मुन्नी की कमसिन बुर की पहली चुदाई-2

(Munni Ki Kamsin Bur Ki Pahli Chudai- Part 2)

देसी कुंवारी लड़की की चुदाई कहानी के पहले भाग
मुन्नी की कमसिन चूत चुदाई की कहानी-1
में आपने पढ़ा कि कैसे फौजी अंकल में मेरी जवानी का मजा लेना शुरू किया.

अंकल आगे बोले- लंड तो देख लिया, सूंघ भी लिया और अब इसे चाटना और चूसना रह गया है … इसे भी सीख लो. चलो इस सुपारे को थोड़ा अपने जीभ से चाटो. आज तुम्हें इत्मीनान से सब कुछ सिखा दूँगा.
मैंने लंड को सहलाया तो अंकल आगे बोले- चलो अब जीभ निकाल कर इस सुपारे पर फिराओ.

मैं अगले पल अपनी जीभ को सुपारे पर फिराने लगी. सुपारे के स्पर्श से ही मेरी जीभ और मन दोनों मस्त हो उठे. मेरी जीभ का थूक सुपारे पर लगने लगा और सुपारा गीला होने लगा.

मेरी नज़रें सुपारे की बनावट और लालपन पर टिकी थीं. मैं अपने सांवले हाथों में अंकल के खड़े और गोरे लंड को कस के पकड़ कर अपनी जीभ से धीरे धीरे चाट रही थी. अंकल मेरे तमतमाते वासना से भरे हुए चेहरे को देख रहे थे. वे मेरे लंड चूसने के तरीके से काफ़ी खुश थे. मेरे चेहरे पर एक रज़ामंदी और खुशी का भाव साफ़ दिख रहा था.

अंकल की नज़रें चेहरे पर से हट कर मेरे सांवले और नंगे शरीर पर फिसलने लगीं. अंकल अपना एक हाथ आगे बढ़ाकर मेरे काले रंग के दोनों चूतड़ों पर फेरने लगे और अंकल ने मेरे चूतड़ों के मांसल गोलों के उठान को पकड़ कर भींचना शुरू कर दिया. मुझे ऐसा लग रहा था कि अंकल के हाथ मेरे चूतड़ों के माँस के ज्यादा होने का जायजा ले रहे हों. मेरे चूतड़ों का कसाव भी बहुत था. उनके गोरे हाथ के आगे मेरे चूतड़ काफ़ी काले लग रहे थे. मैं अंकल बगल में बैठी हुई अंकल के लंड और सुपारे पर जीभ फिरा रही थी. अंकल से अपने चूतड़ों को मसलवाना मुझे बहुत अच्छा लग रहा था.

तभी अंकल बोले- कब तक बस चाटती ही रहेगी … अब अपना मुँह खोल कर ऐसे चौड़ा करो जैसे गोलगप्पा को मुँह चौड़ा कर के खाती है … समझी.

मैं यह सुन कर सोच में पड़ गयी. अपने जीवन में कभी भी लंड को मुँह में नहीं लिया था, इसलिए मुझे ये सब काफ़ी अजीब लग रहा था. वैसे तो मैं अब गर्म हो चुकी थी, लेकिन मर्द के पेशाब करने के अंग यानि लंड को अपने मुँह के अन्दर कैसे डालूँ, मैं यही सोच रही थी. मैं जीभ फिराना बंद करके लंड को देख रही थी. फिर लंड को एक हाथ से थामे ही अंकल की ओर कुछ बेचैन से होते हुए देखा.
तो अंकल ने पूछा- कभी गोलगप्पा खाया है या नहीं?

इस पर मैंने कुछ डर और बेचैन भाव से हाँ में सिर हल्का सा हिला दिया.
अंकल बोले- गोलगप्पा जब खाती हो तो कैसे मुँह को चौड़ा करती हो … वैसे चौड़ा करो … ज़रा मैं देखूं…

अंकल की ऐसी बात पर मैं एकदम लज़ा गयी क्योंकि गोलगप्पा खाते समय मुँह को बहुत ज़्यादा ही चौड़ा करना पड़ता है … तभी गोलगप्पा मुँह के अन्दर जाता है. मैं अपने मुँह को वैसे चौड़ा नहीं करना चाहती थी … लेकिन अंकल मेरे मुँह की तरफ ही देख रहे थे. उनके हाव भाव से मैं समझ गयी कि अब मुँह को चौड़ा करना ही पड़ेगा. मैं अपनी नज़रें अंकल की आँख से दूसरी ओर करते हुए अपने मुँह को धीरे धीरे चौड़ा करने लगी. अंकल मेरे मुँह को चौड़ा होते हुए देख रहे थे. जब मैं अपने मुँह को कुछ चौड़ा करके रुक गयी और मुँह के अन्दर सब कुछ साफ़ दिखने लगा.

तभी अंकल बोले- थोड़ा और चौड़ा करो और अपने जीभ को बाहर निकाल कर लटका कर आँखें बंद कर लो.

इतना सुन कर मुझे ऐसा करने में काफ़ी लाज़ लग रही थी, मैंने अब सबसे पहले अपनी आँखें ही बंद कर लीं. फिर मुँह को और चौड़ा किया और जीभ को बाहर कर लिया, जिससे मेरे मुँह में एक बड़ा सा रास्ता तैयार हो गया.

“अपने मुँह ऐसे ही चौड़ा रखना समझी … बंद मत करना … अब तुम्हारे मुँह के अन्दर की लाज़ मैं अपने लंड से खत्म कर दूँगा.”
अगले ही पल अंकल ने अपने बगल में बैठे हुए मेरे सर पर एक हाथ रखा और दूसरे हाथ से अपने लंड को मेरे हाथ से ले लिया. अंकल ने अपने लंड को मेरे चौड़े किए हुए मुँह की तरफ ले आए. अगले ही पल अंकल ने अपने खड़े और तननाए लंड को मेरे चौड़े किए हुए मुँह के ठीक बीचों बीच में निशाना लगाते हुए मुँह के अन्दर तेज़ी से ठेल दिया और मेरे सिर को भी दूसरे हाथ से ज़ोर से दबा कर पकड़े रहे.

अंकल का लंड मेरे चौड़े मुँह में एकदम अन्दर घुस गया और लंड का सुपारा मेरे गले के अंतिम छोर मेरे कंठ से टकरा गया. मैं एकदम से घबरा गयी और लंड निकालने की कोशिश करने लगी. लेकिन अंकल मेरे सिर को ज़ोर से पकड़े थे … जिस वजह से मैं कुछ कर नहीं पा रही थी.

अंकल अगले पल अपनी कमर को उछाल कर मेरे गले में लंड ठोक दिया. मुझको ऐसा लगा कि मेरी साँस ही रुक गयी हो और मैं मर ही जाऊंगी.

इस तड़फ़ड़ाहट में मेरी आँखों में आँसू आ गए और मैं लगभग रोने लगी. मैंने लंड को बाहर निकालने के लिए अपने एक हाथ से लंड को पकड़ना चाहा, लेकिन लंड का काफ़ी हिस्सा मुँह के अन्दर घुस कर फँस गया था. मेरे हाथ में लंड की जड़ और झांटें ही थीं मेरी नाक तो मानो अंकल की झांटों के जंगल में दब कर रह गयी थी. मेरी सभी कोशिश बेकार हुए जा रही थीं, क्योंकि अंकल मेरे सर के बाल पकड़ कर मुझे अपने लंड पर दबाए थे. साथ ही अंकल अपनी कमर को उछाल कर अपने लंड को मेरे मुँह में ठोके जा रहे थे.

दूसरे पल अंकल ने मेरे सिर पर रखे हुए अपने हाथ को हटा लिया. मैं तुरंत अपने मुँह के अन्दर से लंड को निकाल कर खांसने लगी और अपने दोनों हाथों से आँखों में आए आँसुओं को पौंछने लगी.
इधर लंड मुँह के अन्दर से निकलते ही लहराने लगा. तभी अंकल बोले- चलो मुँह फिर चौड़ा करो … घबराओ मत, इस बार केवल आधा ही लंड मुँह में पेलूँगा … अब दर्द नहीं होगा … मुँह में लंड को ले लो और होठों से दबा कर रखो. चलो जल्दी से मुँह खोलो.

मैंने फिर अपना मुँह खोला, लेकिन इस बार मैं सजग थी कि लंड कहीं फिर काफ़ी अन्दर तक ना घुस जाए. अंकल ने मेरे खुले मुँह में लंड बड़ी आसानी से घुसाया और लंड कुछ अन्दर घुसाने के बाद उसे आगे पीछे करने के लिए कमर को बैठे ही बैठे हिलाने लगे. वे मेरे सिर को एक हाथ से पकड़ कर ऊपर नीचे करने लगे. उनका गोरे रंग का मोटा और तननाया हुआ लंड, जो 7 इंच का होगा और 2 इंच मोटे पाइप जैसे आकार का लंड मेरे मुँह में घुस कर आगे पीछे होने लगा.

मेरी जीभ और मुँह के अन्दर तालू से लंड का सुपारा रगड़ने लगा. वहीं मेरे मुँह के दोनों होंठ लंड की चमड़ी पर कस गए थे … मानो मुँह के होंठ नहीं … बल्कि बुर की फांकें हों.
अंकल एक संतुलन बनाते हुए एक लय में मेरे मुँह को चोदने लगे. लंड से मुख मैथुन करते हुए अंकल बोले- आह … ऐसे ही रहना … इधर उधर मत होना … बहुत अच्छे तरीके से तेरा मुँह चोद रहा हूँ … शाबाश …

इसके साथ ही उनकी कमर का हिलना और मेरे मुँह में लंड का आना जाना काफ़ी तेज होने लगा. मैंने अपने मुँह के होंठों को अंकल के पिस्टन की तरह आगे पीछे चल रहे लंड पर कस लिया और नमकीन कुल्फी चूसने का मज़ा लेने लगी.

अब अंकल का पूरा का पूरा लंड और सुपारा मेरे मुँह के अन्दर आ जा रहा था. मैंने अपने होठों से लंड को दबा रखा था … जिससे कि लंड आसानी से मुँह में आ जा रहा था. मैं भी अपनी जीभ से सुपारे को दबा कर मजा दे रही थी.

कुछ देर लंड चुसाई हुई … फिर अंकल ने मुझे बिस्तर पर लिटा दिया. वे फिर से मेरी चुचि चूसने लगे और एक हाथ से नाभि के नीचे हाथ से सहलाने लगे. अंकल अपने मूसल लंड को मुँह में पेलने के साथ ही मेरी चुची को चूसने लगे और एक हाथ से मेरी नाभि के नीचे हाथ से सहलाने लगे. जिससे एक अजीब सी सिहरन मेरे पूरे बदन में होने लगी.

अंकल बीच बीच में जांघों पर से सहलाते हुए मेरी कमसिन चुत पर भी उंगली लगा रहे थे. मेरी चुत पर अभी रोंए ही आए थे, जिस पर अंकल अपना हाथ फिरा रहे थे. मेरे मुँह से सिसकारियां भी निकल रही थीं- आह … इहह … ओहह … ओहह… आहह हह इहह्ह… सीसी… सी सी सी… अंकल!
मैंने अंकल की उंगली को पकड़ कर चुत पर लगा दिया. अंकल को तो सब मालूम था. उन्होंने मेरी कमर के नीचे तकिया लगा दिया, जिससे मेरी चुत ऊपर की ओर उठ गई. मेरी चुत अब फूल गयी थी.

अंकल ने अपनी जीभ चुत के रोएं पर लगा कर चाटना चालू किया तो बहुत गुदगुदी होने लगी. मैंने अंकल के बालों को पकड़ कर चुत पर दबा दिया. उनकी जीभ अब मेरी चुत के छेद पर घुसने को हुई, तो मैंने चुत को उचका दिया. अंकल की जीभ चुत में थोड़ी सी घुस गई.

“आह … आह … आह … आहह आ…ह …”
अंकल- क्या हुआ?
मैं- उफ़्फ़ … उफ़्फ़ थोड़ा और घुसाओ न.
अंकल ने जीभ को और अन्दर घुसाया और चूँ… चूँ… कर चुत का रस पीने लगे, मुझे तो अजीब लग रहा था.

अंकल ने मुझे अपनी जांघों पर बिठाया और बोले- अब तुम लंड को अपने हाथों से पकड़ो और चुत की छेद पर रगड़ो.
मेरी चुत एकदम से गीली हो गई थी और रस बाहर की ओर फेंक रही थी. मैं अंकल के लंड को हाथ में लेकर छेद के पास रगड़ने लगी. मुझे गुदगुदी हो रही थी. अंकल ने गोदी में थोड़ी अपनी ओर जैसे खींचा कि लंड का सुपारा चुत में थोड़ा सा घुस गया… मुझे हल्का सा दर्द हुआ.

मैं- अंकल आपका लंड तो चुत में घुसने वाला है… पर दर्द क्यों हो रहा है?
अंकल ने अपना लंड मेरी बुर में सटा कर हल्का से दबाया तो लंड का सुपारा बुर के अन्दर चला गया. जैसे ही लंड का सुपारा बुर के अन्दर घुसा… मैंने ज़ोर से अंकल को पकड़ लिया और कहा- अब लग रहा है कोई गर्म चीज बुर में घुस गई है.

मैंने फिर से अपनी चूत को और ज्यादा से खोला, तो अंकल ने थोड़ा जोर का धक्का लगा दिया. मेरी चीख निकली, पर उन्होंने मेरा मुँह बंद करके एक करारा ज़ोर का झटका दे मारा, जिससे उनका मशरूम जैसा सुपारा मेरी टाइट चूत में घुस गया.
मैं दर्द से तड़प रही थी- आआहह … ओह ओह … उम्म्ह… अहह… हय… याह… ओफ्फ ओफ्फ उई ई मर गईईई … बाहररर निकालो … आहआह!
अंकल को मैं धक्के देकर पीछे हटाने की कोशिश करने लगी. साथ ही जोर से अपनी आँखें भींचते हुए चिल्ला पड़ी- आहह … ओह … ओफ्फ मैं मर गईई … निकालिए बाहररर आहआह … मुझे नहीं चुदवाना.

मुझे पुचकारते हुए अंकल ने कहा- बस मुन्नी थोड़ा बर्दाश्त कर लो… फिर मजा आएगा.
मेरी बुर में अंकल के लंड का सुपारा घुस गया था. अंकल ने मुझे गोदी में अपनी ओर खींच कर रखा था. मैं दर्द से छटपटा रही थी, पर अंकल की बांहों की मजबूती से फंसी हुई थी.
अंकल ने अपना लंड थोड़ा सा बाहर किया और एक झटका फिर से दे दिया. इस बार एक इंच तक लंड अन्दर घुस गया.

“ओफ्फ … माँआ … उईईई … मररर गईई … अब और नहीं सह पाऊंगी … प्लीज बाहर निकालिएए!” मैं रोनी सूरत बनाते हुए बोली.
“अच्छा अब नहीं करूँगा.” अंकल यह कहते हुए मेरे होंठ चूसने लगे और चुची मसलने लगे. कुछ देर चूसने के बाद जब मैं थोड़ी नॉर्मल हुई तो अंकल ने मेरे होठों को कस के चूसते हुए अपना लंड पीछे खींचा और बिना कहे धक्का दे मारा. लंड मेरी बुर को चीरते हुये थोड़ा और घुस गया.

“आआआह मम्मी मर गईई… आह आह ओफ्फ ओह प्लीज मैं आपके पैर पकड़ती हूँ… इसे बाहर निकाल लीजिए…” मेरी आँखें आँसू से भर गई थीं और मैं छूटने की प्रयास कर रही थी. जिंदगी में पहली बार मुझे इतना दर्द हुआ था… वो भी चुदाई में. मैंने कल्पना भी नहीं की थी. मुझे ऐसा लग रहा था मानो चाकू से किसी ने मेरी बुर को चीर दिया हो.

अंकल का आधे से भी कम लंड मेरी छोटी सी बुर में फंस गया था. मैं अंकल की गोद में निढाल हो गयी थी. मेरे कामरस से मेरी योनि और जांघें भीग चुकी थीं… मेरी आंखें बंद थीं. उनका मूसल समान लंड का थोड़ा ही हिस्सा मेरे अन्दर था. पता नहीं पूरा जाएगा तो क्या होगा?

मेरी बुर के अन्दर काफी जलन हो रही थी. अंकल बारी बारी से मेरी दोनों चूचियों को चूसे जा रहे थे. मैं तो कसमसा रही थी- स्स्स्स्स् … उफ़्फ़्फ़ अंकल … मुझे बहुत तेज़ जलन हो रही है, मुझे लगता है मेरी फट गयी है.
अंकल बस मेरी चूची चूसते रहे.
मैं- ऊह जलन हो रही है अंकल, कुछ करो भी अब.

तभी एक और झटके के साथ अंकल ने अपने लंड के कुछ और हिस्से को मेरी चूत में डाल दिया.
“उईईई माँ मर गई रे… उई उई उई ओहोहहो ओहोह आहहह… धीरे धीरे बहुत दर्द हो रहा है…”

मेरी देसी कुंवारी लड़की की चुदाई कहानी अभी बाक़ी है दोस्तो!
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कहानी का अगला भाग: मुन्नी की कमसिन बुर की पहली चुदाई-3

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