सम्भोग से आत्मदर्शन-9

(Sambhog Se Aatmdarshan- Part 9)

यह कहानी निम्न शृंखला का एक भाग है:

अभी तक इस कहानी के पिछले भाग में आपने पढ़ा कि मैं तनु की मम्मी से सेक्स की बात कर रहा था.
वो बोली- अगर मैं किसी गैर मर्द से सेक्स करूंगी तो मरने के बाद छोटी और तनु के पिता को क्या मुंह दिखाऊंगी।
मैं उनकी इस बात पर कुछ ना कह सका क्योंकि पुराने लोगों के दिमाग में पुनर्जन्म या मरणोपरांत की स्थिति भी बनी रहती है, जिसे आप सीधे सीधे गलत नहीं ठहरा सकते।

फिर भी मैंने उन्हें शांत कराते हुए कहा- अब ध्यान से मेरी बात सुनिए, सही और गलत को जानने से पहले हमें मानव जीवन, समाज, व्यवहार, शरीर और सेक्स को जानने समझने की आवश्यकता है। अगर सम्भोग इतना ही गलत होता तो ईश्वर हमारे अंदर सम्भोग क्रिया का ज्ञान और सम्भोग के लायक क्षमता या उससे मिलने वाले आनन्द को ही नहीं भरता।

हमारे मन में इन चीजों के लिए पिछले कुछ सौ सालों से सिर्फ और सिर्फ भ्रम है। किसी ने इन चीजों को अच्छा बताने के लिए अच्छे मजबूत तथ्य दे दिये तो हम भी इन बातों को अच्छा कहने लगते हैं, और किसी ने अगर इन बातों को गलत बताने के लिए कोई मजबूत तर्क दे दिया या धर्म और पुराण की बातें बता दी तो हम उन्हीं की बातों को मानने लगते हैं। वास्तव में हम इस विषय को पर्दे के पीछे रखने वाली बात समझ कर खुद ही कुछ नहीं जानना चाहते, तभी तो अपने दिमाग के तर्क को दबा कर उनसे जुड़े तथ्यों को खोजने का प्रयत्न भी नहीं करते। वास्तव में सम्भोग से आत्मदर्शन होता है और आत्मदर्शन का अभिप्राय है ईश्वर की प्राप्ति।

तो चलिए आज मैं आपको सम्भोग से आत्मदर्शन कैसे होता है, मैं आपको समझाने का प्रयास करता हूँ।
यह विषय दुनिया की उत्पत्ति से जुड़ा हुआ है। हम सभी ये जानते हैं, और पुराण भी कहते हैं कि हम सभी मनु सतरूपा नाम के जोड़े की संतान हैं।

अब सही गलत को छोड़ कर सोचें तो ये समझ आयेगा की दुनिया का सृजन ही चुदाई से हुआ है, पुराण में इस बात को सीधे सीधे नहीं लिख सकते इसलिए कह दिया जाता है कि सतरूपा और मनु ने दुनिया का सृजन किया। लेकिन असल में उन्होंने भी चुदाई ही की थी, तभी तो उनकी संतान हुई थी, अब यह सोचिए कि उनकी संतानों ने आपस में सेक्स किया तभी तो दुनिया आगे बढ़ी, और जब सब उन्हीं की संतान हैं तो आपस में भाई बहन ही तो हुए ना?

अब जरा यह सोचिए कि दुनिया में करोड़ों अरबों लोग रहते हैं, सबकी शक्ल सूरत और फिंगर प्रिंट अलग अलग हैं हम जब तक किसी नये तकनीक का प्रयोग ना करें, तब तक हम किसी की जगह अपने अंगूठे का निशान नहीं दे सकते, और इस दुनिया को और यहाँ रहने वाले प्राणियों को भगवान ने बनाया है और उसी भगवान ने हमारा लंड और चूत भी बनाया है।
जब भगवान आँखों की रेटिना लोगों की शक्ल और अंगूठे का निशान सबका अलग अलग बना सकता है तो क्या हमारे लिंग को क्या ऐसे नहीं बना सकता था कि वो जिस चूत के लिए बना है वहीं काम आये, या चूत को ऐसे बनाता कि उसके पति के अलावा किसी का लिंग उस चूत में घुसता ही नहीं… या घुस भी जाता तो किसी को मजा ना आता।

मैं जैसा कह रहा हूँ, अगर ऐसा होता तो फिर सही गलत की कोई जंग ही ना होती। पर हकीकत तो यह है कि भगवान को भी किसी भी स्त्री के किसी भी पुरुष से सम्भोग करने में कोई आपत्ति नहीं है। भगवान ने इसी लिए दुनिया में सिर्फ दो ही जाति बनाई हैं, नर और मादा, और भगवान के मैनुफेक्चरिंग का कोई नया नमूना होता है तब वो थर्ड जेंडर कहलाता है।

अब यह भी जान लेते हैं कि सेक्स क्या है, मन की कामुक तरंगें जब शरीर की इंद्रियों को जागृत कर देती है उसे हम उत्तेजना कहते हैं, उत्तेजना क्रोध के समय भी होती है, और काम क्रिया के लिए भी पैदा होती है, कामोत्तेजना के वक्त लिंग और चूत अहम भूमिका में होते हैं, लेकिन लिंग और योनि के अलावा भी शरीर के दूसरे अंग इस उत्तेजना को महसूस करते हैं, एवं मस्तिष्क का सहयोग करते हैं।

बहुत से लोग यह जानते हैं कि सेक्स के पीछे पागलपन का होना एक तरह की बीमारी है। पर यह नहीं जानते होंगे कि सेक्स में बिल्कुल भी रुचि ना लेना या सेक्स को गलत समझना भी एक तरह की बिमारी है एवं बहुत सी बिमारियों की जड़ है। तन की प्यास किसी को भी बेचैन कर देती है, लेकिन तन मन में तनिक भी कामुक लहरों के नहीं उठ पाने से व्यक्ति तन और मन दोनों से ही बीमार हो जाता है।
ऐसा इसलिए भी होता है कि सेक्स के दौरान हमारा शारीरिक और मानसिक व्यायाम हो जाता है, और इस व्यायाम का लाभ नहीं लेने वाले बीमार तो होंगे ही।

आप सबने एक और बात सुनी होगी कि किसी पुरुष के लिए पर स्त्री का ध्यान करना और किसी औरत के लिए पर पुरुष का ध्यान करना पाप है। जी हाँ आप सबने सही सुना है। पर इस बात को अच्छी तरह समझ लीजिए कि ध्यान में लाना पाप है सेक्स करने में कोई बुराई नहीं है।

अब आप इस बात का भी अर्थ समझिये… जब आप किसी को दूर से देखते हैं, या किसी से सुनकर उसके बारे में जानते हैं, फिल्म या फोटो में देखते हैं, या करीब रहते हैं या किसी के रिश्ते में रहते हैं या और किसी भी तरह से अगर आपका दिमाग किसी के प्रति प्रेरित हो गया, मतलब आपने किसी को भी अपने मन में क्षण भर के लिए भी स्थान दिया या किसी को सोच कर आपके लिंग में तनाव या चूत में पानी आ गया तो समझ लिजिए कि आपका सारा धर्म वहीं भ्रष्ट हो गया, और एक बार आपके मन में पाप आ गया तो फिर आप दुबारा कितनी बार भी सेक्स करें फिर क्या फर्क पड़ता है।

अगर सेक्स तन से होता तो हम मृत शरीर के साथ भी सेक्स कर लेते, पर हम जीवित लोगों से ही सेक्स करते हैं, और तो और बेजान होकर बिस्तर में लेट जाने वाले से भी सेक्स का मजा नहीं आता.
और एक बात सोचिए जब हम किसी महिला को घुटनों तक के कपड़े में देखते हैं, या जांघों तक के कपड़ों में देखते हैं तब मन में कुछ होता है, लेकिन उससे ज्यादा किसी साड़ी पहने या सलवार पहने लड़की का कपड़ा नीचे से थोड़ा भी उठ जाये तो हम ज्यादा आहें भरते हैं, अर्थात कम दिखने पर ज्यादा उत्तेजना आती है। इसलिए यह स्पष्ट है कि सेक्स हमारे मन से होता है ना कि केवल तन से।
और जब हमारा मन ही एक बार दूषित हो गया फिर तन की क्रियाओं को दोष देने का क्या फायदा, यह ठीक उसी तरह है जैसा कि हम उपवास रखते हैं, जब आप अन्न का दाना खा लेते हो तो उपवास टूट जाता है, यह जरूरी नहीं कि आपने भर पेट खाया हो, ऐसे ही जब आप स्नान करने जाते हो तो आप एक लोटे पानी से भी नहाओ तो नहाये हुए कहलाओगे और पूरी टंकी खाली करके नहाओ तब भी नहाये हुए ही कहलाओगे।

और मेरा मानना है कि आज के युग में हर किसी के अंदर ये गलती कभी ना कभी एक बार हो चुकी है इसलिए अब सही और गलत किसी को सोचना ही नहीं चाहिए। और इन चीजों के लिए आप सीधे सीधे जिम्मेदार भी नहीं हैं, क्योंकि मैंने आप लोगों को अपनी पिछली कहनी में बताया था कि कैसे पर्यावरण और ओजोन परत के कारण वातावरण गर्म हो रहा है, और हमारे अंदर कामोत्तेजना सहित बहुत से विकार हावी हो रहे हैं।
इसलिए अब खुल कर मजे लेने के अलावा हमारे सामने कोई दूसरा विकल्प नहीं है।

पर आप कितना भी कह लो, अपने आप को सही गलत सोचने से रोक नहीं सकते, तो गलत क्या है इसकी भी परिभाषा अच्छे से समझने की जरूरत है, ब लात्कार मतलब किसी के साथ जबरदस्ती करना… यह सबसे गलत बात है, चाहे वो कोई भी हो, छोटी, बड़ी, बूढ़ी, रिश्तेदार या बाहर की या वो कोई वेश्या ही क्यों ना हो, उसके साथ भी जबरदस्ती करना गलत है.

अनैतिक करना गलत है मतलब जानवरों, पशुओं जैसे कुत्ते बिल्ली या बकरी, घोड़े से सेक्स करना गलत है, हालांकि ये हमारे यहाँ कम ही होता है, इससे बीमारी तो होती ही है साथ ही दूषित मानसिकता का भी पता चलता है।
और शारीरिक या मानसिक रूप से अपरिपक्व लड़की से सम्भोग करना गलत है।

अब कहोगी कि तनु और छोटी तो आपकी बेटी है फिर कैसे मैंने आपको उनके सामने करने को कहा। तो उसका जवाब भी जान लिजिए- पहली बात तो मैंने आपको उनके साथ करने को नहीं कहा बस उनके सामने मुझसे सेक्स करने की बात कही. दूसरी बड़ी बात अभी बात इलाज की है, यहाँ हमें सिर्फ छोटी के इलाज का ही सूझ रहा है, और किसी कि मजबूरी का फायदा उठा कर सम्भोग करना या उसे धमका कर या ब्लैकमेल करके सेक्स करना भी बहुत ही गलत बात है।
और हाँ कुछ रिश्तों में संबंध आदिकाल से बनते आ रहे हैं जैसे जीजा-साली, देवर-भाभी, सलहज-ननदोई, ऐसे रिश्तों से सेक्स करने में परहेज नहीं करना चाहिए। हाँ लेकिन सगे बाप बेटी, माँ बेटे या भाई बहन जैसे रिश्तों को तार तार करना गलत है।

मैं मानता हूँ कि सेक्स तन की मूल आवश्यकताओं में से एक है, उसके पूरा होते ही एक अलग ही सुख और शांति का अनुभव होता है, जब मन तृप्त और शांत हो तब आप भगवान भक्ति या अन्य कोई भी काम करें, सफलता की संभावना दुगुनी हो जाती है।

सेक्स और कामोत्तेजना के दौरान हमें अपनी कमजोरी और ताकत भी अहसास होता है, बेचैनी और तृप्ति का भी अहसास होता है और सही तरीके के सहवास के लिए आपको शरीर और आत्म ज्ञान का होना मतलब सामने वाले की सोच को पढ़ने की क्षमता और खुद की इच्छा और भावना को जान कर प्रकट करने का तरीका हो यहीं से आत्म दर्शन होता है।
भगवान को किसी ने नहीं देखा लेकिन जब हम भगवान की बनाई हुई सबसे अनोखी चीज सेक्स और कामुकता से जुड़ी हुई चीजों को जानते हैं तब हम ईश्वर को जानने लगते हैं, जब हम इन सबके द्वारा तृप्त और शांत होते हैं, तब हमारे मन मस्तिष्क में स्वतः ही ईश्वर का स्मरण हो आता है। खुद की क्षमताओं को जानना इस प्रकृति के व्यवहार को समझना और ईश्वर के अलौकिक अस्तित्व और सृष्टि को अंगीकार करना ही तो आत्मदर्शन है।

सेक्स को विकृत भी हम लोगों ने किया है, जब सृष्टि को आगे बढ़ाना था तब नर और मादा ने एक दूसरे से सेक्स किया, तब ना ही जाती देखी गई और ना ही रिश्ते, बस चुदाई और सिर्फ चुदाई हुई, यह बात आदि मानव के जमाने की है, फिर धीरे धीरे मानव संस्कृति आगे बढ़ती गई, और जीवन को सरल सुगम बनाने के लिए प्राकृतिक आपदाओं से और दुनिया के अन्य जीवों से रक्षा के लिए, कुछ नियम कानून तय करने पड़े।
विवाह जैसे रिवाजों का जन्म भी इन्हीं कारणों से हुआ.

फिर लोगों ने बिमारियों का सामना किया, कुप्रथाओं का सामना किया, और एक दौर ऐसा भी आया जब एक पुरुष बहुत सी औरतों से विवाह कर सकता था, ऐसे रिवाज को सुनते ही उस समय के मजे को सोच कर पुरुष पाठकों के लंड सलामी देने लगते हैं, और महिला पाठिकाएँ उस समय के अत्याचार को कोसने लगती हैं।

वास्तव में ये सब उस समय की मांग थी, उस समय बहुत ज्यादा संख्या में युद्ध हुआ करते थे और युद्ध में हजारों लाखों पुरुष मारे जाते थे तब उनकी पत्नियों, बेटियों और बहनों को आक्रमणकारियों से बचाने के लिए किसी पुरुष की आवश्यकता महसूस की जाती थी, और वासना की विकृति से बचने के लिए महिलाओं की शारीरिक आवश्यकता की पूर्ति भी आवश्यक थी, इसलिए एक पुरुष बहुत सी स्त्रियों से विवाह कर लेता था, बाद में यह प्रथा कुप्रथा में बदल गई।

फिर एक वक्त आया जब लोग ज्यादा भक्ति भाव के चक्कर में पड़ कर पारीवारिक जीवन से दूर हो गये, तब उन्हें जीवन के मूल धारा में लाने के लिए मंदिरों या धार्मिक जगहों में कामुक मूर्तियाँ बनवाई गई।

कुल मिला कर यह कहना चाहता हूँ कि सेक्स से हम और हमसे सेक्स हमेशा से ही जुड़ा हुआ है, देश काल परिस्थिति के अनुसार कभी वही चीज सही हो गई, तो कभी वही चीज गलत हो गई। हमें तो बस सेक्स का मजा लेना चाहिए, शायद हमें आत्मदर्शन हो जाये और ईश्वर की प्राप्ति भी जाये।

आंटी मेरी बात बहुत ध्यान से सुन रही थी, उन्होंने हाँ में सर हिलाया ही था कि छोटी ने अपनी माँ को आवाज लगाई.
तब मैंने भी दुकान आने की बात कही, क्योंकि मुझे वहाँ बहुत वक्त हो गया था आंटी को मैंने इस विषय पर और विस्तार से बताया था, पर आप लोगों को ये बातें पसंद आयेगी या नहीं सोचकर संक्षेप में ही बताया है।

मैंने आंटी से कहा- कामुकता का सही ज्ञान और सही प्रयोग हमारी इंद्रियों को जागृत कर देता है। इसलिए छोटी को भी आप इस ज्ञान से धीरे-धीरे परिचित करवाते रहना, और आपकी आपबीती कहानी मैं कल सुनूँगा। क्यों सुनाओगी ना?

उन्होंने एक कातिल मुस्कान के साथ अपने होंठो को जीभ में दबाया और ना में सर हिलाया, आप सब तो जानते होंगे ऐसे ना का मतलब हाँ होता है।
पर आंटी इस उम्र में ऐसी अदा दिखायेंगी, मैंने सोचा नहीं था।

कहानी जारी रहेगी.
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