नंगी आरज़ू-3

(Nangi Aarzoo- Part 3)

This story is part of a series:

“वैसे जो पोर्न देखती या पढ़ती हो.. कभी उसकी नायिका की तरह दो या तीन लड़कों के साथ एकसाथ मजा लेने की ख्वाहिश नहीं होती?”
“अब मेरी तरह एक लंड को भी तरसती लड़की को ऐसी ख्वाहिश न हो, यह तो नामुमकिन है.. लेकिन जहां एक लड़के के लाले पड़े हों, वहां दो की तो उम्मीद करना ही चूतियापा है।”
“कोई बात नहीं.. यहां रह गयी तो जो भी इच्छा होगी, बताना। हर ख्वाहिश पूरी करने की गारंटी है।”

“एक अभी है.. पूरी कर दीजिये।” वह आंखें चमकाती हुई मुझे देखने लगी।
“क्या?”
“अपना लंड मेरी चूत में घुसा कर मेरे ऊपर लद जाइये और मुझे दबा लीजिये.. अभी सिर्फ इतना।”

मैं चुपचाप उठ गया और उसकी टांगों के बीच आ बैठा.. दोनों टांगों को घुटनों से मोड़ कर उसकी योनि उभार कर खोल ली जो लिसलिसे पानी से भीगी हुई थी और बुरी तरह चिकनी हो रही थी।

मुंह में थोड़ी लार बना कर मैंने अपने लिंग को चिकना किया और शिश्नमुंड उसकी योनि से सटा कर दबाव डालना शुरू किया। इतनी ज्यादा चिकनाहट न होती तो शायद काम मुश्किल था लेकिन योनिरस की अति आसानी पैदा कर रही थी।
उसकी योनि की अंदरूनी मांसपेशियां जो देखने में जाहिरी तौर पर बंद और अक्षत लगती थीं, वे दबाव पड़ने पर लचीली होकर फैल गयीं और उन्होंने थोड़े कसाव के साथ शिश्नमुंड को ग्रहण कर लिया।
पता नहीं दर्द या आनंद से उसकी सीत्कार निकल गयी थी, आंखें बंद हो गयी थी और होंठ भिंच गये थे। हाथ ऊपर करके उसने मुट्ठियों में चादर दबोच ली थी।

मैंने उस पर झुकते हुए जोर डालना शुरू किया और लिंग योनि की संकुचित दीवारों को फैलाता अंदर सरकने लगा। अपना आधा जोर अपने घुटनों पर ही रखते हुए उस पर लद गया और ऊपरी धड़ का वजन कुहनियों पर संतुलित करते हुए हाथ उसके नीचे पंहुचा दिये.. दबोचने के अंदाज में।

उसने अपने हाथ मेरी पीठ पर पंहुचा लिये और मुझे कस लिया, जबकि अपनी टांगों को उठा कर उनसे मेरी जांघें जकड़ लीं।
“धक्के लगाने हैं?”
“नहीं.. बस ऐसे ही पड़े रहो और मुझे इस मजे को महसूस करने दो।”

मैं खामोशी से उसी अंदाज में पड़ गया और वह मुझे जकड़े जैसे किसी और दुनिया में पंहुच गयी थी.. उसकी गर्म-गर्म सांसें मेरे सर के बालों से टकरा रही थीं।

कई मिनट यूँ ही गुजर गये।
फिर मुझे उसके शरीर में कंपन महसूस हुआ और उसकी पकड़ में और सख्ती आने लगी। मुझे लगा वह आर्गेज्म पर पंहुच रही थी। मैंने भी उसी के अनुपात में अपनी पकड़ सख्त करनी शुरू कर दी।

और अंतिम पलों में ऐसा लगा जैसे हम हड्डियां तोड़ कर एक दूसरे में समां जायेंगे। फिर वह अकड़ गयी और पिचकारी छूटने के अंदाज में गहरी साँस छोड़ती ढीली पड़ गयी।
“झड़ गयी।” थोड़ी देर बाद मैंने उस पर से हटते हुए कहा।
“हां।” उसने शिथिल स्वर में उत्तर दिया।
“कैसे कर पाई?”

“तरसी हुई थी न.. और अंजान भी नहीं थी। जब चूत में कसा-कसा लंड ठुंसा हो तब गुजरे अतीत में हुई अपनी चुदाई का एक-एक लम्हा उसी तरह याद करना वह मजा देता है कि कुछ करने की जरूरत ही नहीं। ऐसे ही झड़ जाओ।”
“मुझे अंदाजा था कि यही कर रही हो।”
“आपका दिल नहीं किया निकालने का?”
“नहीं… मैं बाकायदा तुम्हें चोद के निकालूंगा न।”

“ओहो.. इमरान भाई, आप अपनी छोटी बहन को चोदेंगे।” उसने शरारत से मुस्कराते हुए कहा।
“क्या हर्ज है.. वैसे भी इंसान एक लंड और एक चूत से ज्यादा और है भी क्या। सगे रिश्ते तक मर्यादा तो फिर ठीक है लेकिन जहां शादी जायज है वहां चोदने में क्या परेशानी.. लेकिन अगर तुम चुदना न चाहो तो कोई बात नहीं।”

“अब तो लंड को मेरी चूत की गहराई दिखा ही चुके हो और उसे मेरा रस चखा ही चुके हो। आगे-पीछे करके धक्के न लगाये तो क्या.. अब छोड़ के क्या करोगे? वैसे यह बताओ कितनी बार ले सकते हो रात भर में?”
“यह उम्र पे डिपेंड रहता है। एक ताजा जवान हुआ लौंडा सात आठ बार भी चोद सकता है लेकिन मेरे लिये तीन बार बहुत है। बाकी एक बार सुबह निकलने से पहले भी कर सकता हूँ।”
“ठीक है.. आज यह रात मेरे लिये जन्नत कर दो भाई। मैं थोड़ा फ्रेश होकर आती हूँ। बिलकुल भर गयी है पानी से।” उसने उठते हुए कहा।

बाथरूम कमरे से निकल के था.. उसे कपड़े वापस पहनने पड़े और वह नाईट बल्ब बुझाती हुई बाहर निकल गयी।

करीब पंद्रह मिनट बाद वह लौटी और दरवाजा बंद कर के मेरे पास आ कर कपड़े उतारने लगी।
“अब चाहे नाइट बल्ब जला लो या पूरी रोशनी कर लो.. आई डोंट माइंड।” वह मेरे पास लेटती हुई बोली।

मैंने उठ कर ट्यूबलाईट और सीएफएल दोनों जला दिये और वापस आ कर उसके पास लेट कर उसे देखने लगा।
“काफी देर लगा दी।”
“आज जब मौका बन गया है तो क्यों न सब मजा ले लूं थोड़ा-थोड़ा.. यह सोच कर पीछे के छेद को भी हल्का और साफ कर लिया ताकि किसी तरह का प्रेशर न बने। पिछली बार में तो मरवाने के टाईम ऐसा लग रहा था कि निकल ही जायेगा।”

“यह अच्छा किया क्योंकि शुरुआत में ऐसा होता है।”
“हां.. आपकी सरपरस्ती में रहूंगी तो समझदार हो जाऊँगी।”
“अपनी चूचियों को देखो, कितने शानदार पफी निप्पल हैं… जब ये टेनिस बॉल के आकार की थीं तब कितनी आकर्षक रही होंगी लेकिन अब देखो, अपना वजूद ही खो बैठी हैं।”

वह थोड़ी मायूसी से अपना लगभग सपाट सीना देखने लगी।

“जबकि अपनी यौन कुंठा के बावजूद तुम इन्हें संभाल सकती थी। तुम्हें कोई सुविधा भले नहीं थी मर्द की … पर तुम खुद से मजा ले सकती थी मौके बना-बना के … सही तरीके से हस्तमैथुन कर के। दिन में एक बार इनका मसाज कर सकती थी तो कम से कम आज यह हालत न होती।”

“फ्रस्टेशन में इतना गहरायी से सोच ही न पाई और आपके जैसा गाइड करने वाला कोई था भी नहीं।”
“कम उम्री में बदन यूँ ढल जाये तो वापसी की संभावनायें फिर सौ प्रतिशत रहती हैं लेकिन ज्यादा उम्र में ढला बदन वापस मिलना मुश्किल होता है। हां, मोटापा तो कभी भी आ सकता है जो बाकी जिस्म को तो कवर कर देगा लेकिन वह शेप और फिगर वापस मिलनी मुश्किल होती है।”

“क्या मुझे अब भी मिल सकती है मेरी फिगर और शेप।”
“ट्राई करो.. शायद मिल ही जाये?”
“कैसे.. प्लीज बतायें।”

“पहले तो अपने दिमाग से निगेटिविटी निकाल दो सारी। शादी नहीं हो रही तो कोई बात नहीं। दिमाग में बिठा लो कि तुम्हें शादी करनी ही नहीं और तुम खुद नौकरी करके अपना गुजारा करने में सक्षम हो। रहा मर्द का संसर्ग तो आसपास पचासों मर्द उपलब्ध है.. जब चाहोगी, अपनी पसंद के मर्द के साथ चुद सकती हो। भाड़ में झोंको सामाजिक नियमों को और समाज को।”
“यह इज्जत, मान मर्यादा के चोंचले किसी मजबूर लड़की को फ्रस्टेशन में ढकेलने वाले होते हैं… उनकी परवाह करना छोड़ो। क्या होगा, लोग पीठ पीछे बातें ही तो बनायेंगे.. बनाने दो। ये बातें तब मैटर करती हैं जब इन पर ध्यान दो। तुम इनके लिये यह सोच लो कि यह बकचोद लोग तुम्हारी शराफत के बावजूद आज तक शादी न करा सके और क्या गारंटी है कि नजदीकी भविष्य में करा भी पायेंगे।”
“थोड़ी हल्की फुल्की योगा टाईप एक्सरसाइज़ करो। दौड़ने की सुविधा मिले तो पांच दस मिनट दौड़ो, चाहे अपने घर की छत पर ही रहो। कोई बैंगन टाईप परमानेंट जुगाड़ बना के रखो, चोदने को मर्द न मिले तो उसका इस्तेमाल करो, पर घुटो मत। यह मत सोचो कि तुम्हारे पास जुगाड़ नहीं और रोज अपना मसाज करो। खासकर अपनी चूचियों और चूतड़ों का। इसका कितना असर पड़ेगा, यह नहीं कह सकता लेकिन पड़ेगा.. इसकी गारंटी है।”

“शुक्रिया इमरान भाई.. आज पहली बार खुद में इतनी पॉजिटिव एनर्जी महसूस कर रही.. मैं जरूर ऐसा ही करूँगी।”
“और अपने दिल दिमाग से यह कांपलेक्स बिल्कुल निकाल दो कि तुम्हारा बदन ढल गया या खराब है। जैसा भी है यह तुम्हारे ऊपर है कि तुम जब चाहो, इसे बेहतर बना सकती हो।”
“ओके गुरूजी।”

फिर थोड़ी देर तक हम अपनी सोच में गुम एक दूसरे को देखते रहे।

“आपका लंड तो मुर्झा कर चुहिया हो गया।” उसने हाथ बढ़ा कर मेरे लिंग को छूते हुए कहा।
क्योंकि मेरा ध्यान सेक्स की तरफ नहीं था.. अब उस उम्र और दौर में तो मैं था नहीं कि सिर्फ उसे नंगी देख कर लिंग लकड़ी हो जाता।

वह उठ बैठी और अपने ऊपरी धड़ का वजन मेरे पेट पर डालती एकदम पास से मेरे लिंग को देखने लगी।
“गुरू दक्षिणा स्वीकार करो पीर साहब।” कहते हुए उसने उस लिजलिजे अवयव को अपने मुंह में रख लिया।
“सौंदा हुआ था तुम्हारे ही रस से।”
“आज गंदा सौंदा सब रहने दो इमरान भाई। पोर्न देख-देख और अन्तर्वासना पढ़-पढ़ के सब पचासों बार कल्पनायें की हैं। आज खुद को आजमाने का मौका है.. कि वाकई में मैं क्या-क्या कर सकती हूँ।”

और न सिर्फ वह चपड़-चपड़ लिंग चूसने लगी, अपितु उल्टे हाथ से दोनों बॉल्स भी धीरे-धीरे सहलाने दबाने लगी.. और जल्दी ही वह टाईट हो गया।
“मेरे मुंह को चोदो।” वह अपना सर उसी जगह रखते हुए तिरछी लेट गयी।
और मैं उसकी तरफ करवट लेते इस तरह तिरछा हो गया कि मेरा लिंग उसके मुंह में घुस सके और अपने सहारे के लिये मैंने अपना एक हाथ उसके सर के पीछे लगा लिया। फिर धीरे-धीरे अपनी कमर को आगे पीछे करने लगा।

इतना जरूर ध्यान रख रहा था कि लिंग को उसके मुंह में उतना ही धकेलूं जितना वह सहज रूप से बर्दाश्त कर सकती थी।

थोड़ी देर बाद उसने पेट पे दबाव डाल कर मुझे रोक दिया और लिंग को मुंह से बाहर निकाल दिया।

अब उसने कुहनी के बल ऊपर होते मुझ पर दबाव डाला जिससे मैं सीधा चित हो गया और वह उठ कर मेरे इधर-उधर होती इस तरह ऊपर चढ़ आई कि उसके दो ढीली बोटियों जैसे स्तन मेरे मुंह पर आ गये।
“बहुत तरसे हैं ये… तीन साल से ऊपर हो गये इन कमबख्तों को किसी के मुंह का स्वाद लिये। चूसो और मुझे वह सुख महसूस करने दो जिसकी कल्पना मैंने एडल्ट कंटेंट पढ़ने देखने के बाद की है।”

दबाने के लिहाज से उसके वक्ष में भले जान नहीं थी लेकिन फूले हुए एरोला और निकले हुए पफी चुचुकों की वजह से चूसने चुभलाने लायक अग्रभाग तो उसके पास था ही।
उसकी पीठ पर दोनों हाथ ले जा कर उसे सहलाते हुए मैं एक चुचुक को भींच-भींच कर चूसने लगा और वह दबी-दबी आहों के साथ लुत्फअंदोज होने लगी- और जोर से खींचो.. दांतों से कुचलो। तकलीफ भी होती है तो होने दो। यह दर्द भी मुझे कई दिनों तक इस मजे को याद रखने में मददगार होगा।

उसकी ख्वाहिश के मुताबिक मैं थोड़े जोर से उसके चूचुकों को खींचने लगा। बीच-बीच में दांतों से हल्के-हल्के कुचलता और फिर उस पर गीली जीभ रोल करके उस तकलीफ को भरने की कोशिश करता।

काफी देर एक चूचुक के साथ खेल चुका तो उसने दूसरा मेरे मुंह में दे दिया और खुद मेरे सर को सहलाती, आंखें बंद किये हौले-हौले सिसकारती रही। फिर मेरे मुंह से अपने चूचुक को निकालती हुई नीचे हुई और मेरे होंठों पर अपने होंठ टिका दिये और उन्हें चूसने लगी।
मुझे उसके होंठों का स्वागत करने में देर नहीं लगी और मैं दुगने जोश से उसके होंठों को चूसने लगा। बीच में कहीं वह मेरे मुंह में जुबान घुसेड़ देती तो कहीं मैं अपनी जीभ उसके मुंह में घुसा देता।

“यकीन नहीं करोगे.. मैं इतनी तरसी हुई हूँ कि सिर्फ इसी सब से आर्गेज्म तक पंहुच सकती हूँ।” काफी देर बाद उसने मेरे ऊपर से हटते हुए कहा।
“मुझे यकीन है.. अब बताओ, कोई और इच्छा?”
“मुझे तीन लड़कों ने चोदा.. एक ने अपना लंड भी चुसवाया लेकिन किसी ने भी मेरी बुर नहीं चाटी। बस उंगलियों से सहला कर गर्म कर लिया.. मैं देखना चाहती हूं कि कैसा महसूस होता है।”
“और रोशनी के लिये भी इसी वजह से तैयार हुई हो कि सारे दुर्लभ नजारे खूब अच्छे से देख सको।”
“या बेबी.. तुम तो बहुत समझदार हो जानेमन।” उसने नशीली निगाहों से मुझे देखते हुए कहा।
“तुम्हें वासना का नशा हो रहा है.. देखो तुम आप की जगह तुम और भाई की जगह जानेमन कह रही हो।” मैंने उसे आंख मारते हुए कहा।

“चढ़ने दो न नशा मेरी जान.. तभी तो खुल के चुदवाऊंगी। भाईजान तो फिर भी रहोगे और आप का खिताब अब बस दुनिया के सामने.. अकेले में तुम एक मर्द और मैं एक औरत।”
“शाबाश स्वीटहार्ट.. अब तुम समझी सही फिलास्फी।”

मैं उठ कर तख्त से नीचे उतर कर उकड़ू बैठ गया और उसे भी एकदम किनारे खींच कर बैठा लिया। यूँ उसके अपने घुटने से मुड़े पांव फैलाने पर उसकी लंबी योनि एकदम मेरे मुंह के सामने आ गयी।
इतनी देर में वह फिर बुरी तरह गीली हो गयी थी। मैंने हथेली से रगड़ कर उसका बाहरी पानी पोंछ दिया और उसे देखते हुए अपनी जीभ निकाल कर उसकी पूरी योनि पर फिराई। नमकीन स्वाद जीभ पर आया और उसने झुरझुरी लेते हुए जोर से ‘सी’ की।

जबकि मैंने जीभ उसकी योनि की बाहरी दीवारों पर फिरानी शुरू की.. उसकी छोटी-छोटी कलिकाओं को जीभ फिरा कर, होंठों से पकड़ कर खींचा.. जीभ को गोल कर के उसके नमकीन पानी से भरे छेद में घुसाया और जहां तक संभव था, अंदर ले गया.. एक हाथ ऊपर कर के, उंगली और अंगूठे के दबाव से उसकी योनि के अंदरूनी गुलाबी भाग को खोल कर उसके छोटे से भगांकुर को चाटा।

और वह अपनी उत्तेजना को दबाने की कोशिश करती होंठ भींचे, लाल पड़ गया चेहरा लिये ‘निसार जाऊँ…’ वाली दृष्टि से मुझे देखती रही।

“इंसान भविष्य से इतना अंजान न रहता तो… काश मुझे पता होता कि एक दिन तुम पहली बार मेरी चूत को चाटोगे तो अब तक दसियों मौके मिले थे तुमसे चटवाने के। बल्कि जवान होने से पहले ही तुमसे चटवाती और चुद रही होती।”

“सही कह रही हो.. मुझे भी इन लम्हात का पहले से अंदाजा होता तो यूँ तुम्हारा तन ढलने की नौबत न आती। तुम्हारे यह थन सनी लियोनी की तरह वैसे ही फूले होते, ये चूतड़ किम की तरह बाहर उभरे होते और यह चूत पावरोटी की तरह फूली होती और तीन-तीन इंच बाहर निकली क्लाइटोरिस चूसने वाले होंठों को लुत्फअंदोज कर रही होती।”

“काश.. काश.. हम अंजाने में कितना ढेर सा सुख पीछे छोड़ आते हैं।”
वह एक गहरी साँस छोड़ती पीछे अधलेटी हो गयी और चेहरा छत की ओर हो गया। इससे उसका निचला हिस्सा और ऊपर हो गया और उसकी गुदा का छेद मेरी पंहुच में हो गया।

क्रमशः

मेरी बहन की चूत चुदाई कहानी के बारे में अपने विचारों से मुझे जरूर अवगत करायें। मेरी मेल आईडी हैं.
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