बहन की सहेली

अपनी बहन की सहेली काजल उसको बहुत अच्छी लगती। जब वह उसकी बहन के पास बैठी होती तो वह बहाने- बेबहाने उसके पास चक्कर लगाता। काज़ल भी उसकी चोर आँख को ताड़ने लग पड़ी थी, पर वह हमेशा शर्म से अपनी आँखों को झुकाये रखती।

पिछले कई दिनों से काज़ल उनके घर नहीं आ रही थी। उसका दिल करता था कि वह अपनी बहन से उसके न आने का कारण पूछे पर बड़ी बहन से ऐसा पूछने का साहस वह न जुटा पाता। वह यह सोचकर बेचैन था कि कहीं काज़ल उसकी चाहत की बात उसकी बहन को न बता दे। उसकी बहन का काज़ल के घर में आना-जाना आम था।

उस दिन वह अपनी बहन के साथ कैरम खेल रहा था तो कमरे में प्रवेश करते हुए एक सुन्दर-से नौजवान ने सीधे उसकी बहन सुमीना की ओर देखते हुए पूछा- काज़ल तो नहीं आई यहाँ?

”नहीं, मेरे पास तो नहीं आई ! आप बैठिए, मैं चाय बनाकर लाती हूँ।”

उसकी बहन सुमीना ने विशेष तौर पर उस नौजवान को बैठने के लिए कहा और साथ ही उसका परिचय करवाया- सुधीर, ये काज़ल के भाई कुणाल हैं।

उसको लगा जैसे काज़ल के भाई कुणाल को देखकर उसकी बहन की आँखों में एक विशेष चमक आ गई हो।

उस दिन के बाद काज़ल का उनके यहाँ आना-जाना बदस्तूर जारी रहा, पर अब वह उस तरफ कम ही जाता था, जिधर वह उसकी बहन के साथ बैठी होती। काज़ल की अपने घर में मौजूदगी उसको बुरी लगती और वह दिन रात सोचता रहता कि दोनों सहेलियों के सम्बन्धों को वह कैसे तोड़े।

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