चूत का रसिया-1

Choot Ka Rasiya-1
कैसे हो दोस्तो… आपका मित्र राज आपके लिए अपने जीवन की एक और यादगार दास्तान लेकर आया है।

लगता है पिछले जन्म में जरूर मैं चूत के लिए तरसा होऊँगा जो भगवान ने मुझे चूतों का राजा बना कर भेजा है और झोली भर भर

कर चूतें दी हैं चोदने के लिए।

आज की कहानी सात साल पहले की है।
तब श्वेता नाम की एक खूबसूरत बला मेरी जिंदगी में आई थी मेरी गर्लफ्रेंड बन कर।
श्वेता 19-20 साल की मदमस्त अल्हड़ जवान लड़की।
नई नई जवानी फूटी थी श्वेता में तभी तो सारा दिन मस्ती के मूड में रहती थी।

मेरे घर के पास ही टयूशन पढ़ने आती थी वो।
हर समय हँसती मुस्कुराती ही नजर आती थी।
खूबसूरती ऐसी की चाँद शर्मा जाए।
खूबसूरत गोल गोल गालों वाला चेहरा, दो नागपुरी संतरो जैसी ताज़ी ताज़ी उभरी हुई चुचियाँ, दो गोल गोल कुल्हड़ों जैसे कूल्हे।

उस समय मुझे उसके सामने दुनिया की हर लड़की बदसूरत लगती थी।
हर समय यही सोचता रहता की इसे कैसे पटाया जाए।

मैं जब भी वो आती जाती तो अपने घर के आगे खड़ा होकर उसको देखता रहता।

कुछ दिन की मेहनत के बाद मैंने उसको हल्के हल्के इशारे करने शुरू किये तो उसने शुरू में बुरा सा मुँह बना कर गुस्से से भरी नज़रों

से मुझे घूरा पर मैं नहीं माना और लगा रहा अपने काम पर!

उस दिन मेरे घर पर कोई नहीं था और मैं दरवाजे पर खड़ा श्वेता का इंतज़ार कर रहा था।

यह मेरी किस्मत ही थी कि वो आज अकेली ही आई थी।

गर्मियों के दिन थे तो गली में भी कोई नजर नहीं आ रहा था।

जैसे ही वो मेरे घर के दरवाजे के पास पहुँची तो मैंने उसको आवाज दी।

‘हेल्लो श्वेता… एक मिनट के लिए रुको प्लीज…’

उसने बुरा सा मुँह बनाया और आगे जाने लगी तो मैंने गली में इधर उधर देखा।
गली में कोई नहीं था।

मैंने झट से जाकर उसका हाथ पकड़ लिया और उसे अपने घर आने के लिए कहा।

मेरी इस हरकत से वो घबरा गई पर फिर वो हिम्मत करके बोली- क्या बात है क्या कहना है तुम्हें…?
घबराहट के मारे उसका गला सूख गया था।

मैंने उसे फिर से अपने घर के अंदर आने को कहा।

वो पहले तो मना करती रही पर जब मैंने उसको बोला की गली में कोई भी आ सकता है तो वो मेरे घर के गेट के अंदर आ गई।

‘घबराओ मत… मैं तो बस अपने दिल की बात तुम्हें बताना चाहता हूँ।’

वो कुछ बोलना चाहती थी पर उसका गला सूख रहा था।

मैंने उसको अंदर चल कर पानी पीने के लिए कहा तो वो घबराहट के कारण अंदर नहीं जा रही थी।

मैंने उसको अपनी तरफ खींचा और अंदर ले गया।
वो घबरा कर पसीने पसीने हो रही थी।

मैंने फ़्रिज़ से कोल्ड-ड्रिंक की बोतल निकाल कर उसे दी पर उसने पीने से मना कर दिया।

वो बार बार जाने की जिद कर रही थी।

‘श्वेता… तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो, मैं तुमसे दोस्ती करना चाहता हूँ…’

मेरी बात सुनकर वो थोड़ा गुस्से में आकर बोली- मैं अच्छी तरह से जानती हूँ तुम जैसे लड़कों को… मुझे नहीं करनी कोई दोस्ती… मेरा

हाथ छोड़ो और जाने दो मुझे..’

मैं उसका जवाब सुनकर सकपका गया पर मैंने उसका हाथ नहीं छोड़ा और अपनी तरफ खींच कर उसको अपनी बाहों में भर लिया।

वो छुटने के लिए छटपटाने लगी पर मैंने उसको अपनी बाहों में जकड़ रखा था।

मैंने उसको दीवार से लगा कर खड़ा कर दिया और उसके होंठों पर होंठ रख दिए।

होंठों से होंठ टकराते ही वो सुन्न पड़ गई, उसका छटपटाना बंद हो गया।

लगभग दो मिनट तक मैं उसके रसीले होंठ चूसता रहा।

फिर जैसे वो एक दम नींद से जागी और मुझे धक्का देकर बाहर की तरफ भागी, उसकी किताबें वहीं पड़ी रह गई।

मैं एक बार तो घबराया कि कहीं वो बाहर जाकर शोर ना मचा दे।

पर उसने ऐसा कुछ नहीं किया।

लगभग एक घंटे बाद वो अपनी सहेली के साथ आई और बोली- प्लीज, मेरी किताबें दे दो।

मैंने उसको अंदर आने के लिए कहा तो उसने मना कर दिया।

मैंने कहा- अगर अंदर नहीं आओगी तो मैं किताबें वापिस नहीं दूँगा।

सहेली साथ में थी तो वो हिम्मत करके मेरे पीछे पीछे अंदर आ गई।

अंदर आने के बाद मैंने उसकी किताबें उसकी तरफ बढ़ाई।

उसने किताबें मेरे हाथ से ले ली और जाने लगी।

तभी वो रुकी और मेरी तरफ देख कर बोली- राज… तुम्हे ऐसा नहीं करना चाहिए था… पसंद तो मैं भी करती हूँ तुम्हें पर…

इतना कहकर वो जाने लगी तो मैंने झट से उसका हाथ पकड़ लिया।

‘श्वेता… अगर तुम भी मुझे पसंद करती हो तो कहती क्यों नहीं हो… प्लीज बोलो ना… तुम भी मुझे प्यार करती हो..?’

वो कुछ नहीं बोली बस उसने शरमा कर अपनी गर्दन झुका ली।

मैंने श्वेता को अपनी तरफ खींच कर अपनी बाहों में भर लिया।

तभी श्वेता की सहेली ने खाँसी करके अपने वहाँ होने का एहसास करवाया।

लड़की पट चुकी थी। मेरी मेहनत सफल हो चुकी थी।

श्वेता अपना हाथ छुड़वा कर अपनी किताबें उठा कर जल्दी से बाहर की तरफ चल दी।

मैं उसके मटकते कूल्हे देखता रह गया।

गेट पर जाकर उसने बड़ी अदा से पलट कर देखा तो मेरी आँख अपने आप दब गई।

मेरे आँख मारने से वो शरमा गई और फिर वो बिना रुके चली गई।

अगले एक महीने तक हम दोनों सिर्फ आँखों आँखों में बातें करते रहे पर मिल नहीं पाए।

मैं चूत का रसिया अब श्वेता को चोदने के लिए मरा जा रहा था।

एक दिन हमारे पड़ोस में कीर्तन था तो मेरी मम्मी वहाँ चली गई।

मम्मी के जाते ही मैं भी श्वेता के इंतज़ार में खड़ा हो गया।

करीब दस मिनट के बाद श्वेता आई।
उसकी सहेली उसके साथ थी पर मैंने बिना कुछ सोचे श्वेता का हाथ पकड़ा और उसको पकड़ कर अपने घर के अंदर ले गया।

उसकी सहेली गेट पर ही रुक गई तो मैंने उसको इशारे से जाने को कह दिया।

सहेली के जाते ही मैंने श्वेता को बाहों में भर के उसके होंठों पर होंठ रख दिए।

उसने पहले पहल तो छूटने की कोशिश की पर फिर मस्ती के मारे आत्मसमर्पण कर दिया।

समय थोड़ा था तो मैंने जल्दी जल्दी सब करने की ठान ली थी।

मेरे हाथ अब श्वेता के बदन का जायजा ले रहे थे।

उस दिन श्वेता ने सलवार कमीज पहन रखी थी। मैंने उसकी कमीज ऊपर उठाई और उसके ब्रा में कसी चूचियों को देखने लगा।

श्वेता ने शरमा कर अपनी कमीज नीचे कर ली और जब मैं दुबारा उठाने लगा तो उसने विरोध किया।

मैंने उसके हाथ पकड़े और एक बार फिर से अपने होंठों को श्वेता के होंठों से मिला दिया।

दूसरे हाथ से मैंने उसकी कमीज को दुबारा उठाना शुरू कर दिया।

कुछ ही सेकंड्स में उसकी चूचियाँ फिर से मेरे सामने थी।

मैंने होंठ छोड़ दिए और अपने होंठ उसकी चूचियों पर रख दिए।

श्वेता के बदन में सिहरन सी भर गई, उसका बदन काँपने लगा।

मैंने उसकी ब्रा को भी ऊपर उठाया और उसकी एक चूची को बाहर निकाल लिया और उसकी चूची के छोटे से चुचूक को अपने होंठों में

पकड़ कर चूसने लगा।

श्वेता की हालत खराब होने लगी थी, उसके बदन में बेचैनी बढ़ने लगी थी, श्वेता के लिए यह पहला एहसास था।
चूची को चूसते हुए मैंने अपना हाथ उसकी जांघों पर से घुमाते हुए उसकी चूत पर रख दिया।

चूत पानी पानी हो रही थी और सलवार तक गीली होने लगी थी।

मुझ से अब कण्ट्रोल नहीं हो रहा था, मैंने उसकी सलवार का नाड़ा खोल कर उसकी सलवार उसकी पेंटी सहित नीचे खींच दी।

उसने शर्मा कर अपनी जांघें भींच ली।

थोड़ी सी मेहनत करके मैंने उसकी जांघें खुली की तो मुझे उसकी रोयेदार झांटों के बीच गुलाबी गुलाबी चूत के दर्शन हुए।
चूत पानी पानी हो रही थी और गीली होने के कारण चमक रही थी।

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अभी आगे कुछ करने की सोचता इस से पहले ही गेट पर कुछ खटपट सुनाई दी।

शायद मम्मी आ गई थी।

मैं बुरी तरह घबरा गया और मुझ से ज्यादा श्वेता।

उसने झट से उठ कर अपनी सलवार बाँधी और किताबें उठा कर बाहर जाने लगी।

मैंने उसको पकड़ कर रोका और पिछले दरवाजे पर ले गया।

जैसे ही मम्मी ने अगले दरवाजे से प्रवेश किया मैंने श्वेता को पिछले दरवाजे से बाहर कर दिया।

मम्मी घर में आते ही सीधे रसोई में कीर्तन से लाया हुआ प्रसाद रखने चली गई और मुझे श्वेता को बाहर निकालने का मौका मिल

गया।

कहानी जारी रहेगी।

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