नीला के चक्कर में-3

प्रेषक : राजा गर्ग

नीला को मैंने थोड़ी देर के लिए छोड़ा, तो नीला उठ कर बाथरूम में चली गई और मैं उसके आने का इंतज़ार करने लगा क्योंकि अभी तो उसकी बस नथ ही उतरी थी, अभी उसकी शर्म खोलना तो बाकी था।

नीला बाथरूम में गई थी, और मैं बिस्तर पर लेटा था। आंटी मेरे बगल में ही बैठी थीं।

आंटी मुझ से बोलीं- जानवर कहीं के ! नीला के साथ ये क्या किया तूने ! ज़ल्दी क्यों करी, मान तो रही थी वो धीरे धीरे, मेरी ही गलती थी, तुझे उस पर चढ़ने दिया। अब कहीं उसने किसी से कुछ कह दिया तो मैं तो बदनाम हो जाऊँगी।

मैं बोला- आंटी वो बच्ची नहीं है, मेरी बात मानो मैंने उसकी आँखों में देखा है, तुमसे भी बड़ी वाली निकलेगी वो, देख लेना। अभी आने तो दो।

आंटी ने बोला- नहीं वो ऐसी लड़की नहीं है।

मगर मैंने कहा- आंटी फालतू बकवास मत करो, और लो ज़रा मेरा लंड साफ़ करो।

आंटी ने एक कपड़ा उठाया और मेरा लंड साफ़ कर दिया। इतने में नीला अन्दर से आ गई, वो अपने आप को धोकर आई थी। मैं बिस्तर पर बैठा था, नीला सीधा आई और आकर मेरे को धक्का मारा और मेरे ऊपर सवार हो गई। मैं बस आश्चर्य से उसे देख रहा था।

उसने आते ही कहा- अब इतना हो गया तो इसे पूरा करो वरना सबको बोल दूंगी कि तुमने और इन आंटी ने मेरे साथ ज़बरदस्ती की है।

मैं और आंटी बस उसे देख ही रहे थे।

आंटी बोलीं- नीला, यह क्या हुआ तुझे?

नीला बोली- चुप कर मोटी, सारे मज़े खुद ही लेती रही और यहाँ मैं तुझे देख-देख कर तड़पती रहती थी। अपने हाथ से अपनी ही चूत सुजा दी, हालत खराब हो गई खुजली करते-करते। इतने दिन हो गए, अब मुझे अपनी मर्ज़ी करने दे। मैं जानती थी कि यह मुश्टण्डा अलमारी के पीछे खड़ा है, मगर देखना चाहती थी कि यह क्या करता है?

मैंने आंटी के मुम्मों के निशानों पर हाथ रख कर कहा- नीला जी, आप मुझे हल्का सा इशारा पहले ही कर देतीं तो आंटी को इतनी तकलीफें नहीं झेलनी पड़तीं। कोई नहीं, अब आ गई हो कोई कसर बाकी नहीं छोडूंगा।

मैंने नीला को उसके बालों से पकड़ा और उसको चूमना चालू किया। उसके होंठों में गज़ब का रस सा था, बहुत ही मीठे लग रहे थे। मन कर रहा था कि बस उन्हें चूसते ही जाओ। वहीं आंटी साइड में कुर्सी लगा कर बैठ गई थीं।

नीला ने मुझसे पूछा- तुम्हारे ये होंठ इतने फटे क्यों है?

मैंने कहा- अपनी आंटी से पूछ लो, बता देगी।

उसने आंटी की तरफ से देखा, आंटी ने भी बस मुस्करा दिया।

खैर मैंने नीला को बेतहाशा चूमा, फिर नीला को अपने से चिपका कर, उसकी चूत में अपना लंड डाला। यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं !

वो कसमसाई और मैंने उससे पूछा- अब बताओ आराम से या….!!

नीला बोली- जैसे तुम आंटी के साथ करते हो।

आंटी बोलीं- पागल है क्या ! मार देगा तुझे ये।

वो बोली- आंटी तुम बाहर जाओ, अब मेरी बारी है।

आंटी चली गई बोलते हुए- ठीक है तेरी मर्ज़ी है।

मैंने नीला से कहा- तुम झेल नहीं पाओगी।

वो बोली- कभी तो शुरू करना ही पड़ेगा, मैं भी तो देखूँ कि मैं कितना झेल पाऊँगी…!

मैं नीला के ऊपर से उठा और फ्रिज में से एक पानी की बोतल निकाली, पूरी एक सांस में गटक गया।

उसके बाद मैं नीला के पास गया और उससे बोला- इसके आगे जो होगा, वो तुम्हारी मर्ज़ी है।

बस फिर क्या था, मैंने अपना मुँह पोंछा और नीला के ऊपर चढ़ गया और बस उसके बाद मैं नहीं रुका। नीला शुरू में बहुत चिल्लाई, वो चिल्लाती रही, मैंने उस पर बिल्कुल भी रहम नहीं बरता। कमबख्त ने मेरे हाथों पर जहाँ से मुझे पकड़ा था, अपने नाख़ून गड़ा दिए।

मैंने ऐसे में गलती से उसके मुँह को चूमना चाहा। मैंने उसक नीचे वाला होंठ पकड़ा, अपने होंठों से, मगर गलती से मेरा नीचे वाला होंठ उसके दांतों में फस गया। उसने काट दिया पूरा, बहुत दर्द हुआ, मैंने उसमे एक थप्पड़ जड़ दिया, उसका मुँह लाल हो गया।

मुझे बुरा लगा, मैंने कहा- सॉरी जान, अब नहीं करूँगा।

तो उसने प्यार से मेरे मुँह को पकड़ा और मेरे नीचे वाले होंठ को जिसमें से खून निकल रहा था, उसे चूसना चालू किया। फिर मैंने भी उसके दोनों होंठों को किस करना चालू किया। मज़ा आ रहा था कसम से, बहुत ही रसीले थे उसके वो दो होंठ।

खैर उसके होंठों को ढंग से चूस के सुजा देने के बाद, मैंने उसके मम्मों को पकड़ा। सोचने लगा कि क्या दिन थे वो, जब इन मस्त नारंगियों को आँख से ही पकड़ते थे और आज हाथ में लिए था।

मैंने उसके एक अंगूर को अपने मुँह से पकड़ा और जोर से खींचा। उसे थोड़ा दर्द हुआ, मगर मैंने उसके मम्मों को चूसना चालू रखा। वो मज़े ले रही थी और मुझे भी करवा रही थी। मज़े करते-करते फिर मैंने उसे अपनी गोदी में बिठाया, उसकी छाती को अपने सीने से लगाया और अपना लंड उसकी चूत में घुसाया। उसको कमर से जकड़ लिया, फिर मैंने उसकी चुदाई चालू की।

मज़ा तो इस बार आया, उसका वो प्यारा सा बदन जब मेरी बांहों में आहें भर रहा था। बड़ा सुखद एहसास हो रहा था। मैंने नीला को पूरी रात जी भरने तक चोदा, मगर उसका मैंने आंटी वाला हाल नहीं किया। प्यारी सी बंदी थी वो, वो कोई जुगाड़ थोड़े ही थी। जो भी था मज़ा आया उसके साथ।

मैं और नीला रात को आंटी के कमरे में ही सो गए। सुबह मेरी आँख खुली तो नीला नहीं थी। मैंने अपना बॉक्सर पहना और कमरे से बाहर आया। आंटी सामने ही थी।

मैंने पूछा- नीला कहाँ है?

आंटी बोलीं- ओहो क्या बात है हीरो, बड़ी चिंता हो रही है नीला की ! वो नहाने गई है, अभी आ जाएगी। क्या बात तूने उसका हाल-बेहाल नहीं किया, सही सलामत बाहर आई है वो।

मैं आंटी के पास गया और उनके ब्लाऊज में हाथ डाला और उनका मम्मा पकड़ लिया और उनसे बोला- आंटी, यह मत सोचो कि मैं तुम्हारे इस जिस्म की खुशबू को भूल जाऊँगा, हमेशा याद रखूँगा और तुम्हें भी भूलने नहीं दूंगा।

यह कह कर मैंने उनकी चूत को पकड़ लिया।

आंटी बोलीं- मैं भी यही चाह रही थी, अभी तू नीला से मज़े ले और मैं और तू मिलेंगे ही।

उसके बाद मैं नीला से मिल कर चला गया। मगर उसके बाद नीला ने तो हद ही कर दी, वो हर दूसरे-तीसरे दिन मुझे फ़ोन करती और मुझे अपने घर बुलाती। पहले तो वो आंटी के पीछे से बुलाती थी, मगर फिर उसने आंटी के सामने ही बुलाना चालू कर दिया।

आंटी के कमरे से नीला के कमरे का सब दिखता था। नीला खुले कमरे में से ही मुझ से काम करवाती थी, जो आंटी दूसरे कमरे से देखती रहती थीं। मगर नीला को कोई फर्क नहीं पड़ता था। वो तो नई-नवेली चुद्ल्ली थी। वो तो बस मेरे साथ सारी हरकतों को अंजाम देना चाहती थी।

एक दिन तो मैं उसके घर पहुँचा, तो उसने लॉबी में रखी टेबल पर अपने पैर पसार दिए और हमने वहीं काम चालू कर दिया। आंटी दरवाज़े पर खड़ी देख रही थी, मगर कुछ कर नहीं पा रही थी।

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