वो लंड चूसने आती थी

(Wo Lund Chusne Aati Thi)

मेरे दोस्त के ऑफिस में एक लड़की थी जिसका नाम था आकांक्षा.
वो बड़ी ही हँसमुख और मनमौजी लड़की थी, उसे देख कर कोई कह नहीं सकता था कि वो अन्दर क्या सोचती है, मेरा दोस्त भी उसकी बड़ी तारीफ करता था. साँवली छरहरी काया और सुन्दर नैन नक्श के साथ उसकी मुस्कान किसी का भी दिल जीत लेती थी, वो किसी भी काम के लिए मना नहीं करती थी.

एक दिन जब मैं अपने दोस्त के ऑफिस की बिल्डिंग में घुसा तो वो बाहर जाती हुई नज़र आई, उसकी आँखें भरी हुई थीं और वो लगातार आँसू पोंछती हुई जा रही थी.
मैंने उसे आवाज़ लगाई तो उस ने मेरी बात सुनी नहीं और सीधे ऑटो स्टैंड पर जा कर ऑटो ले कर निकल गई.

मैं दोस्त के ऑफिस पहुँचा तो मेरा दोस्त पवन वहाँ सर पकड़े बैठा था, मैंने पूछा तो उसने कुछ नहीं बताया बल्कि मुझे बाद में मिलने का बोल कर बाहर निकल गया.
मैंने भी वहाँ से निकलना ही उचित समझा, लेकिन पहले आकांक्षा को रोते और फिर पवन का मूड ख़राब देख कर मुझे पता लग गया कि दाल में कुछ तो काला है. मैंने ज्यादा किसी से पूछ ताछ नहीं की और पवन के ऑफिस भी जाना छोड़ दिया.

एक दिन मुझे आकांक्षा नज़र आई, मैंने उसे रोका और गाड़ी में बैठने के लिए कहा तो पहले उसने मना किया लेकिन मेरे बार बार कहने पर वो मान गई और मेरी गाड़ी में मेरे साथ बैठ गई.

मैं आकांक्षा को ले कर नजदीक के रेस्टोरेंट में गया और उस से पूछ कर उसके लिए एक डोसा और अपने लिए चिकन सैंडविच मंगवा लिया.
थोड़ी देर यूँ ही खाते पीते हुए इधर उधर की बात चीत के बाद मैंने उस से उस दिन के रोने का कारण पूछा तो उस ने कहा- पवन सर और मैं काफी नज़दीक आ गए थे और उनकी वजह से मैं प्रेग्नेंट हो गई तो उन्होंने ज़िम्मेदारी लेने से मना कर दिया और उस दिन मैंने गुस्से में एबॉर्शन करवा लिया.

मैं ये सब सुन कर हैरान रह गया था क्योंकि पवन ने मुझे कभी इस बारे में नहीं बताया था और आकांक्षा जैसी लड़की से तो उसे शादी कर ही लेनी चाहिए थी. पर फिर आकांक्षा ने बताया कि पवन की शादी कहीं और हो रही है इसलिए उसने उसके प्यार को ठुकरा दिया और अब वो अकेली और बेसहारा है.

मैंने उसे ढांढस बंधाया और उसकी जॉब के लिए दो तीन जगह बातचीत कर ली, मेरा अपना काम इतना बड़ा नहीं था कि मैं उसकी सैलरी अफ्फोर्ड कर पाता इसलिए मैंने उसे दूसरी जगह जॉब पर लगवा दिया जहाँ काम का इतना स्ट्रेस भी नहीं था और सैलरी भी पवन के ऑफिस से तो बेहतर ही थी.

आकांक्षा मेरे इस काम से इतनी खुश हुई कि उसने अपनी पहली सैलरी से मुझे ट्रीट भी दी, मैं खुश था कि वो अपने नए जॉब में खुश थी और धीरे धीरे पवन और उसकी बेवफाई को भूलती जा रही थी.
हम लोग अब ज्यादा बात चीत करने और मिलने लगे थे, मुझे आकांक्षा के साथ रहना अच्छा लगता था और शायद उसे भी मैं पसंद था. पर हम दोनों की उम्र के बीच दस बरस का अंतर था जो मुझे कुछ भी कहने से रोक रहा था.

एक दिन मैं किसी पार्टी से लेट घर लौटा और नशे में धुत्त हुआ पड़ा था, मैंने नशे में ही आकांक्षा को फ़ोन लगाया और बातें करने लगा.
बातों ही बातों में मैंने उसे कहा- आकांक्षा, मैं तुम्हें पसंद करता हूँ लेकिन हमारे बीच दस बरस का अंतर है तो मुझे कहने में डर लगता था.
और इतना कह कर मुझे नींद आ गयी.

सुबह उठ कर फोन देखा तो आकांक्षा के तीन चार मिस्स्ड कॉल पड़े थे, मैं हैंगओवर को सँभालने के लिए खड़ा ही हुआ था कि दरवाज़े की घंटी बजी.
दरवाज़ा खोला तो आकांक्षा खड़ी थी, मैंने अपने आप को संभाला और उसे अन्दर बुला लिया.

आकांक्षा मेरी हालत भांप गई थी तो उसने मेरी किचन में जाकर मेरे लिए निम्बू पानी बनाया, मैंने वो नीम्बू पानी पीया, जिसके बाद मुझे उलटी हुई और फिर मैं अच्छा महसूस करने लगा.
उसने मेरे लिए मैगी बनाई जिसे हम दोनों ने साथ में खाया.

उसने मुझसे रात के बारे में पूछा तो मैंने कहा- सॉरी यार, तुम्हें आधी रात को परेशां किया!
पर जब उसने मुझे बताया कि मैंने उसे रात को क्या कहा था तो मैं थोड़ा शर्मा गया.
आकांक्षा ने मुझे कहा- सर, मैं भी आपको पसंद करती हूँ, आप अच्छे आदमी हो लेकिन मैं अभी किसी पर भी भरोसा करने की स्थिति में नहीं हूँ.

मैंने उसे कहा- सॉरी यार, गलती से बोल दिया… लेकिन सच में मैं पसंद करता हूँ तुम्हें और अगर तुम चाहो तो हम…
मुझे बीच में रोक कर उसने कहा- हम साथ होंगे या नहीं, ये तो मैं नहीं जानती लेकिन मैं आपके साथ जब तक हूँ आपकी ही रहूँगी.

मैं उसकी बात समझ नहीं पाया था पर उस दिन के बाद वो मेरा ख़ास ख़याल रखने लगी, अपने ऑफिस से जल्दी फ्री हो कर मेरे ऑफिस आ जाती, मेरे लिए टिफ़िन लाना या बाहर से कुछ खाना पैक करवा लाना उसकी रोज़ की आदत बन गई थी.
मैं इस वक़्त को ख़ुशी से जी रहा था और चाहता था कि ये लड़की मेरी हो जाए, पर कहाँ वो इक्कीस बरस की और कहाँ मैं इकत्तीस बरस का.

एक दिन शाम के आठ बजे जब ऑफिस के सब लोग निकल चुके थे और मैं अकेला फेसबुक देख रहा था तो आकांक्षा वहाँ आई और साथ लाई भेल पूरी को प्लेट में डाल कर मेरे सामने रख दिया.
हम दोनों ने भेल खाई और मुझे एकाएक उस पर इतना प्यार आया कि मैंने उसके सर पर प्यार से हाथ फेर दिया, वो मुस्कुराई और मेरे पास अपनी कुर्सी खिसका ली.

अब आकांक्षा मुझे अपने हाथों से भेल खिला रही थी और मुस्कुराते हुए भी आँसू बहा रही थी.
मैंने पूछा- क्या हुआ रे?
तो वह बोली- बस ऐसे ही आपकी सेवा करना चाहती हूँ, आपको हँसते मुस्कुराते देखना चाहती हूँ.

यह सुन कर मैंने उसे गले लगा लिया और कहा- चाहता तो मैं भी हूँ कि तुम हमेशा मेरे साथ रहो और मैं तुम्हे खूब प्यार दूँ.
अब आकांक्षा ने मुझे कस कर अपने गले से लगा लिया था और धीरे से वो अपनी कुर्सी से उठ कर मेरी गोद में बैठ गई, मैंने उसे गोद में बिठा कर बहुत देर तक प्यार किया, उसका सर सहलाया, उसकी पीठ पर हाथ फेरा और थपथपाया.

आकांक्षा रोती भी रही और मुझे जगह जगह चूमती भी रही.
मैंने कहा- आकांक्षा, बोलो ना मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ?
तो उसने जवाब दिया- मैं आपको हुकुम बुला सकती हूँ?
मैंने कहा- हाँ, लेकिन क्यूँ?
तो बोली- मेरी माँ मेरे पापा को हुकुम बुलाती हैं और मैं एक पत्नी की तरह आपकी सेवा करना चाहती हूँ.
मैं बस मुस्कुरा के रह गया.

लेकिन उसने यहीं अपनी बात ख़त्म नहीं की, उस ने मुझे कहा- आप मेरे साथ सिवाय सेक्स के, और कुछ भी कर सकते हो.
मैं उसकी मासूमियत पर मुस्कुरा उठा और गोद में बैठी आकांक्षा के होंठों को चूम लिया.

आकांक्षा के नर्म और सुन्दर होंठ इतने कमाल के थे कि मुझे तो मीठे ही लग रहे थे, मैंने उसके रसीले मीठे होंठों को बहुत देर तक चूमा और उसने भी मेरे होठों को चूमा, मेरी जीभ को अपने मुंह में ले कर चूसा.
मैंने आकांक्षा से कहा- यहाँ ऑफिस में प्रॉब्लम हो सकती है, मेरा फ्लैट पास ही में है.
तो वो मुस्कुराई और बोली- ठीक है तो आपके घर पर ही चलते हैं.

हम दोनों मेरे फ्लैट पर पहुँचे वहाँ जा कर तो मैं जैसे एक जानवर की तरह आकांक्षा पर टूट पड़ा, उसे गोदी में उठा कर बेडरूम में ले गया और बेड पर लिटा कर उसके पूरे जिस्म को चूमने लगा.
मैंने पहले उसका टॉप उतारा, फिर उसने मेरी टीशर्ट उतार दी और हम दोनों एक दूसरे के जिस्म पर चूमने और काटने लगे.
उसने उस दिन एक स्पोर्ट्स ब्रा पहनी हुई थी जिसे उतारते ही उसके कमाल के मौसंबी जैसे चुचे बाहर आ गए जिन्हें मैंने जम कर पिया उसकी निप्पल इतनी प्यारी थीं कि मैं कभी उन्हें निहारता, कभी अपनी जीभ से छेड़ता और कभी अपने मुंह में ले कर चूसता, या दाँतों से हल्के से काट भी लेता.

आकांक्षा और मैं दोनों ही इस खेल में ऐसे रम गए थे कि हमें आस पड़ोस की दीन दुनिया की फ़िक्र ही नहीं रही, मैंने उसकी जीन्स उतारने के लिए उसकी जीन्स के बटन को खोला तो उसने मेरा हाथ झटक दिया.

मैंने फिर कोशिश की लेकिन नतीजा वही रहा.
तो मैंने पूछा- क्या हुआ?
उसने जवाब दिया- ये आज नहीं करेंगे.
और फिर उसने मेरी जीन्स घुटनों तक खिसका कर अंडर वियर के ऊपर से लंड को मसलना शुरू किया.

मेरा लंड पूरा बारह बजे की सलामी दे रहा था और आकांक्षा उसे ऐसे घूर रही थी जैसे आज तो निचोड़ ही देगी. आकांक्षा ने मेरे लंड को अपनी आँखें बंद कर के सूंघा और आँखें बंद किए किए ही उसने मेरे लंड पर अपने होंठ फिराने शुरू कर दिये, आकांक्षा मेरी अपेक्षाओं के बिल्कुल उलट एक हॉर्नी लड़की की तरह बर्ताव कर रही थी और अब वो मेरे लंड को अपने चेहरे पर फिराने लगी, उसने मेरा लंड अपने माथे पर फिर आँखों फिर नाक गालों होठों और ठोड़ी पर फिराया.

अब उसने मेरे लंड को फिर से चूमना शुरू किया और चूमते चूमते उसने मेरा लंड मुंह में ले लिया, पहले तो सिर्फ काफी देर तक लंड के टोपे को ही चूसती रही. फिर एकाएक उसने मेरे लंड को अपने गले तक अन्दर उतार लिया. मैंने भी उसके मुंह में धक्के लगाने शुरू किए तो उसने मुझे पीछे धकेल कर कहा- साँस रूकती है, आप मत करो कुछ भी, मुझे ही सब करने दो न!

मैं मुस्कुराया और कहा- जो भी कर रही हो, बड़ा ही मजेदार है, अब तुम्ही करो, मैं कुछ नहीं करूँगा.
आकांक्षा ने मेरे लंड को अपने मुंह में रखा और हाथ से पकड़ कर जैसे मंजन कर रही हो, ऐसे दाँतों पर रगड़ने लगी, फिर उसने मेरे लंड की लम्बाई पर अपने मुंह को ऐसे लगा लिया जैसे बांसुरी बजा रही हो और ऐसे ही अपना मुंह मेरे लंड पर रगड़ने लगी.

मैं आकांक्षा के इस लंड चूसने की कलाकारी को मुस्कुराते हुए देख रहा था और उसके बालों में हाथ भी फिरा रहा था.
उसने कहा- हुकुम, आपको मज़ा तो आ रहा है न?
तो मैंने भी मुस्कुरा कर कहा- मेरी जान, ऐसा मज़ा आज तक नहीं आया, तुम बस चूसती रहो.

आकांक्षा अपने जीभ से मेरे लंड को ऐसे चाट रही थी जैसे कोई लोलीपॉप या चुस्की गोला हो और उसने अपने इस कलाकारी से मेरे लंड के टोपे के साथ साथ मेरे पूरे लंड को लाल कर दिया था, अब मेरे लंड की एक एक नस खिंची हुई और साफ़ साफ़ नज़र आ रही थी.

लेकिन आकांक्षा का तो जैसे मेरे लंड से मन ही नहीं भर रहा था और उसने मेरा लंड चूसना जारी रखा, उसके थूक से लबरेज़ मेरे लंड पर उसने अपने हाथ का मूवमेंट और तेज़ कर दिया और बस मेरे शरीर में एक तेज़ गनगनाहट हुई, फिर मेरा सारा वीर्य उसके चेहरे पर, गले पर, चुचों पर गिर गया और कुछ को वो वक़्त रहते पी गई या चाट गई. आकांक्षा ने मेरे वीर्य को अपने चेहरे और चूचों पर अच्छे से मला.
मैंने पूछा- यार आकांक्षा, तुम ऐसा क्यूँ कर रही हो, ये वीर्य को अपने चेहरे पर क्यों रगड़ रही हो?
तो बोली- इस से मेरी स्किन सॉफ्ट रहती है.

मैं अब भी आकांक्षा के सर पर हाथ फेर रहा था और वो ख़ुशी से मेरी तरफ देख रही थी.
फिर जब मैंने कहा- अब चुदाई करें?
तो उस ने जवाब दिया- नहीं हुकुम, पहले ही एक से चुद के देख चुकी हूँ, अब नहीं. और आपको कोई ऐतराज़ है अगर मैं आपके लंड को सिर्फ चूस के अपना प्यार जताऊँ तो?

मैंने मुस्कुरा कर उसे उठाया और चूम लिया, इसके बाद उसने कार, ऑफिस, रेस्टोरेंट, ट्रेन… कहाँ कहाँ मेरा लंड नहीं चूसा. पर कभी चुदाई नहीं करवाई, मुझे भी कोई तकलीफ नहीं थी क्यूंकि ऐसा चुसवाना किसके नसीब में होता है.

एक दिन जब मैंने उसे पूछा- तुम मुझसे शादी कर लो, फिर हम चुदाई कर लेंगे!
तो वो बस मुस्कुराई और फिर एक बार मेरा लंड चूस कर जो गई जो आज तक पलट के नहीं आई.
मैं आज भी उसका मेरे लंड को इस पेशन के साथ चूसना मिस करता हूँ और एक बार वो मिल जाए तो सिर्फ उसी से ज़िन्दगी भर चुसवाना चाहता हूँ, क्या पता वो मुझसे शादी कर के मुझसे चुदना भी चाहे.

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