शीला का शील-9

(Sheela Ka Sheel- Part 9)

यह कहानी निम्न शृंखला का एक भाग है:

उन दोनों की ही कोशिशों से वह जल्दी ही इस झटके से उबर गई और उसने महसूस किया कि उसकी योनि में उठी दर्द की लहरें अब ठंडी पड़ रही थीं।
उसके चेहरे पर राहत के आसार आते देख सोनू ने लिंग को पीछे खींचा और शिश्नमुंड तक बाहर निकाल कर फिर वापस अंदर ठेल दिया।

सख्त दीवारों की चरमराहट में उसने दर्द की आमेज़िश फिर महसूस की लेकिन इस बार वह बर्दाश्त के लायक था।
उसे पता था कि योनि की बनावट उलटी बोतल जैसी होती है। शुरुआत में बोतल के मुंह की तरह संकरा मार्ग होता है और संवेदना पैदा करने वाली सारी मांसपेशियाँ इसी कुछ इंच के मार्गे में होती हैं।
इसके आगे योनि खुल कर फैल जाती है, अंदर उसकी गहराई शरीरों के हिसाब से अलग-अलग हो सकती है मगर यह तय है कि दर्द का रिश्ता इसी शुरुआती मार्ग से होता है।

लिंग की लंबाई कई तरह के आसनों के लिये मैटर कर सकती है लेकिन सम्भोग के लिये कोई मैटर नहीं करती।
जो लिंग आधा घुसने में जितना दर्द देगा उतना ही पूरे में भी महसूस होगा।

योनि के लिये लिंग की मोटाई मैटर करती है, जितना ज्यादा मोटा लिंग, शुरुआत में उतना ही ज्यादा दर्द और योनि के ढीली हो जाने पर शायद मज़ा भी कुछ ज्यादा हो जाता हो।

सोनू इतना ज्ञानी नहीं था, आधे लिंग को ही अंदर बाहर कर रहा था और हर धक्के के साथ लिंग को दो सूत ज्यादा ठेल देता था और जल्दी ही उसने लिंग को जड़ तक शीला की योनि में घुसा दिया।

जैसा कि उसे अंदाज़ा था, कोई अतिरिक्त दर्द न हुआ और जो था भी वो अब धीरे-धीरे मन्द पड़ता लगभग नगण्य हो चला था।

जब एक बार गाड़ी ठीक रफ़्तार में दौड़ पड़ी तो उसे उस सुख की अनुभूति हुई जिसके लिये वह तड़प रही थी, जिसके लिये उसने वर्जनाओं को ठोकर मारी थी।

रग-रग में हर धक्के के साथ ऐसी आनन्द की लहरें दौड़ रही थीं जिन्हें वह बस महसूस कर सकती थी, बयान नही कर सकती थी।

अंधेरे कमरे में उन दोनों की भारी सांसों के साथ योनि और लिंग के समागम की मधुर आवाज़ गूंज रही थी।

सोनू चाहता था कि वह किसी और आसन में आये लेकिन उसके हाथ के इशारे के बाद भी शीला ने सकारात्मक प्रतिक्रिया न दी तो उसने भी ज्यादा ज़ोर न दिया।
बस इतना किया कि जब यूँ उकड़ूं बैठे धक्के लगाते वह थक गया तो उसे बिस्तर के किनारे खींच लाया और खुद नीचे उतर कर खड़ा हो गया।

अब इस पोजीशन में वह ज्यादा थके बिना और ज़ोर से धक्के लगा सकता था।
उसने लिंग को खुल चुकी शीला की योनि में घुसाया और एक लयबद्ध ताल पर उसकी कमर थिरकने लगी। कमरे में समागम की वह मधुर आवाज़ फिर जारी हो गई जो शीला सुनने को बेइंतिहा तरसी थी।

अब उसने बिस्तर या रानो को पकड़ने की कोशिश नहीं की, बल्कि हर धक्के पर हिलते अपने वक्ष उभारों को उसी ताल पर सहलाने लगी थी।
रानो उन पलों में उसके लिए नगण्य हो गई थी।

वह तरसी थी… तड़पी थी, कब से इस पल के लिए बेक़रार थी… जल्द ही उसकी उत्तेजना अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचने लगी।
उसने अपनी नसों में वह मादक ऐंठन महसूस की जो उसे निचोड़ देना चाहती थी और उसकी सिसकारियाँ तेज़ हो गईं। कमरे की सरहदों को तोड़ने लगीं।

फिर चरम पर पहुँचने के सुख ने उसे बेलगाम कर दिया। वह खुद से अपनी कमर ऊपर उठा-उठा कर सोनू के लिंग को अंदर तक लेने की कोशिश करने लगी और साथ ही आवाज़ों पर भी नियंत्रण न रहा।

फिर ऐसा लगा जैसे उसके पेट कि निचले हिस्से की मांसपेशियाँ एकदम सिकुड़ कर फैल गईं हों और उसके अंतर से कोई लावा सा फूट पड़ा हो।
शरीर को एक तेज़ झटका लगा और स्खलन के उन क्षणों में वह कांपने लगी।

योनि की मांसपेशियाँ बार-बार फैलने सिकुड़ने और सोनू के लिंग को भींचने लगीं।

योनि का यह संकुचन और अंदर से उठती भाप ने सोनू के लिंग को भी फुला दिया और वह भी कुछ ऐसे ज़ोरदार धक्कों के साथ, जिन्होंने शीला को हिला दिया… फट पड़ा।

उसने अपने अंतर में उसके लिंग से निकलते गर्म-गर्म वीर्य का अनुभव किया और सोनू किसी जानवर की तरह गुर्राता हुआ उसके ऊपर ढेर हो गया और उसे स्खलन के अंतिम पलों में इतने ज़ोर से भींच लिया कि उसकी हड्डियाँ कड़कड़ा उठीं।

जब यह गुबार थमा तो वह शीला के ऊपर से हट कर बगल में ढुलक गया और अपनी उखड़ी उखड़ी सांसें दुरुस्त करने लगा।

कई मिनट लग गये उसे खुद को संभालने में… दिमाग में चलती सनसनाहट से लड़ कर जीतने में और जब इस अवस्था से बाहर आ सकी तो आसपास के माहौल का अहसास हुआ।

कमरे में छाया अंधेरा और सन्नाटा महसूस हुआ, सिरहाने परछाईं की तरह पड़ी रानो महसूस हुई और अपने पास ही चित पड़ा सोनू महसूस हुआ।

वह एकदम उठ बैठी और सिरहाने सिमट आई… आँख से बंधा स्टोल उसने उतार फेंका था।

उसे एकदम से संज्ञान हुआ कि अब वह पहले वाली कुंवारी शीला न रही थी, उसका शील भंग हो चुका था और यह समाज के बनाये किसी नियम के अन्तर्गत नहीं हुआ था बल्कि प्रकृति के बनाये नियम के अन्तर्गत हुआ था।

आज उसने सामाजिक नियमों की अनदेखी की थी, बड़े बूढ़ों की निर्धारित वर्जनाओं को तोड़ा था, अपनी शारीरिक इच्छाओं के आगे समर्पण कर दिया था।
उसे अपराधबोध की अनुभूति होने लगी।

जो मज़ा, जो अकूत आनन्द अभी कुछ क्षण पहले उसने महसूस किया था, वह दिमाग से निकल गया और रह गई तो खुद की बगावत और इस अपराध का अहसास कि उसने मर्यादा तोड़ी थी।

सोचते-सोचते उसकी आँखें भीग गईं और सांसे बेतरतीब होकर सिसकियों में बदल गईं।

‘क्या हुआ दी?’ उसके बदन की कंपकंपाहट महसूस कर के रानो बोल पड़ी।
‘मम्म… मैं पापिन हूं… सोनू, मेरे भैया… मुझे माफ़ कर दे।’ उसने सिसकियों के बीच कहा।

‘दीदी, यह क्या कह रही हो?’ ज़ाहिर है कि सोनू के लिये यह अनपेक्षित था, तो वह सकपका कर उठ बैठा- दीदी!

रानो उसके दिमाग में चलते झंझावात को बेहतर समझ सकती थी, उसने अपनी बांहों में शीला को संभाल लिया और थोड़ा सहारा मिलते ही वह फूट-फूट कर रो पड़ी।

‘दीदी!’ सोनू भी उसके पास आ गया- तुम रो क्यों रही हो… तुमने कोई पाप नही किया। यह सही है या गलत… यह कौन तय करेगा?’
‘भगवान्…? क्या वह सब नहीं देख रहे।’
‘देख रहे तो उन्होंने यह अन्याय किया ही क्यों… दुनिया में ढेरों लोगों को शरीर का सुख जायज़ तरीके से दिया और ढेरों को वंचित कर दिया। जिन्हें वंचित कर दिया, क्या उनके लिये कोई रास्ता सुझाया।’

‘नहीं पता… पर आज जो हुआ वह गलत है।’

‘दीदी… कुछ नहीं गलत है। जिन्हें गलत कहना है वे ही आकर बता दें कि इतनी उम्र तक बिना शादी के बैठी रहने वाली लडकियाँ, औरतें आखिर करें भी क्या?’

सोनू उम्र में छोटा था लेकिन फिर भी इस किस्म की गंभीर बातें समझता था।
उससे सान्त्वना मिली तो शीला का सुबकना कम होने लगा।

सोनू ने रानो की जगह खुद उसे बाहों में ले लिया और उसका सर अपने कंधे से टिकाये, उसकी पीठ सहलाने लगा।
वह वही सब शब्द दोहराने लगा जो वह रानो के मुंह से सुनती आ रही थी।

कहा नहीं जा सकता कि यह उसकी खुद की सोच थी या उसकी सोच पर रानो और रंजना की छाप।
पर उसके शब्द शीला के विचलित मन को सुकून दे रहे थे और उसकी सिसिकियाँ मद्धम पड़ते-पड़ते ख़त्म हो गई थीं।

जब आप बिना कपड़ों के सम्पूर्ण नग्नता से विपरीत लिंगी शरीर के इतने निकट हों और शरीर घर्षण का अनुभव कर रहा हो तो भावनाएं बदलते देर नहीं लगती।

खुद उन दोनों को भी यह अहसास नहीं हो सका था कि कब शीला अपने अपराधबोध से मुक्त हो गई और कब सोनू उसे सांत्वना देने, समझाने की ज़िम्मेदारी से बरी हो गया।

दोनों ने बस यह महसूस किया था कि सोनू के उसकी पीठ पर फिरते हाथ गर्माहट का अहसास दे रहे थे और सोनू ने यह महसूस किया था कि उससे रगड़ता शीला का जिस्म उसे उत्तेजित करने लगा था।

उसने कंधे पर टिका शीला का आंसुओं से भीगा चेहरा उठा कर आंसू पोंछे तो उसके होंठों ने सोनू को जैसे किसी चुम्बक की तरह खींच लिया।

शीला के गालों पर होंठ फिराते वह उसके होंठों तक पहुँचा तो इस बार वह पहले की तरह बंद न रहे, बल्कि उन्होंने पूरे उत्साह से उनका स्वागत किया।
और वे एक प्रगाढ़ चुम्बन में लग गये।

शीला की मनोदशा अजीब हो रही थी, कहीं न कहीं उसके मन में गलत और सही की जंग अब भी जारी थी, मगर जो हो रहा था, उसके आकर्षण से खुद को मुक्त नहीं कर पा रही थी।

इस बार खुद से उसने सोनू के होंठों को चूसा था और जब सोनू ने जीभ को उसके होंठों तक पहुँचाया था तो उसने जीभ को भी चूसने से गुरेज न किया था।

कहीं न कहीं शीला को अहसास इस बात का भी था कि जब वर्जित फल खाना ही है तो अगर-मगर और इसे-उसे छोड़ कर क्यों खाया जाये।

यह प्रगाढ़ चुम्बन लम्बा चला और उन्होंने न सिर्फ एक दूसरे के होंठ चूसे बल्कि जीभ भी उसी अंदाज़ में चूसी।

रानो अब जैसे दोनों के लिये अप्रासंगिक थी और उसे इस स्थिति से आपत्ति भी नहीं थी, वह बस अपनी दीदी का सुख चाहती थी।

इस गहरे चुम्बन ने दोनों की भंगिमाएं बदल दीं… सोनू ने उसे खींच कर अपनी गोद में ऐसे बिठा लिया कि उसके वक्ष सोनू के सीने से दबने लगे और शीला के नितम्ब उसकी जांघों में टिक गये।

चुम्बन अब भी जारी था लेकिन शीला ने एक हाथ से उसकी पीठ का सहारा लेते हुए, दूसरे हाथ से उसके मुरझाये पड़े लिंग को सहलाना शुरू कर दिया था।

जबकि सोनू उसके दोनों नितंबों को अपने हाथों से मसल रहा था, दबा रहा था और उन्हें एक दूसरे के सामानांतर खींचने की कोशिश कर रहा था।

फिर इसी अंदाज़ में बैठे-बैठे उसने शीला को थोड़ा पीछे की तरफ झुकाया और एक हाथ से उसके एक वक्ष को मसलते हुए दूसरे को मुंह से चूसने चुभलाने लगा।

शीला के खून में चिंगारियाँ उड़ने लगीं।
उसने अपनी योनि में वही गर्म तरंगें उभरती महसूस की जो थोड़ी देर पहले तब महसूस की थी जब लिंग प्रवेश नहीं हुआ था।

दोनों बेताबी से एक दूसरे के अंगों को मसलते रहे और सोनू ने शीला को झुकाते हुए अपने पंजों पर गिरा लिया था और उसकी नाभि में जीभ चलाने लगा था।

दोनों हाथों से उसके स्तनों का भरपूर मर्दन करते हुए उसने शीला की पीठ के नीचे से अपने पांव निकाल लिये और उसे बिस्तर पर टिका दिया।
खुद पीछे खिसकते शीला के पैरों के बीच में आ गया और उसके घुटनों को मोड़ते हुए दोनों पांवों को फैला दिया, जिससे शीला की योनि खुल कर उसके सामने आ गई।
और वह फिर ज़ुबान से उसके बाहरी किनारों से खिलवाड़ करने लग गया।

नसों में ऐंठन होने लगी और ऐसा लगने लगा जैसे कोई अपराधबोध नहीं, कोई वर्जना नहीं, बस आनन्द ही आनन्द… अकूत आनन्द!
वह खुद अपने हाथों से अपने कुचों का मर्दन करने लगी।

सोनू ने उसकी उत्तेजना को जब उस स्तर पर पहुँचा दिया कि शीला के दिमाग में सिवा सम्भोग के कुछ बाकी न रहा तो वह उसके बगल में इस तरह लेट गया कि उसका सर शीला के पैरों की तरफ हो गया और पैर शीला के सर की तरफ।

इस तरह वह शीला की साइड से सट कर सीधे हाथ से उसके वक्ष दबाने लगा तो उलटे हाथ से शीला की जांघ का सहारा ले कर उसकी योनि पर जीभ चलाने लगा।

इस तरीके का जो मुख्य कारण था वह यह था कि इस तरह उसका अर्ध उत्तेजित लिंग अब शीला के मुंह के पास हो गया था। इच्छा स्पष्ट थी जिसे समझना शीला के लिये कोई मुश्किल नहीं था।

पर उसने खुद से सवाल किया… क्या वह ऐसा कर पाने में सक्षम थी?
लेकिन जब वह कर रहा था तो क्या शीला का इन्कार उसे बुरा नहीं महसूस होगा।

उसने थोड़ा तिरछा होते हुए अपने सीधे हाथ से उसे थाम लिया और सहलाने लगी।
पहले आँखों पर पट्टी बंधी थी लेकिन अब आँखें खुली थीं… भले अंधेरा था लेकिन आँखे इस अंधेरे की अभ्यस्त हो चुकी थी और वह धुंधला ही सही उसे देख सकती थी।

वह सात इंच के केले जितने साइज़ का था, चाचे के लिंग से उसकी लंबाई भी कम थी और मोटाई भी, मगर फिर भी आकर्षक था और योनिभेदन के लिये एकदम उपयुक्त था।

वह उसे सूंघने के लिए नाक के पास ले आई, अजीब सी सोंधी-सोंधी गंध का अहसास हुआ, जिसने उसमें और उत्तेजना का संचार किया।

नीचे से जो तरंगें उठ रही थीं, वे हर बाधा के बैरियर गिराये दे रही थीं।
खुद से उसका दिल होने लगा कि वह भी उसे मुंह में रखे।

उसने जीभ निकाल कर उसके अग्रभाग को छुआ।
अजीब सा नमकीन स्वाद महसूस हुआ… उसने मन की वर्जनाओं को किनारे कर के खुद से सवाल किया… क्या उसमें ऐसा कुछ था जो अस्वीकार्य कर देने लायक हो?

जब तक आप किसी चीज़ को मन से स्वीकार नहीं कर पाते, वह आपके लिये घृणित हो सकती है लेकिन जैसे ही आप स्वीकार करते हैं, कोई घृणा बाकी नहीं रह जाती।

पहली बार में उसने उस नमकीन ज़ायके को थूक में उड़ा दिया लेकिन फिर से ज़ुबान लगाने पर जो स्वाद महसूस हुआ, उसने स्वीकार कर लिया।

उसने होंठ खोले और लिंग के अग्रभाग को अंदर समेट लिया। उसे अहसास था कि रानो उसे देख रही होगी मगर अब वह खुद में कोई लाज का चिह्न नहीं पा रही थी।

लिंग के ऊपर होंठों का छल्ला बनाये उसने वहाँ तक अपने होंठ उतारे जहाँ तक शिश्नमुंड उसके हलक से न जा टकराया, फिर वापस खींच लिया।

बचाते-बचाते भी लिंग जीभ से स्पर्श किया और जीभ ही तो स्वाद का पता बताती है, वह जैसे पूरा नमकीन हो रहा था।

फिर उसकी सिमटी ज़ुबान खुल गई और मुंह में मौजूद लिंग पर लिपट गई। लसलसा नमकीन स्वाद उस रस की बिना पर था जो खुद उसकी योनि और सोनू के लिंग से निकला था।

सोनू ने शायद बिस्तर की चादर में ही पोंछ दिया था, लेकिन धोया तो नहीं ही था और इसीलिये उसे यह स्वाद आ रहा था, मगर जब तक वह इस विषय में सोच पाती, स्वाद जीभ पर घुल गया।

उसे उबकाई सी आई… बड़ी मुश्किल से उसने खुद को संभाला और लिंग बाहर निकाल कर थूकने लगी।

लेकिन उसे फिर से मुंह में लेने का लोभ संवरण न कर सकी… उसने पास पड़े अपने स्टोल से उसे पौंछा और फिर से हाथ में थाम लिया।

ऐसा नहीं था कि सोनू उसकी हरकत से बेखबर था लेकिन उसे अंदाज़ा था कि किसी भी लड़की के लिये मुख मैथुन पहली बार में आसान नहीं होता।
वह उसकी योनि को छेड़ते-गर्म करते उसे पूरा मौका दे रहा था कि वह अपने अंतर के विरोध और बाधाओं से पार पा ले।

शीला ने उसके लिंग को फिर से मुंह में लिया और दबा कर वैसी ही अवस्था में रुक कर यह देखने लगी कि अब उसका शरीर कैसे प्रतिक्रिया कर रहा है।

रोके रखने से तो कुछ नहीं हुआ मगर जैसे ही उसे चारों तरफ से जकड़ कर अंदर बाहर करने की कोशिश में ज्यादा हलक तक ले गई फिर उबकाई सी आई और उसने लिंग को फिर मुंह से निकाल लिया।

उसे इतनी समझ थी कि जो रास्ता उसने वर्जनाओं को तोड़ कर खोला था वहाँ ये सब क्रियाएँ सामान्य हैं और आज नहीं तो कल उसे सब करना ही है तो किसी ज़िद पर कायम क्या रहना।
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उसने बाहर से ही उसके लिंग पर जीभ चला कर उसे चाटना शुरू किया।
ये शुरुआत करने के लिए उसे ज्यादा बेहतर तरीका लगा।

वह उसके अंडकोषों को सहलाती लिंग को बाहर से ही चरों तरफ से चाटने लगी।

सोनू की जीभ उसके अंतर की गहराइयों में अब कुरेदने लगी थी जिससे उसकी रगों में उड़ती चिंगारियाँ अपने उफान पर पहुँच रही थीं।

थोड़ी देर की ऊपरी चटाई के बाद शीला ने उसे फिर मुंह के अंदर समेट लिया और इस बार ज्यादा गहराई तक ले जाने के बजाय आधे लिंग को ही चूसने लगी।

इस बार उसे उबकाई न आई और ये चूषण खुद उसे इतना भाया कि उसने सोनू के तिरछे शरीर को धकेलती उसे चित कर लिया और खुद अपने घुटने उसकी पसलियों के आसपास मोड़ते उसके ऊपर आ गई।
अब उसका मुंह ठीक सोनू के लिंग के ऊपर था और सोनू के मुंह के ठीक ऊपर उसकी योनि… सोनू ने उसके नितंबों को सहलाते उसे थोड़ा नीचे करके अपनी सुविधानुसार एडजस्ट कर लिया था।

जो 69 सिक्सटी नाइन की अवस्था उसने रानो की ज़ुबानी सुन कर अपनी कल्पना में ढाली थी, उसे खुद अपने ऊपर साकार कर लिया था।

इस घड़ी उसके जिस्म में फैलती कामाग्नि उस पर इतना हावी थी कि उसे परवाह नहीं थी कि उसे देखती उसकी बहन उसके बारे में क्या सोच रही होगी।

वह भरपूर ढंग से इस सुख को पा लेना चाहती थी, इसमें जी लेना चाहती थी।

और दोनों तरफ के भरपूर चूषण से उसमे फैली उत्तेजना का पारा जल्दी ही अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचने लगा तो वह उठ के सीधी हो गई।
उसने खुद से अपनी योनि सोनू के लिंग के ऊपर पहंचाई और अपने हाथ से सोनू के लिंग को पकड़ कर अपने छेद से सटा लिया…
संकेत साफ़ था।
सोनू ने अपनी कमर ऊपर उठाते हुए अपने लिंग को ऊपर की तरफ उमसाया, जिससे शिश्नमुंड छेद पर दबाव बनाते अंदर धंस गया।
एक मादक, उच्च सिसकारी शीला के मुख से ख़ारिज हुई।

और वह ‘सीईईई’ करते उसपे बैठती चली गई। ऐसा लगा जैसे कोई गर्म सुलगता नश्तर उसके योनिद्वार को भेदता, कसी हुई दीवारों को रगड़ता अंदर पेवस्त हो गया हो।

जितनी तकलीफ का अनुभव हुआ उससे कहीं ज्यादा आनन्द की अनुभूति हुई।

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