माँ बेटी दोनों चुद गईं

(Maa Beti Dono Chud Gayi)

दोस्तो, ये कहानी मुझे मेरी एक परिचिता ने मुझे भेजी थी. आप उसकी ही जुबान में इस सच्ची कहानी का मजा लीजिएगा.

मैं एक शादीशुदा खातून हूँ. मेरी उम्र इस समय करीब 52 साल है. मेरा एक ही बेटा है, उसका नाम रशीद है. एक बेटी भी है, उसका नाम सलमा है.

ये बात आज से 7 साल पहले की है, हमारा घर बहुत अच्छा तो नहीं था, पर पैसे की थोड़ी कमी थी. मेरे खाविंद शक्ल से और चरित्र से एक भले और अच्छे आदमी थे.

उस समय मैं 45 साल की थी और रशीद 27 का था. सलमा काफी छोटी थी, वो कई साल बाद पैदा हुई थी. सलमा सिर्फ 19 साल की थी, तब मेरे पति पैसा कमाने के लिए 2 साल के लिए दुबई चले गए थे. मेरा बेटा रशीद ही खेती बाड़ी देखता था, वो काफी तंदरुस्त और गठीला था.

मेरे पति को गए हुए 3 महीने बीत गए थे. कभी कभी मेरी उनसे फ़ोन पर बात हो जाती थी. मैं और सलमा एक कमरे में सोते थे और रशीद दूसरे कमरे में. दोनों कमरों के बीच में एक शीशे की खिड़की थी, जो थोड़ी सी टूटी हुई थी.

जून का आखिरी दौर था और हल्की हल्की बारिश शुरू हो गयी थी. सलमा एक चारपाई पर सोई हुई थी और एक दूसरे पर मैं लेटी थी.

रात के लगभग 11 बजे होंगे, तभी रशीद की आवाज मेरे कानों में पड़ी.

उसने मुझे कहा- अम्मी, आज सलमा मेरे साथ सोएगी.

मैं उसकी बात सुनकर हैरान रह गयी, मैंने सोचा कि मेरा बेटा मजाक कर रहा है, पर उसके मुँह से दारू की गंध आ रही थी.

सलमा दिए की रोशनी में किताब पढ़ रही थी. सलमा ने भी ये सब सुना रशीद तहमद और सैंडो कट बनियान में हमारे सामने खड़ा था.

मैंने उससे कहा- बेटा ये तेरी बहन है.
लेकिन उसने सलमा का हाथ पकड़ा और उसे खींचता हुआ अपने कमरे में ले गया.

उसकी आंखों में कामवासना झलक रही थी. उसकी बड़ी बड़ी आंखें और तावदार फड़कती मूछें देख कर मैं उसे रोकने का साहस नहीं कर सकी.

तभी मुझे दरवाजा बंद करने की आवाज आयी, मैं उसके कमरे में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पायी.

मैंने दिए की रोशनी बंद कर दी और फिर उस खिड़की के पास बैठ गयी. मुझे सलमा की बहुत फ़िक्र हो रही थी. रशीद के कमरे में भी मिट्टी के तेल का दिया जल रहा था. मुझे कमरे में दोनों की धुंधली सी परछाई दिखाई दी. वो सलमा को अपनी बांहों में पकड़े हुए था, वो सलमा के गाल चूम रहा था. तभी सलमा की आवाज आयी- भाई जान उफ़्फ़ … इतने जोर से मत दबाओ.
वो शायद सलमा की छातियां दबा रहा था और फिर कपड़ों की सरसराहट हुई.

रशीद नीचे झुक कर उसका सलवार खोलने की कोशिश करने लगा. तभी रशीद ने उसका नाड़ा तोड़ दिया, जिसके चट से टूटने की आवाज आई.

सलमा की सलवार नीचे गिर गई, रशीद ने सलमा को अपनी गोद में उठाया और बिस्तर पर धकेल दिया. वो सलमा की छोटी छोटी चूचियां चूसे जा रहा था.

फिर रशीद सलमा की जांघों के बीच में बैठ गया और कुछ सेकंड बाद उन दोनों के सिसकारने की आवाज आने लगी. मैं सिहर गयी क्योंकि रशीद काफी लम्बा चौड़ा था.

मैं खिड़की के और करीब सरक गयी, जहां शीशे के बीच से रशीद और सलमा दोनों दिख रहे थे. रशीद के चूतड़ ऊपर नीचे होने लगे और सलमा की सीत्कारें मेरे कानों में पहुँचने लगी.

मैं बेबस थी … क्योंकि एक तरफ कामवासना से तप्त मेरा 27साल का बेटा था और उसके नीचे मेरी कमसिन 19 साल की बेटी दबी हुई थी.

बस इसके बाद सलमा की सिसकारियाँ निकल रही थी. उसके कंठ से ‘उई अम्मी … उईई … मर गई … आह..’ की आवाज निकल रही थी.

सलमा एकदम कुंवारी थी. भले ही वो दोनों मेरे पेट से पैदा हुए थे, पर ये नजारा देख कर मेरे मन में भी शैतान जाग उठा. अब मुझे सलमा की तेज सिसकारियों में मजा आने लगा था. मेरा पति तो 3 महीने से बाहर था और उसे 2 साल बाद आना था. रशीद अपने चूतड़ों की रफ़्तार बढ़ाने में लगा था और सलमा उसके पलंग पर अपने भाई से चुद रही थी.

रशीद ने सलमा की करीब 15 मिनट तक बहुत चुदाई की और फिर रशीद के चूतड़ उछलने बंद हो गए. साथ ही कमरे में अब सलमा और रशीद की तेज तेज सांसों की आवाज आ रही थीं.

रशीद करीब 2 मिनट तक सलमा के ऊपर लेटा रहा और फिर खड़ा हो गया.

सलमा भी उठी और उसने जैसे ही अपनी सलवार को उठाया, मैं तुरंत ही अपनी चारपाई पर लेट गयी. रशीद ने दिया बुझा दिया था.

दो मिनट बाद सलमा जब कमरे में आयी, तो उसने मुझे जगाया.

मैं तो जाग ही रही थी, उसने अपनी सलवार को पकड़ रखा था. मैंने बहुत धीरे से उसके कान में पूछा- सलमा क्या हुआ?
उसने बताया कि भाईजान ने मेरा नाड़ा तोड़ा और फिर …
मैंने पूछा- और फिर क्या सलमा? बता न … रशीद सो गया है … डर मत!
तब उसने कहा कि उसने मेरे अन्दर डाल दिया.
मैंने फिर पूछा- अरे ऐसा क्या था, जो उसने डाल दिया और तू इतने जोर जोर से क्यों चीख रही थी?
सलमा ने कहा- अम्मी, उसका वो बहुत तगड़ा है.
मैंने उससे फिर पूछा कि अरे तगड़ा है, तभी तो उसने इतनी खेती बाड़ी संभाल रखी है.
सलमा ने कहा- नहीं अम्मी आपको नहीं पता … उसका बहुत बड़ा है. मैं इसलिए चीख रही थी.

ये सुनते ही मेरी चूत में सुरसुराहट होने लगी. मैंने उससे पूछा कि अरी करम जली साफ साफ बता … उसका क्या बड़ा है?
तब सलमा ने मेरे कान में धीरे से कहा- अम्मी उसका नीचे का बहुत बड़ा और सख्त है.
मैंने पूछा- तुझे अच्छा लगा या बुरा?
वो नीचे मुंह करके मुस्कुराने लगी.

मैंने उससे कहा- भूल कर भी अपनी किसी भी खाला या सहेली या अपने अब्बू को ये बात मत बताना … बहुत ज्यादा बदनामी होगी, कोई हमारे घर का पानी भी नहीं पिएगा.
ख़ैर इसके बाद मैंने उसे नई सलवार और कच्छी दी. फिर हम दोनों सो गई.

मगर मेरी आंखों से नींद गायब हो चुकी थी. मैं जैसे तैसे सलमा के सोने का इंतजार करती रही और मुझे अब रशीद के खर्राटों की आवाज भी सुनाई दे रही थी.

रात के करीब डेढ़ बजा होगा, जब मुझे यकीन हो गया कि सलमा भी थक कर गहरी नींद में सो गयी है, तो मैं दबे पांव उठी और रशीद के कमरे में चली गयी.

वहां का नजारा देख कर मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं. मैंने मोमबत्ती की रोशनी में देखा कि चादर पर कुछ खून के निशान थे और रशीद सिर्फ बनियान में सीधा लेटा हुआ था. उसका मुरझाया हुआ लंड बीच में से थोड़ा सा घूमा हुआ था.

रशीद का लंड देख कर मेरी आंखें तनी की तनी रह गईं. इतना मोटा और लम्बा लंड मैंने अपनी 42 साल की जिंदगी में कभी नहीं देखा था. मैं डरते डरते उसके करीब खड़ी हो गयी और उसका लंड गौर से देखने लगी.

मुरझाई हुई अवस्था में भी उसका लंड क्या गदराया हुआ था … साला मुरझाने के बाद भी करीब साढ़े छह इंच रहा होगा. उसकी मोटाई का तो मुझे अंदाजा ही नहीं हुआ. पर ये तय था कि रशीद का तन्नाया हुआ लंड मेरी मुट्ठी में नहीं आ सकता था. वो ऐसा था जैसे कोई लम्बा मोटा खीरा हो. उसके लंड का सुपाड़ा चमड़ी से ढका हुआ था. अभी बस 1 रूपए के सिक्के के बराबर गोलाई नजर आ रही थी, जो पीछे की तरफ मोटी होती जा रही थी. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि अब मैं क्या करूँ.

उसकी काली घुंघराली झांटें देख कर मेरी नियत ख़राब हो गयी थी. मैं जल्दी से बाहर आयी और सीधा गुसलखाने में घुस गयी. मेरी बुर गीली हो गयी थी, यहां तक कि उसमें से चाशनी जैसी टपकने लगी थी. इस वक्त मेरी बुर लंड मांग रही थी. मैंने जल्दी से अपनी एक उंगली बुर में घुसेड़ कर चलायी, पर आग बढ़ती गयी. मैं तेज तेज उंगली चलाने लगी और फिर मेरा पानी झड़ गया.

झड़ने के बाद जैसे मुझे होश आया. मुझे अपनी करनी पर बहुत शर्म आयी कि मैं अपने बेटे के लंड को देख कर ही कामुक हो गयी थी.

मैं थकी सी वापिस कमरे में आ गयी और सो गयी. सुबह कब हुई मुझे पता ही नहीं चला.

जब मैं सोकर उठी, तो घर में रशीद नहीं था … वो खेतों की तरफ चला गया था. सलमा रसोई में चाय बना रही थी. सलमा ने मुझसे … और न मैंने सलमा से कोई बात की.

दिन में रशीद का खाना मैंने उसके कमरे में रख दिया था. तीन दिन तक हम तीनों में से किसी ने भी इस मुद्दे पर बात नहीं की. लेकिन मैं रशीद का लंड देख चुकी थी … इसलिए अब मैं भी उसका स्वाद चखना चाहती थी.

मैं कोई ऐसी तरकीब सोचने लगी कि रशीद मेरे जाल में फंस जाए, पर मैं उसे सीधे नहीं कह सकती थी. क्योंकि वो मेरा बेटा था.

इसलिए मैंने सोचा कि ऐसा काम किया जाए, जिससे उसका ध्यान मेरी तरफ आ जाए.

मैं चौथे दिन शाम को नहायी और पुराना पेटीकोट उतार कर खूंटी पर लटका दिया. अपनी उतारी हुई ब्रा को मैं रोज धो दिया करती थी. मैंने ब्रा धो कर सूखने टांग दी.

फिर मैंने रशीद का दाढ़ी बनाने वाला रेज़र उठाया और अपनी बुर की झांटें साफ कर लीं. साफ़ की हुई झांटों को एक कागज में पुड़िया में बंद करके साबुनदानी के नीचे दबा दीं. मुझे पता था कि पुड़िया खुल जाएगी और रशीद को मेरी झांटें दिख जाएंगी. क्योंकि झांटों के बाल देखने से जवान लड़के बहुत उत्तेजित हो जाते हैं.

ये दो काम करने के बाद मैं रसोई में खाना बनाने लगी. शाम को जैसा मैंने सोचा था, वैसा ही हुआ.

मैं कुछ खोजने का नाटक करने लगी और बाथरूम की तरफ गयी. साबुनदानी के नीचे मेरे झांटों के बाल वाली पुड़िया गायब थी. रशीद आंगन के किनारे खड़ा था और सलमा जानवरों को चारा दे रही थी. सलमा को इस बारे में कुछ भी पता नहीं था.

मैं पेटीकोट और ब्रा लेकर बाहर आयी, तो रशीद हल्के हल्के से मुस्कुरा रहा था.
उसने मुझसे पूछा- अम्मी जान, क्या ढूंढ रही हो?

मैं उसकी बात दरकिनार करती हुई तेजी से कमरे की तरफ जाने लगी, तो रशीद बोल पड़ा- अम्मी वो पुड़िया में क्या था?
मैंने कहा- मुझे नहीं पता कि कौन सी पुड़िया?

बहरहाल रशीद समझ चुका था कि आज शाम को अम्मी ने अपनी बुर साफ की हैं. चूँकि आज चौथा दिन था, तो रशीद का लंड भी जोर मार रहा होगा.

उस रोज जुलाई की 2 तारीख थी. मैंने खाना रशीद के कमरे में रख दिया था. रात 9 बजे रशीद ने पहले दारू पी. आज उसने एक क्वार्टर पूरा गटक लिया था और फिर खाना खाया.

सलमा कमरे में सो गयी और इससे पहले कि रशीद आता, तो हो सकता है वो सलमा को पकड़ कर ले जाता … क्योंकि उसका हाथ अब खुल चुका था.

रात को 10 बजे मैं दालान में आकर चारपाई पर लेट गयी.

सलमा सो चुकी थी, मैंने मैक्सी पहन रखी थी. बारिश तेज होने लगी. मैंने जानबूझ कर अपने पैर रशीद के कमरे की तरफ कर रखे थे और बाहर घुप्प अंधेरा छाया हुआ था. मैंने अपनी मैक्सी कूल्हों तक उठा दी थी … ताकि रशीद मेरी गोरी चौड़ी गांड देख ले. मेरी बुर साली एकदम मक्खन की तरह चिकनी हो गयी थी. मैंने उस पर हल्का सा घी भी लगा दिया था.

मैं रशीद के बारे में ही सोच रही थी कि वो कहीं सलमा को उठा कर न ले जाए. पर मेरी किस्मत अच्छी थी कि मुझे अपने पास रशीद के खड़े होने का अहसास हुआ.

वो सिर्फ बनियान और कच्छे में था. मेरा बदन पसीने से सराबोर हो गया. मैंने रशीद के हाथ में एक छोटी सी टॉर्च देखी. उसने टॉर्च की रोशनी मेरी गांड पर मारी, मैंने करवट लेकर अपनी बाईं जाँघ सीधी फैला रखी थी और दाईं जाँघ घुटने से मोड़ कर अपने पेट से सटा रखी थी. मैंने जानबूझ कर ऐसा किया था, ताकि वो बुर देख कर अपना आपा खो दे.

वो कुछ सेकंड मेरी गांड घूरता रहा और फिर उसने मुझे अपने दोनों हाथों में ऊपर उठा लिया.

मैंने उसे हल्के से डाँटते हुए कहा- अरे कौन है ये?
हल्के स्वर में मैंने ऐसा कहा था, ताकि सलमा की नींद न खुले.

रशीद ने कहा- अम्मी मैं रशीद … अन्दर चलो, सब बताता हूँ तुम्हें कि मैं कौन हूँ? तुम चुप रहना … वर्ना ठीक नहीं होगा.

मैंने जानबूझ कर उसके हाथों से निकलने की कोशिश की, लेकिन फिर उसने मुझे अपने कंधे पर डाल लिया और कमरे में ले गया.

उसने मुझे उसी पलंग पर धकेल दिया. जहां उसने मेरी बेटी सलमा की चूत फाड़ी थी.

मैंने उससे कहा- रशीद, मैं तुम्हारे अब्बू जान को तुम्हारे बारे में सब कुछ बता दूँगी.
उसने बेशर्मी से कहा- हां बताओगी तो तब … जब तुम बताने लायक रहोगी.
मैंने चौंकने का नाटक करते हुए कहा- अरे ऐसा क्या करोगे तुम?
रशीद ने कहा- अम्मी बातों में मेरा टाइम मत ख़राब करो.

उसने मेरे होंठ चूसने शुरू कर दिए. मेरा रोम रोम कांप रहा था क्योंकि मेरा खुद का बेटा मेरी चूत की प्यास बुझाने वाला था.

मैंने जानबूझ कर उससे कहा- रशीद, अगर सलमा को हम माँ, बेटे के बारे में मालूम चल गया … तो वो क्या सोचेगी?

उसने तड़ से मेरी गालों की 5 -6 चुम्मियां ले लीं. उसके मुँह से दारू की गंध आ रही थी.

उसने मेरी मैक्सी उठा कर मेरी चूचियां अपनी हथेली में जैसे ही कसीं, मेरा रोम रोम आनन्द से कांपने लगा.

उसने मुझे खींचा और खुद पलंग पर उकडूँ बैठ गया. उसने मेरी गांड के नीचे अपनी हथेलियां रख दीं और मेरी गांड अपनी छाती पर टिका ली. उसकी चौड़ी छाती पर मेरी गांड टिकी हुई थी. तभी उसने अपना मुँह मेरी सफाचट चूत पर रख दिया. मेरे तन बदन में काम वासना की आग लग गयी.

रशीद ने मेरी चूत को पहले सूंघा और फिर अपनी जीभ से चाटने लगा. वो मेरी चूत के अन्दर जीभ डालने की कोशिश करने लगा. मेरी टांगें उसके कन्धों पर टिकी थीं.

मैं आनन्द में आकर अपने चूतड़ों उठाने लगी. बीच बीच में मैं बेहद धीरे धीरे कह रही थी- रशीद मुझे जाने दो … तुम्हारे अब्बू बहुत नाराज होंगें.
उसने फुसफुसा कर कहा- अब्बू ने अम्मी जान … ऐसा मजा कभी नहीं दिया होगा.

वो सही कह रहा था … क्योंकि उसके अब्बू मुझे 3 मिनट से ज्यादा नहीं चोद पाते थे. वो उतनी देर में ही झड़ कर सो जाते थे.

रशीद ने मेरी बुर चाटी और फिर अपना कच्छा निकाल दिया. जैसे ही मेरी नजर उसके बड़े लौड़े पर पड़ी, मेरी हवा निकल गयी. उस दिन तो मैंने उसका मुरझाया लौड़ा देखा था … पर इस समय उसका लौड़ा फुंफकार रहा था.

रशीद मेरे ऊपर चढ़ गया और उसने मुझसे कहा- अम्मी मुँह खोलो.
मैंने कहा- नहीं रशीद, ये सब पाप है.

उसने तुरंत मेरे गाल पचकाये और मेरे खुले हुए मुँह में अपना लौड़ा पेल दिया. मेरे मुँह में उसका लौड़ा ढंग से नहीं आ रहा था, पर फिर भी वो जोर लगा रहा था. मैंने उसका लौड़ा हटाने के बहाने हाथ में पकड़ा … आह क्या शानदार सख्त लौड़ा था … और साइज! मैंने नापने के लिए अपनी हथेली को फैलाया, तो उससे भी करीब एक इंच लम्बा था. इसका मतलब उसका लंड करीब नौ से दस इंच के बीच का रहा होगा.

मैंने मुश्किल से उसका लौड़ा एक मिनट ही चूसा होगा कि उसने मेरे दोनों पैर पकड़े और घसीट कर पलंग से नीचे लटका दिए. इससे मेरी मैक्सी उलट गयी थी.

इस वक्त उसका लौड़ा ऐसा दिख रहा था जैसे कुठले का बिंटा हो.

रशीद मेरे करीब आया. मैं न ना करती रही … पर तभी उसने मेरे दोनों पैर अपने हाथों से हवा में उठा दिए और मेरी बुर को सहला कर लौड़े को मेरी बुर पर टिका दिया. फिर उसने मेरी चूत की फांकों में अपने सुपारे को फंसाया और एक जोरदार धक्का दे मारा.

मैंने अपने होंठ भींच लिए. उसने एक ही झटके में करीब 3 इंच लौड़ा घुसा दिया था … जो कि सीधे मेरी बच्चेदानी की गांठ पर लगा. इससे मेरे बदन में एक आनन्ददायक टीस उठने लगी.

इसके बाद रशीद ने अपने चूतड़ आगे पीछे करने शुरू किए और मैं मीठे मीठे दर्द के साथ ही आनन्द में गोते लगाने लगी.

बाहर बहुत जोर से बारिश लग गयी थी और इधर मेरी बुर को रशीद अपने बड़े लौड़े से बुरी तरह चोद रहा था. उस समय मैं 46वें साल में थी और रशीद 27 साल एक तंदरुस्त नौजवान लड़का था. उसके लंड की ऐसी करारी चोट मेरी बच्चेदानी पर आज तक उसके अब्बू भी नहीं मार सके थे.

मेरी भी वासना में डूबी सिसकारियां निकलने लगीं. साथ साथ मेरी बुर भी चीखने लगी. लंड के अन्दर बाहर होने से मांस के रगड़ने की साफ आवाज आ रही थी. उसका बड़ा लंड मेरी नाभि तक मार कर रहा था.

रशीद का बेजां मोटा लंड मेरी बच्चेदानी को बार बार पीछे धकेल रहा था. रशीद मस्ती में आकर मेरे तलुए चाट रहा था और मेरी चूचियां तो इतना अधिक उछाल मार रही थीं कि मुझे बार बार पकड़नी पड़ रही थीं. मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे कोई रबर का सख्त मोटा डण्डा मेरी चूत में डाल और निकाल रहा हो.

मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि मैं बस अब मूतने वाली हूँ और अब…

अचानक रशीद के चूतड़ों की रफ़्तार बहुत बढ़ गयी और उसने एक झटके से अपना लौड़ा बाहर निकाल लिया. तभी न चाहते हुए भी मेरी पेशाब की तेज धार रशीद की छाती पर पड़ी. पहले एक फिर दो और फिर तीन पिचकारियां उसके सीने पर जा लगीं.

मैंने सोचा था कि शायद रशीद झड़ने वाला है, पर इसके साथ ही उसने फिर से मेरी बुर में लौड़ा पेल दिया. मेरी बुर से झाग बाहर आने लगा था. उसने मेरी बुर को, जो बिना लंड के कई महीनों से सूखी पड़ी थी, एकदम मक्खन की तरह मुलायम कर दी थी.

रशीद मुझे इसी पोजीशन में करीब 20 मिनट तक चोदता रहा. उसने अच्छी तरह मेरा बैंड बजा दिया था. फिर मेरा मुँह खुल गया, उसने अपने दोनों आंड मेरी गांड के छेद पर सटा दिए थे. मेरी टांगें आनन्द में थरथराने लगी थीं. रशीद की आंखें एकदम बंद हो गयी थीं, वो एकदम भी नहीं हिल रहा था.

हम दोनों ऐसे ही करीब 15 सेकंड तक रहे होंगें और फिर जो गरम गरम 10 -12 धारें उसके लौड़े ने मेरी बच्चेदानी के मुँह पर मारीं, मैं शब्दों में उस आनन्द का जिक्र कर ही नहीं सकती.

इसके बाद रशीद ने मेरे पैर नीचे लटका दिए और मेरे ऊपर झुक गया. रशीद थक चुका था, मुझे उस पर दया आ रही थी क्योंकि उसकी हालत हारे हुए जुआरी की तरह हो गयी थी.

मैंने उसके सिर पर हाथ फेरा … वो पसीने में बुरी तरह नहाया हुआ था. उसके मुँह से बस एक ही शब्द निकला- अम्मी, अब्बू को मत बता देना.
मैं तो खुद ही चाह रही थी कि कहीं ये बात सुनकर उसके अब्बू का भरोसा न टूट जाए.
खैर मैंने उससे कहा- रशीद कोई बात नहीं, जवानी में ऐसा ही होता है, बस अब उठ और आराम कर.

रशीद उठा उसका लौड़ा आधा मुरझा चुका था. मेरी चूत लबालब भर चुकी थी और मेरी आग ठंडी हो चुकी थी.

मैं और रशीद दोनों एक दूसरे की बांहों में खो गए. मैंने उसकी चुम्मियां लीं, क्योंकि रशीद ने मुझे नशे में वो दे दिया था, जो एक जवान औरत को किसी मर्द से चाहिए होता है.

रशीद ने कच्छा पहना और इसके बाद मैंने दिया बुझा दिया और चुपचाप दबे पाँव अपने कमरे में आकर चारपाई पर लेट गयी. कब मेरी आंख लगी, मुझे पता ही नहीं चला.

जब सुबह मैं उठी, तो मेरी बुर सूजी हुई थी. मैंने अपनी जांघ उठा कर नीचे शीशा लगा कर देखा. रशीद ने मेरी बुर का भोसड़ा बना दिया था. मेरी चूत के होंठ बाहर निकल आये थे. मुझे बहुत शरम आयी कि रशीद से कैसे सामना करूंगी.

रशीद और मैं आमने सामने आने से कतरा रहे थे. वो उठा और खेतों में चला गया.

मैं 2 घंटे बाद सलमा को कह कर गयी कि बेटी मैं रशीद को चाय देने जा रही हूँ.

मैं हिम्मत करके रशीद के पास गयी और उसे आवाज लगायी. पहले तो उसने अनसुनी कर दी.

फिर कहा- अरे अम्मी, तुम!
मैंने कहा- रशीद घर में सलमा के सामने बात नहीं हो सकती थी, इसीलिए यहां आयी हूँ.
उसने नजरें नीचे करके कहा- अम्मी कहो.

मैंने उससे कहा- रशीद रात जो कुछ भी हम दोनों के बीच में हुआ है, उसमें जितने कसूरवार तुम हो, उतनी ही मैं भी हूँ. तुम जवान हो और मुझे खुले में नहीं सोना चाहिए था.
उसने कहा- अम्मी खुदा के वास्ते ये सब मत कहो … रात को मैं नशे में था.
मैंने उससे कहा- रशीद तुमने चार रोज पहले भी सलमा को नशे में कली से फूल बना दिया था … पर शर्माओ मत, मुझे तुम बहुत पसंद हो. रही बात अब्बू की, तो उन्हें न सलमा बताएगी और न मैं … हां बस तुम्हारी सेहत के लिए कह रही हूँ कि अब तुम दारू छोड़ दो और हम दोनों को तुम जब तुम्हारा मन करे, अपने कमरे में ले जाना. मैं कुछ दिन में ही सलमा को बता दूंगी कि मैं भी रशीद के पलंग पर सो चुकी हूँ. इसलिए अब तुम शर्म छोड़ो और चाय का मजा लो.

ये सुनकर रशीद के चेहरे पर लालिमा आ गयी. वो शर्मा रहा था.
फिर उसने कहा- ठीक है अम्मी हम दोनों यहीं चाय पिएंगे … पर पहले मैं पेशाब कर लूँ.

ये कह कर वो खड़ा हुआ और उसने अपना तहमद उठा कर अपना औजार बाहर निकाला और मेरी बगल में खड़ा होकर मूतने लगा.

उसका खड़ा लंड देख कर मैं भी मूतने बैठ गयी.

फिर हमने चाय पी, उसने मुझे एक पेड़ की आड़ में ले जाकर चुम्मी ली और कहा- अम्मी अब जाओ … सलमा शक कर रही होगी … बस इतना ध्यान रखना कि सलमा के बच्चा न ठहर जाए.

मैं घर आ गयी और सोचने लगी कि रात रशीद ने कैसे मेरी प्यास बुझाई थी. मैं हैरान थी कि आखिर इतना बड़ा लंड भी होता होगा लड़कों का.

पर खैर मेरी और सलमा की किस्मत बेहत अच्छी रही कि हम दोनों माँ बेटी एक ही लंड से जिंदगी भर चुदती रहीं.

आप सभी के सामने मैंने अपनी सच्ची सेक्स कहानी लिखी है … मुझे नहीं मालूम कि आप लोगों का क्या रिएक्शन होगा. बरहराल जो भी आपको लगे, मुझे लिखिएगा.
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