पुरुष के संग कामुकता भरे पलों का प्रथम सुखद अहसास

(Purush Sang Kamukta Ka Pahal Ahsas)

आप सभी को प्यार भरा नमस्कार. एक बार फिर मैं साहिबा आप सबके समक्ष मेरी नई हिंदी सेक्स कहानी लेकर हाजिर हूँ.

आप सभी ने मेरी पिछली कहानी
बुर की प्यास ने लेस्बियन बना दिया
को बहुत प्यार दिया, मुझे काफी ईमेल मिले जिनमें मेरी कहानी की तारीफें थीं और कुछ में मेरे लिए अपशब्द भी थे.. जिन्हें पढ़कर वाकयी बहुत निराशा हुई, परन्तु कुछ इमेल्स के चलते अपने प्रिय पाठकों को छोड़ना मुमकिन नहीं है.

उस कहानी को आगे बढ़ाने की आपकी इच्छा को मैं पूरी नहीं कर पाऊँगी, उसके लिए माफ़ करें क्योंकि उसमें आगे कुछ भी ऐसा कामुक नहीं हुआ जो मेरे पाठकों को पहले की भाँति आनन्द दे सके, इसलिए मुझे वो कहानी वहीं रोकनी पड़ी, अगर फिर कभी मेरे और काम्या के बीच आनन्ददायक घटना हुई तो उसका जिक्र जरूर करूँगी.

आप सभी के स्नेह के लिए धन्यवाद.

इस बार की कहानी में, मैं अपने और अपने पुराने साथी (बॉयफ्रेंड) के साथ बिताए प्यार के कुछ पल बांटने जा रही हूँ. हर इंसान की जिंदगी में कोई ना कोई शख्स ऐसा होता है, जिससे वो बेइंतेहा मोहब्बत करता है, परन्तु हर रास्ते की मंजिल हो, ये जरूरी नहीं.

उसके साथ बिताये हर पल, वो पहला एहसास हमेशा हमे याद रहता है.. और कुछ पल सेक्स करने से भी ज्यादा आनन्ददायी होते हैं, जो हम हमारे प्रेमी या प्रेमिका के साथ बिताते हैं.

ओरल सेक्स हर शारीरिक प्रेम का आधार होता है, ना कुछ ज्यादा और ना ही कम, इस प्रेम के बिना तो हर सहवास अधूरा है.
पर समय के अभाव में लोग उस चीज को कम से कम करने की कोशिश करते हैं.

जानते हैं वो हमारे दिल का आलम..
और जानकर भी अनजाना कर देना अदा है उनकी..

मेरी जिन्दगी का पहला प्यार पहला मर्द जिसने मुझे छुआ. वो मुझे मेरे दोस्त वीर की पार्टी में मिला था, उसी ने मुझे उससे परिचय कराया था. ना जाने क्या हुआ था कि मुझे गोरे और बॉडी वाले लड़कों की बजाए सांवले और सामान्य कद काठी वाले लड़के ज्यादा पसन्द आते हैं.. और वो बिल्कुल मेरी पसन्द के अनुरूप था.

थोड़ा सांवला सा 5 फुट 10 इंच का कद, ना ज्यादा मोटा, ना ज्यादा पतला. मुझे उसका बहुत ही दिलचस्प व्यक्तित्व नजर आया. एक गजब का जादू था उसमें. उसकी बातों का अंदाज और उससे ज्यादा तो मुझे उसका नाम पसन्द आया.
राघव.. मेरा राघव.

हमारी दोस्ती का सिलसिला वहीं से शुरू हो गया. एक दूसरे को नम्बर दिये और पार्टी से निकल लिए.

जब मैं घर पहुंची तो उसका मैसेज था ‘घर जाते ही बता देना, फ़िक्र नहीं होगी.’
उसका मैसेज देखकर मुझे थोड़ा अच्छा जरूर लगा, फिर सोचा झूठी फ़िक्र दिखा रहा है.
मैंने उसे रिप्लाई किया- एक घण्टे की मुलाकात में इतनी फ़िक्र??
राघव- पहली मुलाकातों में दिल घायल हो जाते हैं.. ये तो बस फ़िक्र है, दिल का आलम तो अलग ही है.

हा हा हा हा… बहुत ही दिल फेंक किस्म के जनाब थे वो. हम तो पहली ही नजर में उन पे फ़िदा हो गए थे.

धीरे धीरे प्यार परवान चढ़ रहा था हमारा, हम अक्सर ही बाहर घूमने जाया करते थे. एक रोज बारिश हो रही थी मौसम खुशनुमा था, तभी मुझे राघव का फ़ोन आया- वेयर आर यू साहिबा.. मैं गाड़ी घर ही छोड़ कर आया हूँ, मुझे लेने आ जाओ. यहाँ कोई आने का साधन मुझे नहीं मिल पा रहा है, इसी बहाने तुम्हारे साथ वक़्त भी बिता लूंगा.

मैंने उसे ओके बोला और तैयार होने चली गई. उसे मेरा सूट पहनना ज्यादा पसन्द था, इसलिए मैंने एक लाल रंग का सूट पहन लिया.

तारीफ़ ही क्या करूँ मैं अपनी इतनी.. क़यामत तो नहीं, पर गोरे बदन पे लाल रंग और ऊपर से तंग फिटिंग का होना, मेरे शरीर का एक एक अंग अलग से दिख रहा था.. और मेरे 36 के बूब्स वो तो कुछ ज्यादा ही मुझे मदहोश कर देने वाली का रूप दे रहे थे.

मुझे सूट पे दुपट्टा ओढ़ने की आदत नहीं है, इसलिए दुप्पटा घर ही छोड़ दिया. मैंने अपनी गाड़ी निकाली और चल दी राघव को रिसीव करने.

बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी खैर.. जब मैं पहुंची राघव के पास, वो मेरा ही इन्तजार कर रहा था, गाड़ी में बैठने के बाद वो एकटक मुझे देखने लगा था.

मैं- ऐसे क्या देख रहे हो बाबा.. चेहरे पे कार्टून बना है क्या मेरे?
मैंने चिढ़ते हुए बोला.

हम उस वक़्त तक सिर्फ एक दूसरे को बाँहों में भर के बैठे रहते थे, जब भी मिलते थे, उससे आगे हम लोगों ने कुछ नहीं किया था.
राघव- कार्टून तो नहीं पर सेक्सी जरूर लग रही है मेरी जान.

ये कहते हुए उसने मेरे गाल पे आये बालों को पीछे कर दिया, उसकी इस बात पे एकाएक ही मेरी हंसी छूट गई और वो भी हँस दिया.

मैं- तो बताइए हुजूर कहां जाना है?
राघव- कहीं अकेले में.
मैं- ऐसा क्यों.. अकेले में क्या करना है?
राघव- तुमसे प्यार.

उसके इस रिप्लाई से न मैं उससे कुछ कह पाई… ना पूछ पाई, बस एक सुनसान जगह ले जाके गाड़ी रोक दी.

वो गाड़ी से उतरा, मेरी तरफ आके गाड़ी का दरवाजा खोला और मेरा हाथ पकड़ कर गाड़ी से बाहर निकाल लिया.

ये सब कुछ इतना अचानक हुआ कि मुझसे मेरे शरीर का भार सहन नहीं हो पाया और मैं राघव के ऊपर ही गिर गई. अब मंजर ऐसा था कि राघव नीचे और मैं उस पर थी.

उसने उठने की बजाए मुझे बाँहों में ले लिया. गिरने से लगी चोट को भुला के वो मुझे अपने आलिंगन में समेटे जा रहा था.

उससे थोड़ा ताकत के साथ मैं छूटकर हटी, तो वो उतनी ही तेजी से उठा और उसने मुझे गाड़ी से सटा दिया.

मेरे चुचे बिल्कुल उसकी छाती में गड़े हुए थे और उसके उठे हुए लंड का आभास मुझे मेरी चूत के ऊपर हो रहा था. मेरी साँसों के साथ उठते हुए मेरे चुचे उसके सीने से रगड़ खा रहे थे.

मैंने उसे हटाना चाहा तो उसने मेरे दोनों हाथ गाड़ी के साथ लगा कर अपने हाथों से दबा लिए और अचानक से मेरे होंठों पे अपने होंठ रख दिए. पहली बार किसी के होंठ मेरे होंठों का रसपान कर रहे थे, पूरे बदन में एक सुरसुरी सी हो रही थी. कुछ देर एक दूसरे के होंठों का रसपान करने के बाद जैसे ही उसका हाथ मेरे मम्मे पे आया, मानो एक करंट सा लग गया हो मुझे. उस वक़्त मेरे में इतनी हिम्मत नहीं थी कि उसे रोक दूँ.

पर जैसे ही दिमाग में अभी हो सकने वाली चुदाई का ख्याल आया, मेरे अभी न चुदने को इरादे को मैं हारने नहीं दे सकती थी और मैंने उसे धक्का देकर दूर कर दिया. उस धक्के से शायद वो नाराज हुआ.
उस वक़्त मेरी रजामन्दी न देखते हुए वो हट गया और हम लोग वहां से अपने अपने घर आ गए.

पूरे रास्ते हमने बात नहीं की, ये सब मेरे लिए पहली बार था. उस एहसास को महसूस करने के बजाए मैं राघव से थोड़ा डर गई थी. पर दूसरे दिन राघव ने मुझे अपने प्यार से समझा ही लिया और बिना मेरी मर्जी सम्भोग करने ना करने का उसने वादा किया. पर बदले में मुझे भी उसे ओरल की परमिशन देनी पड़ी

जब आप प्यार में होते हो आप कुछ भी गलत या सही का अंदाजा नहीं लगा सकते.

कुछ दिन बाद मेरा जन्मदिन था और मुझे राघव के साथ घूमने जाना था. ठीक समय पर राघव मुझे लेने आ गया.

उस दिन मैंने एक काली रंग की छोटी ड्रेस पहन रखी थी, जो मेरी जांघों तक ही आती थी और उसे कमर पे लगी हुई चैन से खोला जा सकता था.

जैसे ही मैं गाड़ी में बैठी राघव के मुँह से मेरी तारीफ में कुछ न निकल पाया. वो कुछ वक़्त मुझे देखता रहा और फिर गाड़ी चला दी.

आज मैं भी शरारत के मूड में थी- क्या बात है जनाब, आज आप चूमेंगे नहीं हमें?
मुझे क्या पता था कि वो तो तैयार है. जैसे ही मैंने बोला, उसने गाड़ी रोकी और मेरी तरफ देखने लगा. एक बार तो मैं डर गई थी, पर चुप रही.

वो थोड़ा क़रीब आया और उसने मेरे माथे पर चुम्बन किया, फिर अपना हाथ मेरे गाल पर रखकर मुझे देखने लगा. मैंने भी अपना गाल थोड़ा घुमाकर अपने होंठ उसकी हथेली में लगा दिए.
मेरा रिसपोंस मिलते ही उसने मेरी कमर में हाथ डाला और मुझे अपने ऊपर खींच लिया और मेरे होंठों को चूसने लगा. उसके चूसने के अंदाज से लग रहा था अभी मेरे होंठों से खून निकल आएगा.

तभी उसका फ़ोन बजा, उसके घर से फ़ोन था, रात होने की वजह से उसे घर बुलाया जा रहा था. वो अपनी बहन से बहुत प्यार करता है, इसलिए वो घर जाने के लिए तैयार हो गया और न चाहते हुए भी उसने मुझे हटा दिया.

इन प्यार के पलों में उसका मुझे यूँ छोड़ना मुझे पसन्द नहीं आया और मैं नाराज होकर पीछे वाली सीट पे चली गई.
वो गाड़ी चलाते हुए मुझसे माफ़ी मांग रहा था.
मैं- तुम बहुत गन्दे हो, उस दिन मैंने तुम्हें हटाया था, उसका बदला ले रहे हो. मेरा बहुत मन हो रहा था, तुम ऐसे कैसे कर सकते हो.
राघव ने गाड़ी रोकते हुए कहा- अच्छा अभी बताता हूँ तुम्हें.. रुको.

वो गाड़ी से उतरा और पीछे वाली सीट पे आ गया, एक झटके से उसने मेरा हाथ पकड़ के अपनी ओर खींचा. मैं सीधा उसकी बाँहों में समा गई.

मुझे सोचने का वक़्त मिलता, उससे पहले ही उसने मेरे होंठ चूसने शुरू कर दिए, कभी वो अपनी जीभ मेरे मुँह में डालता, जिसे मैं चूसती, तो कभी मैं अपनी जीभ उसके मुँह में डालती तो वो चूसता.
उसका एक हाथ मेरे बालों में था और एक मेरी कमर पे था. मेरे दोनों हाथ उसकी शर्ट को खोलने में व्यस्त थे.

मुझे पता ही नहीं चला, कब उसने मेरी ड्रेस पीछे से बिल्कुल खोल दी, उसका एक हाथ मेरी पीठ पे घूम रहा था और उसकी जीभ मेरे मुँह में घूम रही थी.

उसने मेरे होंठ छोड़े और मेरे कान के पास आ गया. जैसे ही वो मुझे कान के पास चूमने लगा, मेरी ‘आह्ह्ह..’ निकल गई. उसकी जीभ मेरी गर्दन और मेरे चूचों की घाटी तक घूम रही थी.

वो एहसास ऐसा था कि मुझसे बिल्कुल सब्र नहीं हो रहा था.. और मेरी लाड़ो तो उसके प्यार से पानी पानी हो रही थी. उसका हाथ जो मेरी पीठ पे घूम रहा था.. उसने मेरा ब्रा का हुक खोल कर अपने मालिक की मदद कर दी थी. राघव ने ज्यादा इन्तजार न करते हुए मेरी ड्रेस निकाल दी. अब मैं उसके सामने सिर्फ एक पेंटी में थी, वो भी ऐसी.. जो टाइट होने की वजह से मेरी चूत की दरार के दर्शन बिना रोक टोक के करा रही थी.

मेरी लाडो को बाद में छेड़ने के मकसद से उसने मुझे अचानक ही पीछे की ओर धकका दे दिया. अब मेरी पोजीशन बिल्कुल कुछ ऐसी थी कि मैं सीट पे लेट सी गई थी और मेरी जांघ राघव के जांघ पे थी. उसने अपने कपड़े निकालने शुरू कर दिए. थोड़ी ही देर में वो सिर्फ अंडरवियर में था.

मुझे लगा वो मेरे चुचे चूसेगा. अब पर उसने ऐसा नहीं किया, उसने मुझे पलटने को कहा. जैसे ही मैं पलटी वो मेरे ऊपर आ गया. मुझे मेरी गांड पे उसके खड़े लंड का आभास हो रहा था.

उसने मेरी पीठ पे चुम्बन करने शुरू कर दिए और थोड़ी ही देर में उसके थूक से मेरी पूरी कमर गीली हो गई थी. धीरे धीरे करके वो नीचे की तरफ सरकता आया और अपने दांतों से मेरी पेंटी को मुँह में दबा लिया.

मुझे समझ आ गया था, मैंने भी मेरी पेंटी मुँह से निकलने में उसकी मदद की. पेंटी निकालने के बाद वो अपना अंडरवियर निकलने लगा.
मैं- ये क्या कर रहे हो?
राघव- फ़िक्र मत करो, सेक्स नहीं करूँगा.
यह कहते हुए उसने अपने लंड को मेरी चूत पे ऐसे रखा कि वो अन्दर ना जाये पर आगे पीछे होने पे रगड़ खाए.

मेरी सांसें तो पहले से ही फूल रही थीं और सिसकारियां भी नहीं थम रही थीं. जैसे ही उसने लंड को चूत पे सैट करके रगड़ मारना शुरू किया, मेरा मन कर रहा था कि चिल्लाऊं, रही सही कसर जालिम ने मेरा मम्मा चूस कर निकाल दी. एक हाथ से वो मेरे मम्मे को इतनी जोर से मसल रहा था कि बस दर्द किसी भी पल सहन से बाहर हो जाए और दूसरे मम्मे के निप्पल पर उसकी जीभ मीठी मीठी सिहरन दे रही थी.

आह्ह्ह की बजाए मेरी सीत्कारें राघव के नाम की चिल्लाहट में बदल रही थीं. मेरी चूत पे रगड़ खाता उसका लंड बस अभी चुदने पे मजबूर कर रहा था.

अचानक वो उठा और अपने दोनों हाथों से मेरी चूत को चौड़ा करके अपनी जीभ मेरे छेद में घुसा दी. आह.. ऐसा लग रहा था मानो लंड ना सही, मेरी चूत को वो जीभ से ही चोद देगा.

जब जब उसकी जीभ मेरे दाने पे आती, ऐसा लगता जान निकल रही है. मैं उसका मुँह हटाना चाह रही थी, पर उसने मुझे ताकत से पकड़ा हुआ था.

मेरे हाथ उसके बालों को नोच रहे थे. वैसे तो मेरा पानी 2 बार निकल चुका था.. ये तीसरी बार था.. और इस बार मैं ये सहन ना कर सकी. मैंने ताकत से उसे हटाते हुए चिल्ला दिया- राघव छोड़ो मुझे.. आआह्ह्ह्ह मार डालोगे क्या?
राघव- नहीं.. मेरी जान को प्यार चाहिए था, तो प्यार ही दे रहा था. अब तुम मुझे दो.

ये कहते हुए वो लेट गया और मुझे अपनी ओर खींचते हुए अपना लंड मेरे मुँह में दे दिया. मैं लंड चूसना नहीं चाहती थी, पर प्यार के बदले प्यार तो देना ही था.

मेरी जीभ उसके लंड से लेकर उसके अखरोट तक घूम रही थी. बीच बीच में वो चोदने के जैसे मेरे गले तक अपना लंड उतार रहा था. जब उलटी के जैसा होने लगा, तो उसने मुझे बैठाया और अपना लंड मेरे बोबों के बीच में रख के चोदने लगा.

मेरी चूत और गांड को छोड़ के वो हर तरह से मेरे शरीर के जरिये अपने लंड को वो तसल्ली दे लेना चाहता था.

तभी उसके मुँह से हल्की सी ‘आआह्ह्ह्ह..’ के साथ उसने अपना पानी मुझ पर ही छोड़ दिया. उसके पानी से मेरे चूचे, मेरा पेट, मेरी गर्दन सब सन चुके थे, पर अभी भी वो मुझे नहीं छोड़ना चाह रहा था.

उसने मुझे साफ़ किया, मुझे वापस लेटा दिया और मेरे मम्मों को चूसने लगा. उसका एक हाथ मेरी बुर पर था और वो मेरे दाने को मसले जा रहा था. जब जब वो उंगली मेरी चूत में डालता, तो ऐसा लगता मानो सारा लावा फूट पड़ेगा और ऐसा ही हुआ. मैं झड़ गई. मैंने उसे हटाया और उसके क़रीब होके बैठ गई. मैंने उसके होंठों को अपने होंठों में ले लिया और अपने एक हाथ से उसके लंड को ऊपर नीचे करने लगी.

एक हसीना के हाथ और होंठों में होंठ कब आदमी को रुकने देते हैं. इतनी मेहनत के बाद वो भी झड़ गया.
घर से फिर से कॉल आने की वजह से हमें निकलना पड़ा.

ये थी मेरे पहले पुरुष के संग कामुकता भरे पलों को बिताने के सुखद अहसास की कहानी, आपको कैसी लगी, जरूर बताइएगा.
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