गां गां गांड
बलवीर- तेरा लं लं लं लं लंड

फिर दोनों मिल कर दोहराते गाते. गांड का गाना गाते समय हम ताल देकर गोल घेरे में नाचते व अपनी पिछाड़ी दिखाते, लंड का गाना गाते समय हम बांए हाथ की मुट्ठी बांध कर उसकी कोहनी दूसरे हाथ से पकड़ नकली लंड ऊपर नीचे हिलाते चारों ओर चक्कर खाते!

फिर गांड हिलाते गाते- हमारी मार हमारी मार
मैं- हम हैं बांके बांके छोरे
बलवीर- हम हैं गोरे गोरे छोरे
हम दोनों- हमारी मार हमारी मार!

नाचते ताल लय में गाते चक्कर खाते
मैं- हमारे होंठ रसीले लाल…
बलवीर- हमारे गोरे गोरे गाल!
दोनों- अभी न आए गांड पर बाल!

चिकनी मस्त गुलाबी माल
हमारी मार हमारी मार!

हम अपने चूतड़ों पर हाथ मारते दर्शकों के बीच गोल गोल चक्कर खाते घूमते, फिर हाथ से नकली लंड बना ऊपर नीचे घुमाते दर्शकों को दिखाते गाते
तेरा बड़ा मस्त हथियार
तू करता लौंडों से प्यार

हम दर्शकों को उंगली दिखाते हाथ फैलाए नाचते गाते
इनकी मारी है कई बार
कृपा कर हम पर भी एक बार

हम कमर झुका फर्शी सलाम ठोकते
हमारी मार हमारी मार…

मैं बलवीर की पिछाड़ी में आगे पीछे धक्का देता, बलवीर मेरी पिछाड़ी में धक्का देता, हम बदल बदल कर यह भंगिमा दोहराते और नाचते।
बलवीर इस गांव में कई बार आया था, वह हमारे मेजबान मामा जी की बड़ी बहन का बेटा था कई लोगों को जानता था। ढोलकें तो शादी में कई थीं, उसने एक ढोलकिए ओम प्रकाश का जुगाड़ कर लिया, वे एक नौटंकी के कलाकार थे, पच्चीस-छब्बीस साल के होंगे सजे बजे!

उसने एक दूर झोपड़ी में ढोलक बजाई धुन सेट की, रिहर्सल की, बोल सुन कर फड़क उठा, वह कंवारा था, फुल टाइम लौंडेबाज था और हम रसीले लौंडे थे. वह ढोलक बजाने के साथ ही साथ हम दोनों की गांड बजाने का भी इच्छुक था पर कह नहीं पा रहा था।

फिर शो का जुगाड़ किया, एक दूर झोपड़ी में कुछ नौजवान दर्शकों को दिखाया, सबने पसंद किया। और हिम्मत बढ़ी दो तीन शो किए.
एक में एक दर्शक ने हमें सौ रूपए बतौर इनाम दिए और ओम प्रकाश से मुखातिब होकर कहा- तुम दोनों तो बिल्कुल टी वी सिनेमा के कलाकार सा नाचते हो! ओम प्रकाश, इन्हें तैयार कर इनका शहर में प्रोग्राम करवा।

हमारा शो चार पांच दिन इसी तरह शाम को चला, हम मस्ती करते, टाइम पास होता. फिर बलवीर ने जो आशंका जताई थी वह हो ही गई।
आज शादी का दिन आ गया था, मेहमानों की भीड़ बढ़ गई, रात बारह बजे तक बारात आई, टीका व बारात की दावत हुई, हम सबने खाना खाया, फिर मामा जी हम दोनों को एक दूर झोपड़ी में ले गए.
बड़ी हॉल नुमा झोपड़ी थी, एक हिस्से में दो भैंसें बंधीं थी, दूसरे में पुआल बिछा दिया था, उस पर दरीनुमा फर्श बिछा था.
मामा जी ने दो कम्बल देकर कहा- आाज भीड़ बहुत है, यहीं सो रहो!
हम थके थे नींद आ गई।

रात लगा कि कोई बात कर रहा है.
“वे दोनों माशूक लौंडे क्या यहीं लेटे हैं?”
दूसरा- हाँ, तू किसे पूछ रहा है?
“मुझे चाहिये।”

फिर मुझे लगा कि मेरे कम्बल में कोई घुसा, मैं ठंड के मारे करवट से पैर सिकोड़े लेटा था, कोई मेरी पीठ से चिपक गया, उसने अपनी एक जांघ मेरे कूल्हों पर रखी और अपना लंड निकाल कर मेरे पिछवाड़े रगड़ने लगा. फिर मेरी पैन्ट के बटन खोलने लगा. मेरा अंडरवियर नीचे खिसकाया, थोड़ा रूका, शायद लंड पर थूक लगा रहा था.

अब उसने अपना लंड मेरी गांड पर टिकाया और पेल दिया.
मैं चिल्लाया- आ… आ… ई… ई…
उसने एक हाथ से मेरा मुंह बंद किया और पूरा पेल दिया, मुझे धक्का देकर औंधा किया और मेरे ऊपर चढ़ बैठा और शुरू हो गया धक्कम पेल… धक्कम पेल…

वह पूरे जोर से लंड पेल रहा था, लगता था जैसे गांड फाड़ ही डालेगा.
अब मेरी नींद खुल गई थी, गांड में लंड पिला था, मैं समझ रहा था कि बलवीर मेरी मार रहा है. पर यह तो कोई दूसरा ही था.
मैंने देखा कि बलवीर के ऊपर भी कोई लेटा था और उसकी गांड में भी लंड पेल रहा था।

बलवीर उसे पहचानता था, बोला- अरे, मम्मा! नेक धीरे धीरे… दम तो लेन दो… आज लगत गांड फार के ही दम लै हो।
मैंने अपनी गांड सिकोड़ी और चित हो गया, उसकी गिरफत से छूटने की कोशिश की, उसे एक मुक्का जड़ दिया व खड़े होकर गांड पर एक लात दी. फिर बनवीर पर चढ़े लड़के को पकड़ा, कुछ बलवीर ने प्रयास किया उसे भी पीछे कॉलर से पकड़ा व दोनों जांघों के बीच एक घुटना मारा, वह आ आ करने लगा और भागने लगा.

वे दोनों जल्दी उठ कर चले गये पर बलवीर उन्हें अंधेरे में भी पहचान गया था, उसने सवेरे मामा जी से शिकायत की, ले दे मची.

मेरी मारने वाले मामा जी के साले थे, वे सुबह ही रवाना हो गये. बलवीर की मारने वाले मामा जी के ही छोटे भाई थे, उन्होंने हम दोनों से माफी मांगी पर बेशर्मी से बलवीर से बोले बोले- बस तू तनिक और ठहर जाता, पानी निकलने में नेक कसर रह गई, बाहर छूटा। वैसे तू है भी तो बड़ा नमकीन! मन नहीं माना।
“गलती हो गई।” बलवीर- नेक और रूक जाते तो तुम्हें सो ऊ पतो पर जातो। तुम भग दए, कओ तो और चम्पी बना दें, बोलो?

मैं सुबह उठा, मेरी गांड कुलबुला रही थी, मैं लेट्रिन के लिये खेतों की ओर जा रहा था, वहां एक पोखर था, सब लोग उसी के आसपास बैठते, पोखर में धो लेते.
मैं जा रहा था कि एक भाई साहब मिले, वे मेरे नाच के कारण मुझे पहचान गए, बोले- थोड़ा आगे मेरे साथ चल!
मैं चला गया.

जब मैं लौट रहा था पोखर की ओर तो अपना अंडरवियर कंधे पर रखे था पीछे से भाई साहब भी चले आ रहे थे, पास आए तो देखा कि उनका भी अंडरवियर कंधे पर था, मेरी तरह नंगे थे एक और खास बात थी कि उनका नौ इंची का मस्त लंड खड़ा था, टनटना रहा था मतलब ऊपर नीचे हो रहा था.

वे मुझे पटाने लगे बुरी तरह… बार बार कह रहे थे- यार! बस एक बार थोड़ा छुला लेने दे, कोई जबरदस्ती नहीं, तू जब कहेगा, बंद कर दूंगा! जरा सी इच्छा पूरी कर दे, न मत कर, दिल न तोड़। मेरे गले में हाथ डाल मुझे चूमने लगे, फिर प्रस्ताव रखा- अच्छा मेरी पहले मार ले।
वे मुझसे तीन चार साल बड़े लगते थे, ऊंचे भी थे तगड़े भी थे।

मेरा लंड पकड़ लिया, घुटनों के बल बैठ कर चूसने लगे, मेरा खड़ा हो गया।
वे गांड दिखाने लगे- डाल दे।
मैं मौन खड़ा रह गया।

वे फिर खड़े हुए, मेरा मुंह व होंठ चूसने लगे। मेरे गले में हाथ डाल कर वे मुझे एक बेरी के पेड़ के पास ले गए, उस पर उन्होंने मुझे टिका दिया, अपने लंड पर थूक मला और बहुत सारा थूक अपने हाथ में लेकर मेरी गांड पर मलने लगे फिर गांड में अपनी उंगली घुसेड़ दी. अब वे दो उंगलियां मेरी गांड में अंदर बाहर कर रहे थे.

जब उन्हें लगा कि गांड ढीली हो गई तो उन्होंने अपना लंड जो बड़ी देर से मचल रहा था, मैंने देखा कि उनका सुपारा तो छोटा था पर उसके पीछे लंड बहुत मोटा था, अब लंड मेरी गांड पर टिकाया और धक्का दिया.
लंड अंदर!
मैंने भी गांड ढीली कर ली थी तो दूसरे धक्के में पूरा अंदर चला गया, वे मस्त हो गए, थोड़ी देर अंदर डाले रहे, मेरे से पूछा- लग तो नहीं रही?

फिर वे शुरू हुए, वायदे के मुताबिक वे धीरे धीरे धक्के लगा रहे थे, फिर अपनी पर आ गए, दे दनादन दे दनादन शुरू हो गए, अंदर बाहर… अंदर बाहर… धक्कम पेल… धक्कम पेल… मचा दी।
मैंने भी गांड के धक्के देना शुरू कर दिए तो उन्होने मेरा मुंह एक बार फिर चूम लिया- वाह दोस्त! वाह! मजा बांध दिया, तुम क्या मस्त चीज हो।
वे झड़ गए, हम अलग हुए, मैं पोखर की ओर जाने लगा तो उन्होंने हाथ पकड़ लिया- नहीं दोस्त! ऐसे नहीं जाने दूंगा, तुम्हें मेरी मारना पड़ेगी।
मैंने कहा- कोई बात नहीं, आपको मजा आ गया बस।

पर वे ऊंचे थे, मैं उनकी खड़े खड़े नहीं मार सकता था, वे उस जमीन में लेटना नहीं चाहेंगे पर वे अड़ गए, जल्दी ही घोड़ी बन गए, वे बोले- मैं लेट जाऊं, तुम कहो तो।
पर मैंने उन्हें वैसे ही चोदा. वे मरवाने के उतने ही उत्सुक थे जितने मारने के… शायद मेरा अहसान चुकाना चाहते थे।

मैंने भी घुटने के बल होकर उनकी गांड में लंड पेला, उनकी वैसे भी ढीली थी, उनकी कमर पकड़ कर अंदर बाहर अंदर बाहर करता रहा। वे अपनी गांड जोर जोर से हिला रहे थे, ढीली कसती… ढीली कसती… कर रहे थे।
गोरे सुन्दर थे, कभी नमकीन चीज रहे होंगे. मराने के शौकीन लगे.
मेरा उत्साह बढ़ा रहे थे- हां! और जोर से पूरा पेल दो जोर लगा के।
गांड भी हिला रहे थे, शायद उन्हें बहुत दिनों से लंड का मजा मिला न था, वे पूरा आनंद ले रहे थे।

मैं भी बड़ी देर तक लगा रहा, उन्हें आघा घंटे तक चोदा।
वे संतुष्ट हुए- वाह यार, मजा बांध दिया… कहां है तुम्हारा लंड, एक बार और चूम लूं।
मैंने भी अपनी से बड़ी उमर के लोगों से मराई तो बहुत पर उनकी मारने के कम ही मौके मिले. फिर भाई साहब जितने उत्साह से कम लोग ही करवाते हैं. मैंने भी उनसे प्रेम से कराई थी तो वे बहुत आभारी थे, बोले- तुमने जैसे कराई, वैसे भी कोई नहीं कराता, फिर तुम जैसे माशूक लौंडे मिलते कहां हैं!

उन्होंने एक बार और मेरा चुम्बन लिया, हम पोखर पर गए, लेट्रिन साफ की और मैं कमरे पर लौटा।
उन भाई साहब का नाम रमेश था, वे गांव के समृद्ध किसान परिवार से थे.

कहानी जारी रहेगी.
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