पाठिका संग मिलन-3

(Pathika Sang Milan- Part 3)

This story is part of a series:


ट्रेन का कन्फर्म टिकट नहीं मिला। मैंने फ्लाइट बुक कर ली।
विमान पूना में हवा में उतर रहा था। इसी शहर में … किसी लड़की से मिलने जाओ तो वह शहर भी कुछ स्पेशल-सा लगता है। रेलगाड़ी से धीरे धीरे घुसने में उस तरह का रोमांच महसूस नहीं होता जो वहाँ विमान से एकदम से उतरने में होता है। इसी जमीन पर चलकर आएगी … एक सुंदर काया … सुंदर कपड़ों में लिपटी, अंदर रहस्यों को छिपाए। उन्हें उतारूंगा। वे रोमांच भरे क्षण …

मेरा कल्पनाजीवी मन उड़ान भर रहा था- वह एयरपोर्ट पर आई है, हाथ में गुलदस्ता लिए, ‘स्वागत है’ कहकर मुस्कुराकर मुझे रिसीव करती, अपने साथ कार में बिठाती। नथुनों में आती उसके बदन की भीनी खुशबू। उसके कपड़ों और शरीर को बगल से चोरी चोरी देखती मेरी आँखें!

मैंने उसे मेसेज कर दिया कि होटल पहुँच गया हूँ।
सुबह की फ्लाइट थी। दोपहर का समय जब गृहिणियाँ रसोई, बच्चों, पति आदि से फुर्सत पा जाती हैं, उपलब्ध था। मैं नहा-धोकर उसका इंतजार करने लगा।

पहली बार किसी नए कपल या स्त्री से मिलना तकलीफदेह प्रक्रिया होती है। कहाँ और कैसे मिलेंगे का बड़ा सवाल होता है। कोई पहले सार्वजनिक स्थान में मिलना चाहेगा फिर होटल, कोई पहले खुद मिलना चाहेगा तब पत्नी के साथ, कोई कुछ और कहेगा। बहुत कम लोग प्रथम मिलन के लिए होटल में आने को तैयार होते हैं। होटल में भी तरह तरह की पाबंदियों के कारण लेडी गेस्ट को कमरे में ला सकना आसान नहीं होता।

नीता सीधे होटल आने को तैयार थी, पब्लिक प्लेस में किसी के देख लेने का डर था।

उसका संदेश आया ‘कृपया मेरे पति से बात करिए।’ उसके साथ एक नंबर था।
मैंने तुरंत नंबर डायल कर दिया। उधर से बड़ी धीमी हलो की आवाज आई औरत की सी … मैंने हिचकते स्वर में पूछा- क्या आप नीता जी के हस्बैंड बोल रहे हैं?
वह हँसकर बोली- मैं नीता ही बोल रही हूँ। देखना चाहती थी कि मेरे पति से मिलना चाहते हैं या नहीं।
मैंने जोर से कहा- स्वागत है उनका जी, कहाँ हैं बुलाइये।
“आते हैं।” कहकर उसने फोन रख दिया।
लेकिन फोन नहीं आया।

दुविधा में मैं कमरे को ठीक-ठाक करने लगा, हालाँकि वह ठीक ही था। पलंग पर चादर तान दी। दो कुर्सियाँ थीं। एक पर वह बैठेगी, दूसरे पर उसका पति। मैं बिस्तर पर रहूँगा।
मैंने किसी पुरुष की मौजूदगी में स्त्री से किया नहीं था। पुरुष और नारी प्रकृति के स्वाभाविक जोड़े हैं। इसमें अतिरिक्त पुरुष चला आए तो अजीब नहीं लगेगा? उत्थित भी होगा या नहीं, मुझे चिंता हुई। मैंने सारे सपने केवल नीता के साथ करने के देखे थे। लेकिन अभी सेक्स नहीं भी तो सकता है। अभी तो वे लोग केवल मिलने आ रहे हैं। इतनी दूर क्या मैं सिर्फ मिलने, बात करने आया हूँ?

रिसेप्शन ने आगंतुक के आने की सूचना दी।
“आने दो।” मैंने कहा।
दिल की धड़कन बढ़ गई।
“टं..टं … ” कमरे की घंटी बजी और मैंने दरवाजा खोल दिया।

एक छाया, जिसके पीछे फरवरी का ग्यारह बजे का सूरज चमक रहा था। दरवाजे के फ्रेम के खाली स्थान को घेरती सुंदर आकृति। लम्बे कद की। कुछ देर खड़ी रही। उसने मुझे एक क्षण से थोड़ा ज्यादा देखा और मैंने उसे उससे एक क्षण और ज्यादा देखा। दोनों मुस्कुराए। दरवाजे के पीछे और कोई नहीं था। सुरुचिपूर्ण हलके मेकअप से सज्जित मुखाकृति। तीखे नाक-नक्श की जगह कमनीयता अधिक। जैसे आकाश के तारे के तीखे कोने धरती के आंगन आकर घिस गए हों और उसका कोमल प्रकाश यथावत रह गया हो।

‘कुलीन भारतीय स्त्री’ मुझे उसके मेल के शब्द याद आए। वह मेरे दरवाजे पर थी।
“वेलकम!” मैंने पीछे हटकर शिष्टाचार दिखाया।

उसके कदम आगे बढ़े। साड़ी के नीचे उसके सैंडिल कसे पैर, जीवन में नई सुंदरता का आगमन!
‘हाय’ कहते हुए उसने नमस्ते में हाथ जोड़े। मैंने अपने बढ़ रहे हाथों को रोका और नमस्ते में जोड़ लिया। मेरी कोशिश उसने देख ली और मुस्कुराकर हाथ बढ़ा दिया। उसे हाथ में लेते ही नीचे पैंट की चेन के पास धक धक हुई … गर्म, गीले कोमल हाथ। इस हाथ को होंठों तक उठा लूँ.

मुझे उसके कमसिन होने का अनुमान था ही। लेकिन प्रत्यक्ष लड़की को देखना फिर भी अलग था। मुझसे बीस-बाइस साल छोटी। साड़ी में आई थी इसलिए थोड़ी बड़ी लग रही थी। ऐसी लड़कियाँ कभी कभी मुझे अंकल कह बैठती हैं।
वह कुर्सी पर बैठने लगी। पति कहाँ है? मैंने दरवाजे के बाहर झाँका- खाली था।
“लगा दूँ?” मैं छिटकिनी की ओर बढ़ा।
“हाँ … वो थोड़ी देर से आएंगे।”

“कैसी हैं?” उसके पास दूसरी कुर्सी पर बैठते हुए मैंने पूछा।
“अच्छी।”
“आने में कोई तकलीफ तो नहीं हुई?”
“नहीं, ये तो मुझे पूछना चाहिए था। आप पूना पहली बार आए हैं।”
“मैं तो बड़े आराम से आ गया।”

“आपका कारखाना किधर है?”
“पता नहीं, उनका आदमी आएगा लेने।”
“हूँ … और पत्नी, बच्चे कैसे हैं?”
“सब अच्छे, एकदम फर्स्ट क्लास।”

मैं उम्र के व्यवधान को लांघकर बराबरी में बात करने की कोशिश कर रहा था। देख रहा था कि मेरे बड़े होने को लेकर उसके मन में कोई निराशा या नापसंदगी का भाव तो नहीं है।
“मैडम को भी लाते तो अच्छा लगता।”
“क्या करें, उनका मौका ही नहीं बन पाया।”
“उनको मालूम है कि आपके यहाँ अकेले मिलने के बारे में?”

सवाल अप्रिय था, पर बेहद संभावित। मैंने पहले से तैयार तुरुप का पत्ता फेंक दिया- आप उनसे बात करेंगी?
“नहीं, नहीं, ऐसे ही पूछा।” बिल्कुल वही प्रत्याशित जवाब आया।
मैंने दूसरा पत्ता फेंक दिया- आपके मिस्टर कब आएंगे?
“वे …” कहकर वह दूसरी तरफ देखने लगी।

मैं चुपचाप उसे देखता रहा।
सफाई सी देती बोली- आज उनको ऑफिस से छुट्टी नहीं मिली। बहुत अर्जेंट काम आ गया।
“कोई बात नहीं। वो गाना है ना- हम भी अकेले, तुम भी अकेले, मजा आ रहा है?”
उसके चेहरे पर मुस्कुराहट लौटी।

मैंने ग्लास में पानी भरकर उसकी ओर बढ़ाया।
उसकी कलाई में चूड़ियाँ बजीं। शायद उससे मैंने कभी चैट में कहा था कि कलाई में मुझे धातु की जगह काँच की चूड़ियाँ पसंद हैं जो बजती हैं।
“शुक्रिया।” उसने थोड़ा सा पानी पिया। औरत की चिड़िया जैसी प्यास। ग्लास के किनारे पर एक जगह लिप्स्टिक का हलका सा निशान बन गया था। देखकर मन में हलचल सी हुई।
“इतने दिनों से हम बात कर रहे थे, आखिरकार आज मिल भी रहे हैं।”
“हाँ … !”

उसके चेहरे पर से आरंभिक घबराहट कम हो रही थी। बड़ी आँखें। गहरी काली भौंहें। थोड़ी ज्यादा मोटी। बीच में नीली बिंदी- स्याही के दाग जैसी प्रतीत होती। नीली साड़ी कंधों से गुजरती हुए वक्ष प्रदेश को घेर रही थी। कंधे पर नीली चोली का एक छोटा सा हिस्सा दिख रहा था। दाहिनी तरफ थोड़ी सी नंगी कमर और नीचे साड़ी के घेरे से बाहर दिखते थोड़े से पैर- साड़ी के अंदर छिपे हिस्सों के प्रति रहस्य का भाव मन में जगाते। वह आँचल का एक सिरा हाथ में पकड़े थी। मैंने खुद को याद दिलाया कि यह किसी की बीवी है। लेकिन औरत लाख किसी की बीवी, किसी की बहन हो, प्रथम परिचय में मायावी लगती ही है।

बीच बीच में चुप्पी अटपटी लगने लगती थी। हालाँकि मैं भरसक उसे खुश करने, अच्छा लगने की कोशिश कर रहा था। वैसा कुछ लग नहीं रहा था वह मेरे प्रौढ़ होने को लेकर ‘अनकम्फर्टेबल’ है।
उसका फोन बजा।
“हलो, हाँ पहुँच गई … नहीं कोई असुविधा नहीं हुई … हाँ, उन्हीं के पास हूँ … (उसने मुड़कर मुझे देखा) नहीं, कुछ नहीं … हाँ फोन करूंगी … तुम आ जाना। नहीं आओगे? … ओके, ठीक है … बाय…”

मैं सोच रहा था कितना वक्त यह मेरे पास रुक सकती है। पति से फोन में जल्दी आने की तो कोई बात नहीं हुई। काश हमारे पास पूरा दिन हो।
इस वक्त बारह बजे अल्पाहार का समय नहीं था। मैंने होटल का मेन्यू कार्ड उठाया और पूछा- कुछ चाय, कॉफी वगैरह लेंगी?
“नहीं, रहने दीजिए।”
“आप संकोच कर रही हैं। कोई ड्रिंक चलेगा?”

वह मुस्कुराने लगी। मेरी हिम्मत बढ़ गई।
“हार्ड या सॉफ्ट?” मैंने पूछा।
“बस कोई हल्का सा …!”
मैंने फोन उठाया और बीयर और वोद्का दोनों का ऑर्डर दे दिया। साथ में कुछ स्नैक्स- भुने काजू, चिकेन स्टीक्स वगैरह!
“ज्यादा ऑर्डर मत कीजिएगा।”
“ज्यादा नहीं दे रहा हूँ। हमें दोपहर का भोजन भी तो करना है।”

वह एकदम से हँस पड़ी- पहले से अपना जुगाड़ कर रहे हैं।”
“मैं तो रात की डिनर भी आपके साथ लेना चाहूँगा … और कल का नाश्ता भी- अगर संभव हो।”
“ओ हो हो … मेरे पति से पूछिए। मैं इतनी भी अच्छी नहीं।”
“मुझे तो लगता है अगर मैं आपको और सुंदर, और खिली-खिली बनाकर लौटाऊँ तो वे और खुश होंगे।”
सुनकर वह गंभीर हो गई- वे आना चाहते थे।
“लेकिन उनको समय नहीं मिला। रहने दीजिए।”

“बात दरअसल ये है कि वे खुद अपने लिए उतने इच्छुक नहीं हैं। मुझे कहा, तुम चली जाओ। अगर तुम्हें अच्छा लगे तो मैं बाद में आ जाऊँगा।”
“लेकिन बुरा न मानें, कोई अपनी पत्नी को पहले अकेले नहीं भेजता। वो भी आप जैसी खूबसूरत को … पता नहीं कैसा आदमी हो।”
“उसका डर मुझे नहीं था। ऐसी संवेदनशील कहानियाँ लिखने वाला आदमी औरतों के प्रति अशिष्ट या और कुछ होगा इसकी जरा सी भी आशंका नहीं थी।”
“थैंक्स!”

“मैंने कहा कि अगर मेरी सुरक्षा की चिंता से जाना चाहते हो तो मत जाओ। वह निश्चय ही कोई भद्र और संभ्रांत आदमी है। मेरे साथ चलो तो मेरे साथी बन कर।”
बातें रोचक होने लगी थीं। मैंने पूछा- फिर?”
“फिर वही … बताया न … कि तुम चली जाओ। पसंद आया तो बाद में आऊंगा।”

मैं उसे देखने लगा। एक खास तरह का कच्चापन, जो लड़की की अवस्था में होता है। अभी माँ भी नहीं बनी है। हालाँकि बातें वह बराबरी के स्तर पर कर रही थी। मुझसे उम्र के बड़े फासले का कोई एहसास नहीं था उसमें। होंठों पर ईषत् मुस्कान। मुस्कान को और चमकीली बनाती नाक की लौंग। क्या यह मुस्कान शिष्टाचारवश है? या सचमुच मैं इसको पसंद आ रहा हूँ? भरे होंठ, चेहरे को घेरता बालों का फ्रेम। गोल ठुड्डी, गोरा गला, गोल कंधे, साड़ी के ढीले घेरे के अंदर भराव का हल्का सा संकेत। पूरे व्यक्तित्व में परिपक्वता की जगह यौवन की गूंज थी। मुझे उन दम्पतियों की याद हो आई जो मिलने के बाद उम्र के अंतर के कारण पीछे हट गई थीं।

घंटी बजी। बेयरा अल्पाहार और पेय रख गया। मैं फ्रिज से बर्फ, सोडा आदि निकाल लाया। वह मुझे ड्रिंक बनाते देख रही थी। शायद पहला मौका होगा जब किसी गैर के साथ कमरे में अकेली थी और शराब पिलाए जाने की प्रतीक्षा कर रही थी। सिचुएशन की अनैतिकता, वर्जनात्मकता बहुत सपष्ट थे। पर शायद नई पीढ़ी के लिए यह उतना अस्वाभाविक नहीं हो।

“क्या सोच रही हैं?”
“यही कि आप क्या सोच रहे होंगे। पति को छोड़कर आपके साथ कमरे में अकेली हूँ और ऊपर से … ” उसने शराब की ओर इशारा किया।
“मैं तो फिदा हो रहा हूँ- आप पर और … अपनी किस्मत पर।”

मैंने स्नैक्स का प्लेट बिस्तर पर रखते हुए कहा- आप अपनी उम्र से काफी समझदार लगती हैं। आइये, यहाँ आराम से बैठ जाइये।
“समझदार!” उसने कौतुक में भौंहें नचाईं। वही नटखट चंचलता जो कम उम्र की विशेषता है।
उसका झुकना और सैंडल उतारना स्वीकृति और सहमति के प्रथम सूचक थे। मैंने बियर का एक छोटा-सा पैग बनाकर उसकी ओर बढ़ा दिया। ग्लास थमाते हुए उंगली उसके कोमल उंगलियों से टकराईं। वही धक, पैंट की जिप के नीचे।

अपने लिए वोदका का पैग लेकर मैं भी बिस्तर पर आ गया। उसने खिसककर मेरे लिए जगह बनाई।
“चीयर्स!”
“चीयर्स!” जाम के शीशे टकराए और उनके साथ चूड़ियाँ भी बजीं। उन आवाजों को मैंने स्मृति में दबा लिया।

सम्मोहन … लालित्य … सौभाग्य.. और क्या कहा जा सकता है स्थिति को? होटल का सुंदर बंद कमरा, साथ में अल्पवयस सुंदरी, सुरा का मादक पान। उसके गीले होंठ बुला रहे थे। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे इतनी अधिक सुंदरता और रोमांटिकता दुर्वह लगने लगी।

मैंने कुछ दूसरी बातें शुरू कीं पूना, और महाराष्ट्र के पर्यटन स्थलों के बारे में, देश-दुनियाँ के बारे में।
वह देश-दुनियाँ-राजनीति आदि से भी बेखबर नहीं थी। पढ़ी-लिखी थी। लेकिन यहाँ ऐसे माहौल में इन बातों की चर्चा शायद उसे भी अटपटी लग रही थी। और मैं किसी बौद्धिक आनन्द के लिए नहीं आया था।

जल्दी ही मैं उसकी निजी बातों की ओर बढ़ गया। उसके पति के बारे में, उसके विवाहपूर्व या विवाहोत्तर सम्बन्धों के बारे में, उसके शौकों के बारे में। ये एडल्ट कहानियाँ पढ़ने का शौक कब से चढ़ा? पति ड्यूटी पर चले जाते थे तो समय काटने के लिए। बहुत कुछ अन्य चीजें पढ़ती थी लेकिन धीरे धीरे एडल्ट कहानियों की ओर झुकाव हो गया। पहले अंग्रेजी में ही कहानियाँ पढ़ती थी, हिन्दी में घिनौनी लगती थीं। लेकिन जब मेरी कहानी पढ़ी तो मुग्ध होकर रह गई। हिन्दी में भी कोई ऐसा लिख सकता है? लगा जैसे मेरी ही कहानी हो …

मैं उसके होंठों का हिलना, आँखों का चलना देख रहा था। स्त्री-कंठ का स्वर, चुस्कियों की आवाज, साँसों की शराब मिली मीठी महक, बीच बीच में साड़ी सम्हालना, चूड़ियों की गूंज … सब कुछ जाम की चुस्कियों के ऊपर वातावरण में घुलता जा रहा था।
‘एक कुलीन भारतीय स्त्री’ का सम्मोहक पतन!

पीते समय उसके ग्लास से जुड़े होंठ और ग्लास के छोर पर दिखती लिपस्टिक की छाप कब से मुझे ललचा रही थी। एक दूसरे का जूठा चखना भी अंतरंगता का एहसास देता है। उसके पैग को देखते हुए मैंने अपना पेग खत्म किया और कहा- आइये इस बार हम अपने जाम बदल लें।

मैंने उसका गिलास अपनी ओर और अपना गिलास उसकी ओर कर दिया।
वह मुसकुराई।
“कोई प्रॉब्लम तो नहीं?” मैंने दोनों गिलासों में वोद्का ही डाल दी।
उसकी भौंहों पर बल पड़ने लगे। उसे लगा था हम सिर्फ ग्लास बदलने वाले हैं, ड्रिंक्स नहीं।
“ये तो स्ट्रॉंग होगा?”
“ज्यादा नहीं। ट्राय करके देखिए न!”

कुछ देर हिचकती रही फिर ग्लास उठा लिया।

कृपया आप मेरी कहानी पर अपनी राय नीचे कमेंट्स में एवं मेरे ईमेल [email protected] पर अवश्य भेजें।

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